श्रीचक्र में नौ व्यूह होते हैं, इसमें से प्रत्येक व्यूह का आदि-अंत जीव और शिव से होता है। जो मानव शरीर के मूल बंधनों का द्योतक है।
यह सभी 9 व्यूह इस प्रकार के होते हैं-
1 ) काल व्यूह आत्मा का विस्तरण अनंत है जिसका कोई अंत नहीं है जहां समय अमर्यादित है लेकिन माया के पाश में काल व्यूह की रचना जीव को विस्मृत करके बार बार जन्म मरण के चक्र में डाल देता है।
2 ) कुल व्यूह आत्मा की कोई न जाति होती है न कुल। आत्मा को सिद्धो की भाषा में नामकुल कहा जाता है। यहाँ जीव भाव में व्यूह रचना कर अपनी कुल की मर्यादा में बांध दिया जाता है। जैसे हिन्दू मुस्लिम ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र।
3 ) नाम व्यूह नाम का बंधन ....जन्म से पहले न कोई तुम्हारा नाम था नहीं पहचान ....तब तुम कौन थे? क्या नाम था तुम्हारा ....जब पहली बार शरीर धारण किया था ...तुम कौन थे ....यह विस्मृति कराने हेतु बार बार नामकरण करके शक्तियां छिनी जाती है।
4) ज्ञान व्यूह कुछ ज्ञान प्राप्त क्या कर लिया ....कोई पंडित कोई महाराज कोई योगी कोई तपस्वी बन गया ....पर मूल ज्ञान न पा सका... वेद पढ़ा पुराण पढ़े ...विज्ञानं पढ़ा ...कुछ पूर्व जन्म की स्मृति से .....तो कभी देवताओ की कृपा से कुछ ज्ञान मिल गया उसके अहंकार में फस गया।
5 ) चित व्यूह इस व्यूह रचना में ब्रह्मा विष्णु महेश भी फंस चुके है ....चित के व्यूह से ब्रह्म से जड़ माया की उत्पत्ति हुई ..... इस विचार करने वाले प्रोग्राम से ही कल्पना को हकीकत मान कर .....जीव काल सृष्टि में फंस चुका है ...इस व्यूह से ही सूक्ष्म और कारण जगत निर्मित हुआ।
6 ) नाद व्यूह यह व्यूह रचना .....भाषा प्रयोजन का बंधन है और इसी मान्यता से शक्तियों का आविर्भाव होता रहता है जो अलग अलग भाषा के बंधन में फंस जाता है। जिसके कारण मनुष्य को यह लगता है कि मैं अभी जी रहा हूं।
7 ) बिन्दु व्यूह यह रचना समाज से जुडी है जो समाज अस्तित्व रखता है। और तुम उनके अंश हो यह समझ बिन्दु व्यूह में फंसाती है।
8 ) आत्म व्यूह आत्मा का व्यूह ...आत्मसाक्षात्कार नहीं ....किन्तु खुद को आत्मा मान कर चलना साक्षी व्यूह में फसना कहते है जहा जीव.... आत्म कक्षा में जा कर फस जाता है और वो परमात्मा नहीं बन पाता है।
9 ) जीव व्यूह यह अंतिम व्यूह रचना है जब तक चेतना और चैतन्य की जाग्रति सुषुप्ति में होती रहेगी .....तब तक तुम कभी ब्रह्मा से लेके कीट तक की योनि में ....जीव भाव से ही प्रकट होते रहोगे .....इच्छाओ के गुलाम बने रहोगे।
इस 9 व्यूह रचना में से जो बाहर लाती है ....वो श्री चक्र साधना है ...बिना यह चक्रव्यूह को पार करे कोई भी जीव मुक्त नहीं हो पाता।
और नही अपने मूल लक्ष्य .... यानि लक्ष्मी की प्राप्ति कर पायेगा
.. आरम्भ शिव फिर अंत जीव.. आरम्भ जीव है तो अंत शिव.. इस क्रिया को ही श्री विद्या योग कहते है. इसी 9 व्यूह की रचना में से बाहर आ गये तो, हम शिव बन जायेगे
क्यूंकि कुंडलिनी ने खुद का अस्तित्व बचाने के लिए - जीव को माया में कैद करने के लिए - यह 9 आवरण का प्रयोग किया कि - जीव को शिव होने का भाव जाग्रत न हो !
सृष्टि के सुरुचिपूर्ण संचालन के लिए यह माया आवश्यक है. लेकिन करो़ड़ों में एक जीव जो श्रीविद्य़ा का आश्रय लेता है, वह जन्म मृत्यु के इस बंधन को तोड़कर मोक्ष प्राप्त करता है।
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