दैवीय प्रेम कोई आकर्षण नहीं होता बल्कि समर्पण की वो अवस्था है जहाँ “पाने” की कोई इच्छा शेष नहीं रहती
जिसे मिलते ही जीवन अपने आप पूर्ण हो जाए जहाँ किसी शर्त, किसी अपेक्षा किसी अधिकार की भाषा ही शेष न बचे -- वही प्रेम दैवीय होता है -- दैवीय प्रेम मे हाथ थामना आवश्यक नही -- निकटता का प्रदर्शन भी आवश्यक नही बल्कि यहाँ तो अनुपस्थिति भी एक पूर्ण उपस्थिति बन जाती है!-
ये वो प्रेम है जहाँ आत्मा आत्मा को पहचान लेती है बिना परिचय, बिना स्पर्श,बिना ये पूछे कि “तुम मेरे क्या हो?”
दैवीय प्रेम आवाज़ नहीं करता शोर नहीं मचाता ये प्रेम तो
चुप्पी की गोद में बैठकर मन के सबसे कोमल हिस्से को सहलाता है-- ये प्रेम दर्द से डरता नही बल्कि दर्द को
प्रसाद की तरह स्वीकार कर लेता है क्योंकि दैवीय प्रेम जानता है -- जो भीतर तक तोड़ दे वही भीतर तक गढ़ने की क्षमता भी रखता है!-
जहाँ सांस रुक-रुक कर चलती हैजहाँ स्मृतियाँ चुभती है
जहाँ कोई नाम लिए बिना आँखें भर आती है वहीं कहीं
दैवीय प्रेम मौन रूप से उपस्थित होता है वो प्रेम जो तुम्हें बेहतर इंसान बना दे जो तुम्हारे भीतर क्षमा, धैर्य और मौन का दीप जला दे जो तुम्हें किसी को पकड़कर रखने के बजाय उसे मुक्त करना सिखा दे -- वही दैवीय प्रेम है!-
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दैवीय प्रेम मे ईर्ष्या नहीं होती अधिकार नहीं होता बस एक गहरी प्रार्थना होती है -- “जहाँ भी रहो जैसे भी रहो,
पूर्ण रहो" ये प्रेम कभी बाँधता नही कभी थकाता नहीं,
कभी कम नहीं पड़ता-- ये प्रेम कभी शिकायत नहीं करता कि “मैंने तुम्हारे लिए क्या-क्या किया” क्योंकि दैवीय प्रेम कर्म करता है हिसाब नही और हाँ, दैवीय प्रेम हर किसी के हिस्से नहीं आता- ये वही लोग समझ पाते हैं
जो टूटकर भी कड़वे नहीं हुए जो छले जाकर भी करुणा बचाए रख पाए जो प्रेम खोकर भी प्रेम को दोषी नहीं ठहराते!-
दैवीय प्रेम उन्हीं हृदयों में उतरता है जो घावों के बावजूद
प्रेम करना नहीं छोड़ते -- अंत में बस इतना ही लिखना है की जिस प्रेम मे अहंकार गल जाए जिस प्रेम में “मैं” विसर्जित हो जाए जिस प्रेम मे तुम किसी को पाकर नहीं
खुद को खोकर पा लो -- समझ लेना,वो प्रेम मनुष्य का नही बल्कि दैवीय प्रेम है!-
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