"जब मन नहीं होता, फिर भी रिश्तों के लिए करना पड़ता है"
इंसान अकेला नहीं जीता। उसका जीवन रिश्तों से जुड़ा होता है माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चे, भाई-बहन, दोस्त, समाज। कई बार हम काम नहीं, बल्कि रिश्तों के लिए ऐसे फैसले लेते हैं जो हमारा मन नहीं चाहता। उस समय हम खुद को पीछे रख देते हैं और रिश्ते को आगे।
मान लीजिए कोई बेटा अपने माता-पिता की खुशी के लिए ऐसा करियर चुन लेता है जो उसका सपना नहीं है। मन रोज़ कहता है, “मैं कुछ और करना चाहता था”, लेकिन वह चुपचाप वही करता रहता है। बाहर से सब ठीक लगता है, पर भीतर एक खालीपन बन जाता है।
रिश्तों में “हाँ” कहना, जब मन “न” कह रहा हो
रिश्तों में सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है जब इंसान मन के खिलाफ हाँ कह देता है।
किसी की बात से सहमत हो जाना, जबकि दिल नहीं मानता
किसी गलत व्यवहार को सह लेना, सिर्फ रिश्ता बचाने के लिए
अपनी तकलीफ को दबा देना, ताकि सामने वाला दुखी न हो
जैसे पति-पत्नी के रिश्ते में एक साथी कुछ ऐसा करता है जो दूसरे को चोट पहुँचाता है। सामने वाला मन में बहुत कुछ कहना चाहता है, पर चुप रह जाता है। वह सोचता है, “बात बढ़ेगी, रिश्ता टूट जाएगा।” उस दिन रिश्ता तो बच जाता है, लेकिन मन टूट जाता है।
काम हो जाने के बाद रिश्तों में पैदा होने वाला पछतावा
जब इंसान मन मारकर कोई बात सह लेता है या कोई फैसला कर लेता है, तब बाद में पछतावा आता है।
मन पूछता है
“मैंने खुद की बात क्यों नहीं रखी?”
“क्या मेरी भावनाओं की कोई कीमत नहीं?”
जैसे कोई दोस्त बार-बार आपका अपमान करता है और आप हँसकर बात टाल देते हैं। उस समय आप दोस्ती निभा लेते हैं, लेकिन घर आकर वही बात दिमाग में घूमती रहती है। सीने में बोझ सा लगने लगता है।
रिश्तों में घुटन: जो दिखती नहीं
रिश्तों की घुटन सबसे खतरनाक होती है, क्योंकि वह बाहर से दिखाई नहीं देती। लोग कहते हैं
“सब ठीक तो है, फिर परेशानी क्या है?”
लेकिन भीतर इंसान घुट रहा होता है।
वह हँसता है, बातें करता है, रिश्ते निभाता है पर मन भारी रहता है।
धीरे-धीरे उसे उन्हीं लोगों के बीच अकेलापन महसूस होने लगता है, जिनके लिए उसने खुद को छोड़ा था।
अतीत में उलझा हुआ मन और रिश्ते
रिश्तों में लिए गए गलत या मजबूरी वाले फैसले मन को बार-बार अतीत में ले जाते हैं।
“उस दिन मैंने चुप क्यों रह लिया?”
“काश मैंने सच बोल दिया होता”
वर्तमान में बैठे-बैठे पुरानी बातें याद आती हैं। सामने वाला कुछ कह भी नहीं रहा होता, फिर भी मन पुरानी चोटों को महसूस करता रहता है। यही वजह है कि रिश्ता होते हुए भी दूरी महसूस होने लगती है।
इस पीड़ा की सच्चाई
सच्चाई यह है कि इंसान रिश्ते खराब होने के डर से बहुत कुछ सह लेता है। वह सोचता है कि त्याग करना ही प्रेम है। लेकिन हर त्याग प्रेम नहीं होता, कुछ त्याग खुद को खो देना भी होता है।
उस समय इंसान जो करता है, वह उसके डर, संस्कार और परिस्थितियों से निकलता है। यह उसकी कमजोरी नहीं, उसकी इंसानियत है।
रिश्तों में सीख क्या है
रिश्ते निभाना जरूरी है, लेकिन खुद को मिटाकर नहीं।
अगर मन बार-बार भारी हो रहा है, तो वह कोई संकेत देता है।
रिश्ते तब ही सच्चे होते हैं जब उनमें अपनी बात कहने की जगह हो।
मन नहीं होते हुए भी रिश्तों के लिए किया गया हर काम इंसान के भीतर एक कहानी छोड़ जाता है। कुछ कहानियाँ सीख बन जाती हैं, और कुछ बोझ।
जरूरत इस बात की है कि हम खुद से यह सवाल करें...
“क्या मैं इस रिश्ते में खुद के साथ ईमानदार हूँ?”
क्योंकि रिश्ते वही टिकते हैं जहाँ इंसान सिर्फ निभाता नहीं, जी भी पाता है।
पाठ 2...
गलत सिखाया गया है हमें... समर्पण करो, त्याग करो, सब पर निस्वार्थ प्रेम लुटाओ... गलत है... ये फलसफा ही गलत है... आपको मेरी बातें कड़वी लग सकती हैं लेकिन धरातल पर यही सच्चाई है..कलयुगी रिश्तों में, चाहे वो आपके खून के ही रिश्ते क्यों न हों, ये ऊंची ऊंची बातें काम नहीं करतीं... हमारे सामने कितने ही जिंदा उदाहरण हैं, जहां अपना सबकुछ लुटाने वालों के हाथ आखिर में खाली रह जाते हैं...
उनकी झोली में क्या आता है... ? कुछ प्रवचन भरी बातें... ? देवी या देवता का टैग...? 'कर्म का फल मिलेगा' जैसे वाक्य... ? लेकिन सबकुछ करने के बाद भी जो खालीपन वो महसूस करते हैं, उसका क्या...? जो जीवन खर्च हो जाता है उसकी भरपाई कैसे हो ? क्या ये बड़ी बड़ी बातें उस खालीपन को भर पाती हैं... ? नहीं... ये सिर्फ ढांढस बंधाने के तरीके हैं...
जीवन कठोर है... ये जंगल जैसा है... इसे जीने के लिए आप हर वक्त संत नहीं बन सकते...सबका भला करते करते खुद का गला नहीं काट सकते... यहां नीति भी जरूरी है, और उससे भी ज्यादा जरूरी है अपनी सीमाओं को बनाना और जानना...
जब इंसान धीरे धीरे रिश्तों के स्वार्थ को समझने लगता है, तो पहले तो वो टूटता है...रोता है..दुखी होता है...सवाल करता है ? आखिर मैं ही क्यों ? लेकिन अगर मन की शक्ति जाग जाए, तो वही इंसान खुद के लिए जीना सीख लेता है...वो अपनी बाउंड्री बनाता है और उस सीमा में किसी को आने की इजाजत नहीं देता... फिर सामने चाहे खून का रिश्ता ही क्यों न हो...
ऐसे लोगों के बीच जीने के लिए कई बार ढीठ होना पड़ता है... पहले पहल ये बहुत मुश्किल लगता है.. मन खुद से सवाल करता है... लेकिन अपने लिए सख्त होना ही पड़ता है... क्योंकि सिर्फ यही एक रास्ता है जिससे इंसान चैन की सांस ले सकता है...
और जैसे ही आप अपने लिए जीने लगते हैं यही लोग कुकुरमुत्ते की तरह उग आते हैं और आपको गिल्टी महसूस कारवाने लगते हैं..जैसे आप अपने लिए जी कर कुछ बहुत गलत कर रहे हों..यहीं बस यहीं 👇आपको उन्हें उनकी बाउंड्री दिखानी पड़ती है..
आज जब बहुत से लोगों को अपने टर्म्स पर जीवन जीते देखती हूं... हंसते, नाचते, खुलकर कहते... तो लगता है किसी ने खुद को पा लिया है... कोई खुद से मिल चुका है... कोई अब दूसरों को खुश करने के बजाय खुद को बचा रहा है...
हमारी सारी शिक्षाएं सही नहीं हैं... और मेरी इस बात को स्वीकार करना इतना आसान नहीं है...क्योंकि हमारी कंडीशनिंग ही इसी तरह से की गई है... जीवन के मूल्य अच्छे होने चाहिए...लेकिन उनका इस्तेमाल खुद को कुचलने के लिए नहीं होने देना चाहिए...
बहुत से लोग कहते हैं, हम तो अच्छा करते हैं फिर हमारे साथ बुरा क्यों होता है... होगा... बार बार होगा... क्योंकि किसी ने तुम्हें खुद के लिए स्वार्थी होना नहीं सिखाया...किसी ने ये नहीं बताया कि इन मूल्यों को सामने रखकर ताउम्र तुम्हारा इस्तेमाल भी किया जा सकता है..तुम्हें कह दिया गया कि अगर विरोध किया तो उसे रिश्तों से विद्रोह समझा जाएगा..
इन नियमों को अगर तुम आंख बंद करके आत्मसात कर लोगे, तो अर्जुन की तरह गांडीव उठाते समय तुम्हारे हाथ भी कांपेंगे...तुम सही गलत नहीं देख पाओगे..सिर्फ मूल्यों की माला जपोगे..फर्क सिर्फ इतना होगा कि वहां युद्धभूमि थी, और यहां रिश्तों का मैदान...
और फिर तुम्हें ये भी सिखाया जाएगा कि रिश्तों में हार जाना ही अच्छा होता है...कि झुक जाना समझदारी है...कि चुप रह जाना ही परिपक्वता है...
ये कैसी बेवकूफी है...? रिश्ते कोई युद्ध नहीं होते कि हर बार तुम ही हथियार डाल दो...और अगर हर बार जीत किसी एक की हो, तो वो रिश्ता नहीं, एकतरफा कब्जा होता है...
इसलिए अब सवाल ये नहीं है कि तुम कितने अच्छे हो...
सवाल ये है कि तुम खुद के लिए कितने जागरूक हो...क्या इन ऊंची बातों के पीछे छिपे सही, गलत को देख भी पाते हो ?
अच्छा होना खूबसूरत बात है...लेकिन अपनी कीमत पर नहीं...
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