श्मशान बड़ा ही विचित्र गुरु है।
वह न किसी को शिष्य बनाता है, न उपदेश देता है, फिर भी जो उसकी निस्तब्धता को सुन ले, उसे जीवन का सबसे गहरा ज्ञान मिल जाता है।
वहाँ पहुँचकर न कोई बड़ा रहता है, न छोटा न धन की चमक बचती है, न पद का अहंकार। जो जीवन भर अपने नाम का ढोल पीटता रहा, वह भी अंत में उसी राख का हिस्सा बन जाता है।
इसलिए अघोर कहता है...
अपने नाम को बड़ा करने में जीवन मत गँवाओ, अपने भीतर को विशाल बनाओ।
क्योंकि अंत में संसार यह नहीं पूछेगा कि तुम कितने प्रसिद्ध थे, सत्य केवल यह देखेगा कि तुम कितने जागे हुए थे।
श्मशान कहे मुस्काय के, कैसा तेरा मान।
एक चिता की आग में, गल जाता अभिमान।
No comments:
Post a Comment