Sunday, January 11, 2026

कुछ स्त्रियाँ आज भी हैं...

कुछ स्त्रियाँ आज भी हैं

जो समय के संग चलती हैं,

पर समय में घुलकर

अपनी जड़ों को नहीं भूलतीं।


वे जानती हैं

मोबाइल की चमक,

शहरों की तेज़ रफ्तार,

और आधुनिकता की भाषा,

फिर भी उनके मन में

रीति-रिवाज

अबूझ बोझ नहीं,

सांसों की तरह स्वाभाविक हैं।


आज भी वे

मांग में पूरा सिंदूर भरती हैं,

आधा नहीं, संकोच में नहीं,

पूरी आस्था के साथ,

जैसे ललाट पर

परंपरा स्वयं उतर आई हो।


बड़ी सी बिंदी

उनकी भौंहों के मध्य

केवल श्रृंगार नहीं,

संस्कृति का विराम-चिह्न है,

जो कहता है,

“मैं हूँ,

और अपनी पहचान के साथ हूँ।”


कलाई भर चूड़ियाँ

जब चलती हैं तो

घर के आंगन में

मधुर नाद भर देती हैं,

उनकी खनक में

माँ की सीख,

दादी की कथाएँ

और नानी का आशीष

एक साथ बज उठता है।


वे पूरा श्रृंगार करती हैं,

किसी को दिखाने के लिए नहीं,

बल्कि अपने भीतर

स्त्री होने के उत्सव को

प्रतिदिन मनाने के लिए।


साड़ी उनके लिए

वस्त्र नहीं,

विरासत है—

जिसकी एक-एक सिलवट में

पूर्वजों का अनुशासन,

मर्यादा और

संयम बुना हुआ है।


वे आज भी

उन नियमों में रहती हैं

जो कभी घरों ने गढ़े थे—

जहाँ रिश्ते पहले आते थे,

और स्वार्थ बाद में।

कहने को लोग उन्हें

पुरानी सोच का कह दें,

पर सच यह है—

यही स्त्रियाँ

समय की आँधी में

संस्कृति की दीया-बाती बनकर

जली रहती हैं।

वे पीछे नहीं,


वे जड़ हैं


और जड़ें ही तय करती हैं

कि वृक्ष

कितनी ऊँचाई तक जाएगा।

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