Saturday, January 31, 2026

सम्भोग: दमन, ऊर्जा और मनुष्य होने का सत्य

 सम्भोग: दमन, ऊर्जा और मनुष्य होने का सत्य


मनुष्य का इतिहास अजीब है।

वह जिस प्रक्रिया से जन्म लेता है,

उसी प्रक्रिया पर बोलते हुए संकोच करता है।

जिस ऊर्जा से जीवन बहता है,

उसी ऊर्जा से वह डरता है।


सम्भोग....

जिसे हमने वर्जना बना दिया,

असल में जीवन की मूल धड़कन है।


1. परम्परा के पीछे छिपा भय


अक्सर कहा जाता है...

“हमारी संस्कृति में यह सब नहीं बोला जाता।”


पर यह संस्कृति नहीं,

डर की परम्परा है।


डर इस बात का कि


कहीं नियंत्रण न टूट जाए


कहीं इच्छाएँ सवाल न पूछने लगें


कहीं मनुष्य अपने भीतर झाँक न ले


सम्भोग पर चुप्पी इसलिए नहीं थोपी गई

कि वह अशुद्ध है,

बल्कि इसलिए कि वह अत्यधिक जीवंत है।


और जो अत्यधिक जीवंत होता है,

वह सत्ता, समाज और ढाँचे को असहज करता है।


2. दमन: ऊर्जा का सबसे खतरनाक रूप


ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती

वह केवल रूप बदलती है।


जब सम्भोग की ऊर्जा को


समझ नहीं मिलती


संवाद नहीं मिलता


स्वीकृति नहीं मिलती


तो वह....


कुंठा बनती है


अपराधबोध बनती है


और अंततः विस्फोट बन जाती है।


यह कोई नैतिक सिद्धांत नहीं,

यह प्रकृति का नियम है।


जैसे....

नदी को बहने दो, तो वह जीवन देती है।

उसे बाँध दो, तो वह बाढ़ बन जाती है।


हमारे समाज ने

नदी नहीं बहने दी,

फिर बाढ़ से डरने लगे।


3. सम्भोग: केवल शरीर नहीं, चेतना की घटना


सम्भोग को केवल शारीरिक क्रिया मानना

उसके साथ सबसे बड़ा अन्याय है।


सम्भोग वह क्षण है

जहाँ मनुष्य


अपने “मैं” को ढीला करता है


नियंत्रण छोड़ता है


और क्षणभर को ही सही,

स्वयं से बाहर निकलता है


दार्शनिक इसे

लघु-मृत्यु कहते हैं....

जहाँ अहंकार टूटता है

और शून्य झलकता है।


इसीलिए सम्भोग

डर पैदा करता है।

क्योंकि जो व्यक्ति

अपने अहं से मुक्त होना सीख ले,

उसे बाँधना कठिन हो जाता है।


4. चरित्र का भ्रम और मौन की हिंसा


हमने चरित्र को

दमन से जोड़ दिया है।


जो जितना चुप,

उतना “अच्छा”।


पर सच्चा चरित्र

चुप्पी से नहीं,

जागरूकता से बनता है।


जो अपनी इच्छा को


देख सकता है


समझ सकता है


और दिशा दे सकता है


वही चरित्रवान है।


पर जो इच्छा से भागता है,

वही अंततः

उसका शिकार बनता है।


सम्भोग पर मौन

सबसे हिंसक शिक्षा है

क्योंकि जो समझाया नहीं जाता,

वह अंधेरे में सीख लिया जाता है।


5. आंतरिक ब्रह्माण्ड और सृजन


हर मनुष्य के भीतर

एक ब्रह्माण्ड है

इच्छाओं का, कल्पनाओं का, ऊर्जा का।


वही ऊर्जा

जीवन को जन्म देती है

और वही ऊर्जा

जीवन को अर्थ देती है


जब इस ऊर्जा को


प्रेम


संवेदनशीलता


और समझ मिलती है


तो वही

कला बनती है,

करुणा बनती है,

सृजन बनती है।


और जब वही ऊर्जा

डर और अपराधबोध में पलती है,

तो वह

हिंसा और विनाश बन जाती है।


6. स्वीकृति


सम्भोग को

न देवता बनाना है,

न दानव।


उसे बस

मानव अनुभव की तरह स्वीकारना है।


संवाद से,

शिक्षा से,

और चेतना से।


क्योंकि

सम्भोग समस्या नहीं,

समस्या है उसका इनकार।


सम्भोग जीवन के विरुद्ध नहीं,

जीवन का प्रमाण है।


उसे दबाने से

पवित्रता नहीं आती,

केवल विस्फोट टलता है।


और जो विस्फोट

समय पर नहीं होता,

वह अधिक तबाही लाता है।


जो ऊर्जा समझ के साथ बहती है

वह संसार रचती है

और जो ऊर्जा डर में दबती है

वह संसार जला देती है।


यह लेख सम्भोग का पक्ष नहीं लेता

यह मनुष्य के पक्ष में खड़ा होता है।


हमारे जीवन में संबंध महत्वपूर्ण हैं

 जब संबंध थकान और दर्द लाए खुद को बचाने का मार्ग


हमारे जीवन में संबंध महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे केवल साथ रहने तक सीमित नहीं होते वे हमारी भावनाओं, समझ और सम्मान की गहराई से जुड़े होते हैं। लेकिन कभी-कभी हम अपने प्रयासों और प्रेम के बावजूद दूसरों से वही समझ और समर्थन नहीं पाते जिसकी हमें आवश्यकता है। ऐसे समय में यह केवल संबंध की समस्या नहीं होती, बल्कि हमारी मानसिक और भावनात्मक ऊर्जा पर भारी बोझ बन जाती है।


1. शब्दों का खेल और भीतर की चुप्पी


कई बार हम बातें करते हैं, लेकिन लगता है कि सामने वाला केवल अपनी ही बात पर अड़ा है। इस स्थिति में संवाद होने का भ्रम उत्पन्न होता है बाहर से सब ठीक लगता है, पर भीतर मन खाली और थका हुआ महसूस करता है।


उदाहरण:

सोचिए आप अपने मित्र को अपने मन की बात समझाने की कोशिश कर रहे हैं। आप धीरे-धीरे अपनी भावनाओं को साझा करते हैं, पर वह बार-बार अपनी ही राय कहता है और आपकी बात पर ध्यान नहीं देता। बाहर से बातचीत चल रही है, लेकिन आप भीतर खाली और असहाय महसूस करते हैं।


उपचारात्मक कदम:

अपने अनुभवों को लिखें, अपनी भावनाओं को किसी भरोसेमंद व्यक्ति से साझा करें, या ध्यान की साधना करें। यह आपको भीतर से सुनने और समझने में मदद करेगा।


2. जब प्रयासों का महत्व न माने जाए


“ये तो कुछ भी नहीं” जैसे शब्द हमें चोट पहुंचाते हैं और हमारी भावनाओं को नकारते हैं। बार-बार ऐसा अनुभव होने पर आत्म-संदेह और कमज़ोरी का भाव जन्म ले सकता है।


उदाहरण:

आपने अपनी माँ के लिए उनके पसंद का उपहार चुना और उन्हें खुश करने के लिए समय निकाला, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया होती है: “ये तो कुछ भी नहीं।” बार-बार ऐसा होने पर आप सोचने लगते हैं: “शायद मैं ही पर्याप्त नहीं हूँ।”


उपचारात्मक कदम:

याद रखें कि आपके प्रयासों की मूल्यवानता आपके भीतर है, न कि दूसरों की स्वीकृति में। खुद को सहानुभूति देना और अपनी उपलब्धियों को स्वीकार करना मानसिक स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी है।


3. सम्मान और सीमाओं की रक्षा


अगर कोई व्यक्ति आपकी सीमाओं, भावनाओं और जिम्मेदारियों का सम्मान नहीं करता, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं यह आपको अस्थिर महसूस करवा सकती है।


उदाहरण:

आपने अपने साथी से अनुरोध किया कि वह समय पर घर लौटें ताकि परिवार के साथ समय बिताया जा सके, लेकिन वह बार-बार अनदेखा करता है और अपनी मर्जी चलता है। इससे आप लगातार थकान और असहाय महसूस करते हैं।


उपचारात्मक कदम:

स्पष्ट सीमाएँ तय करें। यह “स्वार्थ” नहीं, बल्कि खुद की सुरक्षा है। सीमाओं को सुरक्षित रखने से आप मानसिक रूप से मजबूत बनते हैं।


4. शक्ति के खेल से बचाव


कुछ लोग अपने अहंकार के कारण धमकी, ब्लैकमेल या दोषारोपण का सहारा लेते हैं। यह शक्ति के खेल हमारे आत्मसम्मान को चुनौती दे सकते हैं।


उदाहरण:

आपने अपने वरिष्ठ या शिक्षक से मदद मांगी, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया होती है कि “तुम ही गलती कर रहे हो, तुम्हें सीखना चाहिए।” इसके बाद वह आपको दोषी ठहराते हुए दूसरों के सामने नीचा दिखाते हैं।


उपचारात्मक कदम:

अपनी मानसिक शक्ति बढ़ाएँ। खुद से कहें कि आप किसी की भावना या नियंत्रण के अधीन नहीं हैं। कभी-कभी दूरी बनाना ही सबसे बड़ी सुरक्षा और उपचार है।


5. भीतर का स्वास्थ्य, बाहर के नकली चेहरे से अधिक महत्वपूर्ण


आपके शरीर का स्वास्थ्य बाहरी रूप से सामान्य लग सकता है, लेकिन लगातार तनाव और अस्वीकार के कारण मन धीरे-धीरे थक जाता है। यह नींद, ध्यान और निर्णय क्षमता को प्रभावित कर सकता है।


उदाहरण:

एक कर्मचारी लगातार आलोचना और अवहेलना झेलता है। बाहर से वह सामान्य दिखता है, लेकिन रात को नींद नहीं आती, निर्णय लेने में कठिनाई होती है, और आत्मविश्वास कम होता है।


उपचारात्मक कदम:

ध्यान, योग, गहरी साँस की तकनीक, रचनात्मक गतिविधियाँ और आत्म-सहानुभूति को नियमित जीवन में शामिल करें। यह मानसिक थकान को कम करने में मदद करता है।


6. संबंध नहीं, आपकी चेतना की सुरक्षा


जब कोई लगातार समझने से इंकार करता है, तो यह केवल रिश्ता नहीं, बल्कि आपकी आंतरिक शांति पर भी हमला है। ऐसे समय में अपने भीतर दो हिस्से हो सकते हैं—एक जो संबंध बचाने की कोशिश करता है, और एक जो खुद को बचाने की चाह रखता है।


उदाहरण:

आपके जीवनसाथी लगातार आपकी भावनाओं को अनदेखा करते हैं और केवल अपनी जरूरतें देखते हैं। आप भीतर से टूटते जा रहे हैं, पर बाहर से घर सामान्य चलता दिखता है। इस समय खुद को बचाने के लिए दूरी बनाना या संबंध के पैटर्न बदलना ही मानसिक सुरक्षा है।


उपचारात्मक कदम:

खुद को बचाने की दिशा में कदम उठाना स्वार्थ नहीं है। अपने स्वास्थ्य और आत्म-सम्मान की रक्षा करना प्राथमिकता है।


"खुद को चुनना उपचार है"


हर संबंध में समझौता होता है, लेकिन जब संवाद, सम्मान और मानसिक सुरक्षा खतरे में हो, तो खुद को चुनना ही सबसे बड़ा कदम है। यह केवल दूरी बनाने का सवाल नहीं यह अपने अस्तित्व और मानसिक शांति को सुरक्षित रखने का मार्ग है।


जो लगातार आपकी समझ और भावनाओं को नकारता है, वह आपका परिवर्तन नहीं चाहता, बल्कि आपके अस्तित्व को कमतर दिखाना चाहता है। ऐसे में खुद को बचाना सच्ची शक्ति है।


फलों के छिलकों में भी होते हैं औषधीय गुण

 फलों के छिलकों में भी होते हैं औषधीय गुण,बस बीमारी अनुसार सेवन का तरीका आना चाहिए,कैसे करें छिलकों का सेवन देखें विवरण...


🍎 फलों के छिलकों के औषधीय लाभ

1. सेब का छिलका/कोलेस्ट्रॉल कम करता है

हृदय को मजबूत बनाता है/वजन घटाने में सहायक

कब्ज दूर करता है

2. केले का छिलका/दाँत चमकाने में उपयोगी

त्वचा की खुजली व दाग में लाभ/मस्सों में राहत

पौधों के लिए उत्तम खाद

3. संतरे का छिलका/चेहरे की चमक बढ़ाता है

पाचन सुधारता है/खाँसी-जुकाम में लाभ

त्वचा के दाग कम करता है

4. नींबू का छिलका/लीवर साफ करता है

रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाता है/मुँह की दुर्गंध दूर करता है

चर्बी कम करने में सहायक

5. अनार का छिलका/दस्त व पेचिश में लाभ

मसूड़ों की मजबूती/पेट के कीड़े नष्ट करता है

गले के संक्रमण में उपयोगी

6. आम का छिलका/पाचन तंत्र मजबूत करता है

त्वचा के लिए लाभकारी/कमजोरी दूर करता है

7. पपीते का छिलका/त्वचा को निखारता है

मुहाँसे कम करता है/मृत त्वचा हटाता है

8. अमरूद का छिलका/मधुमेह में लाभ

कब्ज व गैस में उपयोगी/इम्युनिटी बढ़ाता है

9. तरबूज का छिलका/किडनी साफ करता है

सूजन कम करता है/मूत्र संबंधी रोगों में लाभ

10. अनानास का छिलका/पाचन एंजाइम बढ़ाता है

जोड़ों के दर्द में सहायक/सूजन कम करता है

11. नाशपाती का छिलका/रक्त शुद्ध करता है

हृदय रोग में लाभ/पाचन सुधारता है

12. चीकू का छिलका/दस्त रोकने में सहायक

पेट को ठंडक देता है

🍊🍎 फलों के छिलकों का सेवन विधि

1. छिलका पाउडर बनाकर

सबसे सुरक्षित तरीका

छिलके धोकर छाया में सुखाएँ

मिक्सी में पीसकर पाउडर बना लें

मात्रा: ½ चम्मच

सेवन: गुनगुने पानी / शहद के साथ

समय: सुबह खाली पेट


2. काढ़ा बनाकर

खाँसी, पाचन, इम्युनिटी के लिए

सूखे छिलके 1 चम्मच

पानी 1 कप

उबालें जब ½ रह जाए

छानकर पिएँ

दिन में 1 बार


3. चाय के रूप में

थकान, मोटापा, पाचन में लाभ

संतरा / नींबू / सेब के छिलके

5 मिनट उबालें

शहद मिलाकर पिएँ


4. चूर्ण + दही

कब्ज व पेट की समस्या में

½ चम्मच छिलका चूर्ण

1 कटोरी दही

रात में सेवन करें


5. पेस्ट बनाकर (बाहरी उपयोग)

त्वचा के लिए

छिलका पीसकर पेस्ट बनाएँ

चेहरे पर 10–15 मिनट

फिर धो लें


6. सब्जी या चटनी में

(तरबूज, कद्दू, नींबू छिलका)

बारीक काटकर सब्जी/चटनी में मिलाएँ

स्वाद व पोषण दोनों बढ़ते हैं


⚠️ सावधानी

केमिकल लगे फलों के छिलके न लें

हमेशा अच्छी तरह धोएँ

अधिक मात्रा में न लें

गर्भवती महिला व गंभीर रोगी पहले पूछें

मेरी आत्मकथा

 सच कहूँ तो बहुत पहले ही ये एहसास हो गया था कि जिन चीज़ों को हम अपनी पसंद, अपनी सोच, अपना निर्णय मानते रहे, उनमें से ज़्यादातर हमारे ऊपर धीरे-धीरे, चुपचाप और योजनाबद्ध तरीक़े से लाद दी गई थीं। फर्क़ बस इतना था कि हर बोझ का नाम अलग था, पैकिंग अलग थी और उसे स्वीकार करने की भाषा इतनी मुलायम थी कि प्रतिरोध की गुंजाइश ही नहीं बची।


बचपन से ही हमें बताया गया कि ये करना ज़रूरी है, वो करना सही है, और इससे अलग सोचना जोखिम भरा है। किसी ने ये नहीं पूछा कि हम क्या चाहते हैं, क्या समझते हैं, या क्या महसूस करते हैं। हमारे कंधों पर अपेक्षाएँ रख दी गईं परिवार की, समाज की, व्यवस्था की और हमें सिखाया गया कि इन अपेक्षाओं को ढोना ही जिम्मेदारी कहलाता है। धीरे-धीरे जिम्मेदारी और मजबूरी के बीच का फर्क मिटा दिया गया।


शिक्षा को आज़ादी का रास्ता कहा गया, लेकिन वह भी एक तय ढाँचे में ढाल दी गई। क्या पढ़ना है, कैसे पढ़ना है, और कब सफल कहलाना है, सब पहले से तय था। सवाल पूछना अव्यवहारिक माना गया और सहमति जताना समझदारी। हममें से ज़्यादातर ने वही सीखा जो बताया गया, वही माना जो दिखाया गया और वही सपना देखा जो सुरक्षित कहा गया।


काम, रोज़गार, करियर इन सबको सम्मान और पहचान से जोड़ दिया गया। ऐसा नहीं कि मेहनत गलत है, लेकिन मेहनत के नाम पर जो चुप्पी हमसे माँगी गई, जो समझौते हमसे कराए गए, वे कभी हमारे हिस्से की बातचीत का विषय नहीं बने। धीरे-धीरे हमने ये मान लिया कि थकान स्वाभाविक है, असंतोष निजी कमजोरी है और सवाल उठाना कृतघ्नता।


रिश्तों में भी यही हुआ। प्रेम, त्याग, समर्पण इन सब शब्दों को इतना पवित्र बना दिया गया कि उनके भीतर छुपे दबाव दिखाई ही न दें। कई बार निभाना मजबूरी होता है, लेकिन उसे ‘फ़र्ज़’ कहकर सम्मानित कर दिया जाता है। भावनाओं को नियंत्रित करने की सीख दी गई, लेकिन भावनात्मक शोषण पर चुप्पी साधी गई।


धर्म, संस्कृति, नैतिकता इनके नाम पर भी बहुत कुछ थोप दिया गया। क्या सही है, क्या गलत है, इसका निर्णय हमारे विवेक से पहले किसी और ने कर लिया। हमें बताया गया कि मान लेना ही श्रद्धा है और न मानना अपराध। धीरे-धीरे आस्था और डर का फर्क धुंधला कर दिया गया।


राजनीति और व्यवस्था ने तो इस कला को और निखारा। फैसले हमारे नाम पर लिए गए, लेकिन हमारी सहमति सिर्फ औपचारिक रही। नियम, कानून, नीतियाँ सब ‘भलाई’ के नाम पर लागू होती रहीं और अगर कहीं चोट लगी तो कहा गया कि यह आवश्यक बलिदान है। किसके लिए आवश्यक ये सवाल हमेशा अधूरा रहा।


विडंबना देखिए कि इन सब बोझों को इस तरह बाँधा गया कि हमें ही लगे अगर हम गिर रहे हैं, तो गलती हमारी है। अगर हम थक गए हैं, तो हम कमजोर हैं। व्यवस्था कभी कटघरे में खड़ी नहीं हुई, इंसान हमेशा खड़ा रहा।


समय के साथ ये समझ भी आई कि सबसे भारी बोझ चुप्पी का है। बोलना जोखिम बन गया, और सहना आदत। हमने खुद को समझाया कि सबके साथ ऐसा ही होता है, इसलिए ये सामान्य है। इसी सामान्य ने असामान्य अन्याय को रोज़मर्रा का हिस्सा बना दिया।


कहीं न कहीं हममें से बहुतों ने बहुत पहले समझ लिया था कि चीज़ें वैसी नहीं हैं जैसी दिखाई जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग इस सच के साथ जीते हैं, और कुछ लोग उसे नज़रअंदाज़ करके खुद को सुरक्षित समझते हैं।


शायद सबसे ईमानदार उम्मीद यही है कि कभी न कभी हम इतना साहस जुटा पाएँ कि लादे गए बोझों और चुनी गई जिम्मेदारियों के बीच फर्क करना सीख सकें। कम से कम अपने भीतर तो सच को नाम दे सकें। क्योंकि यथार्थ में नाम बदल देने से बोझ हल्का तो नहीं होता, बस उसे उठाने वाला इंसान अकेला पड़ जाता है। 


जीवन को यदि केवल प्रकाश की आकांक्षा में जिया जाए, तो वह एक भ्रम बनकर रह जाता है। प्रकाश प्रतीक है ज्ञान, सफलता और सुख का, किंतु यह ज्ञान भी तभी अर्थवान होता है जब उसके समानांतर अज्ञान का बोध मौजूद हो। अंधकार के बिना प्रकाश की अनुभूति संभव नहीं, क्योंकि विरोध ही चेतना को जन्म देता है।


जब जीवन में निरंतर प्रकाश रहता है सफलता, प्रशंसा और सुविधा का एकछत्र राज्य तो मनुष्य का विवेक शिथिल पड़ने लगता है। वह स्वयं को सत्य का अंतिम केंद्र मान बैठता है। यही वह अवस्था है जहाँ बुद्धि फिसलती है; निर्णय तर्क से नहीं, अहंकार से जन्म लेने लगते हैं। ऐसे निर्णय व्यक्ति को उन्नति की जगह पतन की ओर ले जाते हैं, यद्यपि वह स्वयं इस पतन से अनभिज्ञ रहता है।


अंधकार इस भ्रम को तोड़ता है। दुःख, असफलता और संकट मनुष्य को उसकी सीमाओं से परिचित कराते हैं। अंधकार कोई शत्रु नहीं, बल्कि चेतना का शिक्षक है। यह हमें मौन सिखाता है, प्रतीक्षा सिखाता है और यह बोध कराता है कि सत्य सरल नहीं होता। इसी अंधकार में प्रश्न जन्म लेते हैं, और प्रश्न ही दर्शन की पहली सीढ़ी हैं।


जहाँ प्रकाश उत्तर देता है, वहीं अंधकार खोज की शुरुआत करता है। जीवन की गहराई, करुणा और विनम्रता अंधकार की ही देन हैं। यदि जीवन केवल उजाले में बीते, तो मनुष्य यांत्रिक सुख का उपभोक्ता बनकर रह जाएगा न संवेदनशील, न जागरूक।


अतः जीवन का सौंदर्य प्रकाश में नहीं, बल्कि प्रकाश और अंधकार के संतुलित सह-अस्तित्व में है। अंधकार हमें जड़ से जोड़ता है और प्रकाश लक्ष्य की ओर ले जाता है। दोनों मिलकर ही मनुष्य को केवल जीवित नहीं, बल्कि जाग्रत बनाते हैं।



एलोवेरा किस किस बीमारी में लाभकारी,कैसे

 एलोवेरा किस किस बीमारी में लाभकारी,कैसे...


🩺 एलोवेरा किन बीमारियों में लाभकारी है

1️⃣ पेट की बीमारियाँ

कब्ज

गैस, एसिडिटी

अल्सर

अपच

लाभ: पाचन सुधारे, आँतों की सफाई करे


2️⃣ मधुमेह (शुगर)

ब्लड शुगर नियंत्रित करता है

इंसुलिन की क्रिया बेहतर करता है


3️⃣ त्वचा रोग

मुंहासे, फोड़े-फुंसी

दाग-धब्बे

जलन, खुजली, एलर्जी

लाभ: त्वचा को ठंडक और नमी देता है


4️⃣ बालों की समस्याएँ

बाल झड़ना

रूसी (डैंड्रफ)

बालों का कमजोर होना


5️⃣ जोड़ों का दर्द व सूजन

गठिया

घुटनों का दर्द

सूजन


6️⃣ इम्युनिटी कमजोर होना

बार-बार बीमार पड़ना

थकान, कमजोरी


7️⃣ हृदय रोग

कोलेस्ट्रॉल कम करता है

रक्त संचार सुधारता है


8️⃣ मूत्र रोग

जलन

संक्रमण

पेशाब में रुकावट


9️⃣ महिला रोग

अनियमित मासिक धर्म

कमजोरी

श्वेत प्रदर


🔟 वजन बढ़ना

मेटाबॉलिज्म तेज करता है

चर्बी घटाने में सहायक


🍃 एलोवेरा का सेवन कैसे करें

✅ 1. एलोवेरा जूस

मात्रा: 20–30 ml

तरीका: सुबह खाली पेट गुनगुने पानी के साथ

लाभ: शरीर डिटॉक्स, पाचन ठीक


✅ 2. ताजा एलोवेरा जेल

पत्ती काटकर अंदर का पारदर्शी जेल निकालें

मात्रा: 1 चम्मच

शहद या पानी के साथ लें

लाभ: पेट, त्वचा, इम्युनिटी के लिए


✅ 3. त्वचा पर लगाने का तरीका

ताजा जेल सीधे चेहरे या प्रभावित स्थान पर लगाएं

20 मिनट बाद धो लें

लाभ: चमकदार त्वचा, दाग कम


✅ 4. बालों में लगाने का तरीका

एलोवेरा जेल + नारियल तेल

सप्ताह में 2 बार

लाभ: बाल मजबूत, रूसी खत्म

Friday, January 30, 2026

बुजुर्गों में टांगों की कमजोरी क़े कारण

 Leg Cramps - बुजुर्गों में टांगों की कमजोरी: कारण, कमी और समाधान - अगर आपकी टांगें मजबूत हों, तो ज़िंदगी अपने आप आसान हो जाती है - ज़रा एक पल के लिए कल्पना कीजिए।


सुबह उठते ही आपकी टांगें भारी नहीं, बल्कि मजबूत और स्टेबल महसूस हो रही हैं।

अब मसल वीकनेस नहीं है।

चलते वक्त क्रैंप्स नहीं पड़ते।

बैलेंस बनाने में डर नहीं लगता।

और सबसे बड़ी बात — गिरने का डर खत्म हो चुका है।


अगर आप एक्टिव रहना चाहते हैं, आत्मनिर्भर रहना चाहते हैं और हर उम्र में कॉन्फिडेंट महसूस करना चाहते हैं, तो इसका राज एक्सरसाइज़ से भी पहले सही न्यूट्रिशन में छुपा है।


इस Post में हम बात करेंगे 7 ऐसे बेहद ज़रूरी विटामिन्स और मिनरल्स की, जो आपकी टांगों को सिर्फ मजबूत नहीं बल्कि unstoppable बना सकते हैं।


ये न्यूट्रिएंट्स मसल फंक्शन सुधारते हैं, हड्डियों की मजबूती बनाए रखते हैं और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करते हैं।


इनका असर सिर्फ चलने पर नहीं, बल्कि इस बात पर पड़ता है कि आप रोज़ खुद को कैसा महसूस करते हैं।


अगर आपको पार्क में टहलना पसंद है, डांस करना अच्छा लगता है या आप दूसरों पर निर्भर हुए बिना अपनी ज़िंदगी जीना चाहते हैं, तो यह post आपके लिए है।


1. विटामिन D – टांगों की ताकत की नींव

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर में कुछ नेचुरल बदलाव आते हैं।

मसल मास धीरे-धीरे कम होने लगता है।

हड्डियों की घनता घटने लगती है।

और जो काम पहले आसान लगते थे, वो धीरे-धीरे मुश्किल हो जाते हैं।


इन सबका एक बहुत बड़ा कारण है — विटामिन D की कमी।


अक्सर लोग सोचते हैं कि विटामिन D सिर्फ हड्डियों के लिए जरूरी है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह टांगों को मजबूत, संतुलित और फंक्शनल बनाए रखने में सीधा रोल निभाता है।


उम्र बढ़ने के साथ हमारी त्वचा धूप से विटामिन D बनाना कम कर देती है।

ऊपर से सीनियर सिटिज़न्स धूप में कम निकलते हैं — कभी मोबिलिटी की वजह से, कभी स्किन डैमेज के डर से।

नतीजा? शरीर में विटामिन D का लेवल चुपचाप गिरता चला जाता है।


इस कमी का सीधा असर मसल स्ट्रेंथ पर पड़ता है।

टांगें कमजोर होने लगती हैं, बैलेंस बिगड़ता है और गिरने का खतरा बढ़ जाता है।


रिसर्च साफ बताती है कि जिन बुजुर्गों में विटामिन D का लेवल सही होता है:


उनके मसल फाइबर्स ज्यादा मजबूत होते हैं

कोऑर्डिनेशन बेहतर रहता है

और गिरने व फ्रैक्चर का रिस्क कम होता है


इसके उलट, जिनमें कमी होती है, उनके लिए सीढ़ियाँ चढ़ना या कुर्सी से उठना भी चुनौती बन जाता है।


विटामिन D मसल्स में प्रोटीन सिंथेसिस को सपोर्ट करता है और नर्व-मसल कम्युनिकेशन को बेहतर बनाता है।

इसे आप अपने लेग मसल्स का फ्यूल समझ सकते हैं।


खासतौर पर यह फास्ट-ट्विच मसल फाइबर्स को सुरक्षित रखता है, जो अचानक संतुलन बिगड़ने पर आपको संभाल लेते हैं।

इनके कमजोर होने पर रिएक्शन स्लो हो जाता है और चोट का खतरा बढ़ जाता है।


अच्छी बात यह है कि विटामिन D को मेंटेन करना मुश्किल नहीं है।

रोज़ 15–30 मिनट की सुबह या शाम की धूप काफी मदद कर सकती है।

धूप लेते समय सनस्क्रीन न लगाएं।


खाने में फैटी फिश, अंडे का पीला हिस्सा और धूप में उगे मशरूम शामिल करें।

अगर जरूरत पड़े तो 800–1000 IU का सप्लीमेंट लिया जा सकता है।

ज्यादा कमी होने पर डॉक्टर की निगरानी में हाई डोज़ दी जाती है।


2. कैल्शियम – सिर्फ हड्डियों के लिए नहीं, मूवमेंट के लिए भी

उम्र के साथ हड्डियों का कमजोर होना आम बात है।

लेकिन जब कैल्शियम कम होता है, तब एक छोटा सा गिरना भी बड़े फ्रैक्चर में बदल सकता है।


कैल्शियम सिर्फ हड्डियों को मजबूत नहीं करता, बल्कि हर मसल मूवमेंट के लिए जरूरी होता है।

चलना, खड़े होना, कदम बढ़ाना — सब कुछ कैल्शियम और मसल फाइबर्स के तालमेल पर निर्भर करता है।


कैल्शियम की कमी से:


मसल क्रैंप्स पड़ते हैं

टांगों में कमजोरी महसूस होती है

मूवमेंट स्लो और अस्थिर हो जाती है


दूध, दही और पनीर अच्छे सोर्स हैं, लेकिन हरी पत्तेदार सब्जियां, बादाम और मछली भी उतने ही जरूरी हैं।


अगर डाइट से पर्याप्त कैल्शियम न मिले, तो सप्लीमेंट मदद कर सकता है — लेकिन विटामिन D के साथ।


बुजुर्गों के लिए रोज़ाना 1000–1200 mg कैल्शियम की जरूरत होती है।


ध्यान रखें, सिर्फ कैल्शियम लेना काफी नहीं है।

वॉकिंग और हल्की वेट-बेयरिंग एक्सरसाइज़ इसे सही जगह तक पहुंचाने में मदद करती है।


3. विटामिन B12 – नर्व्स का पावर सपोर्ट

जब बात टांगों की ताकत की होती है, तो अक्सर लोग नर्व हेल्थ को भूल जाते हैं।

यहीं पर विटामिन B12 बेहद अहम बन जाता है।


यह नर्व्स को मजबूत रखता है और ब्रेन से टांगों तक जाने वाले सिग्नल्स को साफ और तेज बनाता है।


B12 की कमी से:


टांगों में भारीपन

सुन्नपन या झनझनाहट

बैलेंस की समस्या

बार-बार गिरना


यह कमी बुजुर्गों में बहुत आम है, क्योंकि उम्र के साथ पेट का एसिड कम हो जाता है और B12 का अब्सॉर्प्शन घट जाता है।


अच्छी बात यह है कि समय पर टेस्ट और सही सप्लीमेंट से इसे पूरी तरह रोका जा सकता है।


4. मैग्नीशियम – क्रैंप्स का सबसे बड़ा दुश्मन

अगर आपको रात में टांगों में दर्दनाक क्रैंप्स पड़ते हैं, तो मैग्नीशियम की कमी इसका बड़ा कारण हो सकती है।


मैग्नीशियम:


मसल रिलैक्सेशन को कंट्रोल करता है

स्पैज़्म और थकान कम करता है

बैलेंस और फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ाता है

यह कैल्शियम को सही जगह तक पहुंचाने में भी मदद करता है।


हरी सब्जियां, नट्स, बीज और साबुत अनाज इसके बेहतरीन सोर्स हैं।


5. पोटेशियम – स्मूद मूवमेंट का राज़

सुबह उठते ही पिंडली में क्रैंप पड़ना या चलते वक्त टांगों का कांपना — ये सब पोटेशियम की कमी के संकेत हो सकते हैं।


पोटेशियम मसल सेल्स के अंदर फ्लूइड बैलेंस बनाए रखता है और नर्व सिग्नल्स को सही रखता है।


केला, आलू, पालक, बीन्स और संतरा इसे नेचुरली पूरा करते हैं।


6. विटामिन K – कैल्शियम को सही रास्ता दिखाने वाला

विटामिन K वह न्यूट्रिएंट है जो कैल्शियम को हड्डियों तक पहुंचाता है, न कि आर्टरीज में जमा होने देता है।


यह:


हड्डियों की घनता बढ़ाता है

जॉइंट स्टिफनेस कम करता है

फ्रैक्चर का रिस्क घटाता है


पालक, केल, फर्मेंटेड फूड और अंडे इसके अच्छे सोर्स हैं।


7. विटामिन B6 – मसल रिपेयर और एनर्जी का साथी

विटामिन B6:


नर्व सिग्नलिंग सुधारता है

मसल रिकवरी तेज करता है

प्रोटीन का सही इस्तेमाल करवाता है

इसकी कमी से थकान, भारीपन और कमजोर स्टैमिना महसूस होता है।


केला, चना, आलू, फिश और पोल्ट्री इसके अच्छे सोर्स हैं।


आख़िरी बात

मजबूत टांगें सिर्फ चलने के लिए नहीं, आत्मनिर्भर ज़िंदगी के लिए जरूरी हैं।

सही न्यूट्रिशन के बिना उम्र बढ़ने का असर जल्दी दिखने लगता है।


अगर यह जानकारी आपके काम आई हो, तो इसे अपने परिवार और दोस्तों के साथ ज़रूर शेयर करें।

और कमेंट में बताइए — आपको इनमें से कौन-सा न्यूट्रिएंट सबसे ज्यादा सरप्राइज़िंग लगा?


मिर्च हैं औषधी का रूप

 ये मिर्च हैं औषधी का रूप,किस बीमारी में कौनसी मिर्च करती है दवाई का काम,जाने संपूर्ण विधि...


🌶️ मिर्च और उनके औषधीय उपयोग

1. हरी मिर्च

लाभकारी रोग

पाचन कमजोर होना

भूख न लगना

विटामिन C की कमी

सर्दी-जुकाम

कैसे काम करती है – पाचन रस बढ़ाती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है


2. लाल मिर्च (सूखी)

लाभकारी रोग

जोड़ो का दर्द

रक्त संचार की कमी

मोटापा

जुकाम में नाक बंद होना

कैसे काम करती है – शरीर को गर्म करती है, रक्त प्रवाह तेज करती है


3. काली मिर्च

लाभकारी रोग

खांसी, कफ, दमा

गला खराब

अपच

सर्दी

कैसे काम करती है – कफ नाशक, अग्नि प्रदीपक


4. सफेद मिर्च

लाभकारी रोग

कमजोर पाचन

गैस, अपच

थकान

कैसे काम करती है – पेट को हल्का व साफ रखती है


5. हरी गोल मिर्च (पेपरकॉर्न)

लाभकारी रोग

एसिडिटी

पेट दर्द

कब्ज

कैसे काम करती है – पाचन सुधारे, गैस कम करे


6. कश्मीरी मिर्च

लाभकारी रोग

हृदय कमजोरी

उच्च रक्तचाप

रक्त शुद्धि

कैसे काम करती है – हल्की गर्म, रक्त को साफ करती है


7. भूत जोलोकिया (तीखी मिर्च)

लाभकारी रोग

साइनस

नाक बंद

माइग्रेन

सूजन

कैसे काम करती है – तीव्र गर्म तासीर से जमी हुई कफ को तोड़ती है

⚠️ बहुत कम मात्रा में उपयोग करें


8. शिमला मिर्च

लाभकारी रोग

एनीमिया

त्वचा रोग

आंखों की कमजोरी

कैसे काम करती है – विटामिन A, C से भरपूर


9. तीखी हरी देसी मिर्च

लाभकारी रोग

भूख की कमी

मोटापा

आलस्य

कैसे काम करती है – मेटाबॉलिज्म तेज करती है


10. सूखी देसी मिर्च (बीज रहित)

लाभकारी रोग

सर्दी में ठंड लगना

कमजोर रक्त संचार

कैसे काम करती है – शरीर में गर्मी बढ़ाती है


 सावधानी

अल्सर, पित्त, बवासीर, गर्भावस्था में अधिक मिर्च न लें

हमेशा मात्रा अनुसार ही उपयोग करें।


मानव शरीर में कौन कौन से देवताओं का वास है?

 मानव शरीर में कौन कौन से देवताओं का वास है?


हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि मानव शरीर में विभिन्न देवताओं का वास होता है। इस विचार को कई ग्रंथों और धार्मिक शिक्षाओं में बताया गया है। प्रमुख देवताओं में शामिल हैं:

हाथों में इंद्रदेव का वास होता है.

चरणों में विष्णु का वास होता है.

जिह्वा में सरस्वती का वास होता है.

उपस्थ (मेढ़ू) में प्रजापति का वास होता है.

गुदा में मित्र और मृत्यु देवता का वास होता है.

बुद्धि इंद्रिय में ब्रह्मा का वास होता है.

अहंकार में रुद्र का वास होता है.

मन में चंद्रमा का वास होता है.

शास्त्रों के मुताबिक, देवताओं के अंदर 16 तरह की कलाएं होती हैं, जिन्हें कोई भी 


भगवान शिव - मानव के मस्तिष्क में।

भगवान विष्णु - हृदय में।

भगवान ब्रह्मा - ज्ञानेंद्रियों में जैसे आंखों, कानों आदि।

गणेश - मन में।

सूर्य देव - शरीर के विभिन्न अंगों में।

इनके अलावा, अन्य देवताओं और शक्तियों का भी मानव शरीर में स्थान होता है, जिन्हें विभिन्न जगहों पर, जैसे चक्रों और ऊर्जा केंद्रों में, माना जाता है। यह धारणा व्यक्ति की आत्मा और शरीर के बीच के संबंध को दर्शाती है और अध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


मानव शरीर में कौन कौन से देवताओं का वास है और उनके कार्य क्या हैं,,,,,

ईश्वर ने अपनी माया से चौरासी लाख योनियों की रचना की लेकिन जब उन्हें संतोष न हुआ तो उन्होंने मनुष्य शरीर की रचना की।


मनुष्य शरीर की रचना करके ईश्वर बहुत ही प्रसन्न हुए क्योंकि मनुष्य ऐसी बुद्धि से युक्त है जिससे वह ईश्वर के साथ साक्षात्कार कर सकता है।


हमारे ज्ञानवान पाठक जानते हैं कि मानव शरीर एक देवालय है। ईश्वर ने पंचभूतों (आकाश ,वायु ,अग्नि भूमि और जल ) से मानव शरीर का निर्माण कर उसमें भूख-प्यास भर दी।


आकाश की सूक्ष्म शरीर से, भूमि की हड्डियों, flesh से और अग्नि की body heat के साथ तुलना की गयी है।


देवताओं ने ईश्वर से कहा कि हमारे रहने योग्य कोई स्थान बताएं जिसमें रह कर हम अपने भोज्य-पदार्थ का भक्षण कर सकें। देवताओं के आग्रह पर जल से गौ और अश्व बाहर आए पर देवताओं ने यह कह कर उन्हें ठुकरा दिया कि यह हमारे रहने के योग्य नहीं हैं।


जब मानव शरीर प्रकट हुआ तब सभी देवता प्रसन्न हो गए।


तब ईश्वर ने कहा—अपने रहने योग्य स्थानों में तुम प्रवेश करो ।


तब सूर्य नेत्रों में ज्योति (प्रकाश) बन कर, वायु छाती और नासिका-छिद्रों में प्राण बन कर,


अग्नि मुख में वाणी और उदर में जठराग्नि बन कर,


दिशाएं श्रोत्रेन्द्रिय (सुनना ) बन कर कानों में,


औषधियां और वनस्पति लोम (रोम) बन कर त्वचा में,


चन्द्रमा मन होकर हृदय में, मृत्यु (मलद्वार) होकर नाभि में और जल देवता वीर्य होकर पुरुषेन्द्रिय में प्रविष्ट हो गए।


तैंतीस देवता अंश रूप में आकर मानव शरीर में निवास करते हैं ।


उपनिषद् का निम्नलिखित कथानक मानव शरीर के देवालय होने की पुष्टि करता है :

हमारा शरीर भगवान का मंदिर है। यही वह मंदिर है, जिसके बाहर के सब दरवाजे बंद हो जाने पर जब भक्ति का भीतरी पट खुलता है, तब यहां ईश्वर ज्योति रूप में प्रकट होते हैं और मनुष्य को भगवान के दर्शन होते हैं।


आइये देखें मानव शरीर में कौन कौन से देवताओं का वास है और उनके कार्य क्या हैं :

संसार में जितने देवता हैं, उतने ही देवता मानव शरीर में “अप्रकट” रूप से स्थित हैं, किन्तु दस इन्द्रियों (पांच ज्ञानेन्द्रिय और पांच कर्मेन्द्रियां) के और चार अंतकरण (भीतरी इन्द्रियां—बुद्धि, अहंकार, मन और चित्त) के अधिष्ठाता देवता प्रकट रूप में हैं। इस सभी इन्द्रियों का टोटल किया जाये तो 14 बनता है।


आइए इन देवताओं के बारे में संक्षेप में जानकारी प्राप्त करें ,इतनी संक्षेप में कि साधारण मनुष्य को भी समझ आ जाये। सभी कठिन शब्दों को सरल करने का प्रयास तो किया है लेकिन जिनका सरलीकरण नहीं किया गया है वह केवल इस लिए कि सरलीकरण के बाद और अधिक कठिनता देखी गयी थी।


1. नेत्रेन्द्रिय (चक्षुरिन्द्रिय) के देवता—भगवान सूर्य नेत्रों में निवास करते हैं और उनके अधिष्ठाता देवता हैं; इसीलिए नेत्रों के द्वारा किसी के रूप का दर्शन सम्भव हो पाता है । नेत्र विकार में चाक्षुषोपनिषद्, सूर्योपनिषद् की साधना और सूर्य की उपासना से लाभ होता है ।


2. घ्राणेन्द्रिय (नासिका) के देवता—नासिका के अधिष्ठाता देवता अश्विनीकुमार हैं । इनसे गन्ध का ज्ञान होता है ।


3. श्रोत्रेन्द्रिय (कान) के देवता—श्रोत-कान के अधिष्ठाता देवता दिक् देवता (दिशाएं) हैं । इनसे शब्द सुनाई पड़ता है ।


4. जिह्वा के देवता—जिह्वा में वरुण देवता का निवास है, इससे रस का ज्ञान होता है ।


5. त्वगिन्द्रिय (त्वचा) के देवता—त्वगिन्द्रिय के अधिष्ठाता वायु देवता हैं । इससे जीव स्पर्श का अनुभव करता है ।


6. हस्तेन्द्रिय (हाथों) के देवता—मनुष्य के अधिकांश कर्म हाथों से ही संपन्न होते हैं । हाथों में इन्द्रदेव का निवास है ।


7. चरणों के देवता—चरणों के देवता उपेन्द्र (वामन, श्रीविष्णु) हैं । चरणों में विष्णु का निवास है ।


8. वाणी के देवता—जिह्वा में दो इन्द्रियां हैं, एक रसना जिससे स्वाद का ज्ञान होता है और दूसरी वाणी जिससे सब शब्दों का उच्चारण होता है । वाणी में सरस्वती का निवास है और वे ही उसकी अधिष्ठाता देवता हैं ।


9. उपस्थ (मेढ़ू) के देवता—इस गुह्येन्द्रिय के देवता प्रजापति हैं । इससे प्रजा की सृष्टि (संतानोत्पत्ति) होती है ।


10. गुदा के देवता—इस इन्द्रिय में मित्र, मृत्यु देवता का निवास है । यह मल निस्तारण कर शरीर को शुद्ध करती है ।


11. बुद्धि इन्द्रिय के देवता—बुद्धि इन्द्रिय के देवता ब्रह्मा हैं । गायत्री मंत्र में सद्बुद्धि की कामना की गई है इसीलिए यह ‘ब्रह्म-गायत्री’ कहलाती है । जैसे-जैसे बुद्धि निर्मल होती जाती है, वैसे-वैसे सूक्ष्म ज्ञान होने लगता है, जो परमात्मा का साक्षात्कार भी करा सकता है ।


12. अहंकार के देवता—अहं के अधिष्ठाता देवता रुद्र हैं । अहं से ‘मैं’ का बोध होता है ।


13. 13. मन के देवता—मन के अधिष्ठाता देवता चन्द्रमा हैं । मन ही मनुष्य में संकल्प-विकल्प को जन्म देता है । मन का निग्रह परमात्मा की प्राप्ति करा देता है और मन के हारने पर मनुष्य निराशा के गर्त में डूब जाता है ।


14. चित्त के देवता—प्रकृति-शक्ति, चिच्छत्ति ही चित्त के देवता हैं । चित्त ही चैतन्य या चेतना है । शरीर में जो कुछ भी स्पन्दन (चलन, चेतना) होती है, सब उसी चित्त के द्वारा होती है ।


भगवान ने ब्रह्माण्ड बनाया और समस्त देवता आकर इसमें स्थित हो गए, किन्तु तब भी ब्रह्माण्ड में चेतना नहीं आई और वह विराट् मनुष्य उठा नहीं। जब चित्त के अधिष्ठाता देवता ने चित्त में प्रवेश किया तो विराट् पुरुष उसी समय उठ कर खड़ा हो गया। इस प्रकार भगवान संसार में सभी क्रियाओं का संचालन करने वाले देवताओं के साथ इस शरीर में विराजमान हैं


अब मनुष्य का कर्तव्य है कि वह भगवान द्वारा बनाए गए इस देवालय को कैसे साफ-सुथरा रखे ? इसके लिए निम्न कार्य किए जाने चाहिए:


1. नकारात्मक विचारों और मनोविकारों-काम,क्रोध,लोभ,मोह,ईर्ष्या,अहंकार से दूर रहे ।


2. योग साधना, व्यायाम व सूर्य नमस्कार करके अधिक-से-अधिक पसीना बहाकर शरीर की आंतरिक गंदगी दूर करें ।


3. अनुलोम-विलोम व सूक्ष्म क्रियाएं करके ज्यादा-से ज्यादा शुद्ध हवा का सेवन करे ।


4. शुद्ध सात्विक भोजन सही समय पर व सही मात्रा में करके पेट को साफ रखें ।


नीचे दिए गए विवरण को पढ़ते समय आप सोच रहे होंगें कि ऊपर दी गयी जानकारी रिपीट हो रही है। हाँ कुछ तथ्य रिपीट अवश्य हो रहे हैं लेकिन इनका अध्ययन करना लाभदायक ही होगा।


हम जानते हैं कि मनुष्य का शरीर एक देवालय है। इस देवालय के आठ चक्र और नौ द्वार हैं। अर्थववेद में कहा गया है-


“अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या,तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः”


जिसका अर्थ है कि आठ चक्र और नौ द्वारों वाली अयोध्या देवों की पुरी है, उसमें प्रकाश वाला कोष है जो आनन्द और प्रकाश से युक्त है अर्थात आठ चक्रों और नौ द्वारों से युक्त यह देवों की अयोध्या नामक नगरी है।


विज्ञान के अनुसार मनुष्य का जन्म माता-पिता के संयोग से संभव हो पाता है।


लेकिन क्या केवल संयोग से ही मनुष्य की रचना हो जाती हैं, बिलकुल नहीं ! इसके लिए देवी-देवताओं का सहयोग भी होता है। 33 कोटी के देवी-देवता जैसे कि सूर्य, पृथ्वी, वायु, जल, आकाश, चन्द्र आदि हमारे जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है।


हमारी माता के गर्भ में ये देव अपने एक-एक अंश से बच्चा पैदा करने और उसका पालन पोषण करने में सहयोग करते हैं।


ज़रा कल्पना करें कि अगर वायुदेव माँ के गर्भ में न पहुंच पाए तो क्या गर्भ में जीवन संभव हो सकता है। यही बात जल की है,यही बात अग्नि आदि देवों के बारे में भी लागू होती है। इन सभी देवों को एक-एक करके समझने के लिए तो विज्ञान और अध्यात्म की बैकग्राउंड होनी चाहिए ,अग्निदेव का अर्थ यह कदापि न लिया जाए कि माँ के गर्भ में कोई स्टोव या भट्टी स्थापित है और वह बच्चे के लिए खाना पका रही है। बेसिक साइंस का ज्ञान बताता है कि भोजन का पचना (digestion),उससे रक्त का बनना, एनर्जी का पैदा होना एक प्रकार का combustion/ burning/ignition process है।


अथर्ववेद के 5वें कांड में लिखा है:

सूर्य मेरी आँखें हैं, वायु मेरे प्राण हैं,अन्तरिक्ष मेरी आत्मा है और पृथ्वी मेरा शरीर है। इस तरह दिव्यलोक का सूर्य, अंतरिक्ष लोक की वायु और पृथ्वी लोक के पदार्थ क्रमशः मेरी आँखें और प्राण स्थूल शरीर में आकर रह रहे है और हाथ जो तीनों लोकों के सूक्ष्म अंश हैं, हमारे शरीर में अवतरित हुए हैं। इसीलिए ज्ञानी मनुष्य मानव शरीर को ब्रह्म मानता है क्योंकि सभी देवता इसमें वैसे ही रहते हैं जैसे गोशाला में गायें रहती हैं।


माँ के गर्भ में 33 देवता अपने-अपने सूक्ष्म अंशों से रहते हैं परन्तु यह गर्भ तभी स्थिर (ठोस) होने लगता है जब परमात्मा अपने अंश से गर्भ में जीवात्मा को अवतरित करते हैं | उस समय सभी देवता गर्भ में उस परमात्मा की स्तुति करते हैं और उसकी रक्षा व् वृद्धि करते है | सभी देवता प्रार्थना करते हैं कि- हे जीव !


आप अपने साथ अन्य जीवों का भी कल्याण करना,परन्तु जन्म के समय के कठिन कष्ट के कारण मनुष्य इन बातों को भूल जाता है |


वेद का मंत्र हमें यह स्मरण दिलाता है मैं अमर अथवा अदम्य शक्ति से युक्त हूँ। हमारा शरीर ऐसा दिव्य और मनोहारी मनुष्य शरीर होता है। तभी तो उपनिषदों में ऋषियों का अमर संदेश गूंजता है: अहं ब्रह्मास्मि तत्वमसि |


इसी तरह सभी जीवों की उत्पत्ति होती है। अतः देवता यह घोषणा करते हैं कि सृष्टि का हर प्राणी परमात्मा का ही अंश है इसलिए हम सभी को इसी भगवानमय दृष्टि से एक दूसरे को देखना चाहिए। इस वाक्य को पढ़कर आज के मानव पर घृणा तो आती है कि हमारे वेद, पुराण, उपनिषद ,देवता क्या शिक्षा देते हैं, कैसे इतने परिश्रम से सृष्टि की स्थापना करते हैं,लेकिन मानव


महामानव और देवमानव बनने के बजाय दैत्यमानव बनने में को


ई कसर नहीं छोड़ता। शायद उस मानव को यह नहीं मालूम की सृष्टि के नियम, विधाता की अदालत में एक-एक प्राणी के एक-एक कर्म का लेखा लिखा जा रहा है। कर्म अपने कर्ता को ढूंढ ही निकालता है, सज़ा या इनाम मिल कर ही रहते हैं। कर्म की थ्योरी इतनी strong है कि इससे तो देवता क्या भगवान तक भी बच नहीं पाए।

इंसान अकेला नहीं जीता

 "जब मन नहीं होता, फिर भी रिश्तों के लिए करना पड़ता है"


इंसान अकेला नहीं जीता। उसका जीवन रिश्तों से जुड़ा होता है माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चे, भाई-बहन, दोस्त, समाज। कई बार हम काम नहीं, बल्कि रिश्तों के लिए ऐसे फैसले लेते हैं जो हमारा मन नहीं चाहता। उस समय हम खुद को पीछे रख देते हैं और रिश्ते को आगे।


मान लीजिए कोई बेटा अपने माता-पिता की खुशी के लिए ऐसा करियर चुन लेता है जो उसका सपना नहीं है। मन रोज़ कहता है, “मैं कुछ और करना चाहता था”, लेकिन वह चुपचाप वही करता रहता है। बाहर से सब ठीक लगता है, पर भीतर एक खालीपन बन जाता है।


रिश्तों में “हाँ” कहना, जब मन “न” कह रहा हो


रिश्तों में सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है जब इंसान मन के खिलाफ हाँ कह देता है।


किसी की बात से सहमत हो जाना, जबकि दिल नहीं मानता


किसी गलत व्यवहार को सह लेना, सिर्फ रिश्ता बचाने के लिए


अपनी तकलीफ को दबा देना, ताकि सामने वाला दुखी न हो


जैसे पति-पत्नी के रिश्ते में एक साथी कुछ ऐसा करता है जो दूसरे को चोट पहुँचाता है। सामने वाला मन में बहुत कुछ कहना चाहता है, पर चुप रह जाता है। वह सोचता है, “बात बढ़ेगी, रिश्ता टूट जाएगा।” उस दिन रिश्ता तो बच जाता है, लेकिन मन टूट जाता है।


काम हो जाने के बाद रिश्तों में पैदा होने वाला पछतावा


जब इंसान मन मारकर कोई बात सह लेता है या कोई फैसला कर लेता है, तब बाद में पछतावा आता है।

मन पूछता है

“मैंने खुद की बात क्यों नहीं रखी?”

“क्या मेरी भावनाओं की कोई कीमत नहीं?”


जैसे कोई दोस्त बार-बार आपका अपमान करता है और आप हँसकर बात टाल देते हैं। उस समय आप दोस्ती निभा लेते हैं, लेकिन घर आकर वही बात दिमाग में घूमती रहती है। सीने में बोझ सा लगने लगता है।


रिश्तों में घुटन: जो दिखती नहीं


रिश्तों की घुटन सबसे खतरनाक होती है, क्योंकि वह बाहर से दिखाई नहीं देती। लोग कहते हैं

“सब ठीक तो है, फिर परेशानी क्या है?”


लेकिन भीतर इंसान घुट रहा होता है।

वह हँसता है, बातें करता है, रिश्ते निभाता है पर मन भारी रहता है।

धीरे-धीरे उसे उन्हीं लोगों के बीच अकेलापन महसूस होने लगता है, जिनके लिए उसने खुद को छोड़ा था।


अतीत में उलझा हुआ मन और रिश्ते


रिश्तों में लिए गए गलत या मजबूरी वाले फैसले मन को बार-बार अतीत में ले जाते हैं।


“उस दिन मैंने चुप क्यों रह लिया?”


“काश मैंने सच बोल दिया होता”


वर्तमान में बैठे-बैठे पुरानी बातें याद आती हैं। सामने वाला कुछ कह भी नहीं रहा होता, फिर भी मन पुरानी चोटों को महसूस करता रहता है। यही वजह है कि रिश्ता होते हुए भी दूरी महसूस होने लगती है।


इस पीड़ा की सच्चाई


सच्चाई यह है कि इंसान रिश्ते खराब होने के डर से बहुत कुछ सह लेता है। वह सोचता है कि त्याग करना ही प्रेम है। लेकिन हर त्याग प्रेम नहीं होता, कुछ त्याग खुद को खो देना भी होता है।


उस समय इंसान जो करता है, वह उसके डर, संस्कार और परिस्थितियों से निकलता है। यह उसकी कमजोरी नहीं, उसकी इंसानियत है।


रिश्तों में सीख क्या है


रिश्ते निभाना जरूरी है, लेकिन खुद को मिटाकर नहीं।

अगर मन बार-बार भारी हो रहा है, तो वह कोई संकेत देता है।

रिश्ते तब ही सच्चे होते हैं जब उनमें अपनी बात कहने की जगह हो।


मन नहीं होते हुए भी रिश्तों के लिए किया गया हर काम इंसान के भीतर एक कहानी छोड़ जाता है। कुछ कहानियाँ सीख बन जाती हैं, और कुछ बोझ।

जरूरत इस बात की है कि हम खुद से यह सवाल करें...

“क्या मैं इस रिश्ते में खुद के साथ ईमानदार हूँ?”


क्योंकि रिश्ते वही टिकते हैं जहाँ इंसान सिर्फ निभाता नहीं, जी भी पाता है।

पाठ 2...

गलत सिखाया गया है हमें... समर्पण करो, त्याग करो, सब पर निस्वार्थ प्रेम लुटाओ... गलत है... ये फलसफा ही गलत है... आपको मेरी बातें कड़वी लग सकती हैं लेकिन धरातल पर यही सच्चाई है..कलयुगी रिश्तों में, चाहे वो आपके खून के ही रिश्ते क्यों न हों, ये ऊंची ऊंची बातें काम नहीं करतीं... हमारे सामने कितने ही जिंदा उदाहरण हैं, जहां अपना सबकुछ लुटाने वालों के हाथ आखिर में खाली रह जाते हैं...


उनकी झोली में क्या आता है... ? कुछ प्रवचन भरी बातें... ? देवी या देवता का टैग...? 'कर्म का फल मिलेगा' जैसे वाक्य... ? लेकिन सबकुछ करने के बाद भी जो खालीपन वो महसूस करते हैं, उसका क्या...? जो जीवन खर्च हो जाता है उसकी भरपाई कैसे हो ? क्या ये बड़ी बड़ी बातें उस खालीपन को भर पाती हैं... ? नहीं... ये सिर्फ ढांढस बंधाने के तरीके हैं...


जीवन कठोर है... ये जंगल जैसा है... इसे जीने के लिए आप हर वक्त संत नहीं बन सकते...सबका भला करते करते खुद का गला नहीं काट सकते... यहां नीति भी जरूरी है, और उससे भी ज्यादा जरूरी है अपनी सीमाओं को बनाना और जानना...


जब इंसान धीरे धीरे रिश्तों के स्वार्थ को समझने लगता है, तो पहले तो वो टूटता है...रोता है..दुखी होता है...सवाल करता है ? आखिर मैं ही क्यों ? लेकिन अगर मन की शक्ति जाग जाए, तो वही इंसान खुद के लिए जीना सीख लेता है...वो अपनी बाउंड्री बनाता है और उस सीमा में किसी को आने की इजाजत नहीं देता... फिर सामने चाहे खून का रिश्ता ही क्यों न हो...


ऐसे लोगों के बीच जीने के लिए कई बार ढीठ होना पड़ता है... पहले पहल ये बहुत मुश्किल लगता है.. मन खुद से सवाल करता है... लेकिन अपने लिए सख्त होना ही पड़ता है... क्योंकि सिर्फ यही एक रास्ता है जिससे इंसान चैन की सांस ले सकता है...


और जैसे ही आप अपने लिए जीने लगते हैं यही लोग कुकुरमुत्ते की तरह उग आते हैं और आपको गिल्टी महसूस कारवाने लगते हैं..जैसे आप अपने लिए जी कर कुछ बहुत गलत कर रहे हों..यहीं बस यहीं 👇आपको उन्हें उनकी बाउंड्री दिखानी पड़ती है..


आज जब बहुत से लोगों को अपने टर्म्स पर जीवन जीते देखती हूं... हंसते, नाचते, खुलकर कहते... तो लगता है किसी ने खुद को पा लिया है... कोई खुद से मिल चुका है... कोई अब दूसरों को खुश करने के बजाय खुद को बचा रहा है...


हमारी सारी शिक्षाएं सही नहीं हैं... और मेरी इस बात को स्वीकार करना इतना आसान नहीं है...क्योंकि हमारी कंडीशनिंग ही इसी तरह से की गई है... जीवन के मूल्य अच्छे होने चाहिए...लेकिन उनका इस्तेमाल खुद को कुचलने के लिए नहीं होने देना चाहिए...


बहुत से लोग कहते हैं, हम तो अच्छा करते हैं फिर हमारे साथ बुरा क्यों होता है... होगा... बार बार होगा... क्योंकि किसी ने तुम्हें खुद के लिए स्वार्थी होना नहीं सिखाया...किसी ने ये नहीं बताया कि इन मूल्यों को सामने रखकर ताउम्र तुम्हारा इस्तेमाल भी किया जा सकता है..तुम्हें कह दिया गया कि अगर विरोध किया तो उसे रिश्तों से विद्रोह समझा जाएगा..


इन नियमों को अगर तुम आंख बंद करके आत्मसात कर लोगे, तो अर्जुन की तरह गांडीव उठाते समय तुम्हारे हाथ भी कांपेंगे...तुम सही गलत नहीं देख पाओगे..सिर्फ मूल्यों की माला जपोगे..फर्क सिर्फ इतना होगा कि वहां युद्धभूमि थी, और यहां रिश्तों का मैदान...


और फिर तुम्हें ये भी सिखाया जाएगा कि रिश्तों में हार जाना ही अच्छा होता है...कि झुक जाना समझदारी है...कि चुप रह जाना ही परिपक्वता है...


ये कैसी बेवकूफी है...? रिश्ते कोई युद्ध नहीं होते कि हर बार तुम ही हथियार डाल दो...और अगर हर बार जीत किसी एक की हो, तो वो रिश्ता नहीं, एकतरफा कब्जा होता है...


इसलिए अब सवाल ये नहीं है कि तुम कितने अच्छे हो...

सवाल ये है कि तुम खुद के लिए कितने जागरूक हो...क्या इन ऊंची बातों के पीछे छिपे सही, गलत को देख भी पाते हो ?


अच्छा होना खूबसूरत बात है...लेकिन अपनी कीमत पर नहीं...



प्रेम और प्रेमी...

 पाठ 1


मेरी__प्रीति 


मेरे पास जो सबसे अच्छे शब्द हैं,

#प्रीति वो तुम्हारे जुड़े से आए है,, 

मेरे पास जो सबसे अच्छे दोहे हैं,

#प्रीति वो तुम्हारे कंगन से बने हैं,,

मेरी सबसे अच्छी पंक्तियाँ,

#प्रीति तुम्हारे गले के हार से बनी है ,

जो खूबसूरत शेर मैं कह पाता हूँ 

#प्रीति तुम्हारे झुमके से निकलते हैं, 

मेरी सबसे खनकती गजलें, 

#प्रीति तुम्हारी छमछम करती पाजेब से होती है,

मेरे सबसे नाजुक लेख,

#प्रीति तुम्हारे साफ उज्ज्वल बेदाग चरित्र से प्रफुल्लित होते हैं, 

मेरे पास जो सबसे अच्छी कविताएँ हैं,

#प्रीति वो तुम्हारी नजाकत भरी अदाओं से मेल खाती है, 

#प्रीति तुम पर लिखे मेरे 

#ये_शब्द_शेर_नज्म_गजलें_कविताएं_महाकाव्य

इस उम्र में मेरी ऐनक बनी है,,, 

जब मै दो इंच भी नहीं देख पाता हूँ तब

#प्रीति तुम्हारे रुपयौवन से सजी यही कविताएँ, 

मुझे दिखाती हैं 

#प्रीति तुम्हारी आंखों में सजी ओस की बूंद 

#प्रीति बर्फ सी शीतल तुम्हारी काया, 

#प्रीति गुलाब के पंखुडीयों से तुम्हारे लब, 

#प्रीति पक्षियों सी चहचहाहट करती तुम्हारी मधुर आवाज़ 

#प्रीति तितलियों सी खुलती बंद होती तुम्हारी पलकें

यही ग़ज़लें, तुम्हें बताती हैं 

यही कविताएँ, तुम्हें दिखाती हैं 

मेरा तुम्हारे प्रति #निश्छल_निस्वार्थ_प्रेम.....

#प्रीति वो प्रेम_पत्र जो तुम्हारे लिए लिखे गए,

मगर तुम्हें खोने के डर से तुम तक कभी पहुचाएं नहीं, 

इन्हीं कविताओं में तुम देखोगे 

#प्रीति तुम्हारा मान, #प्रीति तुम्हारा सम्मान,

#प्रीति तुम्हारे सौंदर्य की स्वर्णगाथा, 

#प्रीति तुम ही हो मेरी सोच मेरी प्रेरणा, 

मेरे जीने का जज्बा,,

जो मेरे शब्द शेर नज्म गजलें कविताएं को 

प्रेरित करती हैं....... 

#प्रीति तुम ही तुम मेरे इस जहाँ में हो 

और यही मेरी #संपत्ति है, यही मेरी दुनिया है..

#मेरी_प्रीति...


पाठ 2...

#प्रीति तुम वो हो जिसे देखकर मुझे सकुन मिलता है,,


#प्रीति तुम वो हो जो मेरे दिल और दिमाग दोनों में बसे हो,,


#प्रीति तुम वो हो जिससे बात करके मैं कभी बोर नहीं होता हूं,,


#प्रीति तुम मेरी ताकत भी हो और कमजोरी भी हों,,


#प्रीति तुम वो हो जिसे मैं कभी खोना नहीं चाहता हूं,,


#प्रीति तुम वो हो जिसे मैं हमेशा अपने साथ रखना चाहता हूं,


#प्रीति तुम वो हो जो मेरे रोम रोम में संचार करते हों,,


#प्रीति तुम वो हो जो मेरे दिल को धड़कनों के रूप में स्पंदन करते हो,, 


#प्रीति तुम बस तुम सिर्फ तुम हो क्योंकि मुझे तुमसे जो मिला है, जब भी इसका ख्याल आता है तो खुशी से पागल हो जाता हूं, बावला हो जाता हूं,, मैं अनंत तक नाचते रहता हूं उत्सव में....!


#प्रीति तुम्हारा गुणगान करते रहता हूं। तुम्हारी तस्वीर देखकर नतमस्तक होते रहता हूं। जब तुम्हारे तस्वीर के सामने नतमस्तक होता हूं तो यह अभास होता है कि मेरे आस-पास कहीं ईश्वर है और फिर किसी शख्स का, दुनिया का, समाज का, भय पैदा ही नहीं होता...!!


#प्रीति यह साहस, यह हिम्मत मेरे अंदर सिर्फ तुम्हारे प्रेम से होती है, कि जो तुमने दिया है, वह इतना ज्यादा है और बिना कारण दिया है....!!!


#प्रीति न मेरी कोई योग्यता है, न मेरे पास कोई लौटाने का उपाय है... अनंत है, चिरकाल है, शुन्य से लेकर ब्रम्हांड तक है, उस उम्र से लेकर इस उम्र तक मेरे जीवन में जो भी है 

#प्रीति..... वो बस तुम्हारा प्रेम है....


पाठ 3...


#प्रीति कई नज्म कई शेर कई गजले तुम्हारे लिये,,

मैंने इस साल लिखे....

#प्रीति तुम्हारी उलझी हुई जुल्फों में,,,

अपने अधूरे खयालात लिखे...

#प्रीति कुछ शिकायतो के दिन लिखे.. 

कुछ महीनो के प्यार लिखे...

#प्रीति कुछ तुम्हारी शरारते लिखी..

 कुछ अपने अंदाज लिखे....

#प्रीति जीवन के कई पहलु को नये रंग में सजाने,

तुम्हारी पलकों की कोर में अटके काजल की छटाओं

 को,, रंगे आफताब लिखे... 

#प्रीति तुम्हारे उलझे हुए सवालों के कई सुलझे हुए जवाब लिखे... 

हया के रंग लिखे,,, अदाओं के तेवर लिखे.... 

#प्रीति मैने जब भी लिखे 

 तुम्हारी खुबसुरती के नक्षबिंदु लिखे.... 

कई नज्म, कई शेर, कई गजले, तुम्हारे लिये 

हाँ.... #प्रीति मैने इस साल लिखे तुम्हारे लिए लिखे....


मैं वो किताब हूँ..... लिखा है जिसके

पहले पन्ने पर #प्रीति और आखिरी पन्ने पर #प्रीति...

बीच के 

किसी एक पन्ने पर #प्रीति के खामोश एहसास है,,

किसी एक पन्ने पर #प्रीति की चुलबुली ख्वाहिशें हैं,, 

किसी एक पन्ने पर #प्रीति के हुस्न का जादू है,,

किसी एक पन्ने पर #प्रीति के कर्ण मधुर आवाज का संगीत है,,

किसी एक पन्ने पर #प्रीति के घने काले जुल्फों की गाथा है,,

किसी एक पन्ने पर #प्रीति के सुराहीदार गर्दन की व्याख्या है,,

किसी एक पन्ने पर #प्रीति के मृगनयनों की परिभाषा है,,

किसी एक पन्ने पर #प्रीति के मुस्कुराहट की दाहोदिशा है,,

किसी एक पन्ने पर #प्रीति के खिलखिलाहट की शैली है,,

किसी एक पन्ने पर रुप की देवी #प्रीति का काव्य संग्रह है,,

किसी एक पन्ने पर #प्रीति के मिठे एहसास हैं,,

किसी एक पन्ने पर #प्रीति का अतीत है,,

किसी एक पन्ने पर #प्रीति का भविष्य है,,

जब सब लिखकर भी मन नहीं भरा और लगा कि 

अभी तो कुछ भी नहीं लिखा है तो

आखरी पन्ने पर लिख दिया #प्रीति....


पाठ 4...


#प्रीति जानते हो तुम...

मैं जितनी भी कहानियां, कविताएं लिखता हूं...

सबका आधार, प्रेम, आनंद, सकुन का शीर्षक 

#प्रीति बस तुम को लिखता हूं....

मेरे जीवन पटल पर मैं उन्मुख जब भी रहता हूं 

मेरे जीवन के सार का शीर्षक बस 

#प्रीति तुमको लिखता हूं....

लिखता हूं मैं वो सब जो कभी समक्ष ना 

आने के कारण मैं तुमसे कह ना सका 

मेरी हर अनकहे प्यार का हकदार 

#प्रीति मैं सिर्फ तुमको लिखता हूं....

मेरे शून्य में निहारते नैनो से निर्झर बहते 

अश्रु संग आती आंखों में चमक को

#प्रीति मैं सिर्फ और सिर्फ तुमको लिखता हूं 

मेरे जीवन के प्रेम आधार का शीर्षक

#प्रीति मैं बस तुमको लिखता हूं.........

जो पढ़ रहे है मुझे वो अपना ख्याल रखे,

मैं लाख बुरा सही ज़माने की नज़र में,

फिर भी मैं अपनी दुआओ में

#प्रीति बस तुमको लिख रहा हूं।।


मैं अहंकारी इतना की एक बार कोई दिल से 

उतर गया तो मैं उसके तरफ देखूं भी नहीं,,

और प्रेमी इतना की झूककर #प्रीति के पैर छू लेता हूं।


मैं जिसे भुख तक बर्दाश्त नहीं होती,,

#प्रीति के लिए मैने करवा चौथ भी रखता हूं।


मेरी ग़लती होने पर भी मैने किसी से माफी नहीं मांगी,

पर #प्रीति के आगे बिना गलती के हाथ जोड़कर खडा होता हूं।


मुझे सही से अपने शर्ट का क्रिच भी बनाना नहीं आता,

मगर बखूबी बनाता हूं मैं #प्रीति के साड़ी की प्लेट।


मैं आज भी सागर से गहरा प्रेम करता हूं,

बस #प्रीति नाम की माला जपकर मैं अपना जीवन समर्पित करता हूं....


पाठ 5...

जलते_तपते जीवन में....

#प्रीति शीतल_मधुर छाँव हो तुम...

.

पलकों की पगडंडियों पर ....

#प्रीति सपनों का गाँव हो तुम...

.

चिलमिलाती धूप में....

#प्रीति घडे का थंडा पानी हो तुम....

.

जुनून हो तुम सुकून हो तुम...

#प्रीति रूह में जान होती हैं जब साथ होती हो तुम...

.

अब भी पूछते हो मुकाम अपना....

कह तो दिया 

#प्रीति धडकनों का स्पंदन हो तुम...

.

तुम्हारा अक्स आंँखों में बस गया है कुछ ऐसा...,

ईश्वर के सजदे में आँखें बंद करता हूँ तो 

#प्रीति ईश्वर में भी दिखते हो तुम...

.

जिसे मैने अपनी जान का दर्जा दे रखा है

सुनो #प्रीति... #मां के बाद दूसरी औरत हो तुम.....


समर्पित है मेरा प्रेम #प्रीति तुम्हारे चरणों में बस.....

गुज़ारिश है ईश्वर से इस प्रेम का कभी अंत ना हो,

और प्रेम कितना किसको मिला इसका कभी हिसाब ना हो,

प्रेम कोई सौदा नहीं जो पुरा मिले तो ही अपनाना हो,

प्रेम तो एक अनुभूति हैं जो अधूरी रहकर भी 

पुरे जीवन का वज़न बन जाती है,

और शायद इसीलिए प्रेम सबसे महंगा शौक़ नहीं,

सबसे ईमानदार इम्तिहान होता है,

प्रेम का अर्थ है_ 

एक मुक्त जीवन, सभी मोह से मुक्ति,

एक भरोसा, एक जिम्मेदारी, 

और प्रेमी का अर्थ है_

सभी स्वतंत्रता के बाद भी अपने प्रेम के बंधन में बंधे रहना,,, 

जिनको प्रेम पर विश्वास है हिसाब उनके लिए नहीं है,

 जिनको विश्वास नहीं है हिसाब उनकी तरकीब है,

 जिनको प्रेम पर विश्वास है वो चल पड़ते हैं,  

छोटी सी रोशनी भी उन्हें उनकी मंजिल पर पहूंचा देती है,

 जिनको विश्वास ही नहीं है वो ज्ञान में डूबे होते हैं, 

बडे अंधकार का हिसाब लगा लेते हैं, उनको अंधकार घबरा देता है , पैर डगमगा जाते हैं, 

प्रेमी बनो ज्ञानी नहीं, प्रेम बिना जो ज्ञान आता है 

वो सब नफा नुकसान से भरा कुडा करकट है,,,

प्रेमी बनकर जो ज्ञान मिलता है आ..हा.. उसकी बात ही और है, निस्वार्थ...निश्छल....निष्कपट.....

मैं तो कहता हूं ___

प्रेम में जो चल पड़ा पहूंच गया, यह ज्ञान की नहीं प्रेम पर विश्वास कि बात है...


#प्रीति मेरे होश और हवास पे 

छा गए हो तुम।

किस कदर मुझको अपना 

बना गए हो तुम।।


#प्रीति मैं तुम्हारे अलावा कुछ 

सोच नहीं पाता।

इस कदर मेरे दिल में 

समा गए हो तुम।।


#प्रीति गुलाबों की महक भी 

फीकी सी लगती है।

ये कौन सी खुशबू मुझमें 

बसा गए हो तुम।।


#प्रीति जिंदगी क्या है 

तुम्हारी चाहत के सिवा।

ये कैसा ख्वाब मेरी आँखों को 

दिखा गए हो तुम।।


#प्रीति मेरे होठों पर रहता है 

तुम्हारा ही जिक्र।

जबसे तुम्हारे माथे को 

मेरे होंठों से लगा गये हो तुम....


पाठ 6...


#प्रीति तुम मेरे लिए ईश्वर की सबसे सुंदर रचना हो!

#प्रीति तुम मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हो!

#प्रीति तुम, मेरे दिल का आईना हों!

#प्रीति तुम, मेरे लिए अकेलेपन का एकांत हो!

#प्रीति तुम, मेरी आत्माओं का झरोखा हो!

#प्रीति तुम, मेरे जीवन की शोभा हो!

#प्रीति तुम मेरे लिए भगवान का सबसे

 कीमती उपहार हो!

#प्रीति तुम मेरे दिल का स्पंदन हों!

#प्रीति तुम मेरे जीवन का ऑक्सीजन हों!

#प्रीति तुम मेरे रोम-रोम का सुकुन हो!

#प्रीति मेरी खुशी हो या उदासी, 

तुम हमेशा साथ निभाती हो!

#प्रीति मेरी खुशी तुम्हारे आंखों से व्यक्त होती है!

#प्रीति तुम्हारे दुख मेरी आंखों से व्यक्त होते हैं!

जब मुझे #प्रीति तुम पर प्यार आता है तो 

मैं इसे व्यक्त करने के लिए अपने अंतस्थ से मोतियों

से शब्द को चुनकर तुम्हारा श्रिंगार करता हूं, लेकिन

 #प्रीति मेरी आंखें तुम्हारे प्रति मेरे प्यार को

जगजाहिर कर देती है!

#हां_प्रीति.. मंत्रमुग्ध कर देने वाले तुम्हारे मुखड़े को

जब भी एक टक देखता हूं बावला हो जाता हूं !

#हां_प्रीति.. तुम्हारा मुखड़ा जब रेशम सी जुल्फों में

छुप जाता है तब वो मुझे ईश्वर से अवगत कराता हैं!

मुझे पढ़नेवाले मुझे #प्रीति तुम्हारा 

दीवाना या पागल कहते है!

#प्रीति मेरा रोम-रोम अभिव्यक्ति की मशीन हैं 

जो तुम्हारे प्रति मेरी सभी भावनाओं को व्यक्त करती हैं!

#प्रीति तुम मेरे लिए ब्रम्हांड की असली खूबसूरती हों!

दुनिया में सात आश्चर्य है, #प्रीति तुम्हारे नाम के भी अनगिनत लोग हैं लेकिन ईश्वर के हाथों तराशी गई 

#प्रीति तुम मेरे जीवन का अद्भुत आश्चर्य हो !

#प्रीति तुम मेरे जीवन का सबसे अभिव्यंजक हिस्सा हों!

 मेरे लिए ईश्वर के हाथों बनी सबसे आश्चर्यजनक 

अद्भुत अद्वितीय अकाल्पनिक अचंभित रचना 

#प्रीति तुम हो!


प्रेम क्या है?

कुछ नहीं है बस, 

हथेलियों के बीच छुपे 

#प्रीति तुम्हारे मुख की महिमा है।


प्रेम जादू है,

दो होठों का स्पर्श हैं, 

#प्रीति तुम्हारे अटूट आशा और 

विश्वास की गरिमा है।


प्रेम क्या है?

तृषित अनुराग है, समर्पण से भरा है,

#प्रीति तुम्हारे शीतल सम्मोहन की 

काव्याक्षरा है।


प्रेम तुम्हारी मौन स्वीकृति है,

मेरी योग्य निष्कृति है,

प्यार मैं हूं, प्यार तुम हो,

विरहिनी शीत ऋतु में, 

#प्रीति तुम्हारे स्पंदनों का आसरा है।


प्रेम शायर है, कविता है प्रेम,

दूरियों के गणित में मिलने का जोड़ है,

अनमोल है, अबोल है, 

#प्रीति तुम्हारा ये प्रेम बेजोड़ है।


#प्रीति तुम्हारे बिना मैं जीवन के 

रहस्यों को नहीं जानता था,

केवल जीवन की 

सतह को ही जानता था।


जैसे-जैसे प्रेम का #प्रीति में ध्यान गहरा हुआ है, 

वैसे-वैसे मैंने पाया मेरे भीतर #प्रीति तुम्हारा 

एक अपूर्व सौंदर्य लहरे ले रहा है।

#प्रीति इतना सौंदर्य तुमने उंडेल दिया की

मेरा सारा जगत सुंदर हो गया है।


पाठ 7...


#प्रीति मेरे पास पैसा नहीं है,

मै तुम्हे आभूषण से नहीं सजा सकता,

लेकिन मेरे पास कागज और कलम है,

और साथ में अथाह और निस्वार्थ प्रेम है,

जिससे #प्रीति मैंने तुम्हें वो रूप दिया है कि 

सुरज निकालने से पहले जिसके दीदार के लिए

इन्द्र को भी इस धरा पे आना पड़ता है,

#प्रीति अप्सराओं को भी अपने यौवन पर 

शर्माना पड़ता है,

#प्रीति मैने तुम्हे सजाया है अपने शब्दो से,

रस, छंद, अलंकार और वर्तनी से,

क्योंकि #प्रीति मै तुम्हारे प्रेम में डूबा

एक साधारण इंसान हूं,

ये टुटे फुटे शब्द ही मेरी पूंजी है,

#प्रीति तुम्हारे प्रति पागलपन ही मेरी धरोहर है,

#प्रीति मेरे अंदर तुम्हारे लिए असीम शक्ति है,

#प्रीति उस सूर्य ने भी अपनी सुबह की 

पहली किरण के लिए तुम्हारे रुप यौवन से तेज चुराया है,

#प्रीति एक स्वर्ग आरक्षित हैं तुम्हारे लिए इस नीले अम्बर में,

बस #प्रीति तुम पर लिखा है और #प्रीति तुम को ही पढ़ा है,

मूल्य #प्रीति तुम्हारा दिया तो #प्रीति तुम्हारा ब्याज ही बढ़ा है 

अब मन में #प्रीति तुम्हारी अथाह निधियां है 

तिजोरी अथाह सुकुन से मेरी प्रिय #प्रीति ने ऐसी भरी हैं

बस #प्रीति ही मेरी संपत्ति है #प्रीति ही मेरी धरोहर है।।


किसी ने मुझसे पुछा_

तुम इतना लिखते हो,,

#प्रीति_प्रीति करते हो,,

तुम्हारी जिंदगी में #प्रीति का 

वजूद या अस्तित्व क्या है...??


#प्रीति तुम्हारे लिए ज़रूरी है 

या फ़िर तुम्हारी ज़रूरत ...??


कई बार मेरे भी मन में आता है

कि मैं इसका क्या नया जवाब दूँ...

क्योंकि बहुत बार ज़वाब इसका दिया है,,

मैं जानता हूं मैं कितना ही #प्रीति के

बारे में बताऊं,, कितना ही प्रीति पर लिखूं, 

लेकिन लिखते वक्त जब मेरा लिखा ही

मैं पढ़ता हूं तो ऐसा लगता है

#प्रीति पर मैंने बस एक कतरा लिखा है,

पुरा समुंदर बाकी है फिर भी 

आज फिर से मैं एक छोटा सा 

प्रयास कर रहा हूँ ...

तुम्हारे साथ साथ बहुत लोगों का

यह सवाल होता है, जिसका जवाब 

कविता में समझा रहा हूँ..


आसान नहीं है #प्रीति के एहसास को 

शब्दों में पिरो पाना..

मगर फ़िर भी एक कोशिश 

नाकाम कर रहा हूँ...


#प्रीति मेरे लिए 

सुकून का वो झोंका है 

जिसमें मैं अपनी पीड़ा भूल 

कुछ पल जी खोल के 

मुस्कुराता हूँ , बेपरवाह होकर....

जैसे जिंदगी में 

सब बिल्कुल वैसा है जैसा

मैंने सोच रखा था 

ख़्यालों की दुनियाँ में...


#प्रीति मेरे लिए

बरसात की चंद बूँदें है 

जिसमे मेरा रोम - रोम भीगता है

 कितनी ही अतृप्त इच्छाएं

तृप्त हो जाती है और नई

कल्पनाओं के अंकुर विस्फूटित 

होकर कोमल फ़ूल 

प्रमुदित हो खिलखिलाते हैं 

सदाबहार से ....


#प्रीति मेरे लिए 

वो खूबसूरत लम्हा है 

जो गुज़र कर भी गुजरता नहीं है

मुझमें ही कहीं लहरों सा उमड़कर

शांत जम सा जाता है..

कितनी ही बाँतें , अनमोल

यादों के क्षण अनायास ही 

जुड़ते चले जाते हैं 

मुझे सांत्वना देने के लिए.....


#प्रीति मेरे लिए

एक सुंदर सपने का संसार है 

जिसमें सबकुछ जीवंत है

प्यार का मीठा झरना बहता है

जहां कटुता, कसैलापन 

और किसी के लिए मन में

बुरी भावना नहीं है , 

उस स्वप्न सागर में नौका 

विहार का सुख #प्रीति से ही तो

मिलता है ,जहाँ प्रेम नदी

बिन किनारे के 

बस बहती है निरंतरता लिए....


किसी ने मुझसे पुछा___

मैंने देखा है आपकी हर पोस्ट #प्रीति पर होती है,,

कभी #प्रीति पर तारीफ लिखते हो,,, 

कभी #प्रीति की याद में अश्कों को पिरो जाते हों, 

कभी उच्च कोटि के ब्रम्हांडीय शब्दों से 

#प्रीति को नवाजते हो,, 

पर कभी #प्रीति को लेकर कोई मजाक, 

जोक्स नहीं करते हों,,,,,

प्रेम तुम ऐसे कैसे हो,,,

ऐसा क्या है #प्रीति में...?

जब भी कुछ लिखते हो,, 

जब भी कुछ बात करते हो

हर बात में #प्रीति को लेकर आते हो...


मैंने कहा ___

प्रेम ऐसा ही है ।

दिन निकलते ही #प्रीति पर ग़ज़लें...

दोपहर होते-होते #प्रीति पर शेर…

शाम होते-होते #प्रीति पर ग्रंथ....

और रात होते-होते #प्रीति पर महाकाव्य

लिख सकता है ....

जिसका रोम_रोम तक मुझे ज़ुबानी याद है...

#प्रीति मेरी बातों में,, #प्रीति ही मेरी आंखों में,,

ज़र्रे ज़र्रे में #प्रीति है,,, जिधर नजर घुमाता हूं 

हर जगह बस #प्रीति ही #प्रीति होती है क्योंकि 


#प्रीति मेरा #वजूद है कोई #भद्दा_मज़ाक थोड़ी हैं.....!!

#प्रीति मेरी पूरी #कायनात है मात्र एक #स्त्री थोड़ी हैं....


#प्रीति सुर्ख_आँखें...नंगे_पांव...

 बिखरी_जुल्फें..ताजमहल_सा_बदन

मैने रंग दिया दिल का हर कोना #प्रीति 

तुम्हारी खूबसुरती से,

मेरी धडकनों से,

मेरे मस्तिष्क के नसों से,

#प्रीति तुम्हें याद करके आँखों में आते आँसुओं से,

कानों में गुंजती #प्रीति तुम्हारी मधुर आवाज़ से,

मेरी परछाई में दिखते #प्रीति तुम्हारे एहसास से,

मेरे रोम_रोम में लहराते #प्रीति तुम्हारे तरंगों से,

#प्रीति तुम्हें छुने को बेताब स्पंदन करती मेरी साँसों से

पूछो••••••••

सुकुन किसे कहते हैं.....!

क्योंकि कण_कण से #प्रीति तुम्हारी खूश्बु आती हैं,,,, 

जर्रे_जर्रे में #प्रीति तुम नजर आती हों,,, 

कस्तुरी बन महकती है साँसें मेरी कुछ इस तरह,,,, 

मेरे रोम_रोम में #प्रीति तुम निखार लाती हों....!

अब हर वक्त #प्रीति तुम्हारे इतने नशें पीने के बाद 

मेरे रोम-रोम में अठखेलियाँ करती 

#प्रीति तुम्हारी नटखट_अदाएं देख कर 

दिल से निकली गजल कहू,,

या रुह पर रक्स करते तुम्हारी अदाओं से 

निकले शेर पढुं,

या जग की चिंता छोड़ अपनी ही धुन में

इश्क़ कैसे निखार लाता है

यह बस.... #प्रीति तुम्हारी आंखों में आंखें डालकर 

देखता रहु....





प्रेम और मोह

 पाठ 1


प्रेम और मोह ...

आखिर क्या है यह प्रेम..

और क्या है यह मोह...? 

कितने लोग इसके बीच का फर्क समझते हैं ??


'प्रेम' और 'मोह' यह दो ऐसे शब्द है 

जिनके बीच जमीन और आसमान का फर्क है ..!


अर्थात - प्रेम वह जिसमें पाने की कोई चाह नहीं होती... और मोह वह जो पाने के लिए विवश कर दे ...

जब व्यक्ति किसी इंसान से या किसी भी वस्तु से प्रेम करता है तो उसे पाने के लिए 

न जाने वह क्या-क्या करता है ..

पर असल में वह व्यक्ति की चाहत बन जाती है ....

और चाहत कब मोह का रूप ले लेती है ..

यह व्यक्ति समझ ही नहीं पाता 

और उस पाने की चाह को ही प्रेम समझ बैठता है.. 

किंतु जब हम किसी से सच में प्रेम करते हैं 

तो हम बस उसको खुश देखना चाहते हैं 

उसकी खुशी में ही स्वयं की खुशी ढूंढ लेते हैं..!


मनुष्य की सबसे प्रिय चीज होती है उसकी " स्वतंत्रता "


जब हम किसी व्यक्ति को जिससे हम कहते हैं 

कि हम बहुत प्रेम करते हैं 

उसको बांधने की कोशिश करते हैं ...

उसको समझते नहीं ..

उसको उसकी जिंदगी अपने हिसाब से 

नहीं जीने देते ..

उससे बहुत सी उम्मीदें करते हैं 


परंतु क्या यह सच में प्रेम है ...?


जिससे आप प्यार करते हो उसको पाना ..

अपना बनाना या खुद से बांध कर रखना 

क्या यह प्रेम है ..? 


नहीं असल में यह मोह है ...

इंसान मोह को प्रेम का नाम दे देता है 

क्योंकि जब आप किसी से सच्चा प्यार करते हैं 

तो उसको आजाद छोड़ देते हैं 

क्योंकि आपको उस पर भरोसा होता है 

कि वह व्यक्ति विशेष चाहे कुछ भी करें परंतु 

वह रहेगा आपका ही होकर हमेशा ...


विश्वास एक ऐसी डोर होती है ..

जो किसी भी रिश्ते के लिए बहुत जरूरी होती है ....

यदि आपको अपने रिश्ते पर भरोसा नहीं होगा तो 

रिश्ता कामयाब नहीं होगा..

अतः यदि प्रेम है तो भरोसा भी करना पड़ेगा 

तभी रिश्ते की डोर मजबूत बनेगी ...!


हम स्वयं क्यों नहीं यह बात आजमा कर देखते .. 

जब वह व्यक्ति जिसे आप प्रेम करते हो 

वह जरूरत से ज्यादा आप को बांधकर रखें 

हमेशा अपनी इच्छाओं का पालन करवाएं 

बजाए आपकी इच्छाओं को महत्व देने के 

और आपसे प्रत्येक क्षण पर सवाल करें 

और उस मोह को प्रेम का नाम दें 

तो कैसा महसूस होता है ..?


बहुत सीधा सा जवाब है 

जाहिर सी बात है हमें पसंद नहीं आता ..क्यों ? 


क्योंकि हमें आजादी की आदत होती है ...

हम सभी को अपनी जिंदगी अपने 

तरह से जीने की आदत होती है 

ठीक उसी प्रकार सामने वाला भी है 

यदि आप उसको सच में प्रेम करते हैं 

तो उसको समझना सीखिए 

उस पर भरोसा करना सीखिए 

जरूरी नहीं आप जिससे प्रेम करो 

उसको अपना बनाओ तभी वह प्रेम है.. 


अतः प्रेम वह है जो निस्वार्थ भाव से किया जाए, 

प्रेम जिससे आप प्यार करो उसकी खुशी ही 

आपके लिए सब कुछ हो वह खुश तो आप खुश...

रिश्ते में मोह होगा तो कभी भी रिश्ता कामयाब नहीं होगा रिश्ता चाहे कोई भी हो 

अगर उसे प्यार के पानी से सिंचा जाएगा 

तभी वह खिलेगा..

मजबूत बनेगा ..

अतः मोह के बंधन में 

बंधा होगा तो टूट जाएगा..!


अतः जिससे आप प्रेम करते हैं, 

उसको स्वतंत्र छोड़ दीजिए 

मोह हट जाएगा तो 

पाठ 2....

प्रेम है मन की मृत्यु...


प्रेम है मन की मृत्यु, 

प्रेम है मन का समाप्त हो 

जाना, 


प्रेम है मन का अपने प्रियतम के मन में विलीन हो जाना...!!!!!


जैसे बिना प्रेम के मन में लहरें उठती हैं, 

कोई हमसे आकर पूछता है कि 

जब मन शांत होता है तो लहरों 

की क्या अवस्था होती है, 

तो हम कहते है


 जब मन प्रेम में अकंठ डुब जाता है 

तो शांत होता है 


वहाँ लहरें होती ही नहीं.....


लहरों की अवस्था का 


सवाल नहीं....


प्रेम बिना मन अशांत होता है तो 


अनगिनत लहरें होती हैं...


असल में लहरें और अशांति 


एक ही चीज के दो नाम हैं...


अशांति नहीं रही तो लहरें भी नहीं रहेंगी, 


रह जायेंगा प्रेम.......


बिना प्रेम मन है अशांति, मन है लहर। 


जब मन प्रेम को समर्पित हो जाता है तो 


लहरें चली जाती है,,


विचार चले जाते है, 


मन भी विलीन हो जाता है और


 रह जाता है प्रेम, रह जाती है आत्मा...!


 मन की जो लहरें हैं वे ही हमें अलग - अलग 


व्यक्ति बना देती हैं....


एक - एक लहर को अगर होश आ जाए


तो वह कहेगी ‘मैं हूं।’ 


और उसे पता भी नहीं होगा कि वह नहीं है, 


वह अशांति है....


यह जो हमें खयाल उठता है 


कि ‘मैं हूं’ यह हमारी एक - एक मन 


की अशांत लहरों का जोड़ है...


 ये लहरें जब प्रेम में


विलीन हो जाएंगी तो 


आप नहीं रहेंगे, मन नहीं रहेगा...


रह जाएगा प्रेम....


रह जाएगा 


एक प्रेम का सागर....


_प्रेम स्वयं ही बढ़ जाएगा ..!


पाठ 3...


_*प्रेम है अनतता*_ 


प्रेम का पहला सबक है: 

प्रेम को मांगो मत, 

सिर्फ दो। 

एक दाता बनो।


प्रेम का अपना आंतरिक आनंद है। 

यह तब होता है जब तुम प्रेम करते हो। 

परिणाम के लिए प्रतीक्षा करने की 

कोई आवश्यकता नहीं है। 

बस प्रेम करना शुरू करो। 

धीरे-धीरे तुम देखोगे कि बहुत ज्यादा प्रेम 

वापस तुम्हारे पास आ रहा है। 

व्यक्ति प्रेम करता है और प्रेम 

करके ही जानता है कि प्रेम क्या है। 

जैसा कि तैराकी तैरने से ही आती है, 

प्रेम प्रेम के द्वारा ही सीखा जाता है।


प्रेम अधिक कठिन है। 

यह किसी और के साथ नाच है। 

दूसरे के लिए भी जानने की 

जरूरत है कि नृत्य क्या है। 

किसी के साथ तालमेल 

बिठाना एक महान कला है। 

दो लोगों के बीच एक सामंजस्य बनाना … 

दो लोगों का मतलब दो अलग दुनियाएं। 

जब दो दुनियाएं करीब आती हैं,

 संघर्ष अनिवार्य है। 

तुम नहीं जानते कि कैसे सामंजस्य बनाना। 

प्रेम समस्वरितता है। और खुशी, स्वास्थ्य, 

समस्वरितता, सब कुछ प्रेम से उपजता है।


प्रेम करना सीखो। समझने की जल्दी मत करो, 

प्रेम करना सीखो। सबसे पहले एक महान 

प्रेमी बन जाओ।


प्रेम एक जुनून नहीं है, प्रेम एक भावना नहीं है। 

प्रेम एक बहुत गहरी समझ है कि कोई और 

किसी तरह तुम्हें पूरा करता है। 

कोई तुमको एक पूरा वर्तुल बनाता है। 

किसी अन्य की उपस्थिति तुम्हारी 

उपस्थिति को बढ़ाती है। 

प्रेम तुम्हें स्वयं होने की स्वतंत्रता देता है, 

यह स्वामित्व नहीं है।


प्रेम अनंतता है। 

यदि वह है, तो यह बढ़ता चला जाता है, 

बढ़ता चला जाता है। प्रेम शुरुआत जानता है, 

लेकिन अंत नहीं जानता......

और जब मेरा भी #प्रिती में मन लग गया तब 

मैं प्रेम की अनतता जान पाया और मेहसूस हुआ

#प्रीति_के_प्रेम_में_जीवन_उत्सव_है.....


प्रेम और प्रेमी

 पाठ 1

इस कदर वाकिफ है, 

मेरे जज्‍बातों से मेरी कलम, 

मैं “प्रेम” भी लिखना चाहूँ तो 

“#प्रीति” लिख जाता हूं,,

#प्रीति पारस की तरह है,

#प्रीति सिर्फ मुझसे इश्क नहीं करती,

#प्रीति मेरे दिल में बसती है,,

मेरे साथ जिस रिश्ते में भी #प्रीति जीती है,,

उस रिश्ते को सकुन आनंद ख़ुशी हंसी

अल्हड़पन, नटखटता, संजिदगी से 

भर देती है..... क्योंकि मेरे जीवन में 

#प्रीति रंग हैं, #प्रीति चित्र है, 

#प्रीति हिज्र है, #प्रीति संग है, 

#प्रीति अल्हड मस्त मलंग है,,,

#प्रीति धूप है, #प्रीति शाम हैं, 

पाती पाती #प्रीति का नाम है,,

#प्रीति दिन है, #प्रीति रात हैं, 

#प्रीति अहसास हैं, #प्रीति जज़्बात है,,

#प्रीति प्याले में छलका जाम है,,

#प्रीति अनमोल दिल का रूआब है,,

मैंने कभी कंकर पत्थर जमा करने में

अपना जीवन व्यतीत नहीं किया इसलिए 

ना करना मेरे जीवन में #प्रीति का हिसाब, 

#प्रीति मेरे जीवन का शुद्ध सौ कॅरेट का

अनमोल हीरा हैं,, अनमोल हीरा है...

👏༺꧁ #प्रीति_ही_परमात्मा_है ꧂༻👏

           *********************

              


मौन हुँ,

निःशब्द नहीं,

भीतर की आवाज हुँ,

गूँजता नहीं हूं...


जज़्बाती हुँ,

मगर कहता नही हूं,

झूठ का कभी

मैं साथ लेता नहीं हूं,


पहल नहीं करता हूं 

कभी खूद को सच्चा बताने की

लेकिन #प्रीति के चरणों में 

नतमस्तक होने से 

डरता भी नही हूं....


पाठ 2...

यूं तो मुद्दे और मसले बहुत हैं दिमाग की खूराक को

 मगर, दिल को..... #प्रीति का ही ज़िक्र सबसे ज्यादा अजीज़ है... क्योंकि मैं जीवन में जब कभी उस पड़ाव पर पहुंचा हूं, जहां प्रेम और समाज में से किसी एक को चुनना पड़ा, तब कुछ पल मन को शांत कर लिया...चिंतन किया... आंखें बंद करके विचारना की.... मन जब शांत हुआ तब #प्रीति ही मुझे सर्वोत्तम विकल्प लगी.... क्योंकि मैं जानता हूं यदि मैं मर भी गया तब भी कभी

समाज को संतुष्ट नहीं कर पाऊंगा.. और जब #प्रीति को चुना तो शुरवात में बहुत चुनौती आई... लेकिन फिर जैसे जैसे #प्रीति में मन रमता गया जिंदगी बहुत आसान हो गई, #प्रीति की अदाओं को अपने नेत्रों में समा लेना, #प्रीति पर शायरीयां करना, #प्रीति को निहारना रोजमर्रा का काम हो गया और जब भी #प्रीति पर लिखा दिल के किसी कोने से आवाज आती थी जो भी #प्रीति पर लिखा है अच्छा लिखा है पर कम लिखा है और बरसों से #प्रीति पर लिखते रहने के बाद भी आज भी 

नहीं बांध पाता हूं मैं #प्रीति को शब्दों में

जब भी मैं प्रयत्न करता हूं #प्रीति को लिखने की

हर अक्षर #प्रीति के समक्ष बौने प्रतीत होते है,

#प्रीति होती है मेरे समीप जब मैं झांकता हूं मेरी ही आंखों में, टटोलता हूं जब अपने हृदय को #प्रीति रुप का तेज ऐसे बिखरता है जैसे समस्त ब्रह्मांड में #प्रीति से सुंदर कुछ भी नहीं है, मेरे अक्षर #प्रीति में कहीं विलीन हो जाते हैं, #प्रीति को देख रह जाती है स्तब्ध मेरी तूलिका और झंकृत होने लगता है एक प्रणय संगीत हृदय में, और हर क्षण बंध जाता हूं मैं #प्रीति की दिव्यता में, किंतु कितना भी लिखूं, कितना भी कहूं नहीं बांध पाता हूं मैं #प्रीति के तेज़ को अपने टूटें फ़ूटे शब्दों में।


पाठ 3...


कलम हाथ में लिए मैं यूं ही बैठा था

शब्दों का इंतजार करते हुए तब

मम्मी की पुरानी बातें याद आ गई और

मैं मम्मी की बातों को याद करते हुए

मम्मी की पुरानी बातों में खो गया,,,

मुझे याद आया कि 

मेरी मम्मी अक्सर कहती थीं

"लल्ला! अपना कीमती सामान 

एक जगह मत रखो, अलग अलग रखो 

कुछ गुम गया तो दुख थोड़ा कम होगा।"


और फिर एक दिन मम्मी इस

दुनिया से चल बसी, फिर

मम्मी की वो बातें याद आने लगी,

भरा-पुरा परिवार होने के बावजूद

एक कमी सी लगने लगी,,

फिर मेरे जीवन में #प्रीति आई,

मम्मी की वो बातें याद आई कि

लल्ला अपना कीमती सामान

एक जगह मत रखो, अलग अलग रखो

और मेरे पास सबसे कीमती सामान

मेरा स्वाभिमान मेरा प्रेम था, 

जो निस्वार्थ, निश्छल और निष्कपट था,

फिर उस प्रेम को अलग-अलग लोगों में बांटने

के बजाए मैंने #प्रीति में ही सब रिश्तों को 

संजोकर देखने लगा,

कभी मां, कभी बहन, कभी बेटी,

 कभी सहेली, कभी प्रेमिका...

#प्रीति के प्रति दिवानगी इतनी बढ़ने लगी

की उसके सामने सारी दुनिया

बौनी लगने लगीं,,

और फिर मैंने अपने प्रेम को 

जैसे मम्मी ने कहा था वैसा

थोड़ा थोड़ा 

सब #प्रीति के हिस्सों में बांट दिया

कुछ मां के हिस्से,

कुछ बहन के हिस्से,

कुछ बेटी के हिस्से,

कुछ सहेली के हिस्से और 

एक हिस्सा प्रेमिका के लिए

और धीरे धीरे मैं अपने हिस्से कुछ ना रख सका,,


बाकी जो भी बचा #प्रीति को दे दिया 

तुम सोच भी नहीं सकते कि 

वह सबसे बड़ा हिस्सा था 

मेरे मन का वह हिस्सा 

जो #प्रीति के नाम लिखा था 

वह अनमोल था।

दुनिया की सारी दौलत 

उस हिस्से से कमतर थी मेरे लिए... 

फिर एक दिन मेरी सबसे बड़ी दौलत 

 मेरा सबसे कीमती सामान

 कहीं ग़ुम हो गया,

दुनियादारी के रस्मों रिवाजों में खो गया,,,

#प्रीति ने अपने इर्द-गिर्द इतनी भीड़ बना ली

जिसमें मैं नजर ही नहीं आ रहा था,

और अचानक #प्रीति भीड़ में खो गई।

 मैंने उसे बहुत ढूंँढ़ा 

 गीली आंँखें, भीगे मन से।


अकेलेपन में चिल्लाया हूंँ ...

पूजा पाठ भी न करने वाला मै नास्तिक

लड़का भगवान के सामने गिड़गिड़ाया हूँ,

तकिए में अपने आंसू छुपाया हूं,

तेज़ गाने में सिसकन को दबाया हूं,

#प्रीति को मैंने बहुत ढूंढा 

हर ओर ढूंढा ......

मैंने #प्रीति में भी #प्रीति को ढूंढ़ा 

पर #प्रीति नहीं मिली,

#प्रीति दुनिया के लोगों में खो गई,

जीवन का सबसे कीमती हिस्सा 

खोने के बाद भी मैं जी रहा हूं

क्योंकि मैंने कुछ हिस्से 

#प्रीति के अनेक रुप में बांट चुका हूं,

मां के नाम 

कुछ बहन के नाम

कुछ बेटी के नाम 

कुछ सहेली के नाम और 

थोड़ा सा हिस्सा

#प्रीति की याद, #प्रीति के ख्यालात, 

#प्रीति की खिलखिलाहट,

#प्रीति का अल्हड़पन, #प्रीति का बांकपन,

ऐसी अनगिनत 

#प्रीति की मनमोहक अदाओं से 

अपना रोम-रोम सिंच रखा हूं।

इन पांचों को मिलाकर 

मैंने फिर से नई दुनिया बनाई ।


#प्रीति बिना कमी तो है 

पर खुद को अधूरा नहीं कह सकता हूँ..


मांँ की आंँखों की चमक 

बहन की नोंक-झोंक वाली खनक 

बेटी का अल्हड़पन,

सहेली का भरोसा 

मुझे टूटने से संभाल लेती है,


और फिर #प्रीति को याद करके

आनेवाले आंसुओं से

निकली मुस्कुराहट 

मुझे प्यारी लगने लगी है।

मैं बस #प्रीति को लिखने लगा हूं,

जिंदगी तब भी खूबसूरत थी 

ज़िंदगी अब भी खूबसूरत है

ज़िंदगी हमेशा खूबसूरत रहेगी

क्योंकि #प्रीति कहीं भी रहो

हर रिश्ते में #प्रीति मेरे साथ है.....

और मेरी ख्यालों की दुनिया हो

या वास्तविक दुनिया हो

सब #प्रीतिमय है....


मैंने निस्वार्थ भाव से #प्रीति को प्रेम किया है और इसलिए मेरा ईश्वर मुझे कभी नहीं भुलता,, मैं जानता हूं कि जिस क्षण से कोई भी किसी एक से निस्वार्थ भाव से प्रेम करने लगता है उस पल से वो अपने ईश्वर को याद हो जाता है और मेरा #प्रीति से ऐसा रिश्ता है जिसमें मेरे निस्वार्थ भाव से किए प्रेम का विस्तार होता है, अक्सर लोग क्षणभंगुर प्रेम से भरते है अपना खालीपन, पर मैंने सीखा है शून्य में भी #प्रीति को करते रहना निस्वार्थ प्रेम और लेते रहना ईश्वर के दर्शन, #प्रीति पास नहीं तो क्या, #प्रीति के अहसास तो है, #प्रीति की मुस्कुराहट मेरे चारों ओर बिखरी है, #प्रीति की खिलखिलाहट मेरे कानों में मधूर संगीत की तरह गूंजती है, मेरे ह्रदय के स्पंदन पर #प्रीति के पदचाप की आवाज आती है, मेरा प्रेम कैद नहीं, निश्छल निष्कपट भाव से #प्रीति को आजाद रखता है, #प्रीति कहीं भी रहो, पर मुझमें ही रहती है.....

"मेरे तन के मन मंदिर में, 

 #प्रीति पहले से प्रतिष्ठित हैं ।।

 याद #प्रीति की आते ही, 

 अश्कों से आंखें सिंचित हैं ll

 ख्यालों में भी #प्रीति आ जाए 

 तो धड़कनों का रक्स निश्चित हैं ll

 आपसी प्रेम और विश्वास से, 

 #प्रीति के सारे मार्ग चिन्हित हैं ll

 आदि से अनंतकाल तक, 

 मेरे रोम रोम में #प्रीति ही अविजित हैं

इसलिए हर किसी पर नहीं मरता मेरा दिल ,

जो मेरी #प्रीति है वो पुरे ब्रम्हांड में एक है....


पाठ 4...


#प्रीति मेरे लिए कोई भी दुसरा 

तुम जैसा नहीं हो सकता,


#प्रीति मेरे दिल में तुम हो जहां हमेशा तुम ही रहोगे, 

मैं तुम्हारे बगैर हस तो सकता हूं 

मगर खुश नहीं रह सकता,


#प्रीति मेरे लिए खुशी सकुन आनंद का मतलब 

सिर्फ और सिर्फ तुम...... इसलिए 


#प्रीति तुम्हें पता है यदि मुझे ईश्वर ने

कभी निर्जीव वस्तु बनाया तो मैं होना चाहूँगा

तुम्हारे कमरे की दीवार पे टंगा दर्पण।


ताकि #प्रीति तुम्हारी श्रिंगार रुपी देह और 

जगमगाती रूह को 

अपने नेत्रों पे प्रतिबिम्बित कर सकूँ,,,


क्योंकि #प्रीति ये वही सुंदरता है 

जिसका आंकलन मैंने

हमेशा अपनी हर शायरी, ग़ज़लें, 

कविताएं, महाकाव्य में किया है लेकिन 

यह सब देखने में

#प्रीति तुम हमेशा से असमर्थ रही हो


इसलिए आइना बन

#प्रीति तुम्हारा दीदार तुम्हें कराऊंगा

तुम कितनी खूबसूरत हो यह

#प्रीति तुम्हारे आंखों से तुम्हें दिखाऊंगा..


#प्रीति तुम्हारा मौन और मेरा मौन मिलकर प्रेम बन जाते है। इस क्षण कलम और कागज में जो घट रहा है यह प्रेम है। इधर मेरा शून्य #प्रीति तुम्हें लिख रहा है, उधर तुम्हारा शून्य मुझे पढ रहा है। लिखना तो बहाना है। इस निमित्त मेरा शून्य #प्रीति तुम्हारे शून्य से मिल रहा है। इस निमित्त #प्रीति तुम्हारा शून्य मेरे शून्य के साथ नाच रहा है, तरंगायित हो रहा है। इधर #प्रीति तुम्हारा शून्य शब्द बन परोस रहा हैं कलम बने मेरे शून्य को। मेरा लिखना तो एक खूंटी है; उस पर मैंने टांग दिया अपने शून्य को, #प्रीति तुमने टांग दिया अपने शून्य को— दो शून्य मिल कर जहां एक हो जाते हैं वहां प्रेम है। और #प्रीति दो शून्य पास आएं तो एक हो ही जाते हैं। दो शून्य मिल कर दो शून्य नहीं होते, एक शून्य होते है। #प्रीति हजार शून्य मिल कर भी एक ही शून्य होगा, हजार नहीं। इसी तरह दूर कहीं शून्य में दिखती #प्रीति तुम्हारे साये से लिपट के रह जाती है आत्मा मेरी, और मैं #प्रीति तुम्हारी देह से टूटा दूर से तुम्हें शून्य में देखता आखिरी हिस्सा हूं!

मस्ती प्रेम की पढा गई एक पाठ

जिसके मन में गाॅंठ नहीं बस उसके है ठाठ

ढूंढा सब जहां में पाया #प्रीति तुम्हारा पता नहीं

जब पता #प्रीति तुम्हारा मिला अब पता मेरा नहीं......

इसलिए भावुक हूं, आनंदित हूं, मर्यादित हूं, प्रेममग्न हूं,

संतुष्ट हूं,निःशब्द हूं ।। मैं बस "#प्रीतिमय" हूं ।।


पाठ 5....


#प्रीति______

तुम्हें चांद का टुकड़ा कहूं या तुम्हें खूबसूरत

 रुप की अप्सरा कहूं,,

काली जुल्फें, काजल से भरी काली काली आंखें,

 मख़मल से कोमल देह को क्या कहूं,,

#प्रीति तुम्हें भगवान ने धरती पर भेजा सिर्फ मेरा 

हमसफ़र बनने को,,

तुम तो मेरी धडकनों का स्पंदन बन गई 

तुम्हें दिल की महारानी कहूं,,

#प्रीति तुम्हें तराशा है भगवान ने अपने हाथों से,

एक एक अंग को बनाया सबसे खूबसूरत 

अपनी कलाओं से,,

गुलाब की पंखुड़ियों से लाल होंठ,, 

मृग जैसी कत्थई आंखें , 

सुराहीदार गर्दन,

काली घटाओं सा जुल्फों का रंग, 

संगेंमरमर सा शफ्फाक बदन,, 

जब जब भी तुम्हें देखता बावला हो जाता हूं, 

तुम्हें चांद का टुकड़ा कहूं या तुम्हें खूबसूरत 

रुप की देवी कहूं,,

#प्रीति शब्द कम पड जाते हैं, जब जब भी 

तुम्हारी खूबसूरती पर लिखना चाहता हूं,,

आंखों से आंखें मिलाकर तुम्हारी तस्वीर के 

रास्ते तुम्हारे कोमल ह्रदय में रहना चाहता हूं,,

मैं पागल हूं और बहुत पागल हूं पर यह भी

बात सच है की केवल तुम्हारा दिवाना हूं,

अब तुम ही बताओ #_प्रीति_____

जब तुम झुककर मेरा माथा चुमती हो,

तुम्हारे मुखड़े को चांद कहूं या 

मल्लिका_ए_जिंदा_ताजमहल कहूं...


एक दिन कहीं ऐसा ना हो कि

तुम मुझे कॉल करो,,

और वो कॉल रिसीव ही न की जाये...


फिर तुम एक और कोशिश करो,,कॉल करने की,,

और फिर रिसीव न हो...

फिर एक अरसे बाद,तुम्हे थोड़ी फ़िक्र हो,,

तुम मैसेज करो मुझे,,वो मैसेज...जिसका कोई भी जवाब अब कभी नहीं आएगा...


फिर तुम सच में थोडे और परेशान हो जाओ... और

तुम्हें मेहसूस हो हीरा मेरे पास था और मैं कंकर जमा करने में हीरे को तडा दे दिया तब 

तुम सोचो मेरे बारे में, मेरी हर बात,, मेरी आवाज़, मेरा चेहरा....

तुम्हारे लिए मेरी फ़िक्र..


मेरे साथ बिताया हर एक लम्हा..

फिर तुम मुझे एक और कॉल करो,,

और फिर कोई रेस्पांस न मिले...

तुम फिर मुझे मैसेज करो..

जिसका कोई जवाब न मिले..

तुम अचानक बहुत बेचैन हो जाओ..

तुम्हें सब कुछ याद आता रहे...

तुम लगातार मेरे बारे में सोचो...

तुम्हे सब कुछ याद आये.

सब कुछ...


और एक दिन जब तुम्हें नींद न आये.. 

बस मेरी याद आये...

तुम मुझे सोशल मीडिया पर ढूंढो..

फिर मैसेज करो..

फिर कॉल करो.

फिर कोई जवाब न मिले..

तब तुम फोन गैलरी खोलकर..

मेरी तस्वीरें देखो...


तुम्हे गुस्सा आये, चिढ हो,तुम्हे रोना आये..

तुम्हें एहसास हो कि मैं किस हाल में रह रहा हूँ..

परेशान होना क्या होता है..

टूट जाना क्या होता है...


फिर कुछ अच्छा ही नहीं लगेगा..

तब तुम हर जगह मुझे ही ढूंढो..


बस एक आखिरी बार मुझे देखना चाहो,

मुझे सुनना चाहो..

मेरे सीने से लगना चाहो...

मुझसे लिपटकर रोना चाहो..

तुम पागल हो जाओ उस प्यार के लिए,

जो सिर्फ और सिर्फ मुझसे मिल सकता था..

और उस हाल में,

तुम्हे सुनने वाला

तुम्हारे माथे को चूमने वाला...

तुम्हे सीने से लगाने वाला...

"मैं"...

कहीं दूर...अंधेरे में...

अपने कमरे में...

आधी रात को,,

वो हर एक मैसेज पढ़कर,,

तुम्हे याद करूँ...फिर वो मैसेज डिलीट कर दूँ..

उसका कभी कोई जवाब नहीं आएगा..


तुम महसूस करो दिल का टूटना,

अकेलेपन में रोना..किसी से कुछ न कह पाने की बेबसी..

सारे काम ज़बरदस्ती लगने लगे,

बस हर वक़्त मेरी बाहों की ज़रूरत लगे,

नींद की गोलियां भी किसी काम की न रह जाएं..


हर वक़्त..

सोते जागते,मुझे याद करो..

बस मैं ही हर वक़्त तुम्हारे दिलो दिमाग में रहूँ...

उस वक़्त...जब ये सब हो..

शायद तुम्हे समझ आये..

कि तुम कितनी गलत थे...तुमने क्या किया..

और तुम्हे क्या मिला था..

और तुमने क्या खो दिया...

तब तुम्हें समझ आएगा...मैं कैसा था...


हाँ..सच में..

तुम एक बार महसूस कर सको..

वो सब जो मैं करता हूँ...


पाठ 6...


दुनिया में अनगिनत लोग हैं और हर कोई

अपने अनुभव से बताते है कि प्रेम क्या है...?

जीवन में केवल प्रेम ही है जो दिखाता है कि 

#प्रीति कौन है....

#प्रीति क्या है......

मेरा आकार भी #प्रीति, 

मेरा आधार भी #प्रीति,

मेरा प्यार भी #प्रीति,

 मेरा त्यौहार भी #प्रीति,

मेरा अंत भी #प्रीति, 

मेरा आगाज भी #प्रीति,

मेरी जान भी #प्रीति, 

मेरे सिर का ताज भी #प्रीति,

मेरे लिए मेरी दुनिया है #प्रीति,

छु कर जो गुजरे वो हवा है #प्रीति,

मैंने जो मांगी वो दुआ है #प्रीति,

मेरे चेहरे की कशिश है #प्रीति,

सितारों के बिच चांद की चमक है #प्रीति,

सारे जहां का करार है #प्रीति,

बस और कुछ नहीं है #प्रीति 

मेरी जिंदगी है #प्रीति.........


पाठ 7...


मैं जब भी ये गजले, ये शायरियां,... लिखता हूं,,,,  

जहन में #प्रीति का चांद सा मुखड़ा सजाता हूं..

मैं जब भी ग़ज़लों में अंत्रा लिखता हूं,,

#प्रीति की मुस्कान को कलम बनाता हूं,,,

मैं जब भी श्रिंगार रस लिखता हूं,

#प्रीति की एक एक अदाओं को शब्द रस में घोलता हूं,,

काली घटाओं सी जुल्फों की जब बात आती है,

#प्रीति के सुराहीदार गर्दन को मैं दाऊत बनाता हूं,,

नयन नशीले लिखने के लिए

मैं #प्रीति के काजल से रंग चुराता हूं,,

ये ग़ज़लें, शायरियां, कविताएं, काव्य मुझे यह

सब लिखना नहीं आता है,,

मैं तो बस #प्रीति की तस्वीर कागज़ पर लगा देता हूं.....

जब भी #प्रीति की मुस्कान कोरे पन्नों पर बिखरती है,

अक्षर न अक्षर को अपने आप उमड़ने देता हूं....


भीतर भरे भय वहम शक से खाली हो जाओ, 

ब्रह्मांडीय प्रेम की ऊर्जा आपके अंदर महसूस होने लगेगी क्योंकि प्रेम के तज़ुर्बे पर कभी ना पुछना मुझसे,

मैंने प्रेम में प्रेम पर हजार पन्नों की कोरी किताब लिखीं हैं,

जानते हो प्रेम क्या है अपने वक्त के कीमती लम्हें किसी को देना किसी की सुन लेना। 

किसी की आंख से आंसूओं को चुन लेना। 

किसी के ज़ख्मों पर मीठे बोल के मरहम लगा देना।

बिना किसी रिश्ते के बिना किसी संबंध के 

किसी के दर्द का एहसास होना। 

यहीं तो प्रेम है। 

प्रेम में दो अनजान इंसान एक दूसरे के प्राण बन जाते है 

बिना एक दूसरे के एक पल भी रह नहीं पाते  

परमात्मा के बाद

अगर दुनिया में कोई पवित्र चीज है तो वो है प्रेम....

सच मैं प्रेम का एहसास अनोखा होता है...


पाठ 8...


#प्रीति तुम्हारी सुंदरता को मैंने कभी तुम्हारे शरीर से नहीं देखा,

क्योंकी मुझे पता है एक दिन यह मांस पिंड का शरीर

अग्नि शिखा में लिप्त होगा,,

#प्रीति तुम्हारा होना मैंने तुम्हारे अस्तित्व से समझा है ...

#प्रीति मैंने जाना की तुम अनंत हो.. 

काया क्षीण होगी ..दृष्टि समाप्त होगी.. 

बाल गिरने लगेंगे लेकिन 

मैं और मेरा शाश्वत प्रेम 

#प्रीति तुम्हारे लिए अबाधित रहेगा

अजीवन अस्पर्शित...

#प्रीति तुम्हारी तस्वीर को देखते ही दिल को सुकून, 

#प्रीति तुम्हारी आंखों पर नज़र पड़ते ही दिल को चैन,

#प्रीति तुम्हारे होंठों पर मुस्कान देखकर रुह को मिठास, और

#प्रीति लिखते लिखते तुम्हारी तस्वीर को 

सिने से लगाते ही प्रेम पर एक नशें का 

सुरूर सा छा जाता है, क्योंकि

एक पुरुष अपनी पसंदीदा स्त्री को 

निश्चल और निस्वार्थ भाव से जब प्रेम करता है 

तो उसके ह्रदय में उस स्त्री का स्थान 

एक देवी के समान होता है और 

ह्रदय में उस स्त्री के प्रति सदैव 

सम्मान की भावना होती है और 

वो पुरुष अपने पुरे जीवन काल में 

उसी स्त्री को अपने जीवन का

आपादमस्तक मानता है....


#प्रीति एक ऐसी शख्सियत की मालकिन है....

जिसको मैंने अपने जीवन में 

कुछ ऐसे लिखा है,

लोगों को मेरे जीवन से

#प्रीति को मिटाने के लिए

रबर को नहीं

अपने आप को घिसना पड़ेगा..

क्योंकि मुझे जब चुनाव करना पड़ा 

दुनिया और #प्रीति में

तब भी मैंने सिर्फ #प्रीति को चुना,,

दुनिया की नश्वर घृणा से कर ली दूरी 

जब #प्रीति से मेरे प्रेम को अमरत्व मिला,,

तब भी मैंने मांगा हर जनम में 

कोई रुप कोई जीवन

केवल एक #प्रीति पर मरने के लिए,

लौटूंगा वैसे ही #प्रीति तुम तक

 धुप बारिश बसंत बनकर,,

फिर #प्रीति तुम्हारी बाहों में सिमटने के लिए,,,

एक और बार #प्रीति को चुनूंगा 

 एक और बार आऊंगा मैं

केवल #प्रीति तुम्हें प्रेम करने के लिए....


जब पुकारना हो मुझे

#प्रीति मेरा नाम लेने से पहले शरमा जाती है...

#प्रीति मेरे इश्क का माहताब है

 काली घटाओं में से निकल कर आती है...

#प्रीति अपने नयनों से कह दो यूं तारों के बिच से 

मुस्कुराकर न देखा करे मुझे,

यह दिल पहले से ही #प्रीति तुम्हारी अदाओं से पागल है..

उपर से #प्रीति तुम्हारा नशीली निगाहों से देखने से 

मेरे दिल की धड़कने धड़कना भूल जाती है....

#प्रीति तुम पर लिखी ग़ज़ल, शायरी, कविताएं, 

कहानियां तो महज मेरे दिल का हिस्सा है...

#प्रीति स्पंदन की तरह मेरी हर बात में होती है,

अंधेरे से घिरे मेरे जीवन को 

#प्रीति जुगनू बन मेरे जीवन को रोशन करती है,

किस्सा कितना सुनाऊं मैं मेरी मोहब्बत का,

सितारों की भीड़ में भी मेरी चांद सी #प्रीति

मेरी आगोश में होती है.....






प्रेम और प्रेमी

पाठ 1...


किसी ने मुझसे पूछा

आपको इतनी #शायरी कैसे जमती हैं....

मैने कहा- 

झूम उठता हैं दिल 

एक #प्रीति के खयालों से 

और निकल आते हैं शायरी के लफ्ज़  

बहार के पत्तों की तरह

जब मन में शुरू होता है 

श्रृंगार_ए_हुस्न  

#प्रीति के रुपयौवन का.... क्योंकि

मेरा आकार भी #प्रीति, 

मेरा आधार भी #प्रीति,

मेरा प्यार भी #प्रीति,

 मेरा त्यौहार भी #प्रीति,

मेरा अंत भी #प्रीति, 

मेरा आगाज भी #प्रीति,

मेरी जान भी #प्रीति, 

मेरे सिर का ताज भी #प्रीति,

मेरे लिए मेरी दुनिया है #प्रीति,

छु कर जो गुजरे वो हवा है #प्रीति,

मैंने जो मांगी वो दुआ है #प्रीति,

मेरे चेहरे की कशिश है #प्रीति,

सितारों के बिच चांद की चमक है #प्रीति,

सारे जहां का करार है #प्रीति,

बस और कुछ नहीं

मेरी जिंदगी है #प्रीति,

मेरा प्रेम सम्पूर्ण समर्पण है मेरे ह्रदय का,,

मैंने यहां #प्रीति में ही पूरी दुनियां देखी है....


पाठ 2...


मेरी_प्रीति...


दर्पण के सामने खड़ा होकर, 

जब भी #प्रीति को संवारता हूं,,

उस दर्पण में खुद को देख,

अचरज में पड़ जाता हूं,,,

  

#प्रीति शरमाकर कजरारी नज़रें नीचे झुका लेती हैं,,

पर कनखियों से मुझको ही देखा करती हैं,,,

यूं आँखों ही आँखों में पूछ लेती है इशारों में,,

बताओ कैसी लग रही हूँ इस बिंदिया के सितारों में,,


#प्रीति की टेढ़ी बिंदी सीधी कर

 मै जब अपना प्यार जताता हूँ,,, 

उस पल मै अपने स्पर्श से, 

उसको उससे चुरा ले जाता हूँ,,,


#प्रीति कहती है....

ये पायल चूड़ी झुमके कंगन

 सब देते हैं मुझे तुम्हारी संगत,,

इनकी खनकती आवाजों में 

सिर्फ तुम्हारा नाम पाती हूँ,,

दर्पण के सामने खड़ी होकर,

 जब भी खुद को सँवारती हूँ,,,


#प्रीति कहती है ये भी सच है.....

पहरों दर्पण के सामने बिता कर ,

सिर्फ तुमको रिझाना चाहती हूँ,,,

तुम मेरे लिए सबसे पहले हो 

,तुमको बताना चाहती हूँ,, 


#प्रीति एक अदा से जुल्फें झटककर कहती है...

कहने को ये श्रृंगार है मेरा, 

पर सही मानों में प्यार ओढ़ रखा है तेरा,,,

जिसे मैं हर बला की नज़र से बचा कर,

अपने पल्लू से बांधे रखना चाहती हूँ,,,

अपनी प्रीत हर रोज़ यूं ही सजा कर,

 तुम्हें सिर्फ अपना ख्याल देना चाहती हूँ,,


दर्पण के सामने खड़ा होकर, 

जब भी #प्रीति को संवारता हूं 

उस दर्पण में खुद को देख,

मैं अचरज में पड़ जाता हूं....

पाठ 3...

क्या लिखता हूं,,,,? क्यो लिखता हूं,,,,,

किसके लिए लिखता हूं,,,,?

छोड़िए इन सब बातों को,,

 एक लम्हा देखता हूं #प्रीति को आंखों में, 

बस उसी को अलग अलग तरीके से लिखता हूं.......

शब्द सारे फ़ीके पड जाते हैं तारीफ करते हुए,

और क्या क्या तारिफ करु मैं #प्रीति की,,,

मुझे खुद #प्रीति को अपने मन माफिक गढ़ने में

पुनर्जन्म लेकर आना पड़ा है.....

मेरे लिए #प्रीति जैसे दुःख में सुख की छांव है...

#प्रीति के आसपास होने भर का एहसास

दुःख के घने अंधेरे को चीर कर 

जैसे दुर कही टिमटिमाते दिए सा खास है...

बस प्रीति वहीं सुकून है...

मेरे लिए #प्रीति क्या है ..... 

हथेली पर रखा 

एक कपूर का टुकड़ा

टुकड़ा गल जाता है ..... 

खुशबू रह जाती है

पाठ 4

मेरे लिए प्रीति क्या है ....

बदन पर गिरा

शबनम का एक क़तरा

क़तरा बह जाता है ...... 

एहसास रह जाता है


मेरे लिए #प्रीति क्या है ..... 

माथे पर दिया गया

एक मीठा बोसा

बोसा छूट जाता है ...... 

तिलस्म रह जाता है 


मेरे लिए #प्रीति क्या है ..... 

आँखों का जादू

जादू चल जाता है ...... 

बुत थम जाता है


बस यूँ ही ..... 

#प्रीति तुम कलम पर छाई रहती हो,

कागज पर उतरते तुम्हारी अदाओं से

दिल बहलता रहता है,,


#प्रीति तुम्हारे ख्याल आता हैं 

गुदगुदा कर चला जाता हैं...

रह जाती हैं बस तुम्हारी मिठी मिठी यादें...

गीत लिखूं, ग़ज़ल लिखूं या लिखूं अब कोई रुबाइयां,,

#प्रीति नजदीकियां लिखूं, दुरियां लिखूं या लिखूं तुमसे जुदाईयां...


तुम्हारी बातें लिखूं, तुम्हारी मुस्कान लिखूं या लिखूं तुम्हारी रुसवाइयां,,

#प्रीति तुम्हें तकदीर लिखूं, दुआ लिखूं, या लिखूं तुम्हारी अच्छाईयां.....


वफा लिखूं, सदा लिखूं, या लिखूं गुंजती हूई शहनाईयां,,

#प्रीति आवारगी लिखूं, तुम्हारी सादगी लिखूं, या लिखूं ये तन्हाईयां.....


रुठना लिखूं, मनाना लिखूं या लिखूं अपनी लड़ाईयां,,

#प्रीति अदा लिखूं, दिल फिदा लिखूं या लिखूं तुम्हारी अंगड़ाइयां....


पाठ 4...


मैं प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति ~


मैं प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति___

अपने आप को बदलने के लिए ~


मै प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति____

अपने आप को समझने के लिए ~


मैं प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति____

 क्यूंकि मैं अपने आप खुद की मदद नहीं कर सकता ~


मैं प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति______

क्यूंकि मैं असहाय लोगों की सहायता करता रहूँ ~


मै प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति_____

क्यूंकि कोई लालच मेरे मन को ललचाए नहीं ~


मै प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति______

क्यूंकि कोई झूठ मेरे कदम डगमगाए ना ~


मैं प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति_______

क्यूंकि तुम्हारी आवश्यकता प्रति क्षण मेरे अंदर से बहती है - जागते सोते ~


मै प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति_______

परमात्मा को धन्यवाद देने की उन्होंने अपनी परछाई मेरे जीवन में दी~


मैं प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूं #प्रीति______

 क्यूंकि तुम्हारी छवी ईश्वर से मिलती है और 

प्रार्थना मेरी पुरी हो जाती है ~...~...~...


पाठ 5...

#प्रीति_मैं_तुम्हें_ढूँढ_लेता_हूँ_**


" आँखें मीचकर सोने से पहले, 

जज्बात पिघलकर रोने से पहले, 

जब अल्फाज सीने में दफ़न हो जाते हैं, 

तब यादों में पलकें भिगोने से पहले, 

तुम्हारे अक्स से बातें कर लेता हूँ, 

तुम्हारी तस्वीर को मनाकर, 

उन्ही से रुठ लेता हूँ, 

गुजरते हर लम्हें में.. 

............. #प्रीति_मैं_तुम्हें_ढूँढ_लेता_हूँ.............

*

सर्दियों के इस मौसम में जब सिकुडने लगता हूँ, 

रात ठण्ड के मारे जब छीकने लगता हूँ, 

तब लगता है दवा लेकर तुम चले आ रहे हो, 

कपकपाते हाथों की नर्म उंगलियों से 

बालों को सहला रहे हो, 

तुम्हारे होने के एहसास भर से ही, 

हर दर्द में सकुन पाता हूँ.. 

यादों की चादर ओढ़े हर रात 

.................. #प्रीति_मैं_तुम्हें_ढूँढ_लेता_हूँ..............

*

भीड में अकेलेपन का एहसास तुम्हारे बिना होता है, 

तुमसे थी सारी मुस्कुराहटे,

 तुम ही मेरी हर खुशी का जहाँ थे, 

मेरे आंसू अब सूख चुके हैं जब यह मौन हूए, 

अब तो बस तुम्हारी तस्वीर से बातें कर लेता हूँ, 

जिंदगी में घट रही हर अच्छी बुरी बात 

तुम्हारा माथा चुमकर तुम्हीसे शेअर कर लेता हूँ, 

................#प्रीति_मैं_तुम्हें_ढूंढ_लेता_हूं............

*

दिल कागज का बन जाता है जिसपर दर्द लिख देता हूँ.... 

उसी दर्द की दबी आवाज में.... 

लिखे हुए हर अल्फाज में.... 

जिंदगी में लगती ठोकरों में.... 

दबी हुई आह में.... 

अंदर ही अंदर घुटते हुए आँसू में.... 

कभी ना खत्म होने वाले तुम्हारे इंतजार में... 

***********#प्रीति_मैं_तुम्हें_ढूँढ_लेता_हूँ***********


पाठ 6...

सुनो.....#प्रीति_____


#प्रीति मैं चाहता हूं तुम्हें इतना 

कि मैं तुम्हारे रेशे रेशे को 

अपने अल्फाजों में ढालता हूं,


#प्रीति उतार कर छवि तुम्हारी 

मैं तो अपनी रचनाओं में ,

तुम्हें हर पल ही

अपना मैं बनाता हूं,


#प्रीति भरता हूं मैं रंग 

अपने ही जज्बातों के

और खूबसूरत एहसासों से

तुम्हें रोज ही मैं संवारता हूं,


#प्रीति देकर रंग अपने प्यार का मै 

तुम्हारा चेहरे की मुस्कान में 

अपनी मुस्कान मिलाकर

और भी निखारता हूं,


#प्रीति छू लेता हूं लबों को तुम्हारे

 मैं तो अपनी ही कलम से,

और फिर बिना छुए भी तुम्हें 

अक्सर छू ही जाता हूं,


#प्रीति तुम्हारी खूबसूरत छवि को 

कुछ ऐसे ही सामने बिठाकर मैं 

तुमसे अपने हाल_हवाल बताता हूं,

तुम्हारे हाल हवाल पुछकर

तुम्हारा ख्याल भी रखता हूं ,


#प्रीति नहीं कह सकता हूं तुमसे 

मैं कभी भी कि आखिर मैं 

तुम्हें कितना और क्यों चाहता हूं****

पाठ 7...

#प्रीति तुम्हारे साथ गुजारी 

एक चाँद रात……

तुमने कहा था तुलना करके बताओं 

इस चाँद रात की,

कि कितनी भारी थी वो चाँद रात

दुनिया की हर शै से

जिस चाँद रात हम साथ थे 

खुले आसमाँ में तारों की छाँव में,


मैंने तुम्हारी शर्त मानी और 

#प्रीति मैं ले आया तराजू एक

और रख दिया उसके एक पलड़े में

उस चाँद रात की…..सुनहली याद को , 

उसके एहसास को

फिर रखा मैंने दूसरे पलड़े में

इस जहां के सारे फूलों को

चाँद रात भारी रही,


#प्रीति मैंने तमाम रंग लिए 

कायनात के, धनक से चुरा

और रख दिये फूलों के संग

फिर से चाँद रात…..

वहीं थी नीचे झुकी..भारी,


#प्रीति मैं ले आया 

सातों समुंदरों का पानी सारा

रख दिया चाँद रात के पलड़े के खिलाफ

मगर चाँद रात तो चाँद रात रही...कहाँ झुकी

सोचा बहुत कि करूँ क्या,

 किसके साथ करूँ तुलना,


#प्रीति फिर मैंने रख दिये, 

गीतों, गजलों, कविताओं के

सब रस, भाव, और छंद…..

की चाँद रात झुके

मगर फिर भी ये हो न सका

बहुत भारी थी वो चाँद रात,


#प्रीति फिर आखिर मैंने बढ़ाया हाथ 

और तोड़ लिया सभी सितारों को

आसमाँ के आंचल से

चाँद रात तो चाँद रात ठहरी

न पलड़ा झुका ना मैं रुका

पर अब क्या था कि तोल सकूँ

क्या बचा था अब इस कायनात में

कि वो उस चाँद रात पर भारी पड़े,,


#प्रीति अचानक याद आया मुझे

कि मेरे बटुए में पड़ा था 

#प्रीति एक बाल तुम्हारा 

जो जाने कैसे आ गया था

लिपटकर मेरे कुर्ते की बाजू पर

और रख लिया था मैंने

संभाल कर उसे बटुए में

कोई ताबीज समझकर


#प्रीति मैंने दुसरे पलड़े से

वो सब चीजें हटा दी जो मैंने

चांद रात के खिलाफ रखी थी और

रख दिया वो बाल तराजू में

चाँद रात के खिलाफ,

फिर तो ग़जब हो गया

ब्रम्हांड में बिजलियां चमकने लगी,

बादल गरजने लगे, 

चारों ओर गर्जना होने लगी,

और झुक गया पलड़ा 

चाँद रात के खिलाफ था जो

ओह देखो #प्रीति तुम्हारा एक बाल भी

भारी था दुनिया की तमाम शै से,


#प्रीति अब समझो तुम क्या हो,,

ये दुनिया ये कायनात...

....और इसकी तमाम शै

कुछ नहीं हैं, #प्रीति तुम्हारे आगे,

बस तुम हो ...तुम हो...तुम हो

#प्रीति तुम्हीं हो…..

मेरे लिए तमाम

क़ायनात से भारी,  

दुनिया के कितने अब्ज

लोगों से न्यारी,

#प्रीति मेरा एकलौता खजाना हो 

तुम हो मुझे जान से प्यारी.....


पाठ 8...


मैं इतना साधा सा फ़कीर हूं कि #प्रीति तुम्हारी फोटो को भी देखता हूं तो मुलाक़ात समझता हूं,, मैंने जब अपने वास्तविक जीवन का ढंग बदला तब अपने अंतर्मन को #प्रीति तुम्हारी छवि से सुंदर बनाया और सभी को यह महसूस होने दिया कि #प्रीति तुम्हारा साथ होना मेरे लिए एक ईश्वरीय उपहार है क्योंकि #प्रीति मेरे लिए तुम्हारे होने का अर्थ है दिव्य और दुनिया का अर्थ है नया लेकिन अल्प। जिसमें अनगिनत लोग होते हैं, मिलते हैं, चले जाते हैं,, इसलिए मेरे लिए #प्रीति तुम कभी दुनिया नहीं हो सकती और जो दुनिया है वह कभी मेरी #प्रीति नहीं हो सकती। #प्रीति हमेशा #प्रीति रहेंगी - प्रीति मेरे लिए अपनी शाश्वत नवीनता और परम आनंद के कारण #प्रीति है। #प्रीति मेरे अस्तित्व का प्रगट रूप है....

"जो दिखाई पड़ती है आंखों से,

     जो कह पाती है बस आँखों से,

   जो हाथों से स्पर्श में आती है, 

   जो इंद्रियां से पहचान पाती हैं,

   जो इंद्रियों की प्यास होती है,

   ज़र्रे ज़र्रे में जिधर देखूं उधर

जो भी दृश्यमान है वह #प्रीति है,

 #प्रीति तुम्हारी इतनी बाते है, #प्रीति तुम संग के आनंद की इतनी चर्चा है, इतनी कविताएं, कितने ग्रंथ हैं, सब दिन रात #प्रीति तुम पर लिख रहा हूं लेकिन लगता ऐसा कि मैं #प्रीति तुम्हें थोड़ा भी लिख नहीं पाता हूं; सब शब्दो की बाजीगरी है, सब बातचीत है। #प्रीति फिर भी जब तुम्हारी एक एक अदाकारी याद आती है तब मैं बस शब्दों में उन्हें ढालते चला जाता हूं । और शायद इतनी बात मैं इसीलिए करता हूं क्योंकि "#प्रीति तुम तो मेरी भावनाओं और अहसासों की अनकही लहरें है जिन्हें मैं कितना भी कहूं, कितना भी लिखूं फिर भी शब्दो मे कहां बांध पाता हूं..... #प्रीति तो अनंत है.....

"मैं" अपने कमरे में बैठा

#प्रीति की तस्वीरें निहार रहा था...

तब"लोग" बंद दरवाजे के बाहर से

पूछ रहे थे....

क्या देख रहे हो...?


"मैं" हँसा, बोला....

कभी देखता हूँ,

कभी चूक जाता हूँ....

पर #प्रीति दोनों में....

वैसी ही दिखती रहती है...!!


"लोग" समझे नहीं...

"मैं" उठा और चला गया...

और छोड़ आया

खुला दरवाजा 

#प्रीति की तस्वीरें...

और देखने वाले भी....!!


जो शौहरत के लिए गिरना पड़े खुद अपनी नजरों से

तो फिर मेरे ईश्वर हरगिज मुझे मशहूर ना करना,,

मैं बुरा हूं, गलत हूं, धोखेबाज हूं, जो मुझे जैसे देखे वैसा हूं,

मैं सब साथ थे तब भी एक शख्स से प्रेम करता था और अब अकेला हूं तब भी उसी शख्स को पहले से दूगना प्रेम ही करता हूं और इससे ज्यादा करने लायक साहस का कोई काम नहीं है क्योंकि 

अकेले चलना प्रकृति का सच्चा रुप है,

न नाटक, न बेरहमी, बस समझदारी,,

जब अपना कहने वाले ही ना समझे तो 

ना शोर, ना कलह, ना कोई वाद-विवाद

बस चुपचाप वहां से चले जाना ही जीवन

बचाने की समझदारी है...दोस्त 

किसीने मुझसे कहा...

तुम पागलों की तरह गुमसुम बैठे रहते हो,

ना बाहर आते जाते हो, जीवन को जैसे

श्मशान बना बैठे हों,

"कभी तो खोदकर देखो तुम अपने दिल की कब्रे...... 

मिलेगी हजारे ख्वाहीशें जिनको तुमने अपने अंदर मार चुके हों"..........

मैंने कहा*******

#प्रीति की खुशी के लिए 

                 ख्वाहिशों को मारना मेरा जूनून था.....

अब #प्रीति के अलावा कोई ख्वाहिश ही ना रही

                                      इसी में मेरा सकुन है.….......

पाठ 9...