मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि दुनिया में सत्तर प्रतिशत बीमारियां मानसिक हैं।
सत्तर प्रतिशत, बड़ा अनुपात है!
और ये सत्तर प्रतिशत बीमारियां ऐसी हैं जो तुम चाहते हो कि हो जायें।
तुमने देखा, परीक्षा के वक्त बच्चे बीमार हो जाते हैं! परीक्षा के वक्त सारी दुनिया में बच्चों की बीमारियां एकदम बढ़ जाती हैं।
क्योंकि बीमारी सुगम उपाय है बचने का।
परीक्षा देने की जरूरत नहीं, बीमार हैं!
या अगर देनी भी पड़ी परीक्षा और पास न हुए, तो भी कोई यह नहीं कह सकता कि कोई हमारी भूल हुई; बीमार थे।
या अगर तृतीय श्रेणी में आये तो भी चलेगा, क्योंकि बीमार थे, क्या कर सकते हो?
यह तो बीमारी बड़ी तरकीब बन गयी।
और इस आदमी ने बीमारी के साथ संबंध जोड़ लिया स्वास्थ्य की बजाय।
मेरी अपनी देशना तो यही है कि जब बच्चे स्वस्थ हों, चाहो तो उन पर थोड़ा ज्यादा ध्यान दे देना; मगर बीमार हों तो ज्यादा ध्यान मत देना।
ध्यान को स्वास्थ्य से जुड़ने दो।
जब बच्चे मस्त हों, आनंदित हों, उनको गले लगा लेना;
लेकिन जब बीमार हों तो कंबल उढ़ा कर उनको सुला देना।
यह कठोर मालूम पड़ेगा।
ऊपर से तो कठोर साफ ही लग रहा है।
लगेगा कि यह भी क्या मैं उलटी बातें सिखा रहा हूं!
ऐसे भी मैं उलटी ही बातें सिखाता हूं।
लेकिन बच्चा बीमार हो तब उसे कंबल उढ़ा कर सुला देना; दवा पिला देना--बस ऐसे ही जैसे नर्स करती है।
उस वक्त मातृत्व मत दिखलाना।
सुविधा हो तो नर्स ही रख देना।
वह ज्यादा अच्छा है।
लेकिन जब बच्चा प्रसन्न हो, आनंदित हो, तो कभी उसे गले भी लगाना।
उसका हाथ में हाथ लेकर नाचना भी।
उसका स्वास्थ्य में रस जोड़ो, ताकि जिंदगी-भर उसका रस स्वास्थ्य में रहे, बीमारी में न हो जाये।
दुनिया की सत्तर प्रतिशत बीमारियां समाप्त हो सकती हैं, अगर हम बच्चों का संबंध स्वास्थ्य से जोड़ दें।
और मां-बाप इतना ध्यान बच्चों की तरफ क्यों देते हैं, इसका तुमने कभी विचार किया?
मनसविद कहते हैं अपराध के कारण।
चौंकोगे तुम!
मां-बाप को यह लगता रहता है कि बच्चों के लिए हमें जो करना चाहिए, हम नहीं कर पा रहे हैं।
यह इससे अपराध-भाव पैदा होता है, गिल्ट पैदा होती है...कि देखो बगल के पड़ोसी ने तो बच्चे के लिए कार ले दी और हमारा बच्चा अभी भी एक फटीचर सायकिल पर ही चल रहा है!
हम नहीं कर पा रहे हैं जो हमें करना चाहिए बेटे के लिए।
तब क्या करें?
तो कम-से-कम उसकी खुशामद तो कर ही सकते हैं, उसके ऊपर ज्यादा ध्यान तो दे ही सकते हैं।
अतिशय रूप से उसकी चिंता तो कर ही सकते हैं।
इतना तो किया जा सकता है।
यह पूर्ति है।
लेकिन कोई इस तरह की पूर्ति से लाभ होनेवाला नहीं है।
और चूंकि हम सच में प्रेम नहीं करते बच्चों को, इसलिए भी अपराध-भाव मालूम होता है।
तो उस अपराध को छिपाने के लिए हम बच्चों को लिए खिलौने लायेंगे, आइस्क्रीम लायेंगे।
उन बच्चों को हम बिगाड़ेंगे।
वह अपराध-भाव से ही पैदा हो रही है बात।
प्रेम बढ़ेगा तो अपराध-भाव घट जायेगा।
अपराध-भाव घट जाएगा तो अपराध-भाव के कारण जो-जो काम तुम कर रहे थे, वे बंद हो जायेंगे।
तब जो करने योग्य है, जो जरूरी है वह होगा।
और इतना मैं जानता हूं कि ध्यान से जो मस्ती आती है, वह मस्ती एक अर्थ में बेहोशी लाती है और एक अर्थ में होश भी लाती है।
वह मस्ती बड़ी विरोधाभासी है--होश और बेहोश एक साथ बढ़ता है।
इस जगत में एक प्रतिशत से लेकर निन्यानबे प्रतिशत तक प्यार किया जा सकता है, लेकिन सौ प्रतिशत प्यार इस जगत में किसी से नहीं किया जा सकता।
वह तो सिर्फ परमात्मा का अधिकार है।
वह तो उसका हक है।
वह तो हमें उसी को देना होगा।
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