सच कहूँ तो बहुत पहले ही ये एहसास हो गया था कि जिन चीज़ों को हम अपनी पसंद, अपनी सोच, अपना निर्णय मानते रहे, उनमें से ज़्यादातर हमारे ऊपर धीरे-धीरे, चुपचाप और योजनाबद्ध तरीक़े से लाद दी गई थीं। फर्क़ बस इतना था कि हर बोझ का नाम अलग था, पैकिंग अलग थी और उसे स्वीकार करने की भाषा इतनी मुलायम थी कि प्रतिरोध की गुंजाइश ही नहीं बची।
बचपन से ही हमें बताया गया कि ये करना ज़रूरी है, वो करना सही है, और इससे अलग सोचना जोखिम भरा है। किसी ने ये नहीं पूछा कि हम क्या चाहते हैं, क्या समझते हैं, या क्या महसूस करते हैं। हमारे कंधों पर अपेक्षाएँ रख दी गईं परिवार की, समाज की, व्यवस्था की और हमें सिखाया गया कि इन अपेक्षाओं को ढोना ही जिम्मेदारी कहलाता है। धीरे-धीरे जिम्मेदारी और मजबूरी के बीच का फर्क मिटा दिया गया।
शिक्षा को आज़ादी का रास्ता कहा गया, लेकिन वह भी एक तय ढाँचे में ढाल दी गई। क्या पढ़ना है, कैसे पढ़ना है, और कब सफल कहलाना है, सब पहले से तय था। सवाल पूछना अव्यवहारिक माना गया और सहमति जताना समझदारी। हममें से ज़्यादातर ने वही सीखा जो बताया गया, वही माना जो दिखाया गया और वही सपना देखा जो सुरक्षित कहा गया।
काम, रोज़गार, करियर इन सबको सम्मान और पहचान से जोड़ दिया गया। ऐसा नहीं कि मेहनत गलत है, लेकिन मेहनत के नाम पर जो चुप्पी हमसे माँगी गई, जो समझौते हमसे कराए गए, वे कभी हमारे हिस्से की बातचीत का विषय नहीं बने। धीरे-धीरे हमने ये मान लिया कि थकान स्वाभाविक है, असंतोष निजी कमजोरी है और सवाल उठाना कृतघ्नता।
रिश्तों में भी यही हुआ। प्रेम, त्याग, समर्पण इन सब शब्दों को इतना पवित्र बना दिया गया कि उनके भीतर छुपे दबाव दिखाई ही न दें। कई बार निभाना मजबूरी होता है, लेकिन उसे ‘फ़र्ज़’ कहकर सम्मानित कर दिया जाता है। भावनाओं को नियंत्रित करने की सीख दी गई, लेकिन भावनात्मक शोषण पर चुप्पी साधी गई।
धर्म, संस्कृति, नैतिकता इनके नाम पर भी बहुत कुछ थोप दिया गया। क्या सही है, क्या गलत है, इसका निर्णय हमारे विवेक से पहले किसी और ने कर लिया। हमें बताया गया कि मान लेना ही श्रद्धा है और न मानना अपराध। धीरे-धीरे आस्था और डर का फर्क धुंधला कर दिया गया।
राजनीति और व्यवस्था ने तो इस कला को और निखारा। फैसले हमारे नाम पर लिए गए, लेकिन हमारी सहमति सिर्फ औपचारिक रही। नियम, कानून, नीतियाँ सब ‘भलाई’ के नाम पर लागू होती रहीं और अगर कहीं चोट लगी तो कहा गया कि यह आवश्यक बलिदान है। किसके लिए आवश्यक ये सवाल हमेशा अधूरा रहा।
विडंबना देखिए कि इन सब बोझों को इस तरह बाँधा गया कि हमें ही लगे अगर हम गिर रहे हैं, तो गलती हमारी है। अगर हम थक गए हैं, तो हम कमजोर हैं। व्यवस्था कभी कटघरे में खड़ी नहीं हुई, इंसान हमेशा खड़ा रहा।
समय के साथ ये समझ भी आई कि सबसे भारी बोझ चुप्पी का है। बोलना जोखिम बन गया, और सहना आदत। हमने खुद को समझाया कि सबके साथ ऐसा ही होता है, इसलिए ये सामान्य है। इसी सामान्य ने असामान्य अन्याय को रोज़मर्रा का हिस्सा बना दिया।
कहीं न कहीं हममें से बहुतों ने बहुत पहले समझ लिया था कि चीज़ें वैसी नहीं हैं जैसी दिखाई जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग इस सच के साथ जीते हैं, और कुछ लोग उसे नज़रअंदाज़ करके खुद को सुरक्षित समझते हैं।
शायद सबसे ईमानदार उम्मीद यही है कि कभी न कभी हम इतना साहस जुटा पाएँ कि लादे गए बोझों और चुनी गई जिम्मेदारियों के बीच फर्क करना सीख सकें। कम से कम अपने भीतर तो सच को नाम दे सकें। क्योंकि यथार्थ में नाम बदल देने से बोझ हल्का तो नहीं होता, बस उसे उठाने वाला इंसान अकेला पड़ जाता है।
जीवन को यदि केवल प्रकाश की आकांक्षा में जिया जाए, तो वह एक भ्रम बनकर रह जाता है। प्रकाश प्रतीक है ज्ञान, सफलता और सुख का, किंतु यह ज्ञान भी तभी अर्थवान होता है जब उसके समानांतर अज्ञान का बोध मौजूद हो। अंधकार के बिना प्रकाश की अनुभूति संभव नहीं, क्योंकि विरोध ही चेतना को जन्म देता है।
जब जीवन में निरंतर प्रकाश रहता है सफलता, प्रशंसा और सुविधा का एकछत्र राज्य तो मनुष्य का विवेक शिथिल पड़ने लगता है। वह स्वयं को सत्य का अंतिम केंद्र मान बैठता है। यही वह अवस्था है जहाँ बुद्धि फिसलती है; निर्णय तर्क से नहीं, अहंकार से जन्म लेने लगते हैं। ऐसे निर्णय व्यक्ति को उन्नति की जगह पतन की ओर ले जाते हैं, यद्यपि वह स्वयं इस पतन से अनभिज्ञ रहता है।
अंधकार इस भ्रम को तोड़ता है। दुःख, असफलता और संकट मनुष्य को उसकी सीमाओं से परिचित कराते हैं। अंधकार कोई शत्रु नहीं, बल्कि चेतना का शिक्षक है। यह हमें मौन सिखाता है, प्रतीक्षा सिखाता है और यह बोध कराता है कि सत्य सरल नहीं होता। इसी अंधकार में प्रश्न जन्म लेते हैं, और प्रश्न ही दर्शन की पहली सीढ़ी हैं।
जहाँ प्रकाश उत्तर देता है, वहीं अंधकार खोज की शुरुआत करता है। जीवन की गहराई, करुणा और विनम्रता अंधकार की ही देन हैं। यदि जीवन केवल उजाले में बीते, तो मनुष्य यांत्रिक सुख का उपभोक्ता बनकर रह जाएगा न संवेदनशील, न जागरूक।
अतः जीवन का सौंदर्य प्रकाश में नहीं, बल्कि प्रकाश और अंधकार के संतुलित सह-अस्तित्व में है। अंधकार हमें जड़ से जोड़ता है और प्रकाश लक्ष्य की ओर ले जाता है। दोनों मिलकर ही मनुष्य को केवल जीवित नहीं, बल्कि जाग्रत बनाते हैं।
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