जब पहली बार...मेरी हथेली पर उनके नाम की मेहंदी रची थी, तब माँ ने बड़े चाव से कहा था कि यह रंग जितना गहरा होगा, प्यार उतना ही अटूट होगा।
आज शीशे में खुद को देखती हूँ तो लगता है कि वह रंग शायद प्यार का नहीं, बल्कि उन समझौतों की स्याही थी जो मुझे ताउम्र खुद को मिटाकर लिखने थे। शादी की उस पहली रात से लेकर आज के इस सन्नाटे तक, सफर लंबा रहा है, पर मेरा अपना कुछ भी नहीं रहा।
जिस दिन फेरे हुए, उसी दिन मेरी पहचान के आगे एक विराम लगा दिया गया और मुझे सिखाया गया कि अब मेरा हर सच,
किसी की सुविधा के अनुसार तय होगा।
अजीब तमाशा है इस दुनिया का। जब तक मैं घूँघट की ओट में सिसकती रही, सब चुप थे। जैसे ही मैंने अपनी रीढ़ सीधी की और ज्यादतियों के खिलाफ एक दीवार खड़ी की, पूरा शहर मेरे दरवाजे पर सुलह की पोटली लेकर खड़ा हो गया।
यह सुलह नहीं है, यह तो मेरे वजूद की नीलामी है। वे लोग, जो बरसों मेरे आंसुओं से बेखबर थे, आज अचानक मेरे घर की शांति के रखवाले बन बैठे हैं। वे पक्ष और विपक्ष की बात नहीं करते, वे बस मेरी गलतियों का हिसाब लेकर आए हैं।
उनका कहना है कि मेरा स्वाभिमान दरअसल मेरा अहंकार है, और मेरा बोलना उनकी शान में गुस्ताखी।
भीड़ के शोर में खड़े वे सुलहकार क्या जानें कि सुलह के रास्ते असल में टूटे हुए कांच के टुकड़ों पर चलने जैसे हैं। कोई यह क्यों नहीं पूछता कि जिस दहलीज को मैंने मंदिर माना था, वहीं मेरी रूह को हर दिन क्यों कुचला गया?
जब वह चिल्लाते थे, तब यह समाज बहरा क्यों हो जाता था?
नहीं, तब तुम सब निजी मामला कहकर अपनी खिड़कियाँ बंद कर लेते थे।
लेकिन जब मैंने अपनी आवाज खो दी, तो सबको मेरे मौन से तकलीफ होने लगी। उलाहनों की बौछार कुछ ऐसी है कि कलेजा छलनी हो जाता है— अरे, चार लोग क्या कहेंगे?
बच्चों का मुंह तो देख लिया होता!
औरत का धर्म झुकना है, पत्थर होना नहीं।
इन नसीहतों के शोर में मेरी वह चीख कहीं खो गई है, जो मैंने उस रात मारी थी जब पहली बार मैंने अपनी सिसकियों के बीच उनको समझाने की कोशिश की थी,
तब तो उन्होंने कहा था—तुम्हारी औकात क्या है मेरे बिना? दो वक्त की रोटी मिल तो रही है ,छत है,आखिर दिक्कत क्या है तुमको? परिवार में रहना है तो थोड़ा बहुत सहना तो पड़ेगा ही।
वे शब्द आज भी मेरे कानों में तेजाब की तरह गिरते हैं। उस दिन उन्होंने मुझे नहीं, बल्कि उस रिश्ते की पवित्रता को मारा था। जब मेरी आंखों में आंखें डालकर कहा था—तुम्हारे जैसी हजार औरतें हैं, जो कितना कुछ सहती है और चुपचाप रहती हैं,एक तुम ही स्पेशल आई हो कहीं की महारानी,अगर इतनी ही तकलीफ़ है तो चली क्यों नही जाती?
तब सुलह करवाने वाला यह समाज कहाँ था? तब ये उलाहने देने वाले लोग किस गहरे सन्नाटे में सोए थे?
आज जब मैं उससे बैर ठाने बैठी हूँ, तो मैं अकेली नहीं हूँ। मेरे आस-पास नसीहतों का एक पूरा जंगल खड़ा है। हर कोई जज है, हर कोई वकील है, बस कोई इंसान नहीं है।
उनके लिए मेरा दुख सिर्फ एक घरेलू अनबन है,
पर मेरे लिए यह अपनी बिखरी हुई किर्चियों को समेटने की आखिरी कोशिश है। वे चाहते हैं कि मैं वापस उसी नरक में मुस्कुराते हुए चली जाऊं ताकि उनकी परंपरा का भ्रम बना रहे।
वे मेरी गलतियाँ ऐसे गिनाते हैं जैसे किसी अपराधी का कच्चा चिट्ठा हो, पर उनके गुनाह? उन्हें तो मर्दानगी के पर्दों के पीछे सलीके से छुपा दिया गया है।
उनको थोड़ा सा गुस्सैल है, तू ही सह लिया कर बोल के माफ कर दिया गया और मुझे अड़ियल कहकर कटघरे में खड़ा कर दिया गया।
शादी से आज तक का यह सफर दरअसल मुझे खुद से दूर करने की एक साजिश थी। ये जो सुलह करवाने आए हैं,दरअसल मुझे बचाने नहीं, बल्कि मुझे फिर से बांधने आए हैं। उनकी नजरों में मेरा अपना कोई पक्ष ही नहीं है—मैं या तो सहनशील हूँ या गलत।
बीच का कोई रास्ता उन्होंने छोड़ा ही नहीं। मेरी आँखें आज नम हैं, पर कमजोर नहीं। यह नमी उन बरसों के लिए है जो मैंने दूसरों की खुशियों की वेदी पर चढ़ा दिए।
कलम गवाह है कि एक औरत की सबसे बड़ी गलती सिर्फ यह होती है कि वह एक दिन यह तय कर लेती है कि अब उसे और नहीं टूटना है।
लेकिन.....
मिटा दिये मैंने वो हर हर्फ़ जो किसी और ने लिखे थे,
अब मैं अपनी तकदीर का मुकम्मल कोरा कागज़ हूँ।
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