Saturday, June 27, 2026

तुम्हारी देह

 तुम्हारी देह


मेरे लिए कोई भूखी कामना नहीं,


बल्कि उस दरवेश की दुआ है जो बरसों से एक ही चौखट पर बैठा अपने रब का इंतज़ार कर रहा हो।


मैंने तुम्हें आँखों से कम, आत्मा से अधिक छुआ है।


जैसे कोई सूफ़ी पहली बार सुनता है अपने भीतर बजती हुई अनहद की धुन।


तुम्हारी गर्दन पर ठहरा हुआ एक क्षण


मुझे वैसा ही पवित्र लगता है जैसे किसी फ़क़ीर को अचानक मिल जाए अपनी तलाश का उत्तर।


तुम्हारे होंठों की मुस्कान में


मैंने कई बार देखा है फिरदौस का खुलता हुआ दरवाज़ा,


जहाँ न कोई भय है, न कोई विरह,


सिर्फ़ प्रेम का उजाला है।


तुम्हारी देह पर समय की हल्की-हल्की छायाएँ


वैसी ही सुंदर हैं जैसे रेगिस्तान में हवा के बनाए हुए नक़्श,


क्षणभंगुर, पर अनंत।


और मैं,


एक भटकता हुआ दरवेश,


हर जन्म, हर दिशा, हर प्रार्थना में


तुम्हारी ही ओर लौटता हूँ।


क्योंकि तुमसे प्रेम करना


किसी व्यक्ति से प्रेम करना नहीं,


बल्कि उस फिरदौस की तलाश है


जिसका रास्ता तुम्हारी आत्मा से होकर जाता है।

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