Tuesday, December 30, 2025

श्रीचक्र में नौ व्यूह होते हैं

श्रीचक्र में नौ व्यूह होते हैं, इसमें से प्रत्येक व्यूह का आदि-अंत जीव और शिव से होता है। जो मानव शरीर के मूल बंधनों का द्योतक है।


यह सभी 9 व्यूह इस प्रकार के होते हैं-


1 ) काल व्यूह आत्मा का विस्तरण अनंत है जिसका कोई अंत नहीं है जहां समय अमर्यादित है लेकिन माया के पाश में काल व्यूह की रचना जीव को विस्मृत करके बार बार जन्म मरण के चक्र में डाल देता है।


2 ) कुल व्यूह आत्मा की कोई न जाति होती है न कुल। आत्मा को सिद्धो की भाषा में नामकुल कहा जाता है। यहाँ जीव भाव में व्यूह रचना कर अपनी कुल की मर्यादा में बांध दिया जाता है। जैसे हिन्दू मुस्लिम ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र।


3 ) नाम व्यूह नाम का बंधन ....जन्म से पहले न कोई तुम्हारा नाम था नहीं पहचान ....तब तुम कौन थे? क्या नाम था तुम्हारा ....जब पहली बार शरीर धारण किया था ...तुम कौन थे ....यह विस्मृति कराने हेतु बार बार नामकरण करके शक्तियां छिनी जाती है।


4) ज्ञान व्यूह कुछ ज्ञान प्राप्त क्या कर लिया ....कोई पंडित कोई महाराज कोई योगी कोई तपस्वी बन गया ....पर मूल ज्ञान न पा सका... वेद पढ़ा पुराण पढ़े ...विज्ञानं पढ़ा ...कुछ पूर्व जन्म की स्मृति से .....तो कभी देवताओ की कृपा से कुछ ज्ञान मिल गया उसके अहंकार में फस गया।


5 ) चित व्यूह इस व्यूह रचना में ब्रह्मा विष्णु महेश भी फंस चुके है ....चित के व्यूह से ब्रह्म से जड़ माया की उत्पत्ति हुई ..... इस विचार करने वाले प्रोग्राम से ही कल्पना को हकीकत मान कर .....जीव काल सृष्टि में फंस चुका है ...इस व्यूह से ही सूक्ष्म और कारण जगत निर्मित हुआ।


6 ) नाद व्यूह यह व्यूह रचना .....भाषा प्रयोजन का बंधन है और इसी मान्यता से शक्तियों का आविर्भाव होता रहता है जो अलग अलग भाषा के बंधन में फंस जाता है। जिसके कारण मनुष्य को यह लगता है कि मैं अभी जी रहा हूं।


7 ) बिन्दु व्यूह यह रचना समाज से जुडी है जो समाज अस्तित्व रखता है। और तुम उनके अंश हो यह समझ बिन्दु व्यूह में फंसाती है।


8 ) आत्म व्यूह आत्मा का व्यूह ...आत्मसाक्षात्कार नहीं ....किन्तु खुद को आत्मा मान कर चलना साक्षी व्यूह में फसना कहते है जहा जीव.... आत्म कक्षा में जा कर फस जाता है और वो परमात्मा नहीं बन पाता है।


9 ) जीव व्यूह यह अंतिम व्यूह रचना है जब तक चेतना और चैतन्य की जाग्रति सुषुप्ति में होती रहेगी .....तब तक तुम कभी ब्रह्मा से लेके कीट तक की योनि में ....जीव भाव से ही प्रकट होते रहोगे .....इच्छाओ के गुलाम बने रहोगे।


इस 9 व्यूह रचना में से जो बाहर लाती है ....वो श्री चक्र साधना है ...बिना यह चक्रव्यूह को पार करे कोई भी जीव मुक्त नहीं हो पाता।

और नही अपने मूल लक्ष्य .... यानि लक्ष्मी की प्राप्ति कर पायेगा

.. आरम्भ शिव फिर अंत जीव.. आरम्भ जीव है तो अंत शिव.. इस क्रिया को ही श्री विद्या योग कहते है. इसी 9 व्यूह की रचना में से बाहर आ गये तो, हम शिव बन जायेगे

क्यूंकि कुंडलिनी ने खुद का अस्तित्व बचाने के लिए - जीव को माया में कैद करने के लिए - यह 9 आवरण का प्रयोग किया कि - जीव को शिव होने का भाव जाग्रत न हो !


सृष्टि के सुरुचिपूर्ण संचालन के लिए यह माया आवश्यक है. लेकिन करो़ड़ों में एक जीव जो श्रीविद्य़ा का आश्रय लेता है, वह जन्म मृत्यु के इस बंधन को तोड़कर मोक्ष प्राप्त करता है।

बीमारी में कौनसा ड्राई फ्रूट्स खाए

बहुत जरूरी है ये जानना किस बीमारी में कौनसा ड्राई फ्रूट्स खाए #जरूरत अनुसार कैसे और कब खाए ड्राई फ्रूट्स #प्राकृतिक जीवन देखे उपयोग करने का तरीका सम्पूर्ण विवरण:


1.बादाम


दिमाग़ की कमजोरी

याददाश्त कम होना

शारीरिक दुर्बलता

बच्चों में मानसिक विकास

कैसे सेवन करें

रात में 5–6 बादाम पानी में भिगो दें

सुबह छिलका उतारकर अच्छी तरह चबाएँ

चाहें तो 1 चम्मच शहद के साथ लें


क्यों लाभकारी

बादाम में विटामिन E, ओमेगा-3 और प्रोटीन होते हैं, जो मस्तिष्क व नसों को मज़बूत करते हैं।


2️⃣ काजू

किस बीमारी में लाभकारी

अत्यधिक कमजोरी

कम वजन

थकान

कैसे सेवन करें

3–4 काजू सुबह नाश्ते के साथ

या हल्का भूनकर

❌ कब न लें

मोटापा, शुगर और उच्च कोलेस्ट्रॉल में अधिक सेवन न करें।


3️⃣ अखरोट

किस बीमारी में लाभकारी

हृदय रोग

तनाव, चिंता

ब्रेन हेल्थ

कैसे सेवन करें

1–2 अखरोट सुबह खाली पेट

क्यों

अखरोट में ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है, जो दिल और दिमाग दोनों के लिए श्रेष्ठ है।


4️⃣ पिस्ता

किस बीमारी में लाभकारी

कमजोरी

आँखों की थकान

रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना

कैसे सेवन करें

6–8 पिस्ता दिन में कभी भी

बेहतर है भिगोकर या हल्का भूनकर


5️⃣ किशमिश

किस बीमारी में लाभकारी

कब्ज

खून की कमी

पेट की कमजोरी

कैसे सेवन करें

10–15 किशमिश रात को भिगोकर

सुबह पानी सहित सेवन करें


6️⃣ काली किशमिश

किस बीमारी में लाभकारी


एनीमिया


चक्कर आना


महिलाओं में कमजोरी


कैसे सेवन करें


8–10 काली किशमिश भिगोकर सुबह


7️⃣ खजूर

किस बीमारी में लाभकारी


अत्यधिक कमजोरी


कम रक्तचाप


प्रसव के बाद कमजोरी


कैसे सेवन करें


1–2 खजूर गुनगुने दूध के साथ


❌ मधुमेह में न लें


8️⃣ अंजीर

किस बीमारी में लाभकारी


पुरानी कब्ज


बवासीर


पेट की सूजन


कैसे सेवन करें


2 अंजीर रात को भिगोकर


सुबह खाली पेट


9️⃣ सूखी खुबानी

किस बीमारी में लाभकारी


खून की कमी


त्वचा रोग


कमजोरी


कैसे सेवन करें


2–3 खुबानी भिगोकर सुबह


🔟 मूंगफली

किस बीमारी में लाभकारी


कमजोरी


सर्दी में ऊर्जा


कैसे सेवन करें


भुनी हुई 1 मुट्ठी


❌ एसिडिटी व एलर्जी में न लें


1️⃣1️⃣ सूखा नारियल

किस बीमारी में लाभकारी


शरीर में रूखापन


कमजोरी


कैसे सेवन करें


1–2 छोटे टुकड़े दिन में


1️⃣2️⃣ मखाना

किस बीमारी में लाभकारी


मधुमेह


हृदय रोग


गर्भावस्था में कमजोरी


कैसे सेवन करें


घी में हल्का भूनकर 1 कटोरी


1️⃣3️⃣ हेज़लनट

किस बीमारी में लाभकारी


हृदय व नसों की कमजोरी


कैसे सेवन करें


3–4 दाने सुबह


1️⃣4️⃣ ब्राज़ील नट

किस बीमारी में लाभकारी


थायरॉयड


कैसे सेवन करें


सप्ताह में 2–3 बार केवल 1 दाना


1️⃣5️⃣ मैकाडेमिया नट

किस बीमारी में लाभकारी


हृदय स्वास्थ्य


कैसे सेवन करें


2–3 दाने

❌ अधिक मात्रा से वजन बढ़ता है


1️⃣6️⃣ पाइन नट

किस बीमारी में लाभकारी


कमजोरी


यौन दुर्बलता


कैसे सेवन करें


1 चम्मच सुबह


1️⃣7️⃣ सूखी क्रैनबेरी

किस बीमारी में लाभकारी


मूत्र संक्रमण (UTI)


कैसे सेवन करें


1 छोटा चम्मच


1️⃣8️⃣ सूखी ब्लूबेरी

किस बीमारी में लाभकारी


आँखों की कमजोरी


एंटीऑक्सीडेंट की कमी


कैसे सेवन करें


1 चम्मच दिन में


1️⃣9️⃣ प्रून्स (सूखा आलूबुखारा)

किस बीमारी में लाभकारी


गंभीर कब्ज


कैसे सेवन करें


2–3 भिगोकर सुबह


2️⃣0️⃣ अंजीर स्लाइस

किस बीमारी में लाभकारी


कब्ज


हड्डियों की कमजोरी


कैसे सेवन करें


2–3 स्लाइस भिगोकर

अति सुन्दर वाक्य...

हा! आज शिक्षा मार्ग भी संकीर्ण होकर विष्ट है,

कुलपति सहित उन गुरुकुलों का ध्यान ही अवशिष्ट है।


बिकने लगी विद्या यहाँ अब, शक्ति हो तो क्रय करो,

यदि शुल्क आदि न दे सको तो मूर्ख रह कर ही मरो!


ऐसी असुविधा में कहो वे दीन कैसे पढ़ सकें?

इस ओर वे लाखों अकिंचन किस तरह से बढ़ सकें?


अधपेट रह कर काटते हैं मास के दिन तीस वे,

पावें कहाँ से पुस्तकें, लावें कहाँ से फ़ीस वे॥


वह आधुनिक शिक्षा किसी विध प्राप्त भी कुछ कर सको—

तो लाभ क्या, बस क्लर्क बन कर पेट अपना भर सको!


लिखते रहो जो सिर झुका सुन अफसरों की गालियाँ!

तो दे सकेंगी रात को दो रोटियाँ घरवालियाँ॥


अब नौकरी ही के लिए विद्या पढ़ी जाती यहाँ,

बी० ए० न हों हम तो भला डिप्टीगरी रखी कहाँ?


किस स्वर्ग का सोपान है तू हाय री, डिप्टीगरी!

सीमा समुन्नति की हमारी, चित्त में तू ही भरी!!


शिक्षार्थ क्षात्र विदेश भी जाते अवश्य कभी-कभी,

पर वकृता ही झाड़ते हैं लौट कर प्राय: सभी!


है काम कितनों का यही पहले यहाँ मिस्टर बने,

इंगलैंड जाकर फिर वहाँ वाग्वीर बारिस्टर बने॥


वे वीर हाय! स्वदेश का करते यही उपकार हैं—

दो भाइयों के युद्ध में होते वही आधार हैं!


उनके भरोसे पर यहाँ अभियोग चलते हैं बड़े,

हारे कि जीते आप, उनके किंतु पौ-बारह पड़े!


जाकर विदेश अनेक अब तक युवक अपने आ चुके,

पर देश के वाणिज्य-हित की ओर कितने हैं झुके?


हैं कारखाने कौन-से उनके प्रयत्नों से चले?

क्या-क्या सु-फल निज देश में उनसे अभी तक हैं फले?


अमरीकनों के पात्र जूँठे साफ कर पंडित हुए,

सच्चे स्वदेशी मान से फिर भी नहीं मंडित हुए!


दृष्टांत बनते हैं कि वे इस कहावत के लिए—

बारह बरस दिल्ली रहे पर भाड़ ही झोंका किए!”


दासत्व के परिणाम वाली आज है शिक्षा यहाँ,

हैं मुख्य दो ही जीविकाएँ—भृत्यता, भिक्षा यहाँ!


या तो कहीं बन कर मुहर्रिर पेट का पालन करो,

या मिल सके तो भीख माँगो, अन्यथा भूखों मरो!


बिगड़े हमारे अब सभी स्वाधीन वे व्यवसाय हैं,

भिक्षा तथा बस भृत्यता ही आज शेष उपाय हैं।


पर हाय! दुर्लभ हो रही है प्राप्ति इनकी भी यहाँ,

यह कौन जाने इस पतन का अंत अब होगा कहाँ!


वह सांप्रतिक शिक्षा हमारे सर्वथा प्रतिकूल है,

हममें, हमारे देश के प्रति, द्वेष-मति की मूल है।


हममें विदेशी-भाव भर के वह भुलाती है हमें,

सब स्वास्थ्य का संहार करके वह रुलाती है हमें!!


होती नहीं उससे हमें निज धर्म में अनुरक्ति है,

होने न देती पूर्वजों पर वह हमारी भक्ति है।


उसमें विदेशी मान का ही मोह-पूर्ण महत्व है,

फल अंत में उसका वही दासत्व है, दासत्व है!


हम मूर्ख और असभ्य थे, उससे विदित होता यही,

इस मर्म को कि हम जगद्गुरु थे, छिपाती है वही।


फ्री थाट ही वह वेद के बदले रटाती है हमें,

देखो, हटा कर असलियत से वह घटाती है हमें॥


क्या लाभ है उन हिस्ट्रियों को कंठ करने से भला—

रटते हुए जिनको हमारा बैठ जाता है गला?


हा! स्वेद बन कर व्यर्थ ही बहता हमारा रक्त है,

सन्-संवतों के फेर में बरबाद होता वक्त है!


दुर्भाग्य से अब एक तो वह ब्रह्मचर्याश्रम नहीं,

तिस पर परिश्रम व्यर्थ यह पड़ता हमें कुछ कम नहीं!


फिर शीघ्र ही चश्मा हमारे चक्षु चाहें क्यों नहीं?

हम रुग्ण होकर आमरण दुख से कराहें क्यों नहीं?


है व्यर्थ वह शिक्षा कि जिससे देश की उन्नति न हो,

जापान के विद्यार्थियों की सूक्ति है कैसी अहो!


साहब! हमें यूरोपियन हिस्ट्री न अब दिखलाइए,

बेलन की रचना हमें करके कृपा सिखलाइए॥


करके सु-शिक्षा की उपेक्षा यों पतित हम हो रहे,

हो प्राप्त पशुता को स्वयं मनुजत्व अपना खो रहे।


आहार, निद्रा आदि में नर और पशु क्या सम नहीं?

है ज्ञान का बस भेद सो भूले उसे क्या हम नहीं?


धर्मोपदेशक विश्व में जाते जहाँ से थे सदा,

शिक्षार्थ आते थे जहाँ संसार के जन सर्वदा।


अज्ञान के अनुचर वहाँ अब फिर रहे फूले हुए,

हम आज अपने आपको भी हैं स्वयं भूले हुए॥


अपमान हाय! सरस्वती का कर रहे हम लोग हैं,

पर साथ ही इस धृष्टता का पा रहे फल-भोग हैं!


निज देवता के कोप में कल्याण किसका है भला,

हम मोह-मुग्ध फँसा रहे हैं आप ही अपना गला॥



Monday, December 29, 2025

कुछ अन कही बाते...

 🌑 जीवन में कई बार एक ऐसा पड़ाव आता है जब भावनाएं मानो जम सी जाती हैं। हम उस मोड़ पर खड़े होते हैं जहाँ किसी का साथ होना या न होना, किसी का प्यार या किसी की नफरत सब बेमानी लगने लगता है। 

दिल इतना थक जाता है कि वह शिकायत करना भी छोड़ देता है। अक्सर हम इसे अपनी हार मान लेते हैं, लेकिन सच तो यह है कि यही वह समय है जब रूह आपसे अपना हक माँग रही होती है।

🌑 अक्सर इस मोड़ पर हम एक बड़ी गलती कर बैठते हैं। दूसरों की बेरुखी या उनकी खामोशी को अपनी किस्मत मान लेते हैं।खुद को एक शिकार की तरह देखने लगते हैं, जैसे हमारे दुखों का रिमोट कंट्रोल किसी और के हाथ में हो।खुद को उस अंधेरे कमरे में बंद कर लेते हैं जहाँ सिर्फ पछतावा और दर्द होता है।दूसरों को सजा देने की चाह में, अनजाने में खुद को ही लहूलुहान करते रहते हैं।

हमारी जिंदगी को संवारने की जिम्मेदारी हमारी थी, उसे किसी और की गलतियों की भेंट क्यों चढ़ा रहे हैं?

हम किसी के व्यवहार का शिकार होने के लिए पैदा नहीं हुए हैं। यह जिंदगी किसी की मोहताज नहीं है। अगर आज किसी की उपस्थिति खुशी नहीं दे रही, तो उसकी अनुपस्थिति को दर्द भी मत बनने दीजिए।

सोचिये क्या वाकई जिंदगी इतनी सस्ती है कि कोई आएगा, दो शब्द कड़वे बोलेगा, और हमारी पूरी हस्ती बिखर जाएगी? 

क्या हम इतने कमजोर हैं कि किसी की अनुपस्थिति हमारा वजूद ही मिटा दे? 

🌑 हकीकत तो ये है कि लोग हमको उतना ही दुख देते हैं, जितनी हम उन्हें इजाजत देते हैं। जिस दिन हमने अपनी तकलीफों का जिम्मा दूसरों पर डालना बंद कर दिया, उसी दिन हम आजाद हो जाएंगे।

​अक्सर दूसरों को सबक सिखाने के चक्कर में हम खुद की जिंदगी का इम्तिहान फेल कर देते हैं। हम चाहते हैं कि उन्हें हमारी कमी महसूस हो, वो तड़पें, वो पछताएं... और इस चाहत में हम खुद तड़पना शुरू कर देते हैं। 

यह कैसी समझदारी है कि घर पड़ोसी का जले और धुआँ हमारे फेफड़ों में हो?

जिंदगी बराबर जीने के लिए मिली है, घिसटते हुए गुजारने के लिए नहीं। खुद को किसी की यादों का या किसी की बेरुखी का शिकार मत बनाइए। 

आप एक जलता हुआ दीया हैं, कोई बुझी हुई राख नहीं कि कोई भी आकर पैरों से कुचल जाए। 

आज, इसी वक्त, यह तय कीजिए कि आपकी मुस्कुराहट पर सिर्फ आपका हक है। किसी और की दी हुई चोट को अपना गहना मत बनाइए।

🌑 छोटा मुँह बड़ी बात कह रहा हूँ पर ​उठिए, और खुद को उस दलदल से बाहर निकालिए, क्योंकि जब आप खुद के लिए खड़े होते हैं, तभी कायनात आपके लिए रास्ता बनाना शुरू करती है। दूसरों के लिए रोना बंद कीजिए और उस इंसान को हंसाइए जो बचपन से आपके अंदर कहीं खो गया है।

अगर आज अपनी खुशियों के लिए खुद लड़ नहीं सकते, तो कल हमारी बर्बादी पर अफसोस करने का हक भी हम खो देंगे। 

इसलिए खुद को दूसरों के लिए तकलीफ देना प्लिज़ बंद कीजिए। आईने में दिखने वाले उस इंसान से माफी मांगिए जिसे आपने दूसरों की खातिर सबसे ज्यादा नजरअंदाज किया है। अपनी मुस्कुराहट की कमान वापस अपने हाथ में लीजिए। जब दुनिया का शोर फीका पड़ने लगे, तो अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनिए वही आपकी सबसे सच्ची साथी है।

अपनी कहानी का नायक/नायिका बनिए, किसी की कहानी का एक दुखी हिस्सा मात्र नहीं। 

जीना सीखिए, सिर्फ दूसरों के लिए नहीं, बल्कि उस स्वयं के लिए जो आपकी राह देख रहा है।


दैवीय प्रेम कोई आकर्षण नहीं होता

 दैवीय प्रेम कोई आकर्षण नहीं होता बल्कि समर्पण की वो अवस्था है जहाँ “पाने” की कोई इच्छा शेष नहीं रहती

जिसे मिलते ही जीवन अपने आप पूर्ण हो जाए जहाँ किसी शर्त, किसी अपेक्षा किसी अधिकार की भाषा ही शेष न बचे -- वही प्रेम दैवीय होता है -- दैवीय प्रेम मे हाथ थामना आवश्यक नही -- निकटता का प्रदर्शन भी आवश्यक नही बल्कि यहाँ तो अनुपस्थिति भी एक पूर्ण उपस्थिति बन जाती है!-

ये वो प्रेम है जहाँ आत्मा आत्मा को पहचान लेती है बिना परिचय, बिना स्पर्श,बिना ये पूछे कि “तुम मेरे क्या हो?”

दैवीय प्रेम आवाज़ नहीं करता शोर नहीं मचाता ये प्रेम तो

चुप्पी की गोद में बैठकर मन के सबसे कोमल हिस्से को सहलाता है-- ये प्रेम दर्द से डरता नही बल्कि दर्द को

प्रसाद की तरह स्वीकार कर लेता है क्योंकि दैवीय प्रेम जानता है -- जो भीतर तक तोड़ दे वही भीतर तक गढ़ने की क्षमता भी रखता है!-

जहाँ सांस रुक-रुक कर चलती हैजहाँ स्मृतियाँ चुभती है

जहाँ कोई नाम लिए बिना आँखें भर आती है वहीं कहीं

दैवीय प्रेम मौन रूप से उपस्थित होता है वो प्रेम जो तुम्हें बेहतर इंसान बना दे जो तुम्हारे भीतर क्षमा, धैर्य और मौन का दीप जला दे जो तुम्हें किसी को पकड़कर रखने के बजाय उसे मुक्त करना सिखा दे -- वही दैवीय प्रेम है!-

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दैवीय प्रेम मे ईर्ष्या नहीं होती अधिकार नहीं होता बस एक गहरी प्रार्थना होती है -- “जहाँ भी रहो जैसे भी रहो,

पूर्ण रहो" ये प्रेम कभी बाँधता नही कभी थकाता नहीं,

कभी कम नहीं पड़ता-- ये प्रेम कभी शिकायत नहीं करता कि “मैंने तुम्हारे लिए क्या-क्या किया” क्योंकि दैवीय प्रेम कर्म करता है हिसाब नही और हाँ, दैवीय प्रेम हर किसी के हिस्से नहीं आता- ये वही लोग समझ पाते हैं

जो टूटकर भी कड़वे नहीं हुए जो छले जाकर भी करुणा बचाए रख पाए जो प्रेम खोकर भी प्रेम को दोषी नहीं ठहराते!-

दैवीय प्रेम उन्हीं हृदयों में उतरता है जो घावों के बावजूद

प्रेम करना नहीं छोड़ते -- अंत में बस इतना ही लिखना है की जिस प्रेम मे अहंकार गल जाए जिस प्रेम में “मैं” विसर्जित हो जाए जिस प्रेम मे तुम किसी को पाकर नहीं

खुद को खोकर पा लो -- समझ लेना,वो प्रेम मनुष्य का नही बल्कि दैवीय प्रेम है!-

Sunday, December 28, 2025

इन्द्रिय क्या है

 "इन्द्रिय" क्या है"

जीव अनादि है किन्तु अनन्त नहीं है,

मोक्ष मिलने पर जीव का आत्मस्वरूप अपने वास्तविक स्व में

स्थित हो जाता है, तथा इन्द्रियों सहित सारे अन्य तत्व अपने मूल कारण "प्रकृति" में समाहित हो जाते हैं |


स्थूल शरीर के आँख, कान, आदि भागों को इन्द्रियाँ नहीं कह

सकते | इन्द्रियाँ sense organs नहीं हैं | सारे sense organs इन्द्रियों के केवल स्थूल भौतिक उपकरण हैं |

उदाहरणार्थ, शरीर का जो भाग "कान" कहलाता है वह "कर्ण"

नाम की इन्द्रिय नहीं है | "कर्ण" इन्द्रिय का स्थूल बाह्य स्वरुप

"कान" नाम का स्थूल पुर्जा है जो ध्वनि को ग्रहण करने में

लाउडस्पीकर के हॉर्न का कार्य करने वाला बेजान पुर्जा है,

जो ध्वनि का संग्रहण (reception, collection) करता है किन्तु "सुन" और "समझ" नहीं सकता |


यदि आप दूर की किसी ध्वनि को और भी स्पष्टता के साथ

सुनना चाहते हैं तो दोनों हाथों को दोनों कानों से सटाकर इस

तरह रखें (यह acoustic waveguide कहलाता है) कि केवल आगे से ध्वनि की दिशा से आने वाली ध्वनि ही कानों तक पँहुचे और अन्य दिशाओं की ध्वनियाँ बाधित हो जाएँ तो और भी अच्छी तरह ध्वनि सुन सकेंगे | घर में जो सामान्य बिजली का टेबल पंखा चलता है उसके आगे भी खड़े होकर इस तरह का प्रयोग करेंगे तो पायेंगे कि पंखे से निकलने वाले बाहुत सारी frequencies , खासकर अधिक ऊर्जा वाली higher frequencies, सामान्यतः आप नहीं सुन पाते किन्तु कानों पर सही तरीके से हाथ रखेंगे तो सुनायी देने लगेंगी, उन ध्वनियों की शक्ति सैकड़ों गुणा बढ़ जायेगी |


इस सिद्धान्त के आधार पर कृत्रिम acoustic telescope बनाए जाते हैं जिनमें उपरोक्त acoustic waveguide के अलावा नेगेटिव फीडबैक पर आधारित नॉइज़ रिडक्शन द्वारा नियन्त्रित ऑडियो एम्पलीफायर युक्त माइक्रोफोन हों तो मीलों दूर की ध्वनियाँ मनुष्य सुन सकता है | उसमें अनावश्यक ध्वनियों को दबाने और मानवीय भाषा में प्रयुक्त होने वाले सबसे महात्वपूर्ण ध्वनियों को बढाने वाली प्रक्रिया भी हो तो मीलों दूर की मानवीय वार्तालाप को साफ़-साफ़ सुना जा सकता है ।


प्रकृति भी यदि मनुष्य के कानों को उस सीमा तक संवेदनशील

बना दे तो बहुत क्षति होगी | तब इतनी प्रकार की नयी ध्वनियाँ सुनाई देने लगेंगी कि मनुष्य को समझ आने वाले भाषा

के शब्द ("सिग्नल") अनावश्यक ध्वनियों के शोरगुल (नॉइज़") के नीचे दब जायेंगे और जीना कठिन हो जाएगा | मानव शिशु का मस्तिष्क भी धीरे-धीरे "सीख" लेता है कि किन ध्वनियों पर

ध्यान देना चाहिए और किन ध्वनियों को अनसुना करना

चाहिए | उदाहरणार्थ, मस्तिष्क की कोमल कोशिकाओं को

क्षति पँहुचाने में सक्षम अधिक ऊर्जा वाली higher

frequencies बाह्य कान द्वारा ग्रहण तो किये जाते हैं किन्तु

मस्तिष्क के भीतर उनको पँहुचाने वाली मैकेनिज्म धीरे-धीरे

"सीख" लेती है कि कैसे उनको आंशिक या पूर्ण रूप से रोका जाय और भी बहुत सारी अनावश्यक ध्वनियों को सुनने वाली

जैविक मैकेनिज्मों को मनुष्य का मस्तिष्क धीरे-धीरे स्विच-

ऑफ कर देता है ताकि मस्तिष्क में सुनने की क्षमता से

सम्बन्धित पुर्जों तक पँहुचने वाली ध्वनियों में नॉइज़ की

मात्रा कम-से-कम हो और सिग्नल अधिक हो |


कहीं अद्वैत वेदान्त पर बातचीत हो रही हो और बीच में कोई

व्यक्ति प्रश्न उठा दें कि मोटरसाइकिल कम पेट्रोल कैसे खर्च

करे तो यह प्रश्न नॉइज़ है और अद्वैत वेदान्त से सम्बन्धित

बातें सिग्नल (S) हैं | किन्तु कहीं पर मोटरसाइकिल द्वारा तेल

की खपत पर चर्चा हो रही हो और बीच में कोई व्यक्ति प्रश्न

उठा दें कि अद्वैत वेदान्त क्या है तो अद्वैत वेदान्त तब नॉइज़ है

और मोटरसाइकिल से सम्बन्धित बातें सिग्नल हैं | अतः कब कौन सी बात सूचना का सार्थक संकेत (सिग्नल) है और कौन सी बात शोर है यह देश-काल-पात्र के सापेक्ष निर्धारित होती है |


सूचना के सार्थकता की "अर्थसिद्धि" प्रयोगकर्ता के उद्देश्य

और क्षमता द्वारा निर्धारित होती है, वरना सूचना कैसी भी

हो भैंस के आगे बीन ही होती है | भैंस के आगे उस्ताद

बिस्मिल्लाह खान का संगीत केवल नॉइज़ है | भैंस को अपने

जीवन-यापन में सहायक जो ध्वनियाँ सार्थक लगती हैं वे भैंस के लिए सुमधुर संगीत हैं किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के लिए नॉइज़ हैं | दोनों में से किसे बेहतर सिग्नल कहा जाय और किसे शोर, इसका कोई निरपेक्ष मानदण्ड नहीं है, आखिर प्रकृति ने भैंस को भी बड़े ही लाड़-प्यार से बनाया हैं | संगीत बड़ी है या भैंस यह इसपर निर्भर करता है कि आपका उद्देश्य क्या है | यदि आप भैंस का दूध चाहते हैं तो अक्ल से बड़ी भैंस होती है | सिग्नल और नॉइज़ का अनुपात (S/N ratio) बेहतर हो सम्प्रेषण (communication) अच्छा होगा, वरना दो प्राणी अथवा दो यान्त्रिक प्रणालियाँ आपस में सूचनाओं का संचार ठीक से नहीं कर पाएंगे | सूचनाओं के संचार में यह S/N अनुपात केवल ध्वनि द्वारा संचार पर ही नहीं, हर प्रकार के डाटा के लेन-देन में कार्य करता है, शरीर के भीतर दो जैविक अवयवों के आपसी सूचना-सम्प्रेषण (संचार) में भी जो वैद्युत नर्वस इम्पल्स तथा विभिन्न रसायनों के संचार द्वारा होता है | आजकल कम्युनिकेशन-थ्योरी में S/N अनुपात का अध्ययन होता है जिसका मुख्य प्रयोग साइबरनेटिक स्वचालित यान्त्रिक नियन्त्रण प्रणालियों में होता है |


कोई जीव, उसका शरीर, शरीर के हर हिस्से और हर कोशिका

विभिन्न साइबरनेटिक प्रणालियाँ ही हैं, जो अपने कार्य को

सुचारू रूप से करने के लिए समस्त सम्बन्धित आन्तरिक तथा बाह्य अवयवों या प्रणालियों को अपने हिसाब से प्रभावित करने के लिए आवश्यक सूचनाएँ भेजती हैं | किन्तु हर जीवित या निर्जीव साइबरनेटिक प्रणाली में एक केन्द्रीय नियन्त्रण प्रणाली भी होती है जो उन सूचनाओं की जाँच द्वारा निर्धारित करती हैं कि कब किस सूचना को सिग्नल माना जाय और कब उसी को नॉइज़ मानकर अनदेखा किया जाय अथवा भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जाय |


जैविक नियन्त्रण प्रणाली का सबसे मुख्य आधार DNA है जो

समस्त शारीरिक और मानसिक प्रक्रियाओं के नियन्त्रण के उन

अंशों का समुच्चय है जिनको प्रकृति किसी जैविक प्रजाति के

लिए सुरक्षित करने योग्य समझती है | कम्प्यूटर की भाषा में

स्थूल रूप से कहें तो मनुष्य के मन में जो "स्मृति" नाम की शक्ति है वह RAM है, तो डीएनए ROM है | प्रजाति की सुरक्षा के लिए प्रकृति ने इस ROM में परिवर्तन को अत्यधिक कठिन बना दिया है | सुरक्षा की इस प्रणाली का सबसे प्रमुख तरीका है डीएनए द्वारा रसायनिक प्रक्रियाओं में सीधे भाग न लेकर सन्देशवाहकों का प्रयोग करना, ताकि बाह्य तत्वों का

डीएनए से सीधा सम्पर्क न्यूनतम हो | ये सन्देशवाहक डीएनए की सुरक्षा कवच बनकर बफर का कार्य करते हैं, जैसे कि मैसेंजर RNA | इस सुरक्षा कवच में कब-कब दरार आती है इसका अध्ययन आनुवांशिक रोगों और प्रजाति के extinction आदि समस्याओं का अध्ययन करते समय किया जाता है |


जैविक नियन्त्रण प्रणाली वास्तव में सही काल और सही

स्थान (देश या दिक्) पर विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं को

स्विच-ऑफ या स्विच-ऑन करने वाली डिजिटल प्रणाली है

जिसका आनुवांशिक भण्डार डीएनए है |

[ डिजिटल प्रणाली का अर्थ है digits अर्थात संख्याओं पर

आधारित "सांख्य प्रणाली" जिसका सरलतम रूप है कम्प्यूटर मेंशून्य ("0") तथा एक ("1") पर आधारित सांख्य प्रणाली, जो

वास्तव में अरबों ट्रांसिस्टरों के bias वोल्टेज को एक ख़ास

सीमा से अधिक घटा-बढ़ाकर स्विचों का ऑफ ("0") या ऑन

("1") होना ही है | डीएनए में भी समस्त प्रक्रियाओं को आरम्भ

तथा समाप्त करने वाले स्विचों का भण्डार होता है जो समय

आने पर ऑफ या ऑन होते हैं, अर्थात उनका वैल्यू "0" या "1"होता है |


अन्य समस्त अंक प्रणालियाँ मूलतः शून्य और एक वाली बाइनरी अंक प्रणाली पर ही आधारित है | शून्य तो सभी में है, "एक" यदि दो बार हो तो उसे "2" कहते हैं, तीन बार हो तो "3", आदि, किन्तु शून्य कितनी बार भी हो तो शून्य ही रहता है | शून्य है प्रकृति (में गति) का अभाव अर्थात शुद्ध निष्क्रिय चैतन्यता, और एक है प्रकृति की सक्रियता या गति (संस्कृत में "एक" का धातु है "इ" जिसका अर्थ है 'गति')| 

डीएनए यह निर्धारित करता है कि शिशु किन-किन ध्वनियों

को किन-किन सीमाओं तक सुन सकेगा | अनुभव और शिक्षा

द्वारा शिशु धीरे-धीरे सीखता है कि कुछ ध्वनियाँ सार्थक हैं

और कुछ निरर्थक | निरर्थक ध्वनियों को सुनने की क्षमता का

घटना अथवा सुनकर अचेतन रूप से अनसुनी करने की क्षमता का बढ़ना धीरे-धीरे सक्रीय होने लगता है |


निरर्थक का यह अर्थ नहीं है कि वे वास्तव में निरर्थक ही हैं |

समाज बच्चों को सिखाता है कि अभिभावकों तथा

शिक्षकों की बातें गलत भी हों तो "सार्थक" हैं क्योंकि उनसे

"लाभ" होता है, और तितलियों की उड़ान, भौंड़े की गुञ्जन,

बिल्ली के बच्चे की मुस्कान, इन्द्रधनुष का सौन्दर्य, प्रकृति

का अन्तहीन श्रृङ्गार तो बकवास है जिनके पीछे बच्चों को

समय नष्ट नहीं करना चाहिए, उनसे केवल तभी "लाभ" होता है जब कवि के कल्पना की उड़ानों पर प्रोफेसरों की बकवास को दुहराने से परीक्षा में सफलता मिले |


कल्पना केवल कविता में ही नहीं होती, समस्त ज्ञान-विज्ञान

कल्पना का ही फल हैं | सौ वर्ष पहले के महानतम गणितज्ञ

डेविड हिल्बर्ट के एक छात्र ने गणित छोड़कर कविता चुन ली

तो हिल्बर्ट ने कहा - "ठीक किया, गणित लायक कल्पना उसमें

नहीं थी !"


दीर्घकाल तक जिन बातों को दबाया जाता है वे धीरे-धीरे

डीएनए द्वारा सुरक्षित कर ली जातीं हैं | इस प्रकार जो

प्रकृति अपने शुद्ध नैसर्गिक पर्यावरण में मनुष्य का निर्माण

करती है उसी के विरुद्ध कृत्रिम औपचारिक वा अनौपचारिक

शिक्षा द्वारा मनुष्य अपनी प्रजाति को कृत्रिम बनाकर

विलुप्ति की ओर पग बढ़ाता है |

अन्य समस्त कल्पनाएँ स्थूल होती हैं, उनमें मात्रा की शुद्धि हो

तो उसे गणित कहा जाता है | गणित जिन "गणों" पर आधारित हैं उसमें 49 मरुद्गण हैं, ग्यारह रूद्र (इन्द्रियाँ) हैं, 53 अक्ष वाली देवभाषा और समस्त भाषाई अवधारणाएं तथा चिन्तन है | ब्रह्माजी की समूची सृष्टि गणित द्वारा रची गयी सुन्दर कविता है |इस कविता में गणित भीतर छुपा रहता है,मनुष्यों को आमतौर पर नहीं दिखता, किन्तु बिना गणित के कुछ नहीं है | मूर्त वस्तुओं के वर्गीकरण द्वारा उनमें अन्तर्निहित

अवधारणाओं को समझने की क्षमता केवल मनुष्य में होती है जो "शब्दों" को उत्पन्न करके भाषा बनाती है | जैसे कि नदी या

तालाब या नलके के विभिन्न मूर्त जलों में "जल" नाम के कॉमन

"शब्द" की अवधारणा केवल मनुष्य ही समझ सकता है | "जल" नाम का यह "शब्द" अभौतिक, अमूर्त और काल्पनिक है किन्तु प्रकृति में पाए जाने वाले समस्त मूर्त जलों के भीतर H2O के होने ही सच्चाई को उद्घाटित करता है | "शब्द" नाम की कल्पना ही"ब्रह्म" नाम का सत्य है | प्रकृति अथवा विचारों के वर्गीकरणद्वारा समस्त प्रक्रियाओं, वस्तुओं तथापरिघटनाओं को वर्गों या "गणों" (classes) के द्वारा समझना ही गणित है | गण से गणित बना है | किसी प्रणाली में ये गण न्यूनतम दो भी हो सकते हैं, जैसे कि शून्य तथा एक वाली बाइनरी डिजिटल में अथवा genes के सक्रीय वा निष्क्रिय होने में, और किसी प्रणाली में आठ (ऑक्टल) या दस (संख्याओं की दशमलव प्रणाली) या बहुत अधिक भी हो सकते हैं | जैसे कि देवभाषा में 16 देवी-स्वरों एवं 33 कोटि देव-व्यञ्जनों के उनचास गणों में क्ष-त्र-ज्ञ मिलाकर 53 अक्षरों का "अक्ष" ऋग्वेद में वर्णित है, जिसमें ॐ मिलाकर 54 होता है जिसकें दक्षिण और वाम पाठभेद से 108 मूलधातु अलिखित ऐन्द्र-व्याकरण में होते हैं जिनसे लौकिक भाषाएँ भी

बनीं और गुप्त प्राकृतिक भाषाएँ भी (जैसे कि डीएनए की गुप्त

भाषा जो असुरों को नहीं बतायी जा सकती)|

आसुरी जीवविज्ञान में केवल स्थूल शरीर के अध्ययन का ही

महत्त्व है जो प्रोटीन से बनता है | अतः जेनेटिक्स का मुख्य

ध्यान केवन प्रोटीन संश्लेषण पर ही रहा है, जिससे मानव

जीनोम का केवल 1.1% ही प्रत्यक्ष तौर पर सम्बन्धित है जिसे

एक्सॉन कहते हैं | इन तथाकथित सार्थक genes के बीच में बहुत से निरर्थक डीएनए भी होते हैं जो जीनोम का 24% हैं, वे Introns कहलाते हैं | उनमें भी कुछ सार्थक भाग पकड़ाए हैं | शेष 75% को Junk कहा जाता है | अब वैज्ञानिकों में Junk शब्द का प्रचलन उठने लगा है और कहा जाता है कि उनका प्रयोजन पता नहीं है, अतः उनको डार्क या अज्ञात डीएनए कहना बेहतर होगा, किन्तु उनका कार्य जबतक पता नहीं चलता तबतक उनमें कहाँ कौन जीन है यह कहना सम्भव नहीं है | प्रोटीन संश्लेषण द्वारा ही जीन को परिभाषित करने की

संकीर्ण विचारधारा के कारण प्रोटीन संश्लेषण से असम्बद्ध

डीएनए की अनदेखी हुई है जो डीएनए के 98% से अधिक है ! यदि डीएनए एक विशाल बोतल है तो उसका मुँह आपने प्रोटीन के बहाने पतला बना दिया है, इस समस्या को अंग्रेजी में bottle-neck कहते हैं | अब वैज्ञानिक मानने लगे हैं कि डीएनए का सम्बन्ध केवल प्रोटीन संश्लेषण से ही नहीं है, बल्कि समस्त जैविक प्रक्रियाओं से है और पर्यावरण के साथ जीव का तादात्म्य बनाने से भी है | किन्तु इस सम्बन्ध में अत्यल्पवास्तविक कार्य हो पाया है | 


आधुनिक आनुवांशिक विज्ञान को सौ वर्ष से अधिक हुए और डीएनए की खीज के भी 65 वर्ष बीत गए, अभीतक केवल 1.1% ही समुचित रूप से उद्घाटित हो पाया है और उसके भी बहुत से कार्य अन्धकार में हैं | इस गति से पूरे डीएनए के उद्घाटन में हज़ारों वर्ष लग जायेंगे !


जिस प्रकार एक मनुष्य दूसरे मनुष्यों से कई तरह के सामाजिक सम्बन्ध बना सकता है उसी तरह एक ही जीन दूसरे genes या जीन-समूहों से अलग-अलग प्रकार्यों (फंक्शन) वाले सम्बन्ध बना सकता है | प्रकार्य से फेनोटाइप की पहचान होती है जो जीनोटाइप को पहचानने में सहायक हैं | किन्तु अपवाद स्वरुप ही कोई जीन अकेला कार्य करता है | प्रायः वे समूहों में कार्य करते हैं, अर्थात कई जीन मिलकर किसी एक लक्षण या फेनोटाइप को अभिव्यक्ति देते हैं | किसी एक फेनोटाइप से सम्बन्धित डीएनए के भाग को जीनोटाइप कहते हैं जो सामान्यतः जीनों का समूह होता है | किन्तु एक समूह का जीन प्रायः दूसरे समूह वाले जीनोटाइप से भी सम्बन्धित होता है | जैसे कि इन्सुलिन का सम्बन्ध केवल ग्लूकोज के मेटाबोलिज्म या डायबिटीज से ही नहीं बल्कि अनेक रोगों और आयु आदि से भी है | जैसे कि इन्सुलिन में असन्तुलन से आँख की रोशनी गड़बड़ा सकती है | इस सभी प्रक्रियाओं से अलग-अलग बहुत सारे जीनोटाइप के सम्बन्ध हैं, और उन सबका सम्बन्ध इन्सुलिन बनाने वाले डीएनए से है !

अतः किसी जीनोटाइप का पृथक रूप से अध्ययन नहीं हो

सकता, सिस्टम एप्रोच आवश्यक है | उसमें भी संरचना-प्रकार्य

ात्मक (structural-functional) खण्डों तथा प्रक्रियाओं को स्थैतिक (static) तौर पर लेने से बात नहीं बनती, समस्त डीएनए खण्डों और समूहों के प्रकार्यों के स्विचों के ऑन तथा ऑफ होने के विभिन्न टाइम-साइकिल वाले जटिल बायो-क्लॉक को बाह्य प्राकृतिक क्लॉक से जोड़कर पर्यावरण और जीव को एक ही प्रणाली का हिस्सा मानकर देखने से ही डीएनए के अज्ञात या डार्क हिस्से प्रकाश में आ सकते हैं | 


वर्तमान भौतिकवादी पद्धति हज़ारों वर्षों में भी इस कार्य को पूर्ण नहीं कर सकती, पद्धति और विचारधारा में मौलिक परिवर्तन आवश्यक है जिसके बिना bottle-neck को चौड़ा करना सम्भवनहीं |

अध्यात्म क्या है


आपकी बहुत सारी शंकाओं का समाधान होगा,धर्म के प्रति

आपकी रुचि बढ़ेगी। आलेख विस्तृत है,इसलिए शेयर करके समय मिलने पर पढें...


आरम्भ से ही मनुष्य जिज्ञासु प्रवृत्ति का रहा है, अज्ञात,

अदृश्य, अनागत को जानने की उत्कृष्ट अभिलाषा, उनका

विज्ञान समझने की प्रबल इच्छा आज मनुष्य को समय के उस दौर में ले कर आयी है जहाँ से उसके लिए समय और स्थान दोनों सिकुड़ चुके है, लेकिन मनुष्य के लिए उसके मूल प्रश्न, जो उसके अस्तित्व से सम्बंधित हैं, आज भी अनुत्तरित है और वो प्रश्न हैं- मै कौन हूँ?


और क्यों हू?


आदरणीय सज्जनों,

आज हम सब जीव, ब्रह्म और प्रकृति के परस्पर सम्बन्धों और

उनके रहस्यों को समझने की कोशिश करेंगे, चिदानंद स्वरुप ब्रह्म के प्रतिबिम्ब से युक्त, सत, रज और तम गुणों वाली जो शक्ति होती है, प्रकृति कहलाती है, ये प्रकृति दो प्रकार की होती है, सत्व की शुद्धि से उस प्रकृति को माया और सत्व की अशुद्धि यानि मलिनता से उस प्रकृति को अविद्या कहा जाता है।


माया में पड़ा हुआ वो बिम्ब माया को अपने वश में रखता है, इस कारण से वो सर्वज्ञ ईश्वर बन बैठा है, प्रकृति, मूलतः शक्ति

होने के कारण स्वभावतः अस्थिर होती है, इसमें ब्रह्म का बिम्ब

होने से ये ब्रह्म के नियंत्रण में रहती है, प्रकाशात्मक सत्व गुणों

की शुद्धि से यानि जब वो सत्व गुण दूसरे गुणों से कलुषित नहीं हुआ होता तब वो प्रकृति माया कही जाती है।


जब वो सत्व गुण दूसरे गुणों से कलुषित होकर अशुद्ध हो जाता है तब वही प्रकृति अविद्या कहलाने लगती है, यानि कुल

मिलाकर यह समझा जा सकता है, कि विशुद्ध सत्व प्रधान

प्रकृति को माया तथा मलिन सत्व प्रधान प्रकृति को अविद्या कहते हैं, माया में प्रतिबिम्बित उस आत्मा ने माया को अपने स्वाधीन कर रखा है और वही सर्वज्ञाता अनेक गुणों

वाला ईश्वर हो गया है।


वही आत्मा रूपी ब्रह्म जब अविद्या में प्रतिबिम्बित होता है

तो वो एक तरह से अविद्या के वश में फँस जाता है, वास्तव में

अविद्या की विचित्रता के कारण वह एक से अनेक हो जाता है,

इसी अविद्या को कारण शरीर कहते हैं, इस कारण शरीर कहलाने वाली अविद्या में अभिमान करने वाले को प्राज्ञ कहा

जाता है, यहाँ अभिमान का अर्थ घमंड से नहीं लेना चाहिये,

अभिमान का तात्पर्य यहाँ स्वयं के अनुभव करने से है।


अविद्या में प्रतिबिम्बित होकर उसके पराधीन हो जाने वाला

आत्मा जीव कहलाने लगता है, वह जीव उस अविद्या रुपी

उपाधि की विचित्रता के कारण अनेक प्रकार का हो जाता

है, उसमें देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि अनेक भेद हो जाते हैं, इस अविद्या को कारण शरीर इसलिये कहा जाता है, क्योकि स्थूल और सूक्ष्म शरीर तथा स्थूल और सूक्ष्म भूतों का कारण वही माना गया है।


उस कारण शरीर में अभिमान करने वाले अथवा उसी में “मै” की भावना के वशीभूत जीव को प्राज्ञ कहा जाता है, उन प्राज्ञों के भोग के लिए तम-प्रधान प्रकृति में से आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी नाम के पञ्च तत्व उत्पन्न हुयें, उन पञ्च तत्वों के अलग-अलग पांच सत्व भागों से क्रमानुसार- श्रोत्र (कान), त्वचा (स्पर्श), चक्षु (आँखें), रसना (जिव्हा) तथा घ्राण (नासिका) नाम की पांच ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न हुयीं।


अर्थात एक-एक तत्व के अलग-अलग सत्वांश से एक-एक

ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुयीं, उन पाँचों तत्वों के पाँचों सत्वांशों को मिलाकर एक अंतःकरण नाम का द्रव्य (तत्व) उत्पन्न हुआ, यह अंतःकरण अपने वृत्तिभेद के कारण दो प्रकार का होता है, किसी की स्वाभाविक या चेष्टा को उसकी वृत्ति कहते हैं, जब यह अंतःकरण, विमर्श अर्थात संशयात्मक यानि संशय से युक्त वृत्ति को मन कहते हैं।


और जब यह निश्चयात्मक यानी निश्चयपूर्वक वृत्ति को बुद्धि

कहते हैं, यही अंतर है मन और बुद्धि में, इसके बाद उन पाँचों तत्वों के अलग-अलग पाँचों रजों भागों से क्रमानुसार- वाक् (वाणी), हांथ, पैर, पायु तथा उपस्यथ यानी मल-मूत्र त्यागने के स्थान, ये पांच कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न हुयीं, अब जिस तरह से पाँचों तत्वों के सत्व भागों को मिलाकर अंतःकरण उत्पन्न हुआ, उसी तरह से पाँचों तत्वों के रज भागों को मिलाकर एक प्राण की रचना हुई।


ये प्राण अपने वृत्ति-भेद से अर्थात अपने काम के अनुसार पांच

प्रकार का होता है- ये पांचो प्राण वायु रूप में भौतिक शरीर में

उपस्थित होते हैं, ये पांचो प्राण हैं- प्राण, अपान, समान,उदान,

तथा व्यान, इन पञ्च प्राणों का वर्णन आपको योग-प्राणायाम की किसी भी पुस्तक में मिल जायेगा, इस प्रकार से पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय, पांच प्राण, मन तथा बुद्धि इन सत्रह पदार्थों से मिलकर सूक्ष्म-शरीर बनता है।


इसी को वेदान्तों में लिंग शरीर कहा गया है, या ब्रह्माण्डीय

शरीर भी कहते, वह प्राज्ञ नाम का जीव उस लिंग शरीर में “मै”

की भावना की वजह से, यानि की ये धारणा करना कि ये लिंग

शरीर ही मै हूँ, ये ब्रह्मांडीय शरीर ही मेरा वास्तविक रूप है,

तैजस हो जाता है, इसी प्रकार से जब ब्रह्म (आत्मा) यानि

ईश्वर उस लिंग देह में “मै” की भावना करता है तो वह हिरण्यगर्भ हो जाता है।


इन दोनों में अंतर केवल इतना है कि तैजस व्यष्टि है और

हिरण्यगर्भ समष्टि इसके अतिरिक्त दोनों में कोई भेद नहीं,

मलिन सत्व-प्रधान अविद्या रुपी उपाधि वाला जीव, जब लिंग

शरीर में “मै” की भावना करता है तब वह उसी को अपनी आत्मा मानने लगता है, विशुद्ध सत्व-प्रधान प्रकृति को नियंत्रित करने की वजह से वो सर्व-व्यापी होता होता है, अतः वह समष्टि होता है, वह ईश्वर, जिसे हिरण्यगर्भ कहा गया है, लिंग शरीर उपाधि वाले सभी तैजसों के साथ अपनी आत्मा की एकता को समझता है।


वो जानता है कि ये सब मिलकर मै ही हूँ, इसी वजह से वो

समष्टि होता है, उस ब्रह्म से अन्य जो जीव हैं वो उस तादात्म्य

के आभाव से, यानि उन सब के साथ एकत्व ज्ञान के न होने से

व्यष्टि कहलाते हैं, ब्रह्म की इच्छा से प्रकृति, उन प्राज्ञ जीवों के भोग के लिए ही भोग्य यानी अन्न पान आदि, तथा भोगस्थानों- जरायुज, स्वेदज, उद्भिज, और अंडज आदि प्रकार के शरीरों की उत्पत्ति करने के लियें पञ्च तत्वों में से प्रत्येक तत्व को, पञ्चात्मक कर देती है जिससे कि उन जीवों के शरीर का

निर्माण हो सके।


पंचतत्वों को पंचात्मक करने का विधान इस प्रकार है- सर्व

प्रथम प्रकृति पंचतत्वों के प्रत्येक तत्व के पहले दो बराबर भाग

करती है, फिर उनमे से प्रत्येक तत्व के पहले आधे भाग को पूरा रखती है, तथा दूसरे आधे भाग के चार-चार भाग करती है, फिर उन चारो भागों में अपने से भिन्न अन्य चारो तत्वों के भागों को मिलाकर उन तत्वों को पंचीकृत कर देती है।


यानि पंचीकृत हुये प्रत्येक तत्व में आधा भाग उसका अपना है,

तथा आधे भाग में शेष अन्य चार तत्व हैं, इन्ही पंचीकृत तत्वों से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है, ब्रह्माण्ड में 14 भुवन हैं, प्राणियों के भोगने योग्य भोग्य पदार्थ तथा उन लोकों के अनुकूल शरीर उत्पन्न होते हैं, इस सम्पूर्ण स्थूल (विराट) शरीर में अहम् भाव से बैठने वाला हिरण्यगर्भ, “वैश्वानर” कहलाने लगता है।


आकाश, वायु, अग्नि, जल, और पृथ्वी ये पंचदेवों के अपने स्थूल शरीर में आते ही तैजस विश्व हो जाता है, वास्तव में प्रत्येक जीव अपने आप में पूरा एक ब्रह्माण्ड है, जिनको देवता, तिर्यंक, तथा मनुष्य आदि कहा जाने लगता है, किन्तु वे सभी बहिर्मुखी होते है, इन किसी को भी आत्म तत्व का बोध नहीं होता है, वास्तव में, इस स्थूल शरीर में अहम् भाव से निवास करने वाला तैजस ही विश्व कहलाता है।


देवता, पशु-पक्षी, तथा मनुष्य आदि भेद इन विश्वों के ही होते हैं, तैजसों में इस तरह का कोई भेद नहीं होता, कारण शरीर और लिंग? शरीर तो सब जीवों का एक समान ही होता है, इनके केवल स्थूल शरीर यानी भौतिक शरीर ही भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं, ये मनुष्य आदि सभी बाह्यदर्शी हैं, यानि ये सभी बाहरी शब्दादि विषयों को ही देखा सुना करते हैं।


ये अपने दुर्भाग्य से अपनी आत्मा को देख नहीं पाते, इन सभी को आत्म तत्व का यथार्थ ज्ञान नहीं होता, यद्यपि तार्किक लोग

इस देह से भिन्न आत्मा के अस्तित्व को मानते हैं, लेकिन आत्म रूप का यथार्थ ज्ञान उनको भी नहीं होता, सुख-दुख भोगने के

लिए ये कर्म करते हैं और फिर उन कर्मों के फलस्वरूप पुनः सुख-दुःख भोगते हैं।


इस प्रकार से ये जीव नदी में बहने वाले उन कृमियों की तरह हैं, जो एक आवर्त से निकल कर तुरंत दूसरे आवर्त में जा फसते हैं, ऐसे ही ये जीव भी एक जन्म से दूसरे जन्म को पाते रहते हैं, इन्हें कभी भी विश्राम का सुख नहीं मिलता, ऐसे हतभागियों को सुख का चिरस्थायी दर्शन कभी नहीं हो पाता, वास्तव में सुख चिरस्थायी हो ही नहीं सकता, क्योकि सुख और दुःख सापेक्ष होते हैं।


अगर चिरस्थायी कुछ होता है तो उसे ‘आनन्द’ कहते हैं, आनन्द सुख से अलग होता है, लेकिन उस चिरस्थायी आनन्द के आत्मबोध होना जरूरी है, और आत्मबोध के लिये जीव प्रकृति और ब्रह्म के इस रहस्य को समझना जरूरी है, वेद-शास्त्रों में जीव और ईश्वर के संबंध को एक गहन रुप से परिभाषित किया गया है।


धर्म ग्रंथों में आत्मा के ब्रह्म से मिलने और उसी में समा जाने के

तथ्य को व्यक्त करते हुए कहा गया है, कि स्वयं को परब्रह्म का

अंश अनुभव करने पर भी आत्मा उसे सहज रूप से देख नहीं पाती, अभी भी उस पर आवरण तो व्याप्त ही होता है, परन्तु मोह का पूर्ण त्याग हो जाने पर ही आत्मा परमात्मा को प्राप्त कर पाती है, और यही जीव का सार तत्व है।


ब्रह्मतत्व बोध के लिये मोह का त्याग अति आवश्यक है, प्रभु

द्वारा ही माया का प्रादुर्भाव हुआ है और उन्हीं की साधना

और ध्यान द्वारा इस मोह को त्यागा जा सकता है, साधक

अपने योगक्षेम द्वारा आत्मा को जान पाता है उसे इस ज्ञान

मार्ग से ब्रह्म की प्राप्ति होती है, परन्तु अब भी कुछ बाकी रह

जाता है, इस शरीर का मोह एवम् अहंकार दूर होने पर ही उसे

ब्रह्म का सच्चा अनुभव होता है।


सामान्यत: जीव, साधक, अविनाशी एवम अविचल माया का

ही ध्यान करते हैं, जिसे प्रभु ने ही उत्पन किया है वही परमात्मा का अंश है परंतु साधक उस माया में सम्मिलित, व्याप्त परमात्मा का अनुभव नहीं कर पाता, और न ही उस पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है जो उसके लिए आवश्यक है।

वह उसे गौण पाता है, जिस कारण उसे ब्रह्म के पूर्ण दर्शन नहीं

हो पाते, उस साधक पर एक महीन आवरण छाया ही रहता है,

शुरूआत में चारों ओर शून्य अंधकार व्याप्त था, परन्तु सूर्य के

प्रकाश रूप में वस्तुएं स्पष्ट हुई और चारों ओर ज्ञान उत्पन्न हुआ तथा ब्रह्म जीव का विकास हुआ।


सृष्टि की रचना की तब उसी के साथ माया का भी आगमन

हुआ, इस माया ने सभी को अपनी ओर आकर्षित किया साधु,

संन्यासियों द्वारा इसी के महत्व का उल्लेख किया गया और

वेदों, उपनिषदों में इसी के बारे में कहा गया है, भृगु और भार्गव जैसे ऋषियों ने इस माया को जाना और ब्रह्म से साक्षात्कार किया।


सभी धर्म ग्रंथों में परमात्मा के स्वरूप को अनेक रूपों में प्रकट

किया उसी के व्यक्त-अव्यक्त, सूक्ष्म-विराट द्वैत-अद्वैत जैसे रूपों का बखान किया, सभी के ज्ञान मन्त्रों का मर्म ब्रह्म ही रहा है, परमात्मा को सृष्टि का कर्ता, ब्रह्मचारी, अडिग, संसार में समस्त श्रीवृद्धि को प्रदान करने वाला, इस संसार को

चलाने वाला, तथा सृष्टि रूपी छकड़े को खींचने वाला कहा है,

जहां ब्रह्म ही सभी का निर्माता है।


सम्पूर्ण जड़ एवं चेतन तत्व ब्रह्म में ही समाये हुए हैं, जैसे चारों ओर बहती हुई छोटी-छोटी नदियां मिलकर समुद्र में विलीन हो

जाती हैं, उनका अस्तित्व समुद्र होता है, वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टि

उसी से निर्मित एवं ब्रह्म में ही विलीन होती है, जैसे पानी का

बुलबुला पानी से उत्पन्न हो जल में ही समा जाता है, उसी तरह

से संपूर्ण जीव, पदार्थ ब्रह्म से ही जन्म लेते हैं तथा अंत में उसी में लय हो जाते हैं।


जो भी ब्रह्मवेत्ता उस ब्रह्म को जानते हैं, वह उसी में लीन हो

जाते हैं, उसमें लीन होकर वे अव्यक्त रूप से सुशोभित होते हैं,

माया के महत्व एवम उसके बारे में वेदों-उपनिषदों में भी बताया गया है, उसी माया मोह को त्याग कर जीव, ब्रह्म का

साक्षात्कार प्राप्त करता है, भौतिक सुख जो माया का रूप है

उसे त्याग के ही विषय वासनाओं से मुक्त होकर ही परमात्मा

को पाया जा सकता है।


शुद्ध आत्मिक चिंतन ही इस तथ्य से अवगत करा पाता है, जिससे मोक्ष का मार्ग सरल हो जाता है, जीवन के आवागमन से मुक्ति प्राप्त होती है और प्रभु का आश्रय प्राप्त होता है, हम लोग प्रकृति से उत्पन्न हुयें, और अंत में सब इसी प्रकृति में मिल जायेंगे, कहने का मतलब यह है कि शरीर हर पल बदल रहा है, लेकिन आत्मा कभी नहीं बदलती है, आत्मा का परमात्मा से विलय ही मोक्ष है ।

शराब का अर्थ है

हम उस परमात्मा को नमस्कार करते हैं जो नितान्त शान्त है तथा कुछ भी प्राप्त करने का प्रयास नहीं करता, जो पूर्णतया स्वतन्त्र है तथा अपने में सम्पूर्ण है, जो मायोत्पन्न गुणात्मक जगत के कार्यों में आसक्त नहीं होता। वे परमात्मा संसार में अपनी लीला करने में वायु की तरह गतिशील हैं


√•संस्कृत शब्द है- शराब। शृ (हिंसार्थे) + अच्= शर, मारक वस्तु वा पदार्थ। अप् शब्द जल वाचक + जस्= अपः नीचे की ओर जाने वाला सबके भीतर प्रवेश करने वाला, रिक्त स्थान की पूर्ति करने वाला द्रव विशेष, पानी।

 【शर+ अपः =शरापः= शराब (प्→ब्,

 १→३ सूत्र से)】


√•शराब का अर्थ है, वह जल जो किसी को मारे, नष्ट करे, खण्ड-खण्ड करे, नष्ट करे। शराब के भीतर जो गुण वा वस्तु अन्तर्निहित है, उसका नाम है-नशा नश् (नश्यति / नाशयति क्विप् ,क + टाप् = नशा, जो नाश वा नष्ट करता है, अन्तर्धान वा लुप्त करता है तथा स्वयं उड़ जाता है अदृश्य रहता है, उसे नशा नाम दिया गया है। शराब में नशा होती है। जिसमें नशा हो, वह सब शराब है। हर वस्तु में नशा प्रच्छन्न रूप में रहती है। व्यापक होने से यह विष्णु है। अस्मै विष्णवे नमः । 


 √•अन्न ब्रह्म है। अन्न में नशा है। अन्न को सड़ाकर शराब बनायी जाती है। अन्न के विकिण्वन से बनी हुई शराब मद उत्पन्न करने से मदिरा कही जाती है। जो खाया जाय वह अन्न है। फल भी अन्न है। अंगूर/ द्राक्षादि फलों से शराब बनती है। जातक भी शराब है। यौवन प्राप्त होने पर इसमें नशा का प्रादुर्भाव होता है। तरुण, तरुणी के देह की शराब पीता है तो युवती, युवक के शरीर की नशा में धुत्त रहती है। इस प्रकार सर्वत्र नशा का साम्राज्य है। शब्द की नशा कान से स्पर्श की नशा त्वचा से रूप की नशा आँख से, रस की नशा जिहा से, गन्ध की नशा नाक से ग्राह्य है। किन्तु इन पाँचों की नशा एक साथ मन से ग्राह्य है। मन तो कभी अशक्त होता ही नहीं, ज्ञानेन्द्रियाँ अशक्त होती हैं। अतएव यह मन सदैव नशा करता रहता है। मन से स्त्री और पुरुष एक दूसरे को पीते हैं, चाहते हैं। दोनों एक दूसरे के लिये शराब हैं। शराब ही शराबी को पीती है, शराबी तो शराब को पीता ही है। 


√•शराब के शुभ और अशुभ दो प्रभाव हैं। जिस शराब के पीने से विवेक का नाश हो, वह त्याज्य है। जिसके पीने से कुविचारों का नाश हो, वह ग्राह्य है। पार्थिव शराब में ये दोनों गुण हैं। अल्पमात्रा में यह शुभ तथा अधिक मात्रा में पीने से अशुभ प्रभाववाली कही गई है। जो अपार्थिव शराब है, उसका प्रभाव शुभ ही शुभ है। जितना अधिक पिया जाय, उतना ही शुभ है। राम नाम ही यह दिव्य शराब है। प्रारंभ में इसे कान एवं जिहा से पिया जाता है। आगे चलकर इसे मन से पीते रहना चाहिये। मैं इसी शराब के नशे में पागल हो गया हूँ। इस नशे से उन्मत्त में सप्तम भाव के (देवता मूल प्रकृति) के चरणों पर अपना मस्तक रख कर शान्त हूँ ।


√•संसार के सभी समाजों में विवाह संस्कार का प्रावधान है। गृहस्थाश्रम का यह प्रवेश द्वार है। प्रवेश द्वार जितना ही अच्छा एवं दृढ़ हो उतना ही अच्छा एवं दृढ़ गृहस्थ जीवन होता है। इस द्वार का निर्माण धर्म की भूमि पर काम की ईंटों से होना चाहिये। इसमें अर्थ काष्ठ का कुच्छ कपाट हो तथा मोक्ष की एक सुन्दर अर्गला हो। गृहस्थाश्रम का ऐसा सिंहद्वार किसी-किसी को मिलता है। ऐसे एक गृहस्थ थे विदेह जनक श्री राम के श्वसुर वा शाश्वती सीता के पिता।

     【 तस्मै विदेहराजाय नमः । 】


√•इस कलियुग में गृहस्थाश्रम सर्वोपरि है। शास्त्र वाक्य है ...


“सर्वार्था गृहिणो नित्यं सिध्यन्ति च फलन्ति च। 

अतस्तथाविस्सद्वै सततं ब्रह्म चिन्तयेत् ॥

 कलौ तु केवलं वच्मि गार्हस्थयं ह्युत्तमोत्तमम् । 

ततरसन्नेव यलेन कृतकृत्यो भवेदिति ॥ "

           ( मार्कण्डेय स्मृति )


√•१६ महादानों में कन्यादान की गणना होती है। कन्यादान से गृहस्थ को श्रेय मिलता है। १६ महादान ये हैं...


 “गावः सुवर्णरजते रत्नानि च सरस्वति ।

 तिला: कंन्या गजाश्वाश्च शय्या वस्त्रं तथा मही॥ 

धान्यं पयश्च छत्र च गृहं चोपस्करान्वितम्।

 एतान्येव तु चोक्तानि महादानानि षोडश।" 

         ( मार्कण्डेय स्मृति )


 केवल दस वर्ष तक की वय वाली नारी कन्या है अकन्या का दान व्यर्थ है।


"दशवर्षात् परं कन्यां कृच्छेपि न विवाहयेत् । 

दशवर्षात् परं नारी कीर्तिता स्याद्रजस्वला ॥"

          (लौगाक्षिस्मृति )


√• इतनी अल्पवय में नारी का विवाह आज के युगधर्म के अनुकूल नहीं है। इसे बाल विवाह समझा जाता है और इस पर वैधानिक प्रतिबन्ध भी है। जब कि स्मृति वाक्य की सत्यता एवं उपादेयता में कोई सन्देह नहीं है। सभी स्मृतियाँ इसका एकस्वर से समर्थन करती हैं। इसमें दूरगामी लाभ एवं भूरि कल्याण है। इससे दाम्पत्यकलह/ पतिविरोध/पति-पत्नी विच्छेद नहीं होता। यह तर्कयुक्त तथ्य है। इस पर मैं दृढ़ हूँ। परन्तु युगधर्म से लोहा लेना ठीक नहीं। कलियुग को नमस्कार करते हुए आगे बढ़ना है। कन्या का विवाह समवर्षो में विषमवर्ष वाले वर के साथ करना चाहिये। सम संख्याएँ सौम्य वा स्त्री संज्ञक होती हैं। विषम संख्याएँ क्रूर वा पुरुष संज्ञक हैं। इन वर्षों का इन पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है, जीवन सुखी रहता है। संख्या ८ सम है किन्तु अशुभ भाव मृत्यु की द्योतक है। संख्या ९ विषम है यद्यपि शुभ भाव धर्म की द्योतक है। इन वर्षों में कन्यादान वर्जित है। संख्या १० सम है तथा शुभ भाव कर्म वा यज्ञ की प्रतीक है। अतः कन्यादान इसमें प्रशस्त है। संख्या ११ विषम है। यह कन्यादानार्थ अयुक्त है। संख्या १२ सम है। तथा दान भाव द्वादश की प्रतीक है, इसका स्वामी गुरु पति का कारक है। अतः १२ वें में कन्यादान उचित है। विवाह के सभी नियम मुहूर्तादि कंन्या पर लागू होते हैं। १२ वर्ष का एक चक्र होता है। इसके बाद स्मृत्योक्त विधानों की अपेक्षा नहीं रहती। जिस में लाभ हो वह कर्म किया जाय। युग के सापेक्ष मैं स्मृति धर्म का समर्थन करता हूँ। 


√•ब्राह्मण को चाहिये कि वह अपचारिणी स्त्री से दूर रहे, पापी शिष्य को त्याग दे तथा पापी यजमान से विमुख रहे। अपचारिणी स्त्री पति को ले डूबती है। पापी शिष्य गुरू को घोर कष्ट देता है। पापी यजमान तो पुरोहित को नरक में डालता ही है।


√•हर स्त्री पत्नी नहीं हो सकती। पत्नी पवित्र शब्द है। इसे पति का स्त्री-लिंग (पति डीप, नुक पत्नी) कहना अनुचित है।【 पाति रक्षति पा + इति = पति】 अर्थात् स्वामी, किन्तु पत्नी का अर्थ स्वामिनी नहीं है। 【पति + नी (नी + क्विप्) = पतिनी शब्द का अपभ्रंश है, पत्नी।】 नी का अर्थ है, पथ प्रदर्शक अपणी आगे-आगे चलने वाला। इस प्रकार पंतिनी का अर्थ है-पति को साथ लेकर धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति में उसके आगे आगे चलने वाली स्त्री 【पतिनी= पत्नी】। पत्नी के चार रूप हैं-धर्म पत्नी, अर्थ पत्नी, काम पत्नी, मोक्ष पत्नी। जिस स्त्री में ये चारों विशेषताएँ हैं, वह पूर्ण पत्नी है। महाराज दशरथ की. पत्नी कैकेयी पूर्ण पत्नी थी। उसने देव दानव युद्ध में देवताओं का पक्ष लेकर लड़ रहे अपने पति दशरथ के साथ रह कर रथ संचालन करती हुई धर्म पत्नी का रूप प्रस्तुत किया। रथ के नष्ट हो जाने पर उस रथ को पुननिर्मित कर उन्हें विजय दिलाकर उनका अर्थ सिद्ध किया। इसलिये वह अर्थ पत्नी हुई। उनके काम भाव को तुष्ट करते हुए उसने भरत जैसा महान् पुत्र दिया। इसलिये कामपत्नी हुई। अन्त में उसने अपने प्रति अनुरक्त दशरथ को फटकार कर उनका मोह भंग किया जिससे वे राम का नाम लेते हुए मोक्ष पद प्राप्त किये। इस प्रकार वह मोक्ष पत्नी हुई। 

हमारे पूर्वोजों ने अनेको आविष्कार

हमारे पूर्वोजों ने अनेक ऐसे आविष्कार किए, जिनका विचारमात्र भी आज के वैज्ञानिक नहीं कर सकते।


वेद में 18 प्रकार के वायुयानों का उल्लेख है। हमारे ऋषि सूर्य आदि अन्य मंडलों में जा सकते थे। आधुनिक वायुयान के अधिकतम गति 101 मील प्रति घंटा से ऊपर तक जाने की संभावनाएं हम संजोए हुए हैं। सामान्य वायुयान अभी तक 21 मील ऊपर तक ही जा सकता है। 


9 प्रकार के विद्युत को ऋषिगण जानते थे। मनुष्य के ह्दय में एक कौतूहल आज भी प्रश्नवाचक बना हुआ है कि आखिर संसार है क्या? 


सृष्टि की रचना, सभ्यता एवं संस्कृति का विकास-क्रम कैसे और किस प्रकार बना और सृष्टि का विनाश कब, कैसे और किस रूप में होने वाला है? 


युद्ध, महायुद्ध, भूकंप, ओजोन परत में छिद्र या परमाणु विखंडन आदि जैसे संसार का नष्ट होना निश्चित है? 


ऐसे प्रश्न पर चर्चा-परिचर्चा विश्व-स्तर पर होती रहती है, लेकिन इस विषय में सभी का समान मत नहीं होने से विषय पर प्रश्नवाचक बना हुआ है।


परंतु विभिन्न विद्धानों, वैज्ञानिकों एवं भविष्यवेताओं में संसार की स्थिति, निर्माण और उसके नष्ट होने की तिथि के बारे में मतभेद हो सकते हैं कि वेद, ज्ञान का प्रकाश पुंज है, जिससे ऐसा अखंड, अनंत, अपरिमित ज्ञान बोध होता है, जिसको सृष्टि के ऋषियों ने हृदयंगम किया था। वेद, शास्त्र के विद्वान, वेद को सृष्टि विज्ञान के संपूर्ण एवं परिपूर्ण ग्रंथ की मान्यता देने हेतु सर्वसहमत हैं। मनुष्य की उन्नति, प्रगति सभ्यता एवं संस्कृति का विकास हुआ है या भविष्य में होगा, वह वैदिक विज्ञान के आश्रम से ही संभव है।


विश्व की प्राचीनतम मानव सभ्यता के युग से आधुनिक सभ्यता, संस्कृति एवं वैज्ञानिक आविष्कारों का मुख्यत: आधार भू-मंडल में स्थित प्रमुख चार अवयव-जल, अग्नि, वायु और मृदा हैं। इन चारों वस्तुओं के विषद ज्ञान को वेद कहते हैं।


वेद चार हैं-


ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। 


इनकी चार अलग-अलग संहिताएं हैं। बिखरे हुए वेद मंत्रो का संकलन करने का कार्य ऋषियों ने संपन्न कर उन्हें संहिताओं में विभाजित किया। 


भू-मंडल में स्थित चार वस्तुओं में से जल के संबंध में सामवेद में वर्णन किया गया है।सामदेव में जल के इस रूपांतर कार्य तथा गुणों का ज्ञान आदि विश्लेषणात्मक एवं वैज्ञानिक ढंग से सविस्तार उपलब्ध है। 


ऋग्वेद से अग्नि के बारे में ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। 


यजुर्वेद में वायु के विभिन्न प्रकार एवं उनके कार्यों के बारे में ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। 


इसी प्रकार अथर्ववेद में मृदा के विभिन्न गुणों के संबंध में जानकारी अवगत हो सकती है। 


इसी कारण जल, अग्नि, वायु और मृदा को क्रमश: ऋग्वेद, सामवेद और अथर्ववेद कहा जाता है। अग्नि, जल, वायु, और मृदा के क्रमशः 21,1000, 101 एवं 9 मुख्य विभाग होते हैं। इन सबका योग 1,131 के बराबर होता है वेदों की भी 1000, 21, 101, 9 ऋचाएं हैं। यजु का अर्थ वायु है और अथर्व का अर्थ मिट्टी है।


प्रत्येक वेद में जल, अग्नि, वायु और मिट्टी पारिभाषिक शब्द हैं और उनसे केवल हमारे इस जल, अग्नि, वायु और मिट्टी का ही तात्पर्य नहीं है, वरन् इन चारों पदार्थों के आदिस्वरूप, प्रकृति की अव्यय अवस्था से लेकर स्थलतम अवस्था तक जितने रूप प्रकारांतर, विभाग इत्यादि बनते हैं, उन सबका जातिवाचक नाम जल, अग्नि, वायु और मिट्टी वेद में निहित हैं। उदाहरणस्वरूप जल से वेद में घृत, मधु, सुरा, जल इत्यादि समस्त जलीय पदार्थों से अभिप्राय है और जल के सूक्ष्म कण जो भाप रूप में आकाश में स्थित हैं, उनको भी वेद जल ही कहकर पुकारता है।


प्राचीन ऋषियों ने प्रकृति की आदि अवस्था से अन्त्य अवस्था तक पूर्णावलोकन कर प्रत्येक देश में उन देशों की प्राकृतिक रचना को देखकर इन शाखाओं का विस्तृत तथा सक्रम प्रचार किया। उदाहरणस्वरूप उत्तर प्रदेश में जल और वायु प्रधान होने से विंध्य पर्वत के ऊपर साम और यजुर्वेद का प्रचार हुआ तथा विंध्य से नीचे दक्षिण देश अग्नि और भूमि प्रधान होने से वहां ऋग्वेद तथा अथर्ववेद का प्रचार एवं प्रसार हुआ। इससे स्पष्ट है कि हमारे ऋषि-मुनियों को संसार का जबरदस्त सूक्ष्म एवं विस्तृत ज्ञान था, तभी तो वे परिस्थिति-अनुकूल वेदों का प्रचार करने में सक्षम सिद्ध हो सके।


जिन वेदों की रचना भारत में हुई, उनकी 1,131 शाखाएं थीं, उनमें से केवल मात्र 6 शाखाएं ही उपलब्ध हैं अर्थात् 1,125 शाखाएं उपलब्ध नहीं है। जर्मन में 103 शाखाएं अवश्य उपलब्ध हैं, जिन्हें जर्मन सरकार ने बहुत ही सुरक्षित ढंग से रखा है, जिनका अध्ययन केवल वहां के शीर्षस्थ वैज्ञानिकों द्वारा किया जा सकता है। वेद का अर्थ निरुक्त से होता है। प्राचीनकाल में 18 निरुक्त प्रचलित थे। अब भारत में केवल एक यास्क निरुक्त ही उपलब्ध है। जर्मनी में 3 निरुक्त उपलब्ध हैं।


वेदों का अध्ययन प्राचीनकाल में वेद की आज्ञानुसार (यजुर्वेद अ.26/15) ही पर्वतों के शिखर पर अथवा नदियों के संगम पर किया जाता था। 


ऋक् और अथर्व का अध्ययन पर्वतों पर होता था, कारण कि पत्थर पर जो प्रभाव पड़ता है, वह भी जाना जा सकता है। इससे अग्नि तथा मिट्टी का ज्ञान विशेष रूप से वहां जाना जा सकता है। 


साम और यजु का अध्ययन नदियों के संगम पर हुआ करता था, इसका कारण भी स्पष्ट है कि दो नदियों के जल-संगम से विभिन्न गुणों एवं शक्तियों की संभावित संभावनाओं का भी अवलोकन हो सकता है। वायु और जल के संघर्ष से नवीन शक्ति के प्रकट होने की संभावनाएं होती थीं, उसका भी प्रत्यक्ष रूप से अवलोकन सरलता एवं सुगमता से किया जा सकता है। अग्नि और मिट्टी को वैज्ञानिक एकजातीय समझते हैं। ठीक इसी प्रकार जल और वायु भी एकजातीय हैं।


यजुर्वेद के वर्णनानुसार, एक ही विद्युत दीप जिसे उत्तरी ध्रुव के नीचे बिंदु सरोवर के ऊपर रखा जाता था, संपूर्ण एशिया में प्रकाश देता था। ऋग्वेद 4 अ. 4 के अनुसार उनका सामाजिक जीवन इतना पवित्र तथा उच्च था कि सदैव उनका उद्देश्य यही रहता था कि सभी देशों में शांति तथा स्वराज्य स्थापित रहे।


यजुर्वेद आख्यान 17/20 में लिखा है कि वैदिक मंत्रों के आधार पर मन द्वारा ही सृष्टि की उत्पत्ति क्रम का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। आधुनिक काल के वैज्ञानिक सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में तथ्यात्मक प्रत्युत्तर देने में असफल हैं कि ईश्वर ने इतने विशाल संसार की रचना कैसे की। जब सृष्टि के आदि में कुछ भी नहीं था तो भला उसका वर्णन कौन कर सकता है? उस काल में न देवता थे और न ही पितृ और न ही मनुष्य, फिन मन और प्राण ही सूक्ष्म अवस्था में उस काल में वहा उपस्थित थे। अतः वेद ने उसी मन की ओर संकेत कर हमें सृष्टि विज्ञान को सही ढंग से जानने व पहचानने का एकमात्र यंत्र है तो म नहीं है? (ऋग्वेद अ. 20 सू. 164 स. 4 के अनुसार)


अपने मन से यदि हम पूछें कि कौन-सा वन है, उस वन में कौन-सा वृक्ष है, उस वृक्ष में कौन-सी डाली है, जिस डाली को काटकर ईश्वर ने इतने बड़े संसार की रचना की है तो इसका उत्तर वृष्ण यजु. अ. में 7 दिया है कि स्वयंभू वन है, वाक् वृक्ष है, मन उसकी डाली है, जिसको काटकर उस एक शक्ति ने इतना बड़ा संसार बनाया है।


ऋग्वेद अ. 2 अ. 20 म. 13 के अनुसार संपूर्ण ब्रह्मांड पांच चक्रों स्वयंभू, परमेष्ठ, सूर्य, पृथ्वी और चंद्र पर आधारित है। प्रत्येक चक्र, सृष्टि, पृथ्वी एवं चंद्र के स्वयंभू मंडल मे विलीन हो जाने से प्रलय होती है। जिन शक्तियों और नियमों के आधार पर पांचों चक्र अपने-अपने भार को धारण करते हैं, उन्हें सनातन धर्म कहते हैं, क्योंकि ये आदि से अंत तक धारण किए रहता है। धर्म वही है, जो प्रकृति के अनुकूल हो और पाप वही है, जो प्रकृति के विरुद्ध हो।


भारतीय संस्कृति ‘अरण्य संस्कृति’ है। वन दार्शनिक एवं रहस्यमय ज्ञान के लिए उपयुक्त स्थल माना गया है, लेकिन आज कि भौतिकवादी संस्कृति ने वनों का विनाश द्रुतगति से किया है, जिससे कालांतर में सूर्य एवं पृथ्वी को अपने भार को वहन करने की क्षमता क्षीण होती प्रतीत हो रही है। सूर्य की बैंगनी किरणें पृथ्वी पर सीधे रूप से पड़ने पर संभावित संतुलन को क्षति पहुंचने की संभावनाएं प्रबल बनती जा रही हैं। अब हमें प्रकृति के प्रतिकूल आचरण से जलवायु परिवर्तन के खतरों से सावधान होकर परिस्थिति के संतुलन की आवश्यकता है। 


जिस पृथ्वी से हमारा जन्म से मृत्यु तक का सह संबंध है, उस पर करुणामय वृत्ति नहीं है। जो पेड़ अपने काटने वाले को भी छाया देता है, उसकी भी कुल्हाड़ी से हत्या अर्थात् हम पर्यावरण को असंतुलित करके निश्चय ही असनातनी एवं अवैदिक बनते जा रहे हैं, जिसमें हमारा भविष्य अंधकारमय परिलक्षित हो रहा है। यदि पृथ्वी पर सूर्य की बैंगनी किरणों के आगमन की गति तीव्र हो गई तो पुंडरीकात्मक संसार नहीं रह पाएगा। अतः समय रहते पर्यावरण को संतुलित रखने से ही मानव सुरक्षित रह सकेगा।

नारी किसे गुरु बनाये

 नारी किसे गुरु बनाये...



            हिन्दू धर्म में ऐसी कई महिलाएं भी हुई हैं । जिन्होंने वेद की ऋचाएं लिखी और ऋषियों के साथ शास्त्रार्थ किया है । वैदिक काल में नारियों को धर्म और राजनीति में भी पुरुष के समान ही समानता हासिल थी । मैत्रेयी, गार्गी जैसी नारियां वेद पढ़ती थीं और पढ़ाती भी थीं । ऋग्वेद की ऋचाओं में लगभग चौध सौ चौध ऋषियों के नाम मिलते हैं । जिनमें से तीस नाम महिला ऋषियों के हैं । यही नहीं नारियां युद्ध कला में भी पारंगत होकर राजपाट भी संभालती थी । दूसरी ओर महिलाएं आश्रम में रहकर आश्रम का कामकाज भी संभालती थीं ।


             #महाभारत_युद्ध_के_बाद_नारी_का_पतन_होना शुरू हुआ । इस युद्ध के बाद समाज बिखर गया । राष्ट्र राजनीतिक शून्य हो गया और धर्म का पतन भी शूरु हो गया । युद्ध में मारे गए पुरुषों की स्त्रीयां विधवा होकर बुरे दौर में फंस गई थी । 


           वैदिक व्यवस्था शून्य हो गई और उसकी जगह राजा एवं पूरोहितों द्वारा निर्मित सामाजिक नियम महत्वपूर्ण हो गए थे । बौद्ध काल के बाद तो मध्यकाल में नारी की स्थिति और भी बुरी हो गयी थी । इसका कारण हर क्षेत्र में पुरुष और पुरुष मानसिकता का हावी होना था । फीर पुराणों और स्मृतियां का दौर प्रारंभ हुआ । 


          धर्म और शास्त्रों के ठेकेदारों ने कहने लग गये कि नारी को ना तो गुरु बनना चाहिए और ना ही किसी को उनका गुरु बनाना चाहिए । इसके पीछे कई कारण बताए गए । उनके अनुसार नारी का पति ही उसका गुरु होता है । 


              गुरुर्ग्निर्दिजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरु: ।

              पतिरेव गुरु: स्त्रीणां सर्वस्याऽभ्यागतो गुरु: ॥

                                       -पद्मपुराण एवं ब्रह्मपुराण-


           अर्थात अग्नि द्विजातियों का गुरु है । ब्राह्मण चारों वर्णो का गुरु है । एक मात्र पति ही स्त्री का गुरु है । अतिथि सब का गुरु है ।


                 स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ।

                 पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥          

                                                            -मनुस्मृति-


             अर्थात स्त्रियों के लिए वैवाहिक विधि का पालन ही वैदिक संस्कार एवं यज्ञोपवित, पति सेवा ही गुरुकुल वास और गृहकार्य ही अग्निहोत्र कहा गया है । स्त्री को पति के सिवाय किसी भी पुरुष से किसी प्रकार का संबंध नहीं जोड़ना चाहिए ।

            कलिकाल में तो माताओं से प्रार्थना कर रहे है कि वह किसी भी साधु, तथाकथित गुरु के भ्रम जाल में ना पड़ें । क्योंकि आजकल तथाकथित गुरु चप्पे चप्पे पर दुकान खोलकर आम लोगों का शोषण कर रहे है । समाज में गुरू के नाम पर अत्यन्त ठगी, दम्भ और पाखण्ड हो रहा है । साधु को कभी भी स्त्रीयों को शिष्या नही बनाना चाहिये । स्त्री ही स्त्री को दीक्षा दे या गुरु बनाएं तो उचित होता है ।

 

       विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णाशनास्तेऽपि स्त्रीमुखपड़्कजं सुललितं दृष्ट्वैव मोहं गताः ।

शाल्यन्नं सघृतं पयोदधियुतं भुञ्जन्ति ये मानवास्तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेद्विन्ध्यस्तरेत्सागरे ॥     

                                                     -भर्तृहरिशतक-


           अर्थात जो वायु-भक्षण करके, जल पीकर और सूखे पत्ते खाकर बन में रहते थे । वह विश्वामित्र, पराशर आदि भी स्त्रियों के सुंदर मुख को देखकर मोह को प्राप्त हो गए । फिर जो लोग शाली धान्य (सांठी चावल) को घी, दूध और दही के साथ खाते हैं । वह यदि अपनी इन्द्रियका निग्रह कर सकें तो मानो विन्ध्याचल पर्वत समुद्रपर तैरने लगा ।


           ऐसी स्थिति में जो जवान स्त्रियों को अपनी शिष्या बनाते हैं । उनको अपने आश्रम में रखते हैं । उनका कभी भी कल्याण नही हो सकता । आज नही तो कल यह नारी उनके साधना में सबसे बडी बाधा उत्पन्न कर सकती है । उनका रुप, भावभरिगीनी आदि साधनायों पर भारी पढने लग जाता है । फिर उनके द्वारा आपका भला कैसे हो सकता है ? वह केवल धोखा ही है ।


          वर्तमान युग में महिलाएं को किसी भी पुरुष को अपना गुरु नही बनाना चाहिये । उसके लिए उसका गुरु उसका पति ही होता है । फिर भी वह धर्म के मार्ग पर जाना चाहती है तो ऐसे में किसी महिला गुरु को ही अपना गुरु बनाएं । ऐसा शास्त्र वचन है । जो उपरोक्त लिखा गया है । वर्तमान में साधु और असाधु में फर्क करना अति मुश्किल है ।

जिसके सामने स्त्री झुकती है

क्या हर वह पुरुष, जिसके सामने स्त्री झुकती है, सचमुच झुकने योग्य होता है?


जो पुरुष प्रेम में अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व जानता है…जो वाणी में संयम और आचरण में मर्यादा रखता है…जो अपनी सामर्थ्य का प्रयोग संरक्षण के लिए करता है, शोषण के लिए नहीं…चाहे सूर के श्याम हों या तुलसी के राम…साहित्य में ऐसे पुरुषों को धर्म का धारक कहा गया है…


और यदि पुरुष में करुणा नहीं, सौम्यता नहीं, दया नहीं, भावनाओं की समझ नहीं, स्त्री के स्वाभिमान के लिए स्थान नहीं, जिसके भीतर प्रेम है भी, तो केवल नियंत्रण के रूप में…वह पुरुष सम्मान नहीं चाहता…केवल अपने पुरुषत्व की घोषणा चाहता है…या शायद अपने भीतर की रिक्तता छिपा रहा होता है…वह डर पैदा करता है ताकि नियंत्रण बना रहे…वो ये नहीं जानता कि जहाँ भय है, वहाँ सम्मान नहीं…सिर्फ़ चुप्पी होती है…और वह चुप्पी…धीरे-धीरे सम्बन्ध को खोखला कर देती है…वो अक्सर यह नहीं देख पाता कि उसकी कठोरता से स्त्री उसके सामने छोटी नहीं हो जाती…बस भीतर से मृत सी हो जाती है…वह मुस्कुराती तो है, पर खुलकर नहीं…झुकती तो है, पर समर्पित नहीं होती…


जो पुरुष अपने भीतर की दुर्बलताओं से भागता है, वह अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए बाहरी शक्ति का अभिनय करता है…


समाज ने पुरुषत्व को कठोरता, नियंत्रण और स्वामित्व से जोड़ा है…पर एक आदर्श पुरुष इन परिभाषाओं को शांति और धैर्य के साथ अस्वीकार करता है…वह जानता है कि जिस प्रेम में अपमान प्रवेश कर जाए, वह प्रेम नहीं रह जाता…


चरण छूने योग्य पुरुष वह है…जो स्त्री को “मेरी” कहने से पहले “स्वतंत्र” मानता है….जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शालीन रहता है…जिसकी वाणी में संयम होता है…जो जानता है कि शब्द भी आघात कर सकते हैं…


इसलिए नारी का दर्शन कहता है…

मैं झुकूँगी…पर वहाँ, जहाँ मेरा झुकना मेरे अस्तित्व को छोटा न करे…

मैं चरण भी छुऊँगी…पर उस पुरुष के, जो मेरे माथे पर संवेदनाओं का हाथ रखे, न कि बाध्यताओं का…


मेरा प्रेम समर्पण है…पर समर्पण का अर्थ स्वयं को खो देना नहीं…मैं त्याग कर सकती हूँ…पर अपने स्वत्व की कीमत पर नहीं…मैं सहन करूँगी, पर उस पीड़ा को नहीं जो मुझे धीरे-धीरे अपने ही भीतर से मिटा दे…मैं प्रेम में पिघलूँगी, पर पिघलकर अपना आकार नहीं खोऊँगी…


और मेरी महानता इसमें नहीं, कि मैं जिसे बस एक सामाजिक क्रिया के अधीन होकर मुझसे बाँध दिया गया है…उस पशु को आँखों पर पट्टी बाँधकर पूजती रहूँ…मेरे आदर्श कहते हैं…कि जो पुरुष मुझे “संभालने” के नाम पर नियंत्रित करे…वह रक्षक नहीं, डरा हुआ शासक है…जो मुझे डराकर “सीधा” करे…वह पथप्रदर्शक नहीं, शोषक है…मेरी मति इतनी स्वस्थ हो…कि मैं चरण वहाँ छुऊँ जहाँ चरण चलने का अर्थ जानते हों…साथ चलने का….रौंदने का नहीं….


आयुर्वेद जीवन

पहचानो जड़ी बूटी #किस बीमारी में कौनसी काम आती है #कैसे करें उपयोग #

1. अश्वगंधा

किस बीमारी में: कमजोरी, तनाव, अनिद्रा, पुरुष-शक्ति

कैसे: 1 चम्मच चूर्ण गुनगुने दूध के साथ

कब: रात को सोने से पहले


2. गिलोय

किस बीमारी में: बुखार, इम्युनिटी कमजोर, डेंगू

कैसे: 10–15 ml रस या काढ़ा

कब: सुबह खाली पेट


3. तुलसी

किस बीमारी में: सर्दी-खाँसी, दमा, संक्रमण

कैसे: 5–7 पत्ते चबाएँ या काढ़ा

कब: सुबह खाली पेट


4. एलोवेरा

किस बीमारी में: कब्ज, त्वचा रोग, पेट की जलन

कैसे: 20 ml रस

कब: सुबह खाली पेट


5. नीम

किस बीमारी में: त्वचा रोग, खून की गंदगी

कैसे: पत्तों का रस / दातून

कब: सुबह


6. आंवला

किस बीमारी में: आँखों की कमजोरी, बाल झड़ना, गैस

कैसे: 1 चम्मच चूर्ण या रस

कब: सुबह


7. ब्राह्मी

किस बीमारी में: याददाश्त कमजोर, तनाव

कैसे: चूर्ण दूध के साथ

कब: रात


8. शतावरी

किस बीमारी में: महिलाओं की कमजोरी, हार्मोन असंतुलन

कैसे: 1 चम्मच चूर्ण दूध के साथ

कब: सुबह


9. मुलेठी

किस बीमारी में: गले की खराश, खाँसी

कैसे: छोटा टुकड़ा चूसें

कब: दिन में 2 बार


10. अर्जुन

किस बीमारी में: हृदय रोग, उच्च रक्तचाप

कैसे: छाल का काढ़ा

कब: सुबह-शाम


11. हरड़

किस बीमारी में: कब्ज, अपच

कैसे: चूर्ण गुनगुने पानी से

कब: रात


12. बहेड़ा

किस बीमारी में: खाँसी, आँख रोग

कैसे: चूर्ण

कब: सुबह


13. पुनर्नवा

किस बीमारी में: सूजन, किडनी रोग

कैसे: काढ़ा

कब: सुबह


14. कालमेघ

किस बीमारी में: लिवर रोग, पीलिया

कैसे: काढ़ा

कब: सुबह


15. गुड़मार

किस बीमारी में: मधुमेह (डायबिटीज)

कैसे: चूर्ण

कब: सुबह-शाम


16. भृंगराज

किस बीमारी में: बाल झड़ना, सफेद बाल

कैसे: रस या तेल

कब: रात


17. दारुहल्दी

किस बीमारी में: त्वचा रोग, संक्रमण

कैसे: चूर्ण पानी के साथ

कब: सुबह


18. नागरमोथा

किस बीमारी में: गैस, अपच

कैसे: चूर्ण

कब: भोजन बाद


19. चिरायता

किस बीमारी में: बुखार, मलेरिया

कैसे: काढ़ा

कब: सुबह


20. शंखपुष्पी

किस बीमारी में: मानसिक तनाव, नींद न आना

कैसे: सिरप/चूर्ण

कब: रात


⚠️ महत्वपूर्ण सावधानी

गर्भवती महिलाएँ बिना वैद्य की सलाह न लें

अधिक मात्रा हानिकारक हो सकती है

Saturday, December 27, 2025

एकतरफा प्रेम...

एकतरफा प्रेम हृदय के किसी कोने में सहेजी गई वह कोमल भावना है, जिसमें बदले में कुछ पाने की लालसा नहीं, बल्कि केवल अर्पण का भाव होता है। यह एक ऐसा मौन समर्पण है, जहाँ प्रेमी अपने प्रिय की मुस्कुराहट में ही अपनी दुनिया खोज लेता है। इसमें न तो कोई शिकायत होती है और न ही कोई अधिकार, बस एक निस्वार्थ चाहत होती है जो समय के साथ और गहरी होती जाती है।

अक्सर दुनिया इसे अधूरा मानती है, लेकिन गहराई से देखा जाए तो यह अपने आप में पूर्ण है। एकतरफा प्रेम में व्यक्ति अपनी भावनाओं का स्वयं ही साक्षी होता है। वह भीड़ में भी उस एक चेहरे को ढूंढ लेता है, उसकी अनकही बातों को सुन लेता है और उसकी छोटी-छोटी खुशियों में अपनी खुशी तलाशता है। यहाँ संवाद की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि आँखों की भाषा और धड़कनों का मौन ही पर्याप्त होता है।

इस प्रेम की सबसे सुंदर बात इसकी पवित्रता है। जब आप जानते हैं कि सामने वाला कभी आपका नहीं होगा, फिर भी आप उसके मंगल की कामना करते हैं, तो वह प्रेम वासना या स्वार्थ से ऊपर उठकर भक्ति बन जाता है। इसमें दूरी होने के बावजूद एक रूहानी नजदीकी महसूस होती है। यह इंसान को भीतर से धैर्यवान और संवेदनशील बनाता है।

हालाँकि, इस सफर में दर्द की एक मद्धम सी लहर हमेशा साथ चलती है। कभी-कभी वह अकेलापन सालता है, जब आप अपनी भावनाओं को साझा नहीं कर पाते। लेकिन वही दर्द उस प्रेम को और अधिक निखारता है। एकतरफा प्रेम केवल किसी को पा लेने की जिद नहीं, बल्कि किसी को दूर रहकर भी बेपनाह चाहने की वह तपस्या है, जो केवल वही समझ सकता है जिसने इसे जिया हो। यह वह एहसास है जो साबित करता है कि प्रेम का अस्तित्व केवल मिलन में नहीं, बल्कि निस्वार्थ चाहत में भी जीवित रहता है।


!! चाहत क्या होती है !!

जिसकी कमी आप हर पल महसूस करे, 

चाहत वो होती है...!!


ये किसी उम्र की मोहताज़ नही होती, 

जब जिससे होना होता है, हो जाती है...!!


कभी-कभी जिन्दगी में आगे बढ़ते हुए, 

एक अनजाने अजनबी से कोई रिश्ता जुड़ जाता है, 

और वो एक सच्ची दोस्ती में बदल जाता है,चाहत वो होती है....!!


किसी को पाना ही नही, 

किसी के साथ समय बिताने, बाते करने से जो सुकून मिलता है, 

चाहत वो होती है....!!


जिसके साथ आप अपना हर सुख-दुख बाँटना चाहते हो, चाहत वो होती है....!!


ये वो जज़्बा और एहसास है जिसका कोई नाम नही होता, 

जो बेहद पाक और खूबसूरत होता है, 

चाहत वो होती है ...