Sunday, December 28, 2025

जिसके सामने स्त्री झुकती है

क्या हर वह पुरुष, जिसके सामने स्त्री झुकती है, सचमुच झुकने योग्य होता है?


जो पुरुष प्रेम में अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व जानता है…जो वाणी में संयम और आचरण में मर्यादा रखता है…जो अपनी सामर्थ्य का प्रयोग संरक्षण के लिए करता है, शोषण के लिए नहीं…चाहे सूर के श्याम हों या तुलसी के राम…साहित्य में ऐसे पुरुषों को धर्म का धारक कहा गया है…


और यदि पुरुष में करुणा नहीं, सौम्यता नहीं, दया नहीं, भावनाओं की समझ नहीं, स्त्री के स्वाभिमान के लिए स्थान नहीं, जिसके भीतर प्रेम है भी, तो केवल नियंत्रण के रूप में…वह पुरुष सम्मान नहीं चाहता…केवल अपने पुरुषत्व की घोषणा चाहता है…या शायद अपने भीतर की रिक्तता छिपा रहा होता है…वह डर पैदा करता है ताकि नियंत्रण बना रहे…वो ये नहीं जानता कि जहाँ भय है, वहाँ सम्मान नहीं…सिर्फ़ चुप्पी होती है…और वह चुप्पी…धीरे-धीरे सम्बन्ध को खोखला कर देती है…वो अक्सर यह नहीं देख पाता कि उसकी कठोरता से स्त्री उसके सामने छोटी नहीं हो जाती…बस भीतर से मृत सी हो जाती है…वह मुस्कुराती तो है, पर खुलकर नहीं…झुकती तो है, पर समर्पित नहीं होती…


जो पुरुष अपने भीतर की दुर्बलताओं से भागता है, वह अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए बाहरी शक्ति का अभिनय करता है…


समाज ने पुरुषत्व को कठोरता, नियंत्रण और स्वामित्व से जोड़ा है…पर एक आदर्श पुरुष इन परिभाषाओं को शांति और धैर्य के साथ अस्वीकार करता है…वह जानता है कि जिस प्रेम में अपमान प्रवेश कर जाए, वह प्रेम नहीं रह जाता…


चरण छूने योग्य पुरुष वह है…जो स्त्री को “मेरी” कहने से पहले “स्वतंत्र” मानता है….जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शालीन रहता है…जिसकी वाणी में संयम होता है…जो जानता है कि शब्द भी आघात कर सकते हैं…


इसलिए नारी का दर्शन कहता है…

मैं झुकूँगी…पर वहाँ, जहाँ मेरा झुकना मेरे अस्तित्व को छोटा न करे…

मैं चरण भी छुऊँगी…पर उस पुरुष के, जो मेरे माथे पर संवेदनाओं का हाथ रखे, न कि बाध्यताओं का…


मेरा प्रेम समर्पण है…पर समर्पण का अर्थ स्वयं को खो देना नहीं…मैं त्याग कर सकती हूँ…पर अपने स्वत्व की कीमत पर नहीं…मैं सहन करूँगी, पर उस पीड़ा को नहीं जो मुझे धीरे-धीरे अपने ही भीतर से मिटा दे…मैं प्रेम में पिघलूँगी, पर पिघलकर अपना आकार नहीं खोऊँगी…


और मेरी महानता इसमें नहीं, कि मैं जिसे बस एक सामाजिक क्रिया के अधीन होकर मुझसे बाँध दिया गया है…उस पशु को आँखों पर पट्टी बाँधकर पूजती रहूँ…मेरे आदर्श कहते हैं…कि जो पुरुष मुझे “संभालने” के नाम पर नियंत्रित करे…वह रक्षक नहीं, डरा हुआ शासक है…जो मुझे डराकर “सीधा” करे…वह पथप्रदर्शक नहीं, शोषक है…मेरी मति इतनी स्वस्थ हो…कि मैं चरण वहाँ छुऊँ जहाँ चरण चलने का अर्थ जानते हों…साथ चलने का….रौंदने का नहीं….


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