तुम्हें किसी ने कैद नहीं किया...
तुम्हारी पहली बेड़ी लोहे की नहीं थी,
वह एक विचार था—
"लोग क्या कहेंगे?"
फिर दूसरी बेड़ी आई—
"ऐसा करना ठीक नहीं लगता..."
फिर तीसरी—
"मेरे पति क्या सोचेंगे?"
फिर चौथी—
"मेरे माता-पिता, मेरे दोस्त, मेरा समाज क्या कहेगा?"
और देखते-देखते तुमने अपने ही हाथों से
अपने पैरों में, अपने हाथों में, अपने दिल में, अपनी आत्मा में
जंजीरें डाल लीं।
एक-एक कड़ी जोड़ते गए...
एक-एक ताला लगाते गए...
और फिर एक दिन चीख उठे—
"कोई मुझे बचाओ!"
लेकिन तुम्हें बचाने कौन आए?
जिस जेल का दरवाज़ा तुमने खुद बंद किया हो,
उसकी चाबी किसी और के पास नहीं होती।
सच यह है कि...
तुम्हारे शरीर पर कोई जंजीर नहीं है।
तुम्हारी आत्मा पर धारणाओं का बोझ है।
तुम्हें समाज ने बेड़ियाँ नहीं पहनाईं,
समाज ने सिर्फ बेड़ियाँ दिखाईं थीं।
उन्हें पहनने का फैसला तुम्हारा था।
जब तुम पैदा हुए थे, न कोई धर्म था, न कोई जाति, न कोई प्रतिष्ठा, न कोई डर, न कोई "लोग क्या कहेंगे"।
तुम खुले आकाश की तरह थे।
फिर धीरे-धीरे तुम्हारी उड़ान छीन ली गई, और सबसे दुखद बात यह है कि उड़ान छीनने वालों से ज़्यादा तुमने खुद अपनी पंख काटे।
आज भी देर नहीं हुई।
एक सवाल पूछो खुद से—
क्या मैं अपनी जिंदगी जी रहा हूँ,
या दूसरों की अपेक्षाओं का किरदार निभा रहा हूँ?
जिस स दिन यह सवाल ईमानदारी से पूछ लिया, उसी दिन पहली बेड़ी टूट जाएगी।
याद रखो—
आज़ादी कोई उपहार नहीं है,
आज़ादी साहस है।
साहस यह कहने का—
"मैं वही बनूँगा जो मेरा हृदय चाहता है,
न कि जो दुनिया मुझसे चाहती है।"
उठो।
जंजीरें तोड़ो।
क्योंकि कैदी भी तुम हो, जेलर भी तुम हो, और चाबी भी तुम्हारे ही पास है।
जिस दिन तुमने "लोग क्या कहेंगे" को मार दिया,
उसी दिन तुम्हारा नया जन्म होगा।
🔥 अपनी आत्मा को समाज की अदालत से रिहा कर दो।
🔥 तुम्हारा जीवन किसी और की राय से बड़ा है।
🔥 जंजीरें टूटने का इंतज़ार मत करो, उन्हें तोड़ दो।
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