सबसे ज़्यादा अधिकार अगर किसी का होता है आपकी भावनाओं पर, तो वह कोई और नहीं आपका जीवनसाथी होता है।
लेकिन अजीब बात है, हम अक्सर सबसे ज़्यादा लापरवाही भी उसी के साथ करते हैं।
कई लोग कहते हैं,
“उम्र के साथ भावनाएँ मर जाती हैं।”
असल में भावनाएँ नहीं मरतीं, हम उन्हें ज़िंदा रखने की कोशिश छोड़ देते हैं।
उम्र बढ़ने के साथ ज़िंदगी भारी हो जाती है।
ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती हैं, थकान बढ़ती है,
मन में शिकायतें जमने लगती हैं।
धीरे-धीरे इंसान “महसूस करना” कम कर देता है,
और सिर्फ़ “निभाना” सीख लेता है।
यही वह जगह है जहाँ रिश्ते चुपचाप बदलने लगते हैं।
शुरुआती दिनों में हम बिना कहे समझते थे,
छोटी-छोटी बातों पर खुश हो जाते थे,
एक मुस्कान, एक स्पर्श, एक इंतज़ार काफ़ी होता था।
लेकिन समय के साथ हम यह मान लेते हैं कि
अब सामने वाला हमें समझ ही लेगा,
अब प्यार जताने की ज़रूरत नहीं,
अब साथ रहना ही काफ़ी है।
यहीं सबसे बड़ी भूल होती है।
प्यार कोई स्थायी भावना नहीं है,
प्यार एक लगातार किया जाने वाला अभ्यास है।
जैसे शरीर को हर दिन खाना चाहिए,
वैसे ही रिश्ते को हर दिन
ध्यान, समय और संवेदना चाहिए।
बहुत लोग यह कहते हैं
“अब वो फीलिंग नहीं आती।”
सच यह है कि
फीलिंग अपने आप नहीं आती,
उसे बुलाना पड़ता है।
कभी जानबूझकर ध्यान देना पड़ता है,
कभी मन न होते हुए भी स्नेह दिखाना पड़ता है,
कभी अहंकार छोड़कर पहला कदम बढ़ाना पड़ता है।
शुरुआत में यह बनावटी लग सकता है।
लेकिन मनोविज्ञान कहता है
व्यवहार भावना को जन्म देता है,
भावना हमेशा व्यवहार से पहले नहीं आती।
मतलब,
अगर आप प्यार जैसा व्यवहार करते रहेंगे,
तो दिमाग धीरे-धीरे उसी भावना में ढल जाएगा।
रिश्ते टूटते इसलिए नहीं कि प्यार खत्म हो जाता है,
बल्कि इसलिए कि
हम सामने वाले को
“देखना” बंद कर देते हैं।
हम सुनते नहीं,
हम समझने की कोशिश नहीं करते,
हम मान लेते हैं कि
अब सब अपने आप चल जाएगा।
लेकिन कोई भी रिश्ता
अपने आप नहीं चलता।
जो रिश्ते लंबे समय तक खूबसूरत रहते हैं,
उनमें लोग उम्र के साथ
ज़्यादा समझदार होते हैं,
ज़्यादा नरम होते हैं,
ज़्यादा सजग होते हैं।
वे यह नहीं कहते कि
“अब समय नहीं है”,
वे कहते हैं
“यही समय है।”
क्योंकि वे जानते हैं
आज अगर ध्यान नहीं दिया,
तो कल सिर्फ़ आदत बचेगी,
और आदत में गर्माहट नहीं होती।
ज़िंदगी बहुत लंबी नहीं है।
और रिश्ते तो उससे भी छोटे होते हैं।
जब सब कुछ होते हुए भी
कोई रिश्ता सूना हो जाए,
तो उसका दर्द
सबसे गहरा होता है।
इसलिए,
जब समय है.... महसूस करें।
जब सामने वाला है....देखिए।
जब रिश्ता है....उसे सींचिए।
क्योंकि अंत में
सबसे ज़्यादा अफ़सोस
उसी चीज़ का होता है
जिसे बचाया जा सकता था
लेकिन हमने उसे
“बाद में” के लिए टाल दिया।
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