नारी किसे गुरु बनाये...
हिन्दू धर्म में ऐसी कई महिलाएं भी हुई हैं । जिन्होंने वेद की ऋचाएं लिखी और ऋषियों के साथ शास्त्रार्थ किया है । वैदिक काल में नारियों को धर्म और राजनीति में भी पुरुष के समान ही समानता हासिल थी । मैत्रेयी, गार्गी जैसी नारियां वेद पढ़ती थीं और पढ़ाती भी थीं । ऋग्वेद की ऋचाओं में लगभग चौध सौ चौध ऋषियों के नाम मिलते हैं । जिनमें से तीस नाम महिला ऋषियों के हैं । यही नहीं नारियां युद्ध कला में भी पारंगत होकर राजपाट भी संभालती थी । दूसरी ओर महिलाएं आश्रम में रहकर आश्रम का कामकाज भी संभालती थीं ।
#महाभारत_युद्ध_के_बाद_नारी_का_पतन_होना शुरू हुआ । इस युद्ध के बाद समाज बिखर गया । राष्ट्र राजनीतिक शून्य हो गया और धर्म का पतन भी शूरु हो गया । युद्ध में मारे गए पुरुषों की स्त्रीयां विधवा होकर बुरे दौर में फंस गई थी ।
वैदिक व्यवस्था शून्य हो गई और उसकी जगह राजा एवं पूरोहितों द्वारा निर्मित सामाजिक नियम महत्वपूर्ण हो गए थे । बौद्ध काल के बाद तो मध्यकाल में नारी की स्थिति और भी बुरी हो गयी थी । इसका कारण हर क्षेत्र में पुरुष और पुरुष मानसिकता का हावी होना था । फीर पुराणों और स्मृतियां का दौर प्रारंभ हुआ ।
धर्म और शास्त्रों के ठेकेदारों ने कहने लग गये कि नारी को ना तो गुरु बनना चाहिए और ना ही किसी को उनका गुरु बनाना चाहिए । इसके पीछे कई कारण बताए गए । उनके अनुसार नारी का पति ही उसका गुरु होता है ।
गुरुर्ग्निर्दिजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरु: ।
पतिरेव गुरु: स्त्रीणां सर्वस्याऽभ्यागतो गुरु: ॥
-पद्मपुराण एवं ब्रह्मपुराण-
अर्थात अग्नि द्विजातियों का गुरु है । ब्राह्मण चारों वर्णो का गुरु है । एक मात्र पति ही स्त्री का गुरु है । अतिथि सब का गुरु है ।
स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ।
पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥
-मनुस्मृति-
अर्थात स्त्रियों के लिए वैवाहिक विधि का पालन ही वैदिक संस्कार एवं यज्ञोपवित, पति सेवा ही गुरुकुल वास और गृहकार्य ही अग्निहोत्र कहा गया है । स्त्री को पति के सिवाय किसी भी पुरुष से किसी प्रकार का संबंध नहीं जोड़ना चाहिए ।
कलिकाल में तो माताओं से प्रार्थना कर रहे है कि वह किसी भी साधु, तथाकथित गुरु के भ्रम जाल में ना पड़ें । क्योंकि आजकल तथाकथित गुरु चप्पे चप्पे पर दुकान खोलकर आम लोगों का शोषण कर रहे है । समाज में गुरू के नाम पर अत्यन्त ठगी, दम्भ और पाखण्ड हो रहा है । साधु को कभी भी स्त्रीयों को शिष्या नही बनाना चाहिये । स्त्री ही स्त्री को दीक्षा दे या गुरु बनाएं तो उचित होता है ।
विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णाशनास्तेऽपि स्त्रीमुखपड़्कजं सुललितं दृष्ट्वैव मोहं गताः ।
शाल्यन्नं सघृतं पयोदधियुतं भुञ्जन्ति ये मानवास्तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेद्विन्ध्यस्तरेत्सागरे ॥
-भर्तृहरिशतक-
अर्थात जो वायु-भक्षण करके, जल पीकर और सूखे पत्ते खाकर बन में रहते थे । वह विश्वामित्र, पराशर आदि भी स्त्रियों के सुंदर मुख को देखकर मोह को प्राप्त हो गए । फिर जो लोग शाली धान्य (सांठी चावल) को घी, दूध और दही के साथ खाते हैं । वह यदि अपनी इन्द्रियका निग्रह कर सकें तो मानो विन्ध्याचल पर्वत समुद्रपर तैरने लगा ।
ऐसी स्थिति में जो जवान स्त्रियों को अपनी शिष्या बनाते हैं । उनको अपने आश्रम में रखते हैं । उनका कभी भी कल्याण नही हो सकता । आज नही तो कल यह नारी उनके साधना में सबसे बडी बाधा उत्पन्न कर सकती है । उनका रुप, भावभरिगीनी आदि साधनायों पर भारी पढने लग जाता है । फिर उनके द्वारा आपका भला कैसे हो सकता है ? वह केवल धोखा ही है ।
वर्तमान युग में महिलाएं को किसी भी पुरुष को अपना गुरु नही बनाना चाहिये । उसके लिए उसका गुरु उसका पति ही होता है । फिर भी वह धर्म के मार्ग पर जाना चाहती है तो ऐसे में किसी महिला गुरु को ही अपना गुरु बनाएं । ऐसा शास्त्र वचन है । जो उपरोक्त लिखा गया है । वर्तमान में साधु और असाधु में फर्क करना अति मुश्किल है ।
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