पाठ 1...
किसी ने मुझसे पूछा
आपको इतनी #शायरी कैसे जमती हैं....
मैने कहा-
झूम उठता हैं दिल
एक #प्रीति के खयालों से
और निकल आते हैं शायरी के लफ्ज़
बहार के पत्तों की तरह
जब मन में शुरू होता है
श्रृंगार_ए_हुस्न
#प्रीति के रुपयौवन का.... क्योंकि
मेरा आकार भी #प्रीति,
मेरा आधार भी #प्रीति,
मेरा प्यार भी #प्रीति,
मेरा त्यौहार भी #प्रीति,
मेरा अंत भी #प्रीति,
मेरा आगाज भी #प्रीति,
मेरी जान भी #प्रीति,
मेरे सिर का ताज भी #प्रीति,
मेरे लिए मेरी दुनिया है #प्रीति,
छु कर जो गुजरे वो हवा है #प्रीति,
मैंने जो मांगी वो दुआ है #प्रीति,
मेरे चेहरे की कशिश है #प्रीति,
सितारों के बिच चांद की चमक है #प्रीति,
सारे जहां का करार है #प्रीति,
बस और कुछ नहीं
मेरी जिंदगी है #प्रीति,
मेरा प्रेम सम्पूर्ण समर्पण है मेरे ह्रदय का,,
मैंने यहां #प्रीति में ही पूरी दुनियां देखी है....
पाठ 2...
मेरी_प्रीति...
दर्पण के सामने खड़ा होकर,
जब भी #प्रीति को संवारता हूं,,
उस दर्पण में खुद को देख,
अचरज में पड़ जाता हूं,,,
#प्रीति शरमाकर कजरारी नज़रें नीचे झुका लेती हैं,,
पर कनखियों से मुझको ही देखा करती हैं,,,
यूं आँखों ही आँखों में पूछ लेती है इशारों में,,
बताओ कैसी लग रही हूँ इस बिंदिया के सितारों में,,
#प्रीति की टेढ़ी बिंदी सीधी कर
मै जब अपना प्यार जताता हूँ,,,
उस पल मै अपने स्पर्श से,
उसको उससे चुरा ले जाता हूँ,,,
#प्रीति कहती है....
ये पायल चूड़ी झुमके कंगन
सब देते हैं मुझे तुम्हारी संगत,,
इनकी खनकती आवाजों में
सिर्फ तुम्हारा नाम पाती हूँ,,
दर्पण के सामने खड़ी होकर,
जब भी खुद को सँवारती हूँ,,,
#प्रीति कहती है ये भी सच है.....
पहरों दर्पण के सामने बिता कर ,
सिर्फ तुमको रिझाना चाहती हूँ,,,
तुम मेरे लिए सबसे पहले हो
,तुमको बताना चाहती हूँ,,
#प्रीति एक अदा से जुल्फें झटककर कहती है...
कहने को ये श्रृंगार है मेरा,
पर सही मानों में प्यार ओढ़ रखा है तेरा,,,
जिसे मैं हर बला की नज़र से बचा कर,
अपने पल्लू से बांधे रखना चाहती हूँ,,,
अपनी प्रीत हर रोज़ यूं ही सजा कर,
तुम्हें सिर्फ अपना ख्याल देना चाहती हूँ,,
दर्पण के सामने खड़ा होकर,
जब भी #प्रीति को संवारता हूं
उस दर्पण में खुद को देख,
मैं अचरज में पड़ जाता हूं....
पाठ 3...
क्या लिखता हूं,,,,? क्यो लिखता हूं,,,,,
किसके लिए लिखता हूं,,,,?
छोड़िए इन सब बातों को,,
एक लम्हा देखता हूं #प्रीति को आंखों में,
बस उसी को अलग अलग तरीके से लिखता हूं.......
शब्द सारे फ़ीके पड जाते हैं तारीफ करते हुए,
और क्या क्या तारिफ करु मैं #प्रीति की,,,
मुझे खुद #प्रीति को अपने मन माफिक गढ़ने में
पुनर्जन्म लेकर आना पड़ा है.....
मेरे लिए #प्रीति जैसे दुःख में सुख की छांव है...
#प्रीति के आसपास होने भर का एहसास
दुःख के घने अंधेरे को चीर कर
जैसे दुर कही टिमटिमाते दिए सा खास है...
बस प्रीति वहीं सुकून है...
मेरे लिए #प्रीति क्या है .....
हथेली पर रखा
एक कपूर का टुकड़ा
टुकड़ा गल जाता है .....
खुशबू रह जाती है
पाठ 4
मेरे लिए प्रीति क्या है ....
बदन पर गिरा
शबनम का एक क़तरा
क़तरा बह जाता है ......
एहसास रह जाता है
मेरे लिए #प्रीति क्या है .....
माथे पर दिया गया
एक मीठा बोसा
बोसा छूट जाता है ......
तिलस्म रह जाता है
मेरे लिए #प्रीति क्या है .....
आँखों का जादू
जादू चल जाता है ......
बुत थम जाता है
बस यूँ ही .....
#प्रीति तुम कलम पर छाई रहती हो,
कागज पर उतरते तुम्हारी अदाओं से
दिल बहलता रहता है,,
#प्रीति तुम्हारे ख्याल आता हैं
गुदगुदा कर चला जाता हैं...
रह जाती हैं बस तुम्हारी मिठी मिठी यादें...
गीत लिखूं, ग़ज़ल लिखूं या लिखूं अब कोई रुबाइयां,,
#प्रीति नजदीकियां लिखूं, दुरियां लिखूं या लिखूं तुमसे जुदाईयां...
तुम्हारी बातें लिखूं, तुम्हारी मुस्कान लिखूं या लिखूं तुम्हारी रुसवाइयां,,
#प्रीति तुम्हें तकदीर लिखूं, दुआ लिखूं, या लिखूं तुम्हारी अच्छाईयां.....
वफा लिखूं, सदा लिखूं, या लिखूं गुंजती हूई शहनाईयां,,
#प्रीति आवारगी लिखूं, तुम्हारी सादगी लिखूं, या लिखूं ये तन्हाईयां.....
रुठना लिखूं, मनाना लिखूं या लिखूं अपनी लड़ाईयां,,
#प्रीति अदा लिखूं, दिल फिदा लिखूं या लिखूं तुम्हारी अंगड़ाइयां....
पाठ 4...
मैं प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति ~
मैं प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति___
अपने आप को बदलने के लिए ~
मै प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति____
अपने आप को समझने के लिए ~
मैं प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति____
क्यूंकि मैं अपने आप खुद की मदद नहीं कर सकता ~
मैं प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति______
क्यूंकि मैं असहाय लोगों की सहायता करता रहूँ ~
मै प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति_____
क्यूंकि कोई लालच मेरे मन को ललचाए नहीं ~
मै प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति______
क्यूंकि कोई झूठ मेरे कदम डगमगाए ना ~
मैं प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति_______
क्यूंकि तुम्हारी आवश्यकता प्रति क्षण मेरे अंदर से बहती है - जागते सोते ~
मै प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूँ #प्रीति_______
परमात्मा को धन्यवाद देने की उन्होंने अपनी परछाई मेरे जीवन में दी~
मैं प्रार्थना में तुम्हें याद करता हूं #प्रीति______
क्यूंकि तुम्हारी छवी ईश्वर से मिलती है और
प्रार्थना मेरी पुरी हो जाती है ~...~...~...
पाठ 5...
#प्रीति_मैं_तुम्हें_ढूँढ_लेता_हूँ_**
" आँखें मीचकर सोने से पहले,
जज्बात पिघलकर रोने से पहले,
जब अल्फाज सीने में दफ़न हो जाते हैं,
तब यादों में पलकें भिगोने से पहले,
तुम्हारे अक्स से बातें कर लेता हूँ,
तुम्हारी तस्वीर को मनाकर,
उन्ही से रुठ लेता हूँ,
गुजरते हर लम्हें में..
............. #प्रीति_मैं_तुम्हें_ढूँढ_लेता_हूँ.............
*
सर्दियों के इस मौसम में जब सिकुडने लगता हूँ,
रात ठण्ड के मारे जब छीकने लगता हूँ,
तब लगता है दवा लेकर तुम चले आ रहे हो,
कपकपाते हाथों की नर्म उंगलियों से
बालों को सहला रहे हो,
तुम्हारे होने के एहसास भर से ही,
हर दर्द में सकुन पाता हूँ..
यादों की चादर ओढ़े हर रात
.................. #प्रीति_मैं_तुम्हें_ढूँढ_लेता_हूँ..............
*
भीड में अकेलेपन का एहसास तुम्हारे बिना होता है,
तुमसे थी सारी मुस्कुराहटे,
तुम ही मेरी हर खुशी का जहाँ थे,
मेरे आंसू अब सूख चुके हैं जब यह मौन हूए,
अब तो बस तुम्हारी तस्वीर से बातें कर लेता हूँ,
जिंदगी में घट रही हर अच्छी बुरी बात
तुम्हारा माथा चुमकर तुम्हीसे शेअर कर लेता हूँ,
................#प्रीति_मैं_तुम्हें_ढूंढ_लेता_हूं............
*
दिल कागज का बन जाता है जिसपर दर्द लिख देता हूँ....
उसी दर्द की दबी आवाज में....
लिखे हुए हर अल्फाज में....
जिंदगी में लगती ठोकरों में....
दबी हुई आह में....
अंदर ही अंदर घुटते हुए आँसू में....
कभी ना खत्म होने वाले तुम्हारे इंतजार में...
***********#प्रीति_मैं_तुम्हें_ढूँढ_लेता_हूँ***********
पाठ 6...
सुनो.....#प्रीति_____
#प्रीति मैं चाहता हूं तुम्हें इतना
कि मैं तुम्हारे रेशे रेशे को
अपने अल्फाजों में ढालता हूं,
#प्रीति उतार कर छवि तुम्हारी
मैं तो अपनी रचनाओं में ,
तुम्हें हर पल ही
अपना मैं बनाता हूं,
#प्रीति भरता हूं मैं रंग
अपने ही जज्बातों के
और खूबसूरत एहसासों से
तुम्हें रोज ही मैं संवारता हूं,
#प्रीति देकर रंग अपने प्यार का मै
तुम्हारा चेहरे की मुस्कान में
अपनी मुस्कान मिलाकर
और भी निखारता हूं,
#प्रीति छू लेता हूं लबों को तुम्हारे
मैं तो अपनी ही कलम से,
और फिर बिना छुए भी तुम्हें
अक्सर छू ही जाता हूं,
#प्रीति तुम्हारी खूबसूरत छवि को
कुछ ऐसे ही सामने बिठाकर मैं
तुमसे अपने हाल_हवाल बताता हूं,
तुम्हारे हाल हवाल पुछकर
तुम्हारा ख्याल भी रखता हूं ,
#प्रीति नहीं कह सकता हूं तुमसे
मैं कभी भी कि आखिर मैं
तुम्हें कितना और क्यों चाहता हूं****
पाठ 7...
#प्रीति तुम्हारे साथ गुजारी
एक चाँद रात……
तुमने कहा था तुलना करके बताओं
इस चाँद रात की,
कि कितनी भारी थी वो चाँद रात
दुनिया की हर शै से
जिस चाँद रात हम साथ थे
खुले आसमाँ में तारों की छाँव में,
मैंने तुम्हारी शर्त मानी और
#प्रीति मैं ले आया तराजू एक
और रख दिया उसके एक पलड़े में
उस चाँद रात की…..सुनहली याद को ,
उसके एहसास को
फिर रखा मैंने दूसरे पलड़े में
इस जहां के सारे फूलों को
चाँद रात भारी रही,
#प्रीति मैंने तमाम रंग लिए
कायनात के, धनक से चुरा
और रख दिये फूलों के संग
फिर से चाँद रात…..
वहीं थी नीचे झुकी..भारी,
#प्रीति मैं ले आया
सातों समुंदरों का पानी सारा
रख दिया चाँद रात के पलड़े के खिलाफ
मगर चाँद रात तो चाँद रात रही...कहाँ झुकी
सोचा बहुत कि करूँ क्या,
किसके साथ करूँ तुलना,
#प्रीति फिर मैंने रख दिये,
गीतों, गजलों, कविताओं के
सब रस, भाव, और छंद…..
की चाँद रात झुके
मगर फिर भी ये हो न सका
बहुत भारी थी वो चाँद रात,
#प्रीति फिर आखिर मैंने बढ़ाया हाथ
और तोड़ लिया सभी सितारों को
आसमाँ के आंचल से
चाँद रात तो चाँद रात ठहरी
न पलड़ा झुका ना मैं रुका
पर अब क्या था कि तोल सकूँ
क्या बचा था अब इस कायनात में
कि वो उस चाँद रात पर भारी पड़े,,
#प्रीति अचानक याद आया मुझे
कि मेरे बटुए में पड़ा था
#प्रीति एक बाल तुम्हारा
जो जाने कैसे आ गया था
लिपटकर मेरे कुर्ते की बाजू पर
और रख लिया था मैंने
संभाल कर उसे बटुए में
कोई ताबीज समझकर
#प्रीति मैंने दुसरे पलड़े से
वो सब चीजें हटा दी जो मैंने
चांद रात के खिलाफ रखी थी और
रख दिया वो बाल तराजू में
चाँद रात के खिलाफ,
फिर तो ग़जब हो गया
ब्रम्हांड में बिजलियां चमकने लगी,
बादल गरजने लगे,
चारों ओर गर्जना होने लगी,
और झुक गया पलड़ा
चाँद रात के खिलाफ था जो
ओह देखो #प्रीति तुम्हारा एक बाल भी
भारी था दुनिया की तमाम शै से,
#प्रीति अब समझो तुम क्या हो,,
ये दुनिया ये कायनात...
....और इसकी तमाम शै
कुछ नहीं हैं, #प्रीति तुम्हारे आगे,
बस तुम हो ...तुम हो...तुम हो
#प्रीति तुम्हीं हो…..
मेरे लिए तमाम
क़ायनात से भारी,
दुनिया के कितने अब्ज
लोगों से न्यारी,
#प्रीति मेरा एकलौता खजाना हो
तुम हो मुझे जान से प्यारी.....
पाठ 8...
मैं इतना साधा सा फ़कीर हूं कि #प्रीति तुम्हारी फोटो को भी देखता हूं तो मुलाक़ात समझता हूं,, मैंने जब अपने वास्तविक जीवन का ढंग बदला तब अपने अंतर्मन को #प्रीति तुम्हारी छवि से सुंदर बनाया और सभी को यह महसूस होने दिया कि #प्रीति तुम्हारा साथ होना मेरे लिए एक ईश्वरीय उपहार है क्योंकि #प्रीति मेरे लिए तुम्हारे होने का अर्थ है दिव्य और दुनिया का अर्थ है नया लेकिन अल्प। जिसमें अनगिनत लोग होते हैं, मिलते हैं, चले जाते हैं,, इसलिए मेरे लिए #प्रीति तुम कभी दुनिया नहीं हो सकती और जो दुनिया है वह कभी मेरी #प्रीति नहीं हो सकती। #प्रीति हमेशा #प्रीति रहेंगी - प्रीति मेरे लिए अपनी शाश्वत नवीनता और परम आनंद के कारण #प्रीति है। #प्रीति मेरे अस्तित्व का प्रगट रूप है....
"जो दिखाई पड़ती है आंखों से,
जो कह पाती है बस आँखों से,
जो हाथों से स्पर्श में आती है,
जो इंद्रियां से पहचान पाती हैं,
जो इंद्रियों की प्यास होती है,
ज़र्रे ज़र्रे में जिधर देखूं उधर
जो भी दृश्यमान है वह #प्रीति है,
#प्रीति तुम्हारी इतनी बाते है, #प्रीति तुम संग के आनंद की इतनी चर्चा है, इतनी कविताएं, कितने ग्रंथ हैं, सब दिन रात #प्रीति तुम पर लिख रहा हूं लेकिन लगता ऐसा कि मैं #प्रीति तुम्हें थोड़ा भी लिख नहीं पाता हूं; सब शब्दो की बाजीगरी है, सब बातचीत है। #प्रीति फिर भी जब तुम्हारी एक एक अदाकारी याद आती है तब मैं बस शब्दों में उन्हें ढालते चला जाता हूं । और शायद इतनी बात मैं इसीलिए करता हूं क्योंकि "#प्रीति तुम तो मेरी भावनाओं और अहसासों की अनकही लहरें है जिन्हें मैं कितना भी कहूं, कितना भी लिखूं फिर भी शब्दो मे कहां बांध पाता हूं..... #प्रीति तो अनंत है.....
"मैं" अपने कमरे में बैठा
#प्रीति की तस्वीरें निहार रहा था...
तब"लोग" बंद दरवाजे के बाहर से
पूछ रहे थे....
क्या देख रहे हो...?
"मैं" हँसा, बोला....
कभी देखता हूँ,
कभी चूक जाता हूँ....
पर #प्रीति दोनों में....
वैसी ही दिखती रहती है...!!
"लोग" समझे नहीं...
"मैं" उठा और चला गया...
और छोड़ आया
खुला दरवाजा
#प्रीति की तस्वीरें...
और देखने वाले भी....!!
जो शौहरत के लिए गिरना पड़े खुद अपनी नजरों से
तो फिर मेरे ईश्वर हरगिज मुझे मशहूर ना करना,,
मैं बुरा हूं, गलत हूं, धोखेबाज हूं, जो मुझे जैसे देखे वैसा हूं,
मैं सब साथ थे तब भी एक शख्स से प्रेम करता था और अब अकेला हूं तब भी उसी शख्स को पहले से दूगना प्रेम ही करता हूं और इससे ज्यादा करने लायक साहस का कोई काम नहीं है क्योंकि
अकेले चलना प्रकृति का सच्चा रुप है,
न नाटक, न बेरहमी, बस समझदारी,,
जब अपना कहने वाले ही ना समझे तो
ना शोर, ना कलह, ना कोई वाद-विवाद
बस चुपचाप वहां से चले जाना ही जीवन
बचाने की समझदारी है...दोस्त
किसीने मुझसे कहा...
तुम पागलों की तरह गुमसुम बैठे रहते हो,
ना बाहर आते जाते हो, जीवन को जैसे
श्मशान बना बैठे हों,
"कभी तो खोदकर देखो तुम अपने दिल की कब्रे......
मिलेगी हजारे ख्वाहीशें जिनको तुमने अपने अंदर मार चुके हों"..........
मैंने कहा*******
#प्रीति की खुशी के लिए
ख्वाहिशों को मारना मेरा जूनून था.....
अब #प्रीति के अलावा कोई ख्वाहिश ही ना रही
इसी में मेरा सकुन है.….......
पाठ 9...
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