Saturday, June 27, 2026

आज़ादी कोई उपहार नहीं है,आज़ादी साहस है

 तुम्हें किसी ने कैद नहीं किया...

तुम्हारी पहली बेड़ी लोहे की नहीं थी,

वह एक विचार था—

"लोग क्या कहेंगे?"


फिर दूसरी बेड़ी आई—

"ऐसा करना ठीक नहीं लगता..."

फिर तीसरी—

"मेरे पति क्या सोचेंगे?"

फिर चौथी—

"मेरे माता-पिता, मेरे दोस्त, मेरा समाज क्या कहेगा?"

और देखते-देखते तुमने अपने ही हाथों से

अपने पैरों में, अपने हाथों में, अपने दिल में, अपनी आत्मा में

जंजीरें डाल लीं।

एक-एक कड़ी जोड़ते गए...

एक-एक ताला लगाते गए...

और फिर एक दिन चीख उठे—

"कोई मुझे बचाओ!"

लेकिन तुम्हें बचाने कौन आए?

जिस जेल का दरवाज़ा तुमने खुद बंद किया हो,

उसकी चाबी किसी और के पास नहीं होती।

सच यह है कि...


तुम्हारे शरीर पर कोई जंजीर नहीं है।

तुम्हारी आत्मा पर धारणाओं का बोझ है।

तुम्हें समाज ने बेड़ियाँ नहीं पहनाईं,

समाज ने सिर्फ बेड़ियाँ दिखाईं थीं।

उन्हें पहनने का फैसला तुम्हारा था।

जब तुम पैदा हुए थे, न कोई धर्म था, न कोई जाति, न कोई प्रतिष्ठा, न कोई डर, न कोई "लोग क्या कहेंगे"।

तुम खुले आकाश की तरह थे।

फिर धीरे-धीरे तुम्हारी उड़ान छीन ली गई, और सबसे दुखद बात यह है कि उड़ान छीनने वालों से ज़्यादा तुमने खुद अपनी पंख काटे।

आज भी देर नहीं हुई।

एक सवाल पूछो खुद से—

क्या मैं अपनी जिंदगी जी रहा हूँ,

या दूसरों की अपेक्षाओं का किरदार निभा रहा हूँ?

जिस स दिन यह सवाल ईमानदारी से पूछ लिया, उसी दिन पहली बेड़ी टूट जाएगी।

याद रखो—

आज़ादी कोई उपहार नहीं है,

आज़ादी साहस है।

साहस यह कहने का—

"मैं वही बनूँगा जो मेरा हृदय चाहता है,

न कि जो दुनिया मुझसे चाहती है।"

उठो।


जंजीरें तोड़ो।

क्योंकि कैदी भी तुम हो, जेलर भी तुम हो, और चाबी भी तुम्हारे ही पास है।


जिस दिन तुमने "लोग क्या कहेंगे" को मार दिया,

उसी दिन तुम्हारा नया जन्म होगा।


🔥 अपनी आत्मा को समाज की अदालत से रिहा कर दो।

🔥 तुम्हारा जीवन किसी और की राय से बड़ा है।

🔥 जंजीरें टूटने का इंतज़ार मत करो, उन्हें तोड़ दो।

तुम्हारी देह

 तुम्हारी देह


मेरे लिए कोई भूखी कामना नहीं,


बल्कि उस दरवेश की दुआ है जो बरसों से एक ही चौखट पर बैठा अपने रब का इंतज़ार कर रहा हो।


मैंने तुम्हें आँखों से कम, आत्मा से अधिक छुआ है।


जैसे कोई सूफ़ी पहली बार सुनता है अपने भीतर बजती हुई अनहद की धुन।


तुम्हारी गर्दन पर ठहरा हुआ एक क्षण


मुझे वैसा ही पवित्र लगता है जैसे किसी फ़क़ीर को अचानक मिल जाए अपनी तलाश का उत्तर।


तुम्हारे होंठों की मुस्कान में


मैंने कई बार देखा है फिरदौस का खुलता हुआ दरवाज़ा,


जहाँ न कोई भय है, न कोई विरह,


सिर्फ़ प्रेम का उजाला है।


तुम्हारी देह पर समय की हल्की-हल्की छायाएँ


वैसी ही सुंदर हैं जैसे रेगिस्तान में हवा के बनाए हुए नक़्श,


क्षणभंगुर, पर अनंत।


और मैं,


एक भटकता हुआ दरवेश,


हर जन्म, हर दिशा, हर प्रार्थना में


तुम्हारी ही ओर लौटता हूँ।


क्योंकि तुमसे प्रेम करना


किसी व्यक्ति से प्रेम करना नहीं,


बल्कि उस फिरदौस की तलाश है


जिसका रास्ता तुम्हारी आत्मा से होकर जाता है।

तुम्हारी आँखें एक सूर्य, एक चंद्रमा

 अनंत ब्रह्मांड के प्रेम में


तुम्हारे लिपटे हुए सुवासित केशों को

अगर मैं सर्पिलाकार आकाशगंगाएँ मान लूँ,


तो यकीन मानो, मैं हर रात अपनी समस्त दिशाएँ खो देना चाहूँगा उनकी घुमावदार रहस्यमयी कक्षाओं में।


तुम्हारी आँखें एक सूर्य, एक चंद्रमा,


एक में तपता हुआ जीवन, दूसरी में बहता हुआ अमृत,


और मैं, एक आवारा ग्रह की तरह, सदियों से तुम्हारे आकर्षण के गुरुत्व में बंधा हुआ।


तुम्हारे बाएँ गाल पर स्थित वह तिल मुझे पृथ्वी-सा प्रतीत होता है,


जहाँ मेरे समस्त मौसम जन्म लेते हैं, जहाँ मेरी प्रतीक्षा के जंगल उगते हैं, जहाँ मेरी इच्छाओं की नदियाँ समुद्र तलाशती हैं।


और जब तुम अपने केशों की आकाशगंगाएँ खोल देती हो,


तो लगता है मानो सम्पूर्ण ब्रह्मांड ने अपना रात्रि-वस्त्र त्यागकर प्रेम का उत्सव आरम्भ कर दिया हो।


तुम्हारी निकटता तब किसी खगोलीय घटना जैसी लगती है,


जैसे सहस्राब्दियों बाद दो नक्षत्र एक-दूसरे के सामने आए हों, और उनके बीच प्रकाश की नहीं, स्पंदनों की वर्षा हो रही हो।


मैं तुम्हारे समीप आता हूँ वैसे ही जैसे कोई सूफ़ी अपने अंतिम सत्य के निकट पहुँचता है,


काँपते हुए, विस्मित होते हुए, और स्वयं को भूलते हुए।


तुम्हारी साँसों की गरमाहट मेरे भीतर अनगिनत धूमकेतु जगा देती है,


और मेरी धड़कनें तुम्हारी धड़कनों के चारों ओर वैसे ही परिक्रमा करने लगती हैं जैसे ग्रह अपने प्रिय सूर्य के चारों ओर।


तब प्रेम सिर्फ प्रेम नहीं रहता,


वह अनहद की धुन बन जाता है, वह दरवेश का समर्पण बन जाता है, वह फकीर की अंतिम प्रार्थना बन जाता है।


और मैं तुम्हारे उस छोटे-से तिल को देखकर बार-बार यही सोचता हूँ—


यदि यह पृथ्वी है, यदि तुम्हारी आँखें सूर्य और चंद्रमा हैं, और यदि तुम्हारे केश अनंत आकाशगंगाएँ हैं,


तो हाँ,


मैं केवल तुमसे नहीं,


मैं इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड से प्रेम करता हूँ, जो तुम्हारे रूप में मेरे सामने खड़ा है। 

सत्य किसी धर्म की संपत्ति नहीं है

 सबसे बड़ा चमत्कार क्या है?


एक बच्चा पैदा होता है...


न उसके माथे पर हिन्दू लिखा होता है,

न मुसलमान,

न ईसाई,

न जैन,

न बौद्ध।


वह न राम को जानता है,

न कृष्ण को,

न मोहम्मद को,

न ईसा को,

न महावीर को,

न बुद्ध को।


लेकिन कुछ ही वर्षों में वही बच्चा मरने-मारने को तैयार हो जाता है।


क्या कमाल का जादू है!


जिस बच्चे को सत्य का कोई पता नहीं था,

उसे सत्य का ठेकेदार बना दिया जाता है।


जिसने कभी भगवान को देखा नहीं,

वह भगवान के नाम पर लड़ने लगता है।


जिसने कभी आत्मा का अनुभव नहीं किया,

वह आत्मा पर भाषण देने लगता है।


जिसने कभी ध्यान नहीं किया,

वह मोक्ष के प्रमाणपत्र बांटने लगता है।


जिसने कभी सत्य को खोजा नहीं,

वह सत्य का एजेंट बन जाता है।


---


मंदिर कहता है —

सत्य हमारे पास है।


मस्जिद कहती है —

सत्य हमारे पास है।


चर्च कहता है —

सत्य हमारे पास है।


मठ कहता है —

सत्य हमारे पास है।


आश्रम कहता है —

सत्य हमारे पास है।


मजेदार बात यह है कि

सत्य बेचारा आज तक यह नहीं बता पाया कि वह आखिर है किसके पास!


---


बचपन से तुम्हारे दिमाग पर लिख दिया गया —


"यही आखिरी सत्य है।"


और तुमने बिना जांचे,

बिना परखे,

बिना जीए,

उसे स्वीकार कर लिया।


क्यों?


क्योंकि स्वीकार करना आसान है।


खोजना खतरनाक है।


---


धर्म ने तुम्हें सत्य नहीं दिया।


धर्म ने तुम्हें पहचान दी।


और पहचान इतनी नशे की चीज है कि आदमी सत्य खो सकता है,

लेकिन अपनी पहचान नहीं छोड़ सकता।


यही कारण है कि लोग भगवान बदलने से ज्यादा आसानी से पत्नी बदल लेते हैं,

लेकिन अपने विश्वासों पर सवाल नहीं उठाते।


---


सदियों से इंसानों के माथे पर शब्द लिखे जा रहे हैं।


कोई लिखता है — हिन्दू।


कोई लिखता है — मुसलमान।


कोई लिखता है — ईसाई।


कोई लिखता है — बौद्ध।


कोई लिखता है — जैन।


और फिर वही लोग पूरी जिंदगी चिल्लाते रहते हैं —


"मैं सही हूं!"


"मैं सही हूं!"


"मैं सही हूं!"


लेकिन किसी ने यह पूछने की हिम्मत नहीं की —


अगर तुम सही हो,

तो यह आवाज तुम्हारी है,

या तुम्हारे माथे पर लिखे हुए शब्दों की?


आचार्य रजनीश ने कहा था —


"सत्य किसी धर्म की संपत्ति नहीं है।"


जिस दिन तुम अपने विश्वासों को भी संदेह की आग में डाल दोगे,

उसी दिन पहली बार तुम्हारी मुलाकात सत्य से होगी।


उससे पहले तुम केवल किसी न किसी के लिखे हुए वाक्य को दोहरा रहे हो।


और दोहराना ज्ञान नहीं होता।


वह केवल प्रशिक्षित तोते की कला होती है।

आपके जीवन मे ग्रहों के सक्रियता को दर्शाते हैं

 कभी महसूस किया है...


कि बीमार होने के पहले आपका शरीर आपको संकेत देने लगता है?


अचानक बिना कारण थकान महसूस होने लगती है।


भोजन में रुचि कम हो जाती है।


पसंदीदा चीज़ों का स्वाद फीका लगने लगता है।


शरीर भारी-भारी सा लगता है।


मन किसी अनजानी बेचैनी से भर जाता है।


उस समय बीमारी आई नहीं होती।


लेकिन शरीर जान चुका होता है...


कि कुछ आने वाला है।


भूकंप आने से पहले धरती संकेत देती है।


तूफान आने से पहले समुद्र संकेत देता है।


बीमारी आने से पहले शरीर संकेत देता है।


तो क्या यह संभव है...


कि ग्रह भी संकेत देते हों?


और यदि देते हों...


तो क्या हम उन्हें पहचान पाते हैं?


वर्षों से ज्योतिष का अध्ययन करते हुए मैंने एक बात बार-बार देखी है।


लोग ग्रहों को तब देखते हैं...


जब घटना घट चुकी होती है।


व्यापार डूब गया।


रिश्ता टूट गया।


करियर रुक गया।


धोखा हो गया।


और फिर कुंडली खोली जाती है।


"ओह... शनि चल रहा था।"


"राहु सक्रिय था।"


"गोचर खराब था।"


लेकिन मुझे हमेशा एक प्रश्न परेशान करता रहा।


यदि ग्रह इतने शक्तिशाली हैं...


तो क्या वे बिना किसी पूर्व संकेत के अचानक हमला कर देते हैं?


या...


क्या वे पहले हमारे भीतर कुछ बदलना शुरू करते हैं?


मेरे अनुभव में...


ग्रह पहले घटना नहीं बनाते।


वे पहले एक मानसिक वातावरण बनाते हैं।


एक ऐसा वातावरण...


जिसमें आप धीरे-धीरे अलग तरह से सोचने लगते हैं।


अलग तरह से महसूस करने लगते हैं।


अलग तरह के निर्णय लेने लगते हैं।


और फिर वही निर्णय...


कुछ महीनों या वर्षों बाद भाग्य बन जाते हैं।


यहीं ज्योतिष का सबसे गहरा रहस्य छिपा है।


चलिए आज समझते हैं, ग्रह और उनके संकेतों को। 


🔰 सूर्य (Sun)


सूर्य सक्रिय होने से पहले हमेशा सफलता नहीं देता।


कई बार वह एक अजीब सी आंतरिक बेचैनी देता है।


अचानक आपको ऐसा लगने लगता है -


"लोग मेरी कद्र नहीं कर रहे।"


"मेरी बात सुनी नहीं जा रही।"


"मेरे योगदान को महत्व नहीं मिल रहा।"


यदि चेतना जागरूक नहीं है...


तो व्यक्ति सम्मान प्राप्त करने के बजाय सम्मान मांगना शुरू कर देता है।


यहां अहंकार जन्म लेता है।


और मज़ेदार बात यह है...


उसे अहंकार कभी दिखाई नहीं देता।


उसे केवल उपेक्षा दिखाई देती है।


🔰 चंद्र (Moon)


चंद्रमा के सक्रिय होने पर घटनाएँ नहीं बदलतीं।


घटनाओं का अर्थ बदलने लगता है।


एक ही बात जो कल सामान्य लग रही थी...


आज दिल को चोट पहुँचाने लगती है।


व्यक्ति भावनाओं को तथ्य समझने लगता है।


यदि दुःखी है...


तो पूरी दुनिया गलत लगती है।


यदि प्रसन्न है...


तो सब कुछ अच्छा लगने लगता है।


यहीं चंद्रमा की परीक्षा शुरू होती है कि -

क्या आप भावना और वास्तविकता में अंतर कर सकते हैं?


🔰मंगल (Mars)


मंगल हमेशा युद्ध नहीं देता।


लेकिन वह आपको यह महसूस करा सकता है कि हर असहमति एक युद्ध है।


अचानक धैर्य कम होने लगता है।


लोग मूर्ख लगने लगते हैं।


धीमी गति असहनीय लगने लगती है।


फिर व्यक्ति वहां भी लड़ाइयाँ चुनने लगता है...


जहाँ लड़ने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी।


बाद में वही कहता है -


"मेरे जीवन में बहुत संघर्ष है।"


उसे संघर्ष दिखाई देता है।


लेकिन यह नहीं दिखाई देता...


कि आधे युद्ध उसने स्वयं शुरू किए थे।


🔰 बुध (Mercury)


बुध का खेल अत्यंत सूक्ष्म है।


जब बुध असंतुलित होने लगता है...


तो जानकारी बढ़ती है।


लेकिन स्पष्टता नहीं।


व्यक्ति पढ़ता बहुत है।


सुनता बहुत है।


सोचता बहुत है।


लेकिन निर्णय नहीं ले पाता।


मन लगातार विकल्पों में घूमता रहता है।


जैसे ब्राउज़र में सौ टैब खुले हों...


और कोई भी बंद न हो रहा हो।


🔰 बृहस्पति (Jupiter)


जब बृहस्पति सक्रिय होता है...


तो जीवन अक्सर विस्तार चाहता है।


लेकिन विस्तार हमेशा विकास नहीं होता।


कई बार व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक बड़ा बनने की कोशिश करने लगता है।


अत्यधिक आशावाद भी उतना ही खतरनाक हो सकता है...


जितना अत्यधिक भय।


बृहस्पति की छाया में व्यक्ति सोच सकता है -


"सब ठीक हो जाएगा।"


जबकि वास्तविकता कह रही होती है -


"कुछ action भी लेना होगा।"

अन्यथा execution मुश्किल है।


🔰 शुक्र (Venus)


शुक्र का संकेत सुख नहीं होता।


सुख की तलाश होती है।


अचानक व्यक्ति उन चीज़ों की ओर आकर्षित होने लगता है...


जो उसे अच्छा महसूस कराती हैं।


लोग।


संबंध।


प्रशंसा।


आराम।


विलास।


यहां एक प्रश्न भी उठता है -


क्या आप सच मे प्रेम कर रहे हैं?


या केवल उस भावना के आदी हो चुके हैं...


जो प्रेम आपको देता है?


🔰 शनि (Saturn)


शनि का आगमन संघर्ष से पहले शुरू होता है।


अक्सर सत्य से।


जीवन धीरे-धीरे आपको उन चीज़ों से मिलवाने लगता है...


जिनसे आप वर्षों से बच रहे थे।


अधूरे काम।


अधूरी जिम्मेदारियाँ।


अधूरे वादे।


और कभी-कभी...


ऐसी परिस्थितियाँ भी...


जहाँ सुविधा और सत्य आमने-सामने खड़े हो जाते हैं।


व्यक्ति सोचता है -


"बस इस बार..."


लेकिन शनि "बस इस बार" को नहीं भूलता।


क्योंकि शनि का संबंध दंड से कम...


वास्तविकता से अधिक है।


🔰 राहु (Rahu)


राहु का आगमन डर जैसा नहीं लगता।


अवसर जैसा लगता है।


अचानक कुछ पाने की तीव्र इच्छा।


कुछ बन जाने की बेचैनी।


कुछ हासिल कर लेने की भूख।


और धीरे-धीरे इच्छा इतनी बड़ी हो जाती है...


कि वास्तविकता दिखाई देना बंद हो जाती है।


राहु का सबसे खतरनाक संकेत यही है।


जब भ्रम सबसे अधिक होता है...


उसी समय व्यक्ति को सबसे अधिक विश्वास होता है कि वह सही है।


और...

यहीं अक्सर धोखा हो जाता है। 


🔰 केतु (Ketu)


केतु अक्सर कुछ छीनता नहीं।


स्वाद कम कर देता है।


वही जीवन।


वही लोग।


वही उपलब्धियाँ।


लेकिन अचानक भीतर से आवाज़ आती है -


"अब आगे क्या?"


और यदि व्यक्ति इसे समझ न पाए...


तो उसे लगता है कि वह टूट रहा है।


जबकि कई बार...


वह केवल जाग रहा होता है।


👉 अब यहाँ एक महत्वपूर्ण बात भी समझने जैसी है।


हर देरी शनि नहीं होती।


हर भ्रम राहु नहीं होता।


हर गुस्सा मंगल नहीं होता।


हर उदासी चंद्रमा नहीं होता।


इसलिए...


अनुभवी ज्योतिषी एक घटना नहीं देखता।


वह पूरे पैटर्न को देखता है।


बार-बार दोहराए जा रहे संकेतों को देखता है।


समय को देखता है।


और फिर निष्कर्ष निकालता है।


और...यदि आपने भी यहाँ तक पढ़ लिया है...


तो शायद... आज से आप भी एक नया प्रयोग कर सकते हैं।


अगली बार जब जीवन में कुछ असामान्य महसूस हो...


तो तुरंत यह मत पूछिए -


"मेरे साथ क्या होने वाला है?"


थोड़ा रुकिए।


और खुद से पूछिए -


"मुझे क्या दिखाया जा रहा है?"


क्योंकि संभव है...


घटना अभी दूर हो।


लेकिन संकेत आने शुरू हो चुके हों।


और ज्योतिष की सबसे बड़ी शक्ति शायद भविष्य देखने में नहीं है।


बल्कि उन संकेतों को पहचान लेने में है...


जो भविष्य आने से पहले दिखाई देने लगते हैं।


✍️नोट - ये संकेत केवल आपके जीवन मे ग्रहों के सक्रियता को दर्शाते हैं। उनके वास्तविक प्रभाव कुंडली में उनकी स्थिति,भावों के स्वामित्व तथा अन्य ग्रहों के साथ सम्बंधों और influence पर निर्भर करते हैं।


भोग से भागना नहीं भोग के पार देखना

 भोग से भागना नहीं भोग के पार देखना


मनुष्य के जीवन में भोग को लेकर दो अतियाँ दिखाई देती हैं। एक ओर वे लोग हैं जो विषयों को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लेते हैं, और दूसरी ओर वे जो विषयों को शत्रु समझकर उनसे युद्ध करने लगते हैं। परंतु जीवन का सत्य इन दोनों के बीच कहीं अधिक सूक्ष्म है। न भोग अपने आप में बुरा है, न त्याग अपने आप में महान। वास्तविक प्रश्न यह है कि हमारे भीतर देखने वाली दृष्टि कितनी जागृत है।


विषय-वासनाएँ मनुष्य के शत्रु नहीं हैं; वे उसकी चेतना की यात्रा के पड़ाव हैं। समस्या भोग में नहीं, उस भ्रम में है जिसमें हम भोग को पूर्णता समझ बैठते हैं। मन बार-बार किसी वस्तु, व्यक्ति, पद, सम्मान, सुख या उपलब्धि की ओर दौड़ता है क्योंकि उसे लगता है कि शायद वहाँ पहुँचकर वह भर जाएगा। परंतु हर उपलब्धि के बाद कुछ समय का उत्साह आता है और फिर भीतर वही पुराना खालीपन लौट आता है। मन फिर किसी नए लक्ष्य की खोज में निकल पड़ता है।


यहीं से आध्यात्मिकता का जन्म होता है।


मनुष्य पहली बार ईमानदारी से देखता है कि संसार उसे वह नहीं दे पा रहा जिसकी उसे वास्तव में तलाश है। यह बोध जितना गहरा होता जाता है, उतनी ही सहजता से भीतर परिवर्तन घटित होने लगता है।


बहुत से लोग त्याग करना चाहते हैं, लेकिन त्याग कर नहीं पाते। कारण यह है कि त्याग इच्छा के विरुद्ध नहीं हो सकता। जिस वस्तु में अभी भी रस दिखाई देता है, उससे दूर जाने का प्रयास केवल दमन बन जाता है। बाहर से व्यक्ति संयमी दिख सकता है, पर भीतर उसका मन उसी विषय के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। ऐसा त्याग संघर्ष पैदा करता है, शांति नहीं।


सच्चा वैराग्य वहाँ जन्म लेता है जहाँ अनुभव और विवेक मिलकर एक गहरा बोध बन जाते हैं।


कभी यह बोध भोग के अनुभव से आता है। मनुष्य जीवन के अनेक सुखों को जीता है, उन्हें प्राप्त करता है, और फिर देखता है कि हर सुख की एक सीमा है। वह अनुभव करता है कि विषय आनंद दे सकते हैं, पर तृप्ति नहीं; उत्तेजना दे सकते हैं, पर शांति नहीं; क्षणिक संतोष दे सकते हैं, पर पूर्णता नहीं। तब धीरे-धीरे उसका आकर्षण कम होने लगता है। यह किसी नैतिक दबाव का परिणाम नहीं होता, बल्कि समझ का फल होता है।


और कभी यही बोध बिना प्रत्यक्ष भोग के भी जाग सकता है। किसी महापुरुष की वाणी से, किसी गहरे सत्संग से, किसी शास्त्रीय चिंतन से, या जीवन को सूक्ष्मता से देखने की क्षमता से। हर व्यक्ति को आग में हाथ डालकर जलना आवश्यक नहीं कि वह आग की प्रकृति समझ सके। कुछ लोग दूसरों के अनुभव से भी सीख लेते हैं। इसलिए भोग से वैराग्य एक मार्ग है, पर विवेक से वैराग्य उससे भी अधिक सूक्ष्म मार्ग है।


वास्तव में वैराग्य कोई उपलब्धि नहीं है। यह समझ की परिपक्वता है।


जब मनुष्य देख लेता है कि बाहरी वस्तुओं में वह नहीं है जिसकी उसकी आत्मा को खोज है, तब विषय अपने आप महत्व खोने लगते हैं। जैसे बचपन के खिलौने एक दिन स्वतः व्यर्थ हो जाते हैं। उन्हें त्यागना नहीं पड़ता, उनसे लड़ना नहीं पड़ता, बस चेतना उनसे आगे बढ़ जाती है।


यही कारण है कि सच्चे वैराग्य में कोई कठोरता नहीं होती। वहाँ संसार के प्रति घृणा नहीं होती। वहाँ विषयों को दोष देने की प्रवृत्ति नहीं होती। वहाँ केवल एक शांत समझ होती है कि इनकी अपनी सीमाएँ हैं। जो सीमित है वह असीम की प्यास नहीं बुझा सकता।


तब व्यक्ति भागता नहीं, रुक जाता है।


वह हिमालय नहीं खोजता, बल्कि अपने भीतर के शोर को देखना शुरू करता है। वह संसार को छोड़ने की चिंता नहीं करता, बल्कि भ्रमों को छोड़ने लगता है। वह वस्तुओं से दूर नहीं जाता, वस्तुओं पर अपनी निर्भरता से मुक्त होने लगता है। यही वास्तविक स्वतंत्रता है।


आख़िरकार मनुष्य को कहीं जाना नहीं है। कोई दूसरी दुनिया जीतनी नहीं है। जो सत्य है, वह यहीं है; जो शांति है, वह अभी है; जो पूर्णता है, वह इसी क्षण उपलब्ध है। पर उसे देखने के लिए वह दृष्टि चाहिए जो विषयों के आकर्षण और त्याग के अहंकार दोनों के पार देख सके।


जब जीवन की दौड़ के बीच अचानक यह बोध जागता है कि जिस पूर्णता को बाहर खोज रहे थे वह भीतर प्रतीक्षा कर रही है, तब एक अद्भुत परिवर्तन घटित होता है। भोग अपना स्थान खो देता है, त्याग अपना गर्व खो देता है, और मनुष्य पहली बार स्वयं के निकट आ जाता है।


यही वैराग्य है।


न संसार से भागना, न संसार में खो जाना।


बल्कि संसार के बीच रहते हुए उस सत्य को जान लेना, जिसके बाद पाने के लिए कुछ शेष नहीं रहता और छोड़ने के लिए भी कुछ नहीं...

जीवन की 20 सच्चाइयाँ

 जीवन की 20 सच्चाइयाँ जो आसान दिखती हैं, लेकिन निभाना सबसे कठिन होता है...


जीवन में कुछ चीजें बाहर से बहुत सरल दिखाई देती हैं, लेकिन जब उन्हें जीने की बारी आती है, तब उनकी वास्तविक कठिनाई समझ में आती है।


1. सफल वैवाहिक जीवन (Marriage)


प्रेम में पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन एक मजबूत और स्थायी रिश्ता बनाने के लिए धैर्य, त्याग, संवाद और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है।


2. किसी को भूलकर आगे बढ़ना (Moving On)


मन समझ जाता है कि आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन दिल अक्सर लंबे समय तक अतीत से जुड़ा रहता है।


3. नए मित्र बनाना


सच्ची मित्रता के लिए अपने मन को खोलना पड़ता है, जबकि अधिकांश लोग चोट लगने के डर से खुद को सुरक्षित रखना चाहते हैं।


4. कॉलेज के बाद मित्रताओं को बनाए रखना


करियर, परिवार और जिम्मेदारियाँ लोगों को अलग-अलग दिशाओं में ले जाती हैं।


5. विश्वासघात करने वाले व्यक्ति को क्षमा करना


विश्वास एक पल में टूट सकता है, लेकिन उसे दोबारा बनाने में वर्षों लग सकते हैं।


6. स्वस्थ आहार बनाए रखना


इच्छाएँ तुरंत सुख देती हैं, जबकि अनुशासन का लाभ धीरे-धीरे दिखाई देता है।


7. सुबह जल्दी उठना


आराम तुरंत आकर्षित करता है, जबकि अनुशासन के लाभ बाद में मिलते हैं।


8. अच्छा श्रोता बनना


अधिकांश लोग समझने के लिए नहीं, बल्कि जवाब देने के लिए सुनते हैं।


9. व्यवसाय चलाना


सफलता के लिए अनिश्चितता, आलोचना, असफलता और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।


10. निरंतरता बनाए रखना


प्रेरणा आती-जाती रहती है, लेकिन अनुशासन को स्थिर रखना पड़ता है।


11. अपनी सीमाएँ तय करना (Boundaries)


"नहीं" कहना कठिन लगता है, विशेषकर तब जब आप हमेशा दूसरों को प्राथमिकता देते रहे हों।


12. अपनी गलती स्वीकार करना


अहंकार स्वयं को सही साबित करना चाहता है, जबकि विकास के लिए गलती स्वीकार करना आवश्यक है।


13. कठिन परिस्थितियों में शांत रहना


भावनाएँ तुरंत प्रतिक्रिया देती हैं, लेकिन बुद्धिमत्ता धैर्य की मांग करती है।


14. स्वयं से प्रेम करना


बहुत से लोग अपने साथ वैसा व्यवहार नहीं करते जैसा वे दूसरों के साथ करते हैं।


15. पुरानी आदतों को बदलना


परिचित असुविधा अक्सर अपरिचित बदलाव से अधिक सुरक्षित महसूस होती है।


16. वर्तमान में जीना


मन बार-बार अतीत की यादों और भविष्य की चिंताओं के बीच भटकता रहता है।


17. मदद माँगना


कमज़ोरी दिखाने का डर हमें सहायता लेने से रोक देता है, जबकि कई बार वही सबसे अधिक आवश्यक होती है।


18. लोगों को गलत समझने देना


हर गलत राय का जवाब देना जरूरी नहीं होता। अपनी ऊर्जा बचाना भी बुद्धिमानी है।


19. तात्कालिक सुख की बजाय दीर्घकालिक विकास चुनना


जो चीजें हमारे लिए सबसे अधिक लाभकारी होती हैं, वे अक्सर सबसे आसान नहीं होतीं।


20. आंतरिक शांति प्राप्त करना


शांति कोई ऐसी मंजिल नहीं है जिसे एक बार पा लिया जाए।

यह एक अभ्यास है जिसे हर दिन करना पड़ता है।


सबसे बड़ी सीख


जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, हम समझते हैं कि जीवन की कठिनाइयाँ बड़े अवसरों या बड़ी घटनाओं से नहीं बनतीं।


जीवन उन छोटे-छोटे कार्यों से आकार लेता है जिन्हें हमें लगातार करते रहना पड़ता है—

यहाँ तक कि तब भी जब हमारा मन न हो।


यहीं से वास्तविक शक्ति, परिपक्वता और चरित्र का निर्माण होता है।


मैंने लोगों को बदलने की कोशिश छोड़ दी...

मैंने एक बार एक बुज़ुर्ग व्यक्ति से पूछा कि उनकी ज़िंदगी इतनी शांत और खुशहाल कैसे है।


वे मुस्कुराए और बोले...


"मेरी ज़िंदगी तब बदलनी शुरू हुई जब मैंने हर चीज़ को नियंत्रित करने की कोशिश छोड़ दी।


मैंने लोगों को बदलने की कोशिश छोड़ दी...


मैंने हर किसी को खुश रखने की कोशिश छोड़ दी...


मैंने हर गलती पर खुद को दोष देना छोड़ दिया...


मैंने हर परिणाम की चिंता करना छोड़ दिया...


मैंने भविष्य के डर में वर्तमान को खोना छोड़ दिया...


मैंने उन बातों पर ऊर्जा खर्च करना छोड़ दिया जो मेरे बस में ही नहीं थीं...


और फिर मैंने ध्यान देना शुरू किया...


अपने चरित्र पर,


अपनी आदतों पर,


अपने स्वास्थ्य पर,


अपने ज्ञान पर,


और अपने मन की शांति पर।


धीरे-धीरे मुझे समझ आया कि


ज़िंदगी तब आसान नहीं होती जब सब कुछ आपके मुताबिक़ होने लगे,


ज़िंदगी तब आसान होती है जब आप हर परिस्थिति में खुद को संभालना सीख जाते हैं।


जिस दिन मैंने नियंत्रण की जिद छोड़ी,


उसी दिन मैंने सुकून पाना शुरू किया।


आज मैं जानता हूँ कि


हवा की दिशा बदलना मेरे हाथ में नहीं,


लेकिन अपनी नाव के पाल कैसे खोलने हैं,


यह पूरी तरह मेरे हाथ में है।"


याद रखिए...


हर चीज़ को नियंत्रित करने की कोशिश आपको थका देती है,


लेकिन सही चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करना आपको आगे बढ़ा देता है।


इसलिए अपना समय और ऊर्जा वहाँ लगाइए,


जहाँ आपका प्रभाव हो,


न कि वहाँ,


जहाँ केवल चिंता ही मिलती हो।


कई बार सफलता मेहनत से नहीं,


बल्कि अनावश्यक बोझ छोड़ देने से शुरू होती है।


Friday, June 26, 2026

क्या आपका रिश्ता सच में समस्या में है

 क्या आपका रिश्ता सच में समस्या में है... या आपका दिमाग आपको धोखा दे रहा है? 


कई बार हम सोचते हैं कि रिश्ते प्यार की कमी, compatibility की समस्या या सामने वाले की गलतियों की वजह से टूटते हैं।

लेकिन सच यह है कि कई रिश्ते उन मानसिक भ्रमों (Cognitive Biases) की वजह से कमजोर हो जाते हैं, जिनका हमें एहसास भी नहीं होता। 🧠⚠️

हम सामने वाले को नहीं देखते... हम उसके बारे में अपनी बनाई हुई कहानी को देखने लगते हैं। 😔


1️⃣ Confirmation Bias 🔍

"मैं वही देखता हूँ जो मैं देखना चाहता हूँ।"

अगर आपने मान लिया कि आपका पार्टनर लापरवाह है, तो आपका दिमाग हर उस घटना को पकड़ लेगा जो इस विश्वास को सही साबित करे।

लेकिन जब वह आपकी परवाह करता है, आपकी मदद करता है या आपके लिए समय निकालता है, तो आपका दिमाग उसे नजरअंदाज कर देता है।

👉 एक ही व्यवहार प्यार में "केयर" लगता है और गुस्से में "स्वार्थ"।


✅ Reality Check: अपने विश्वास के खिलाफ सबूत भी खोजिए।


2️⃣ Recency Bias ⏳

"आखिरी घटना पूरे रिश्ते की कहानी बन जाती है।"

कल की लड़ाई छह महीने की खुशियों पर भारी पड़ जाती है।

दिमाग हाल की घटना को इतना बड़ा बना देता है कि पूरी तस्वीर गायब हो जाती है।

✅ Reality Check: निर्णय एक घटना पर नहीं, पूरे पैटर्न पर लीजिए।


3️⃣ Negativity Bias 🌧️

"एक बुरी बात दस अच्छी बातों पर भारी पड़ जाती है।"

दिमाग का ध्यान खतरे और नकारात्मकता पर ज्यादा जाता है।

इसलिए एक आलोचना पाँच तारीफों से ज्यादा याद रहती है।

✅ Reality Check: अपने पार्टनर की अच्छी बातों और प्रयासों को भी लिखकर रखिए। 📝❤️


4️⃣ Attribution Bias ⚖️

"मेरी गलती परिस्थिति की वजह से, उसकी गलती उसके चरित्र की वजह से।"

अगर आप लेट आए: 👉 "आज ट्रैफिक बहुत था।"

अगर पार्टनर लेट आए: 👉 "उसे मेरी परवाह ही नहीं।"

✅ Reality Check: निष्कर्ष निकालने से पहले परिस्थिति समझिए।


5️⃣ Sunk Cost Fallacy 🔗

"इतना समय दिया है, अब कैसे छोड़ दूँ?"

कई लोग दुखी रिश्तों में सिर्फ इसलिए बने रहते हैं क्योंकि उन्होंने उसमें बहुत समय, भावनाएँ और ऊर्जा लगाई होती हैं।

✅ Reality Check: सवाल यह नहीं कि आपने कितना निवेश किया। सवाल यह है कि यह रिश्ता आपके भविष्य के लिए कैसा है।


6️⃣ Hindsight Bias 👀

"मुझे पहले से पता था ऐसा होगा।"

ब्रेकअप के बाद दिमाग अतीत को दोबारा लिख देता है।

हमें लगता है कि सारे संकेत पहले से साफ थे।

जबकि उस समय वे इतने स्पष्ट नहीं थे।

✅ Reality Check: अपने पुराने निर्णयों को आज की जानकारी से मत आंकिए।


7️⃣ Rosy Retrospection 🌹

"मेरा एक्स इतना भी बुरा नहीं था..."

समय बीतने के बाद दिमाग दर्द को कम और अच्छी यादों को बड़ा कर देता है।

फिर हम सिर्फ अच्छे पल याद रखते हैं और टूटने की वजह भूल जाते हैं।

✅ Reality Check: सिर्फ अच्छी यादें नहीं, रिश्ता क्यों खत्म हुआ था यह भी याद रखिए।


8️⃣ Spotlight Effect 🎭

"सब कुछ मेरे बारे में ही है।"

पार्टनर चुप है।

आप सोचते हैं: 👉 "वो मुझसे नाराज़ है।"

जबकि हो सकता है वह काम, तनाव या किसी निजी परेशानी से जूझ रहा हो।

✅ Reality Check: हर चीज़ को व्यक्तिगत मत बनाइए।


9️⃣ In-Group Bias 🏰

"कोई हमारे रिश्ते को नहीं समझ सकता।"

कभी-कभी हम दोस्तों और परिवार की genuine चिंताओं को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज कर देते हैं क्योंकि वे हमारी कहानी से मेल नहीं खातीं।

✅ Reality Check: अगर कई लोग एक जैसी चिंता व्यक्त कर रहे हैं, तो उसे सुनिए।


🔟 Availability Heuristic 📺

"जो आसानी से याद आता है, वही सच लगने लगता है।"

किसी दोस्त का तलाक हुआ। सोशल मीडिया पर cheating की कहानी देखी। एक breakup reel देख ली।

अब लगने लगता है कि हर रिश्ता टूटने वाला है।

✅ Reality Check: डर तथ्य पर आधारित है या हाल ही में देखी-सुनी बातों पर?


❤️ आखिर में एक बात याद रखिए...

स्वस्थ रिश्ते उन लोगों के बीच नहीं होते जिनके दिमाग में Biases नहीं होते।


स्वस्थ रिश्ते उन लोगों के बीच होते हैं जो यह पहचान लेते हैं कि:

✨ "हो सकता है अभी मेरा दिमाग पूरी सच्चाई न दिखा रहा हो।"

वे सवाल पूछते हैं। वे स्पष्टता मांगते हैं। वे भावनाओं और तथ्यों में फर्क करना सीखते हैं। 🌱


क्योंकि...

💔 रिश्ते अक्सर प्यार की कमी से नहीं टूटते, बल्कि गलत व्याख्याओं, अधूरी धारणाओं और अनजाने मानसिक जालों से टूटते हैं।

🧠 आपका दिमाग आपको धोखा दे सकता है... ✨ लेकिन जागरूकता आपको सच्चाई तक ले जा सकती है।


महिलाएँ मानसिक दबाव में

 बहुत-सी महिलाएँ लंबे समय तक ऐसे मानसिक दबाव में जीवन बिताती हैं, जिसे बाहर से आसानी से समझा नहीं जा सकता।परिवार की ज़िम्मेदारियाँ, रिश्तों का दबाव, अपनी भावनाओं को दबाकर रखना, हर समय मज़बूत बने रहने की कोशिश, सबको खुश रखने की आदत और बार-बार अपनी ज़रूरतों को पीछे कर देना।ये सब धीरे-धीरे शरीर पर भी गहरा असर डालने लगते हैं।

एक मनोवैज्ञानिक के रूप में मैं अक्सर ऐसे लोगों से मिलती हूँ, जो शुरुआत में शारीरिक समस्याओं की शिकायत लेकर आते हैं, लेकिन बातचीत के दौरान समझ आता है कि उनका शरीर दरअसल लंबे समय से चले आ रहे emotional stress की प्रतिक्रिया दे रहा है। मनुष्य का मस्तिष्क और शरीर एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।

जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक मानसिक दबाव में रहता है, तो शरीर का stress response system लगातार सक्रिय रहने लगता है।मानो शरीर हर समय किसी खतरे की स्थिति में हो। इसका प्रभाव hormones के संतुलन, नींद, पाचन, energy level और यहाँ तक कि immune system पर भी पड़ सकता है।

कई महिलाएँ बताती हैं कि उन्हें हर समय थकान महसूस होती है, लेकिन आराम करने के बाद भी वह थकान कम नहीं होती।किसी को बार-बार सिरदर्द होता है, किसी का दिल तेज़ धड़कता है, किसी को नींद नहीं आती।कई लोगों में पेट की समस्या, गैस, acidity, skin issues या अत्यधिक बाल झड़ने जैसी समस्याएँ भी दिखाई देती हैं।

अक्सर medical reports लगभग सामान्य आती हैं, लेकिन भीतर से वह व्यक्ति emotionally exhausted हो चुका होता है।

लंबे समय तक अपनी तकलीफ़, गुस्सा, डर या निराशा को दबाकर रखने की आदत nervous system पर भारी असर डालती है।

खासकर वे लोग, जिन्होंने बचपन से सब कुछ सहना सीखा हो, अपनी भावनाओं से पहले दूसरों की ज़रूरतों को महत्व दिया हो—उनमें chronic stress से जुड़ी शारीरिक समस्याएँ अधिक देखी जाती हैं।

कई महिलाओं में यह मानसिक दबाव menstrual health को भी प्रभावित करता है।

Periods का अनियमित होना, hormonal imbalance, unexplained fatigue, appetite changes या शरीर में लगातार भारीपन महसूस होनाये केवल शारीरिक समस्याएँ नहीं, कई बार emotional overload की अभिव्यक्ति भी होती हैं।

समस्या यह है कि हमारा समाज अब भी मानसिक तनाव को उतनी गंभीरता से समझना नहीं सीख पाया है।अक्सर लोग सोचते हैं कि व्यक्ति “ज़्यादा सोच रहा है” या “कमज़ोर हो गया है।”

लेकिन सच्चाई यह है कि लंबे समय तक untreated stress शरीर के भीतर वास्तविक biological changes पैदा कर सकता है।हर दर्द की रिपोर्ट नहीं बनती।हर थकान का कारण blood test में दिखाई नहीं देता।कई बार शरीर उसी भाषा में बोलना शुरू कर देता है,जिसे इंसान इतने वर्षों से शब्दों में कह नहीं पाया होता।

तुम कौन हो?

 तुम कौन हो?


कौन हो तुम, जो श्वासों में अनकहे सुर बन झरते हो,

मेरे सूने हृदय-मंदिर में दीपक-से क्यों जलते हो?


मैंने तो हर कण-बिंदु में केवल तुम्हें ही पाया है, 

ज्यों अनहद के सुदूर गगन में कोई नाद समाया है।


जब-जब जीवन-वीणा पर पीड़ा ने स्वर साधा है,

तब-तब तेरी स्मृतियों ने ही मेरा एकांत बाँधा है।


भूलूँ कैसे उस छवि को जो प्राण-वायु-सी बसती है,

धूम-रेख बन अमिट निरंतर इन श्वासों में रिसती है।


अब न मिलन की प्यास शेष, न लौकिक अभिलाषा,

केवल अंतस के पटल पर अलौकिक प्रेम  की भाषा।


यदि थककर यह देह कभी मिट्टी की गोद में सो जाए,

और अंतिम संध्या के दीपक की मद्धम लौ भी खो जाए,


मेरे अंतिम स्वप्न-द्वार पर तुम प्रियतम चले आना,

क्षण भर सजल-नयनों से इस धूलि को सहला जाना।


मैं समझूँगी असीम स्वयं बिछुड़े प्राणों से मिलने आया,

अंतिम ही सही, किंतु इस तन को सकृत् अपनाया।


तुमने यदि संशय सौंपा, मैंने उसे प्रसाद किया,

तुमने जो संताप दिया, मैंने उसे अह्लाद किया।


मेरा यह निस्सीम समर्पण याचना नहीं, आराधन है,

जैसे मीरा के अंतर में केवल श्याम का स्पंदन है।


तुम मेरे होकर भी कब थे? तुम तो नभ के तारे हो,

मैं पथ की धूलि भटकती, तुम युग-युग से न्यारे हो।


जोगन की अनबुझी व्यथा-सी मन की पीर पुकार रही,

पाकर भी जो पूर्ण न पाया, मैं उसी प्रेम की धार रही।


तुम सिंधु अगाध खड़े हो, मैं तट की तप्ती रेत बनी।

तुम व्योम की अनंत प्रभा, मैं ढलती क्षीण रागिनी।


तदपि न जाने किस बंधन से यह जीवन जुड़ जाता है,

जितना तुमसे दूरस्थ रहूं, उतना ही मुड़ आता है।


चाहे न स्वीकार करो, यह प्रेम क्षीण न हो पाएगा,

ज्यों दीपक अंतिम श्वास तक जलकर भी मुस्काएगा।


जब इतिहास समय का मेरे अस्तित्व को भूल जाएगा,

तब भी तेरे नाम का अक्षर मेरी राख तले गुनगुनाएगा 

सत्तर प्रतिशत बीमारियां मानसिक हैं

 मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि दुनिया में सत्तर प्रतिशत बीमारियां मानसिक हैं। 

सत्तर प्रतिशत, बड़ा अनुपात है! 

और ये सत्तर प्रतिशत बीमारियां ऐसी हैं जो तुम चाहते हो कि हो जायें। 

तुमने देखा, परीक्षा के वक्त बच्चे बीमार हो जाते हैं! परीक्षा के वक्त सारी दुनिया में बच्चों की बीमारियां एकदम बढ़ जाती हैं। 

क्योंकि बीमारी सुगम उपाय है बचने का। 

परीक्षा देने की जरूरत नहीं, बीमार हैं! 

या अगर देनी भी पड़ी परीक्षा और पास न हुए, तो भी कोई यह नहीं कह सकता कि कोई हमारी भूल हुई; बीमार थे। 

या अगर तृतीय श्रेणी में आये तो भी चलेगा, क्योंकि बीमार थे, क्या कर सकते हो? 

यह तो बीमारी बड़ी तरकीब बन गयी। 

और इस आदमी ने बीमारी के साथ संबंध जोड़ लिया स्वास्थ्य की बजाय।


मेरी अपनी देशना तो यही है कि जब बच्चे स्वस्थ हों, चाहो तो उन पर थोड़ा ज्यादा ध्यान दे देना; मगर बीमार हों तो ज्यादा ध्यान मत देना। 

ध्यान को स्वास्थ्य से जुड़ने दो। 

जब बच्चे मस्त हों, आनंदित हों, उनको गले लगा लेना; 

लेकिन जब बीमार हों तो कंबल उढ़ा कर उनको सुला देना। 

यह कठोर मालूम पड़ेगा। 


ऊपर से तो कठोर साफ ही लग रहा है। 

लगेगा कि यह भी क्या मैं उलटी बातें सिखा रहा हूं! 

ऐसे भी मैं उलटी ही बातें सिखाता हूं। 

लेकिन बच्चा बीमार हो तब उसे कंबल उढ़ा कर सुला देना; दवा पिला देना--बस ऐसे ही जैसे नर्स करती है। 

उस वक्त मातृत्व मत दिखलाना। 

सुविधा हो तो नर्स ही रख देना। 

वह ज्यादा अच्छा है। 

लेकिन जब बच्चा प्रसन्न हो, आनंदित हो, तो कभी उसे गले भी लगाना। 

उसका हाथ में हाथ लेकर नाचना भी। 

उसका स्वास्थ्य में रस जोड़ो, ताकि जिंदगी-भर उसका रस स्वास्थ्य में रहे, बीमारी में न हो जाये। 

दुनिया की सत्तर प्रतिशत बीमारियां समाप्त हो सकती हैं, अगर हम बच्चों का संबंध स्वास्थ्य से जोड़ दें।


और मां-बाप इतना ध्यान बच्चों की तरफ क्यों देते हैं, इसका तुमने कभी विचार किया? 


मनसविद कहते हैं अपराध के कारण। 

चौंकोगे तुम! 

मां-बाप को यह लगता रहता है कि बच्चों के लिए हमें जो करना चाहिए, हम नहीं कर पा रहे हैं। 

यह इससे अपराध-भाव पैदा होता है, गिल्ट पैदा होती है...कि देखो बगल के पड़ोसी ने तो बच्चे के लिए कार ले दी और हमारा बच्चा अभी भी एक फटीचर सायकिल पर ही चल रहा है! 

हम नहीं कर पा रहे हैं जो हमें करना चाहिए बेटे के लिए। 

तब क्या करें? 

तो कम-से-कम उसकी खुशामद तो कर ही सकते हैं, उसके ऊपर ज्यादा ध्यान तो दे ही सकते हैं। 

अतिशय रूप से उसकी चिंता तो कर ही सकते हैं। 

इतना तो किया जा सकता है।

यह पूर्ति है। 

लेकिन कोई इस तरह की पूर्ति से लाभ होनेवाला नहीं है। 

और चूंकि हम सच में प्रेम नहीं करते बच्चों को, इसलिए भी अपराध-भाव मालूम होता है। 

तो उस अपराध को छिपाने के लिए हम बच्चों को लिए खिलौने लायेंगे, आइस्क्रीम लायेंगे। 

उन बच्चों को हम बिगाड़ेंगे। 

वह अपराध-भाव से ही पैदा हो रही है बात।


प्रेम बढ़ेगा तो अपराध-भाव घट जायेगा। 

अपराध-भाव घट जाएगा तो अपराध-भाव के कारण जो-जो काम तुम कर रहे थे, वे बंद हो जायेंगे। 

तब जो करने योग्य है, जो जरूरी है वह होगा।

और इतना मैं जानता हूं कि ध्यान से जो मस्ती आती है, वह मस्ती एक अर्थ में बेहोशी लाती है और एक अर्थ में होश भी लाती है। 

वह मस्ती बड़ी विरोधाभासी है--होश और बेहोश एक साथ बढ़ता है। 


इस जगत में एक प्रतिशत से लेकर निन्यानबे प्रतिशत तक प्यार किया जा सकता है, लेकिन सौ प्रतिशत प्यार इस जगत में किसी से नहीं किया जा सकता। 

वह तो सिर्फ परमात्मा का अधिकार है। 

वह तो उसका हक है। 

वह तो हमें उसी को देना होगा। 

श्मशान बड़ा ही विचित्र गुरु है

 श्मशान बड़ा ही विचित्र गुरु है।


वह न किसी को शिष्य बनाता है, न उपदेश देता है, फिर भी जो उसकी निस्तब्धता को सुन ले, उसे जीवन का सबसे गहरा ज्ञान मिल जाता है।


वहाँ पहुँचकर न कोई बड़ा रहता है, न छोटा न धन की चमक बचती है, न पद का अहंकार। जो जीवन भर अपने नाम का ढोल पीटता रहा, वह भी अंत में उसी राख का हिस्सा बन जाता है।


इसलिए अघोर कहता है...


अपने नाम को बड़ा करने में जीवन मत गँवाओ, अपने भीतर को विशाल बनाओ।


क्योंकि अंत में संसार यह नहीं पूछेगा कि तुम कितने प्रसिद्ध थे, सत्य केवल यह देखेगा कि तुम कितने जागे हुए थे।


श्मशान कहे मुस्काय के, कैसा तेरा मान।

एक चिता की आग में, गल जाता अभिमान।