Saturday, June 27, 2026

सत्य किसी धर्म की संपत्ति नहीं है

 सबसे बड़ा चमत्कार क्या है?


एक बच्चा पैदा होता है...


न उसके माथे पर हिन्दू लिखा होता है,

न मुसलमान,

न ईसाई,

न जैन,

न बौद्ध।


वह न राम को जानता है,

न कृष्ण को,

न मोहम्मद को,

न ईसा को,

न महावीर को,

न बुद्ध को।


लेकिन कुछ ही वर्षों में वही बच्चा मरने-मारने को तैयार हो जाता है।


क्या कमाल का जादू है!


जिस बच्चे को सत्य का कोई पता नहीं था,

उसे सत्य का ठेकेदार बना दिया जाता है।


जिसने कभी भगवान को देखा नहीं,

वह भगवान के नाम पर लड़ने लगता है।


जिसने कभी आत्मा का अनुभव नहीं किया,

वह आत्मा पर भाषण देने लगता है।


जिसने कभी ध्यान नहीं किया,

वह मोक्ष के प्रमाणपत्र बांटने लगता है।


जिसने कभी सत्य को खोजा नहीं,

वह सत्य का एजेंट बन जाता है।


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मंदिर कहता है —

सत्य हमारे पास है।


मस्जिद कहती है —

सत्य हमारे पास है।


चर्च कहता है —

सत्य हमारे पास है।


मठ कहता है —

सत्य हमारे पास है।


आश्रम कहता है —

सत्य हमारे पास है।


मजेदार बात यह है कि

सत्य बेचारा आज तक यह नहीं बता पाया कि वह आखिर है किसके पास!


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बचपन से तुम्हारे दिमाग पर लिख दिया गया —


"यही आखिरी सत्य है।"


और तुमने बिना जांचे,

बिना परखे,

बिना जीए,

उसे स्वीकार कर लिया।


क्यों?


क्योंकि स्वीकार करना आसान है।


खोजना खतरनाक है।


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धर्म ने तुम्हें सत्य नहीं दिया।


धर्म ने तुम्हें पहचान दी।


और पहचान इतनी नशे की चीज है कि आदमी सत्य खो सकता है,

लेकिन अपनी पहचान नहीं छोड़ सकता।


यही कारण है कि लोग भगवान बदलने से ज्यादा आसानी से पत्नी बदल लेते हैं,

लेकिन अपने विश्वासों पर सवाल नहीं उठाते।


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सदियों से इंसानों के माथे पर शब्द लिखे जा रहे हैं।


कोई लिखता है — हिन्दू।


कोई लिखता है — मुसलमान।


कोई लिखता है — ईसाई।


कोई लिखता है — बौद्ध।


कोई लिखता है — जैन।


और फिर वही लोग पूरी जिंदगी चिल्लाते रहते हैं —


"मैं सही हूं!"


"मैं सही हूं!"


"मैं सही हूं!"


लेकिन किसी ने यह पूछने की हिम्मत नहीं की —


अगर तुम सही हो,

तो यह आवाज तुम्हारी है,

या तुम्हारे माथे पर लिखे हुए शब्दों की?


आचार्य रजनीश ने कहा था —


"सत्य किसी धर्म की संपत्ति नहीं है।"


जिस दिन तुम अपने विश्वासों को भी संदेह की आग में डाल दोगे,

उसी दिन पहली बार तुम्हारी मुलाकात सत्य से होगी।


उससे पहले तुम केवल किसी न किसी के लिखे हुए वाक्य को दोहरा रहे हो।


और दोहराना ज्ञान नहीं होता।


वह केवल प्रशिक्षित तोते की कला होती है।

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