Sunday, December 28, 2025

इन्द्रिय क्या है

 "इन्द्रिय" क्या है"

जीव अनादि है किन्तु अनन्त नहीं है,

मोक्ष मिलने पर जीव का आत्मस्वरूप अपने वास्तविक स्व में

स्थित हो जाता है, तथा इन्द्रियों सहित सारे अन्य तत्व अपने मूल कारण "प्रकृति" में समाहित हो जाते हैं |


स्थूल शरीर के आँख, कान, आदि भागों को इन्द्रियाँ नहीं कह

सकते | इन्द्रियाँ sense organs नहीं हैं | सारे sense organs इन्द्रियों के केवल स्थूल भौतिक उपकरण हैं |

उदाहरणार्थ, शरीर का जो भाग "कान" कहलाता है वह "कर्ण"

नाम की इन्द्रिय नहीं है | "कर्ण" इन्द्रिय का स्थूल बाह्य स्वरुप

"कान" नाम का स्थूल पुर्जा है जो ध्वनि को ग्रहण करने में

लाउडस्पीकर के हॉर्न का कार्य करने वाला बेजान पुर्जा है,

जो ध्वनि का संग्रहण (reception, collection) करता है किन्तु "सुन" और "समझ" नहीं सकता |


यदि आप दूर की किसी ध्वनि को और भी स्पष्टता के साथ

सुनना चाहते हैं तो दोनों हाथों को दोनों कानों से सटाकर इस

तरह रखें (यह acoustic waveguide कहलाता है) कि केवल आगे से ध्वनि की दिशा से आने वाली ध्वनि ही कानों तक पँहुचे और अन्य दिशाओं की ध्वनियाँ बाधित हो जाएँ तो और भी अच्छी तरह ध्वनि सुन सकेंगे | घर में जो सामान्य बिजली का टेबल पंखा चलता है उसके आगे भी खड़े होकर इस तरह का प्रयोग करेंगे तो पायेंगे कि पंखे से निकलने वाले बाहुत सारी frequencies , खासकर अधिक ऊर्जा वाली higher frequencies, सामान्यतः आप नहीं सुन पाते किन्तु कानों पर सही तरीके से हाथ रखेंगे तो सुनायी देने लगेंगी, उन ध्वनियों की शक्ति सैकड़ों गुणा बढ़ जायेगी |


इस सिद्धान्त के आधार पर कृत्रिम acoustic telescope बनाए जाते हैं जिनमें उपरोक्त acoustic waveguide के अलावा नेगेटिव फीडबैक पर आधारित नॉइज़ रिडक्शन द्वारा नियन्त्रित ऑडियो एम्पलीफायर युक्त माइक्रोफोन हों तो मीलों दूर की ध्वनियाँ मनुष्य सुन सकता है | उसमें अनावश्यक ध्वनियों को दबाने और मानवीय भाषा में प्रयुक्त होने वाले सबसे महात्वपूर्ण ध्वनियों को बढाने वाली प्रक्रिया भी हो तो मीलों दूर की मानवीय वार्तालाप को साफ़-साफ़ सुना जा सकता है ।


प्रकृति भी यदि मनुष्य के कानों को उस सीमा तक संवेदनशील

बना दे तो बहुत क्षति होगी | तब इतनी प्रकार की नयी ध्वनियाँ सुनाई देने लगेंगी कि मनुष्य को समझ आने वाले भाषा

के शब्द ("सिग्नल") अनावश्यक ध्वनियों के शोरगुल (नॉइज़") के नीचे दब जायेंगे और जीना कठिन हो जाएगा | मानव शिशु का मस्तिष्क भी धीरे-धीरे "सीख" लेता है कि किन ध्वनियों पर

ध्यान देना चाहिए और किन ध्वनियों को अनसुना करना

चाहिए | उदाहरणार्थ, मस्तिष्क की कोमल कोशिकाओं को

क्षति पँहुचाने में सक्षम अधिक ऊर्जा वाली higher

frequencies बाह्य कान द्वारा ग्रहण तो किये जाते हैं किन्तु

मस्तिष्क के भीतर उनको पँहुचाने वाली मैकेनिज्म धीरे-धीरे

"सीख" लेती है कि कैसे उनको आंशिक या पूर्ण रूप से रोका जाय और भी बहुत सारी अनावश्यक ध्वनियों को सुनने वाली

जैविक मैकेनिज्मों को मनुष्य का मस्तिष्क धीरे-धीरे स्विच-

ऑफ कर देता है ताकि मस्तिष्क में सुनने की क्षमता से

सम्बन्धित पुर्जों तक पँहुचने वाली ध्वनियों में नॉइज़ की

मात्रा कम-से-कम हो और सिग्नल अधिक हो |


कहीं अद्वैत वेदान्त पर बातचीत हो रही हो और बीच में कोई

व्यक्ति प्रश्न उठा दें कि मोटरसाइकिल कम पेट्रोल कैसे खर्च

करे तो यह प्रश्न नॉइज़ है और अद्वैत वेदान्त से सम्बन्धित

बातें सिग्नल (S) हैं | किन्तु कहीं पर मोटरसाइकिल द्वारा तेल

की खपत पर चर्चा हो रही हो और बीच में कोई व्यक्ति प्रश्न

उठा दें कि अद्वैत वेदान्त क्या है तो अद्वैत वेदान्त तब नॉइज़ है

और मोटरसाइकिल से सम्बन्धित बातें सिग्नल हैं | अतः कब कौन सी बात सूचना का सार्थक संकेत (सिग्नल) है और कौन सी बात शोर है यह देश-काल-पात्र के सापेक्ष निर्धारित होती है |


सूचना के सार्थकता की "अर्थसिद्धि" प्रयोगकर्ता के उद्देश्य

और क्षमता द्वारा निर्धारित होती है, वरना सूचना कैसी भी

हो भैंस के आगे बीन ही होती है | भैंस के आगे उस्ताद

बिस्मिल्लाह खान का संगीत केवल नॉइज़ है | भैंस को अपने

जीवन-यापन में सहायक जो ध्वनियाँ सार्थक लगती हैं वे भैंस के लिए सुमधुर संगीत हैं किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के लिए नॉइज़ हैं | दोनों में से किसे बेहतर सिग्नल कहा जाय और किसे शोर, इसका कोई निरपेक्ष मानदण्ड नहीं है, आखिर प्रकृति ने भैंस को भी बड़े ही लाड़-प्यार से बनाया हैं | संगीत बड़ी है या भैंस यह इसपर निर्भर करता है कि आपका उद्देश्य क्या है | यदि आप भैंस का दूध चाहते हैं तो अक्ल से बड़ी भैंस होती है | सिग्नल और नॉइज़ का अनुपात (S/N ratio) बेहतर हो सम्प्रेषण (communication) अच्छा होगा, वरना दो प्राणी अथवा दो यान्त्रिक प्रणालियाँ आपस में सूचनाओं का संचार ठीक से नहीं कर पाएंगे | सूचनाओं के संचार में यह S/N अनुपात केवल ध्वनि द्वारा संचार पर ही नहीं, हर प्रकार के डाटा के लेन-देन में कार्य करता है, शरीर के भीतर दो जैविक अवयवों के आपसी सूचना-सम्प्रेषण (संचार) में भी जो वैद्युत नर्वस इम्पल्स तथा विभिन्न रसायनों के संचार द्वारा होता है | आजकल कम्युनिकेशन-थ्योरी में S/N अनुपात का अध्ययन होता है जिसका मुख्य प्रयोग साइबरनेटिक स्वचालित यान्त्रिक नियन्त्रण प्रणालियों में होता है |


कोई जीव, उसका शरीर, शरीर के हर हिस्से और हर कोशिका

विभिन्न साइबरनेटिक प्रणालियाँ ही हैं, जो अपने कार्य को

सुचारू रूप से करने के लिए समस्त सम्बन्धित आन्तरिक तथा बाह्य अवयवों या प्रणालियों को अपने हिसाब से प्रभावित करने के लिए आवश्यक सूचनाएँ भेजती हैं | किन्तु हर जीवित या निर्जीव साइबरनेटिक प्रणाली में एक केन्द्रीय नियन्त्रण प्रणाली भी होती है जो उन सूचनाओं की जाँच द्वारा निर्धारित करती हैं कि कब किस सूचना को सिग्नल माना जाय और कब उसी को नॉइज़ मानकर अनदेखा किया जाय अथवा भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जाय |


जैविक नियन्त्रण प्रणाली का सबसे मुख्य आधार DNA है जो

समस्त शारीरिक और मानसिक प्रक्रियाओं के नियन्त्रण के उन

अंशों का समुच्चय है जिनको प्रकृति किसी जैविक प्रजाति के

लिए सुरक्षित करने योग्य समझती है | कम्प्यूटर की भाषा में

स्थूल रूप से कहें तो मनुष्य के मन में जो "स्मृति" नाम की शक्ति है वह RAM है, तो डीएनए ROM है | प्रजाति की सुरक्षा के लिए प्रकृति ने इस ROM में परिवर्तन को अत्यधिक कठिन बना दिया है | सुरक्षा की इस प्रणाली का सबसे प्रमुख तरीका है डीएनए द्वारा रसायनिक प्रक्रियाओं में सीधे भाग न लेकर सन्देशवाहकों का प्रयोग करना, ताकि बाह्य तत्वों का

डीएनए से सीधा सम्पर्क न्यूनतम हो | ये सन्देशवाहक डीएनए की सुरक्षा कवच बनकर बफर का कार्य करते हैं, जैसे कि मैसेंजर RNA | इस सुरक्षा कवच में कब-कब दरार आती है इसका अध्ययन आनुवांशिक रोगों और प्रजाति के extinction आदि समस्याओं का अध्ययन करते समय किया जाता है |


जैविक नियन्त्रण प्रणाली वास्तव में सही काल और सही

स्थान (देश या दिक्) पर विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं को

स्विच-ऑफ या स्विच-ऑन करने वाली डिजिटल प्रणाली है

जिसका आनुवांशिक भण्डार डीएनए है |

[ डिजिटल प्रणाली का अर्थ है digits अर्थात संख्याओं पर

आधारित "सांख्य प्रणाली" जिसका सरलतम रूप है कम्प्यूटर मेंशून्य ("0") तथा एक ("1") पर आधारित सांख्य प्रणाली, जो

वास्तव में अरबों ट्रांसिस्टरों के bias वोल्टेज को एक ख़ास

सीमा से अधिक घटा-बढ़ाकर स्विचों का ऑफ ("0") या ऑन

("1") होना ही है | डीएनए में भी समस्त प्रक्रियाओं को आरम्भ

तथा समाप्त करने वाले स्विचों का भण्डार होता है जो समय

आने पर ऑफ या ऑन होते हैं, अर्थात उनका वैल्यू "0" या "1"होता है |


अन्य समस्त अंक प्रणालियाँ मूलतः शून्य और एक वाली बाइनरी अंक प्रणाली पर ही आधारित है | शून्य तो सभी में है, "एक" यदि दो बार हो तो उसे "2" कहते हैं, तीन बार हो तो "3", आदि, किन्तु शून्य कितनी बार भी हो तो शून्य ही रहता है | शून्य है प्रकृति (में गति) का अभाव अर्थात शुद्ध निष्क्रिय चैतन्यता, और एक है प्रकृति की सक्रियता या गति (संस्कृत में "एक" का धातु है "इ" जिसका अर्थ है 'गति')| 

डीएनए यह निर्धारित करता है कि शिशु किन-किन ध्वनियों

को किन-किन सीमाओं तक सुन सकेगा | अनुभव और शिक्षा

द्वारा शिशु धीरे-धीरे सीखता है कि कुछ ध्वनियाँ सार्थक हैं

और कुछ निरर्थक | निरर्थक ध्वनियों को सुनने की क्षमता का

घटना अथवा सुनकर अचेतन रूप से अनसुनी करने की क्षमता का बढ़ना धीरे-धीरे सक्रीय होने लगता है |


निरर्थक का यह अर्थ नहीं है कि वे वास्तव में निरर्थक ही हैं |

समाज बच्चों को सिखाता है कि अभिभावकों तथा

शिक्षकों की बातें गलत भी हों तो "सार्थक" हैं क्योंकि उनसे

"लाभ" होता है, और तितलियों की उड़ान, भौंड़े की गुञ्जन,

बिल्ली के बच्चे की मुस्कान, इन्द्रधनुष का सौन्दर्य, प्रकृति

का अन्तहीन श्रृङ्गार तो बकवास है जिनके पीछे बच्चों को

समय नष्ट नहीं करना चाहिए, उनसे केवल तभी "लाभ" होता है जब कवि के कल्पना की उड़ानों पर प्रोफेसरों की बकवास को दुहराने से परीक्षा में सफलता मिले |


कल्पना केवल कविता में ही नहीं होती, समस्त ज्ञान-विज्ञान

कल्पना का ही फल हैं | सौ वर्ष पहले के महानतम गणितज्ञ

डेविड हिल्बर्ट के एक छात्र ने गणित छोड़कर कविता चुन ली

तो हिल्बर्ट ने कहा - "ठीक किया, गणित लायक कल्पना उसमें

नहीं थी !"


दीर्घकाल तक जिन बातों को दबाया जाता है वे धीरे-धीरे

डीएनए द्वारा सुरक्षित कर ली जातीं हैं | इस प्रकार जो

प्रकृति अपने शुद्ध नैसर्गिक पर्यावरण में मनुष्य का निर्माण

करती है उसी के विरुद्ध कृत्रिम औपचारिक वा अनौपचारिक

शिक्षा द्वारा मनुष्य अपनी प्रजाति को कृत्रिम बनाकर

विलुप्ति की ओर पग बढ़ाता है |

अन्य समस्त कल्पनाएँ स्थूल होती हैं, उनमें मात्रा की शुद्धि हो

तो उसे गणित कहा जाता है | गणित जिन "गणों" पर आधारित हैं उसमें 49 मरुद्गण हैं, ग्यारह रूद्र (इन्द्रियाँ) हैं, 53 अक्ष वाली देवभाषा और समस्त भाषाई अवधारणाएं तथा चिन्तन है | ब्रह्माजी की समूची सृष्टि गणित द्वारा रची गयी सुन्दर कविता है |इस कविता में गणित भीतर छुपा रहता है,मनुष्यों को आमतौर पर नहीं दिखता, किन्तु बिना गणित के कुछ नहीं है | मूर्त वस्तुओं के वर्गीकरण द्वारा उनमें अन्तर्निहित

अवधारणाओं को समझने की क्षमता केवल मनुष्य में होती है जो "शब्दों" को उत्पन्न करके भाषा बनाती है | जैसे कि नदी या

तालाब या नलके के विभिन्न मूर्त जलों में "जल" नाम के कॉमन

"शब्द" की अवधारणा केवल मनुष्य ही समझ सकता है | "जल" नाम का यह "शब्द" अभौतिक, अमूर्त और काल्पनिक है किन्तु प्रकृति में पाए जाने वाले समस्त मूर्त जलों के भीतर H2O के होने ही सच्चाई को उद्घाटित करता है | "शब्द" नाम की कल्पना ही"ब्रह्म" नाम का सत्य है | प्रकृति अथवा विचारों के वर्गीकरणद्वारा समस्त प्रक्रियाओं, वस्तुओं तथापरिघटनाओं को वर्गों या "गणों" (classes) के द्वारा समझना ही गणित है | गण से गणित बना है | किसी प्रणाली में ये गण न्यूनतम दो भी हो सकते हैं, जैसे कि शून्य तथा एक वाली बाइनरी डिजिटल में अथवा genes के सक्रीय वा निष्क्रिय होने में, और किसी प्रणाली में आठ (ऑक्टल) या दस (संख्याओं की दशमलव प्रणाली) या बहुत अधिक भी हो सकते हैं | जैसे कि देवभाषा में 16 देवी-स्वरों एवं 33 कोटि देव-व्यञ्जनों के उनचास गणों में क्ष-त्र-ज्ञ मिलाकर 53 अक्षरों का "अक्ष" ऋग्वेद में वर्णित है, जिसमें ॐ मिलाकर 54 होता है जिसकें दक्षिण और वाम पाठभेद से 108 मूलधातु अलिखित ऐन्द्र-व्याकरण में होते हैं जिनसे लौकिक भाषाएँ भी

बनीं और गुप्त प्राकृतिक भाषाएँ भी (जैसे कि डीएनए की गुप्त

भाषा जो असुरों को नहीं बतायी जा सकती)|

आसुरी जीवविज्ञान में केवल स्थूल शरीर के अध्ययन का ही

महत्त्व है जो प्रोटीन से बनता है | अतः जेनेटिक्स का मुख्य

ध्यान केवन प्रोटीन संश्लेषण पर ही रहा है, जिससे मानव

जीनोम का केवल 1.1% ही प्रत्यक्ष तौर पर सम्बन्धित है जिसे

एक्सॉन कहते हैं | इन तथाकथित सार्थक genes के बीच में बहुत से निरर्थक डीएनए भी होते हैं जो जीनोम का 24% हैं, वे Introns कहलाते हैं | उनमें भी कुछ सार्थक भाग पकड़ाए हैं | शेष 75% को Junk कहा जाता है | अब वैज्ञानिकों में Junk शब्द का प्रचलन उठने लगा है और कहा जाता है कि उनका प्रयोजन पता नहीं है, अतः उनको डार्क या अज्ञात डीएनए कहना बेहतर होगा, किन्तु उनका कार्य जबतक पता नहीं चलता तबतक उनमें कहाँ कौन जीन है यह कहना सम्भव नहीं है | प्रोटीन संश्लेषण द्वारा ही जीन को परिभाषित करने की

संकीर्ण विचारधारा के कारण प्रोटीन संश्लेषण से असम्बद्ध

डीएनए की अनदेखी हुई है जो डीएनए के 98% से अधिक है ! यदि डीएनए एक विशाल बोतल है तो उसका मुँह आपने प्रोटीन के बहाने पतला बना दिया है, इस समस्या को अंग्रेजी में bottle-neck कहते हैं | अब वैज्ञानिक मानने लगे हैं कि डीएनए का सम्बन्ध केवल प्रोटीन संश्लेषण से ही नहीं है, बल्कि समस्त जैविक प्रक्रियाओं से है और पर्यावरण के साथ जीव का तादात्म्य बनाने से भी है | किन्तु इस सम्बन्ध में अत्यल्पवास्तविक कार्य हो पाया है | 


आधुनिक आनुवांशिक विज्ञान को सौ वर्ष से अधिक हुए और डीएनए की खीज के भी 65 वर्ष बीत गए, अभीतक केवल 1.1% ही समुचित रूप से उद्घाटित हो पाया है और उसके भी बहुत से कार्य अन्धकार में हैं | इस गति से पूरे डीएनए के उद्घाटन में हज़ारों वर्ष लग जायेंगे !


जिस प्रकार एक मनुष्य दूसरे मनुष्यों से कई तरह के सामाजिक सम्बन्ध बना सकता है उसी तरह एक ही जीन दूसरे genes या जीन-समूहों से अलग-अलग प्रकार्यों (फंक्शन) वाले सम्बन्ध बना सकता है | प्रकार्य से फेनोटाइप की पहचान होती है जो जीनोटाइप को पहचानने में सहायक हैं | किन्तु अपवाद स्वरुप ही कोई जीन अकेला कार्य करता है | प्रायः वे समूहों में कार्य करते हैं, अर्थात कई जीन मिलकर किसी एक लक्षण या फेनोटाइप को अभिव्यक्ति देते हैं | किसी एक फेनोटाइप से सम्बन्धित डीएनए के भाग को जीनोटाइप कहते हैं जो सामान्यतः जीनों का समूह होता है | किन्तु एक समूह का जीन प्रायः दूसरे समूह वाले जीनोटाइप से भी सम्बन्धित होता है | जैसे कि इन्सुलिन का सम्बन्ध केवल ग्लूकोज के मेटाबोलिज्म या डायबिटीज से ही नहीं बल्कि अनेक रोगों और आयु आदि से भी है | जैसे कि इन्सुलिन में असन्तुलन से आँख की रोशनी गड़बड़ा सकती है | इस सभी प्रक्रियाओं से अलग-अलग बहुत सारे जीनोटाइप के सम्बन्ध हैं, और उन सबका सम्बन्ध इन्सुलिन बनाने वाले डीएनए से है !

अतः किसी जीनोटाइप का पृथक रूप से अध्ययन नहीं हो

सकता, सिस्टम एप्रोच आवश्यक है | उसमें भी संरचना-प्रकार्य

ात्मक (structural-functional) खण्डों तथा प्रक्रियाओं को स्थैतिक (static) तौर पर लेने से बात नहीं बनती, समस्त डीएनए खण्डों और समूहों के प्रकार्यों के स्विचों के ऑन तथा ऑफ होने के विभिन्न टाइम-साइकिल वाले जटिल बायो-क्लॉक को बाह्य प्राकृतिक क्लॉक से जोड़कर पर्यावरण और जीव को एक ही प्रणाली का हिस्सा मानकर देखने से ही डीएनए के अज्ञात या डार्क हिस्से प्रकाश में आ सकते हैं | 


वर्तमान भौतिकवादी पद्धति हज़ारों वर्षों में भी इस कार्य को पूर्ण नहीं कर सकती, पद्धति और विचारधारा में मौलिक परिवर्तन आवश्यक है जिसके बिना bottle-neck को चौड़ा करना सम्भवनहीं |

No comments:

Post a Comment