अनंत ब्रह्मांड के प्रेम में
तुम्हारे लिपटे हुए सुवासित केशों को
अगर मैं सर्पिलाकार आकाशगंगाएँ मान लूँ,
तो यकीन मानो, मैं हर रात अपनी समस्त दिशाएँ खो देना चाहूँगा उनकी घुमावदार रहस्यमयी कक्षाओं में।
तुम्हारी आँखें एक सूर्य, एक चंद्रमा,
एक में तपता हुआ जीवन, दूसरी में बहता हुआ अमृत,
और मैं, एक आवारा ग्रह की तरह, सदियों से तुम्हारे आकर्षण के गुरुत्व में बंधा हुआ।
तुम्हारे बाएँ गाल पर स्थित वह तिल मुझे पृथ्वी-सा प्रतीत होता है,
जहाँ मेरे समस्त मौसम जन्म लेते हैं, जहाँ मेरी प्रतीक्षा के जंगल उगते हैं, जहाँ मेरी इच्छाओं की नदियाँ समुद्र तलाशती हैं।
और जब तुम अपने केशों की आकाशगंगाएँ खोल देती हो,
तो लगता है मानो सम्पूर्ण ब्रह्मांड ने अपना रात्रि-वस्त्र त्यागकर प्रेम का उत्सव आरम्भ कर दिया हो।
तुम्हारी निकटता तब किसी खगोलीय घटना जैसी लगती है,
जैसे सहस्राब्दियों बाद दो नक्षत्र एक-दूसरे के सामने आए हों, और उनके बीच प्रकाश की नहीं, स्पंदनों की वर्षा हो रही हो।
मैं तुम्हारे समीप आता हूँ वैसे ही जैसे कोई सूफ़ी अपने अंतिम सत्य के निकट पहुँचता है,
काँपते हुए, विस्मित होते हुए, और स्वयं को भूलते हुए।
तुम्हारी साँसों की गरमाहट मेरे भीतर अनगिनत धूमकेतु जगा देती है,
और मेरी धड़कनें तुम्हारी धड़कनों के चारों ओर वैसे ही परिक्रमा करने लगती हैं जैसे ग्रह अपने प्रिय सूर्य के चारों ओर।
तब प्रेम सिर्फ प्रेम नहीं रहता,
वह अनहद की धुन बन जाता है, वह दरवेश का समर्पण बन जाता है, वह फकीर की अंतिम प्रार्थना बन जाता है।
और मैं तुम्हारे उस छोटे-से तिल को देखकर बार-बार यही सोचता हूँ—
यदि यह पृथ्वी है, यदि तुम्हारी आँखें सूर्य और चंद्रमा हैं, और यदि तुम्हारे केश अनंत आकाशगंगाएँ हैं,
तो हाँ,
मैं केवल तुमसे नहीं,
मैं इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड से प्रेम करता हूँ, जो तुम्हारे रूप में मेरे सामने खड़ा है।
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