Thursday, February 12, 2026

हर इंसान की दुनिया अलग है

 आज के समय में ध्यान को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि उसके लिए अलग से समय चाहिए, एक शांत कमरा चाहिए, बंद आँखें चाहिए, और जीवन से थोड़ी दूरी चाहिए। जबकि सच यह है कि आज का मनुष्य दूरी नहीं, समावेश चाहता है। उसके पास बैठने का समय नहीं है, पर जीने का समय है। और जहाँ जीवन है, वहीं ध्यान भी हो सकता है।


आज कोई रातभर काम करता है, कोई अचानक मीटिंग में फँस जाता है, कोई यात्रा में है, कोई जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा है। ऐसे में अगर हम कहें कि “सुबह पाँच बजे बैठो, तभी शांति मिलेगी”, तो यह बात ज़्यादातर लोगों के लिए बोझ बन जाती है। ध्यान बोझ नहीं है। ध्यान तो राहत है।


हर इंसान की दुनिया अलग है। किसी का मन संगीत में घुल जाता है, किसी का पेड़ों को देखकर ठहरता है, कोई चलते-चलते भीतर उतर जाता है, कोई गाड़ी चलाते हुए, कोई अपने बच्चों को नहलाते समय, कोई रसोई में, कोई काम करते हुए, कोई प्रेम में, कोई मिलन के क्षणों में। रास्ते अलग हैं, अनुभव अलग हैं, लक्ष्य भी अलग हैं। इसलिए ध्यान का कोई एक आकार नहीं हो सकता।


अक्सर ऐसा भी होता है कि कुछ लोगों को एक ही विधि से शांति मिल जाती है। इसका कारण यह नहीं कि वही तरीका सबसे सही है, बल्कि इसलिए कि उन्होंने मन में पहले ही मान लिया होता है कि यही उन्हें शांति देगा। मन जहाँ भरोसा कर लेता है, वहाँ दरवाज़ा अपने आप खुल जाता है।


असल बात विधि की नहीं, उपस्थिति की है।


जब आप जो कर रहे हैं, उसमें पूरी तरह होते हैं तो वही ध्यान है।

जब आपकी इंद्रियाँ, आपका शरीर और आपका मन एक ही क्षण में हों तो वही ध्यान है।


देखिए, जब कोई खतरा सामने होता है, तब मन कहीं भटकता नहीं।

जब आपका बच्चा कुछ नया बना रहा होता है, तब आपकी पूरी चेतना उसी पर टिक जाती है।

उन क्षणों में कोई अभ्यास नहीं होता, फिर भी आप पूरी तरह जाग्रत होते हैं।


यही बात रोज़मर्रा के कामों में भी हो सकती है।


आप खाना बना रहे हैं तो मसालों की खुशबू को महसूस कीजिए, उबलते पानी की आवाज़ सुनिए, सब्ज़ी के रंग देखिए, चम्मच की हलचल को जानिए। उस समय सिर में बीते या आने वाले विचार चल रहे हों, तो उन्हें जाने दीजिए। काम मत छोड़िए। देखिएगा थोड़ी देर बाद ध्यान फिर लौट आता है। कभी ध्यान गायब, कभी विचार गायब यह खेल चलता रहता है। इसमें घबराने की कोई बात नहीं।


आप किसी रिश्ते में हैं तो सामने वाले की बात को सचमुच सुनिए। सिर्फ जवाब देने के लिए नहीं, समझने के लिए। अपने शब्दों को बोलते समय भी सजग रहिए कि वे कहाँ से आ रहे हैं। उस क्षण में मौजूद रहना ही सबसे बड़ी निकटता है।


आप दफ़्तर में हैं तो सिर्फ काम न करें, काम को देखें। आप क्या बना रहे हैं, किस दिशा में जा रहे हैं, आपका योगदान किस जगह जुड़ रहा है इस पर ठहरकर नजर डालिए। वहाँ भी गहराई संभव है।


आप चल रहे हैं तो कदमों की गति को जानिए।

आप गाड़ी चला रहे हैं तो सड़क, मोड़, आकाश, अपनी साँस सबको एक साथ महसूस कीजिए।

आप प्रेम में हैं तो उस क्षण को जल्दी खत्म करने की बजाय उसमें उतरिए।


ध्यान का मतलब जीवन से भागना नहीं है।

ध्यान का मतलब जीवन में पूरी तरह उतर जाना है।


हम अक्सर सोचते हैं कि ध्यान करने से जीवन बेहतर होगा।

पर सच यह है कि जीवन को बेहतर ढंग से जीना ही ध्यान है।


शुरुआत में यह टिकता नहीं। कुछ सेकंड में मन भाग जाता है। यह स्वाभाविक है। उसे जाने दीजिए। बस इतना ध्यान रखिए कि आप अपना काम न छोड़ें। धीरे-धीरे आप देखेंगे कि मन भागकर लौट आता है जैसे बच्चा खेलकर माँ की गोद में वापस आ जाता है।


आख़िरकार बात इतनी ही है 

आप जो कर रहे हैं, उसी में हो जाना।

आप जो सोच रहे हैं, उसे देखते रहना।

बिना खींचे, बिना रोके।


ध्यान कोई अलग चीज़ नहीं है जिसे जीवन में जोड़ना पड़े।

ध्यान वही है जो तब प्रकट होता है, जब जीवन से कुछ भी छूटा नहीं होता।


और शायद इसी कारण, जब यह समझ उतरती है, तो इंसान को कहीं जाने की जल्दी नहीं रहती

क्योंकि वह जहाँ है, वहीं पूरा है। 

Wednesday, February 11, 2026

किस बीमारी में कौनसा ड्राई फ्रूट्स खाना है

किस बीमारी में कौनसा ड्राई फ्रूट्स खाना है लाभकारी,किस तरह करे सेवन 


बादाम — याददाश्त कमजोर


काजू — कमजोरी/थकान


किशमिश — खून की कमी (एनीमिया)


अखरोट — दिमागी कमजोरी


पिस्ता — हाई कोलेस्ट्रॉल


खजूर — शरीर में खून की कमी


अंजीर (सूखा) — कब्ज


मुनक्का — खांसी


खुबानी (सूखी) — त्वचा रूखापन


काली किशमिश — जोड़ों का दर्द


चिलगोजा — दिल की कमजोरी


मखाना — हाई ब्लड प्रेशर


नारियल (सूखा/खोपरा) — पाचन कमजोरी


कद्दू के बीज — प्रोस्टेट समस्या


तरबूज के बीज — मूत्र जलन


सूरजमुखी के बीज — थकान/कम ऊर्जा


तिल (सफेद) — हड्डियों की कमजोरी


अलसी के बीज — कब्ज/गैस


खसखस — नींद की समस्या


ब्राजील नट — थायराइड समस्या


 कैसे करें सेवन (सरल तरीका) दिया गया है 👇


बादाम — रात में 6–8 भिगोकर सुबह छीलकर खाएं।


काजू — 4–5 काजू सुबह या दोपहर में दूध/पानी के साथ।


किशमिश — 10–12 किशमिश रात में भिगोकर सुबह खाएं।


अखरोट — 2–3 अखरोट सुबह खाली पेट।


पिस्ता — 8–10 पिस्ता दोपहर में स्नैक की तरह।


खजूर — 2 खजूर सुबह दूध के साथ।


अंजीर (सूखा) — 1–2 अंजीर रात में भिगोकर सुबह।


मुनक्का — 8–10 मुनक्का रात में भिगोकर सुबह।


सूखी खुबानी — 2–3 खुबानी भिगोकर सुबह।


काली किशमिश — 10–12 रात में भिगोकर सुबह।


चिलगोजा — 1 मुट्ठी सुबह या शाम।


मखाना — भूनकर 1 कटोरी शाम को।


सूखा नारियल (खोपरा) — 1–2 टुकड़े सुबह।


कद्दू के बीज — 1 छोटी मुट्ठी सुबह।


तरबूज के बीज — भूनकर 1 छोटी मुट्ठी।


सूरजमुखी के बीज — सलाद में मिलाकर या भूनकर।


सफेद तिल — 1 चम्मच भुने तिल सुबह गुनगुने पानी के साथ।


अलसी के बीज — 1 चम्मच भिगोकर/पीसकर सुबह।


खसखस — दूध में उबालकर रात में।


ब्राजील नट — 1 नट प्रतिदिन (ज्यादा नहीं)।


खुद से न लड़े… खुद को दोस्त बनाए

 खुद से न लड़े… खुद को दोस्त बनाए


अक्सर इंसान की ज़िंदगी लड़ाई में ही गुजर जाती है।

कभी जीत की चाह में, कभी हार के डर में।

लड़ाई में हमेशा दो ही परिणाम होते हैं हार या जीत।

और हैरानी की बात यह है कि जीतने वाला भी शांत नहीं होता,

और हारने वाला टूट जाता है।


लड़ाई के बाद किसी को थोड़ा फायदा मिलता है,

तो किसी को गहरा नुकसान।

लेकिन सुकून, संतुलन और स्पष्टता

ये शायद ही किसी के हिस्से आती हैं।


आज इंसान की प्रवृत्ति को धीरे-धीरे

लड़ाकू स्वभाव में बदला जा रहा है।

दुनिया को कुछ ताकतवर लोग इस तरह डिज़ाइन कर रहे हैं

कि हर चीज़ युद्ध जैसी दिखने लगी है।


पढ़ाई अब सीखने की प्रक्रिया नहीं रही,

वह प्रतियोगिता बन गई है।

रिश्ते अपनापन नहीं रहे,

वे तुलना और शर्तों में बदल गए हैं।

पहचान आत्मबोध नहीं,

ब्रांड और स्टेटस बन गई है।


घर, ज़मीन, सामान

सब कुछ पाने की दौड़ बन गया है।

रोज़गार और व्यापार रचना नहीं,

प्रतिस्पर्धा की जंग बन चुके हैं।

यहाँ तक कि पहनावा, खान-पान

और दिखावा भी मुकाबले में बदल गया है।


धीरे-धीरे इंसान इस दुनिया को

रणक्षेत्र समझने लगता है।

क्योंकि उसका दिमाग़ उसी तरह ढाला जा रहा है।


जैसा माहौल होता है,

वैसा ही दिमाग़ बनता है।

अगर चारों ओर संघर्ष है,

तो भीतर भी संघर्ष पैदा होगा।

अगर चारों ओर तुलना है,

तो आत्म-संदेह जन्म लेगा।


तो फिर इंसान करे क्या?


क्या सब छोड़ दे?

क्या जंगल चला जाए?

नहीं।


समाधान भागने में नहीं है,

समाधान है भीतर की दिशा बदलने में।


इंसान जाने-अनजाने उसी भीड़ का हिस्सा बन जाता है।

लड़ता है, दौड़ता है,

खुद को साबित करने में लगा रहता है।

पूरी ज़िंदगी किसी न किसी से आगे निकलने की कोशिश में निकल जाती है।


और फिर सवाल उठता है

“आपने बिना लड़े क्या हासिल किया है?”


लेकिन असली सवाल यह होना चाहिए

जो आपने हासिल किया,

क्या वह सच में लड़ाई थी?

या आप पहले से ही उसके काबिल थे?


लड़ाई और प्रयास का अंतर


लड़ाई वहाँ होती है जहाँ


डर प्रेरणा बन जाए


तुलना ईंधन बन जाए


अहंकार दिशा तय करे


प्रयास वहाँ होता है जहाँ


स्पष्टता हो


धैर्य हो


खुद से ईमानदारी हो


लड़ाई थका देती है।

प्रयास निखार देता है।


जो इंसान हर समय लड़ रहा है,

वह असल में दूसरों से नहीं,

अपने भीतर के डर से लड़ रहा होता है।


सिस्टम आपको लड़ाकू क्यों बनाना चाहता है?


क्योंकि शांत इंसान को नियंत्रित करना मुश्किल होता है।

जागरूक इंसान को डराना मुश्किल होता है।

और जो खुद से संतुष्ट है,

वह आसानी से खरीदा नहीं जा सकता।


इसलिए पहले...

कमी का एहसास पैदा किया जाता है।

फिर डर।

फिर प्रतियोगिता।

और अंत में

“तुम काफी नहीं हो” का भाव।


और इंसान दौड़ता रहता है

बिना यह पूछे कि

दौड़ किस दिशा में है?


भीड़ से अलग रास्ता


जो इस भीड़ का हिस्सा नहीं बनता,

वही अलग पथ पर चलता है।


वह रास्ता आसान नहीं होता।

वहाँ ताली नहीं मिलती।

वहाँ तुरंत पहचान नहीं मिलती।


लेकिन वहीं

गहराई मिलती है।

स्पष्टता मिलती है।

और असली आत्मसम्मान जन्म लेता है।


अलग रास्ता चुनने वाला इंसान

धीरे चलता है,

लेकिन भटकता नहीं।


सफल वही नहीं जो सबसे आगे है।

सफल वह है

जो रात को चैन से सो सके।

जिसे खुद से नज़र चुरानी न पड़े।

जिसकी ऊर्जा टूटी न हो।


अगर आपने बहुत कुछ पाया,

लेकिन खुद को खो दिया

तो वह सौदा बहुत महँगा था।


जीवन युद्ध नहीं, साधना है


जीवन कोई युद्ध नहीं है

जहाँ सबको हराना हो।

यह कोई प्रतियोगी परीक्षा नहीं है।


जीवन एक साधना है

सीखने की,

समझने की,

और परिपक्व होने की।


यहाँ कोई दुश्मन नहीं,

सिर्फ अलग-अलग यात्राएँ हैं।


जिस दिन इंसान यह समझ लेता है


 “मुझे किसी से आगे नहीं निकलना,

मुझे बस खुद के करीब पहुँचना है।”


उसी दिन लड़ाई खत्म हो जाती है।


और जब लड़ाई खत्म होती है,

तब जीवन शुरू होता है।


Monday, February 9, 2026

अपडेट का दौर और बदलता अपराध

 अपडेट का दौर और बदलता अपराध


आज का युग अपडेट का युग है। समय के साथ हर चीज़ बदल रही है विज्ञान, तकनीक, सोच और स्वयं मनुष्य भी। जो व्यक्ति, समाज या व्यवस्था इस बदलाव को स्वीकार नहीं करती, वह धीरे-धीरे पीछे छूट जाती है। यह नियम जितना विकास पर लागू होता है, उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण रूप से अपराध पर भी लागू हो रहा है।


जहाँ एक ओर तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, वहीं दूसरी ओर उसी तकनीक का दुरुपयोग कर अपराधियों ने अपराध के नए-नए रास्ते खोज लिए हैं। अपराध अब केवल गलियों या अँधेरी रातों तक सीमित नहीं रहा, वह मोबाइल स्क्रीन, कॉल, लिंक और ऐप्स के ज़रिए हमारे घरों में प्रवेश कर चुका है।


"डिजिटल युग का अपडेटेड अपराध"


आज का अपराधी हथियारों से ज़्यादा डेटा और तकनीक पर भरोसा करता है।

ऑनलाइन अपराधों के तरीके लगातार विकसित हो रहे हैं...


कभी दंपति या परिवार को ऑनलाइन वीडियो कॉल के ज़रिए बंधक बनाकर करोड़ों की वसूली की जाती है।


कभी कुछ सेकंड की फर्जी वीडियो क्लिप दिखाकर लोगों को डराया और लूटा जाता है।


फर्जी कॉल कर OTP हासिल किया जाता है और पल भर में बैंक अकाउंट खाली हो जाता है।


ऑनलाइन गेम और ऐप्स के नाम पर लोगों को “आसान कमाई” का सपना दिखाकर सीधा पैसा निकाल लिया जाता है।


एक अनजान-सा लिंक क्लिक करते ही मेहनत की कमाई उड़ जाती है।


इन अपराधों की सबसे खतरनाक बात यह है कि इनमें शारीरिक हिंसा नहीं दिखती, इसलिए लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते जब तक वे स्वयं इसका शिकार न बन जाएँ।


"शारीरिक अपराध और उनका बदला हुआ स्वरूप"


डिजिटल अपराधों के साथ-साथ शारीरिक अपराध भी कम नहीं हुए हैं, बल्कि उनके तरीके और ज़्यादा चतुर और छिपे हुए हो गए हैं।

आज कई अपराध ऐसे हैं जो खुले में नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे होते हैं।


कुछ अपराधों के शिकार लोग सब कुछ जानते हुए भी चुप रहते हैं...


कभी सामाजिक बदनामी के डर से


कभी परिवार टूटने की आशंका से


तो कभी आर्थिक या भावनात्मक मजबूरी के कारण


कभी डर के कारण 


"घरेलू अपराध: जो दिखता नहीं, पर सबसे गहरा है"


घरेलू अपराध समाज का वह अंधेरा सच है जिसका कोई ठोस आँकड़ा मौजूद नहीं है।

खासतौर पर महिलाएँ इसका सबसे बड़ा शिकार होती हैं।


अक्सर ऐसा होता है कि....


पीड़िता सब सहती रहती है, पर बोल नहीं पाती


परिवार जानकर भी “घर की बात है” कहकर दबा देता है


समाज इज़्ज़त और बदनामी के तराज़ू में सच को तौल देता है


अगर घरेलू अपराधों का वास्तविक डेटा सामने आ जाए, तो शायद यह भ्रम टूट जाए कि यह केवल अशिक्षित या कमजोर वर्ग की समस्या है। हकीकत यह है कि अच्छे-अच्छे, पढ़े-लिखे और प्रतिष्ठित लोग भी इसके शिकार होते हैं।


"समस्या की जड़ और समाधान की ज़रूरत"


अपराध का अपडेट होना इस बात का संकेत है कि....


हमारी जागरूकता अभी भी पीछे है


कानून और सामाजिक सोच में तालमेल की कमी है


पीड़ित को आज भी अपराधी से ज़्यादा सवालों का सामना करना पड़ता है


समाधान केवल कानून से नहीं आएगा, बल्कि


डिजिटल जागरूकता


खुली बातचीत


पीड़ित को दोषी ठहराने की मानसिकता का अंत


और समय के साथ सोच को अपडेट करने से ही आएगा


बदलाव प्रकृति का नियम है। अगर हम बदलाव के साथ खुद को अपडेट नहीं करेंगे, तो अपराध हमसे एक कदम आगे ही रहेगा।

ज़रूरत इस बात की है कि हम तकनीक का इस्तेमाल केवल सुविधा के लिए नहीं, बल्कि सावधानी और समझदारी के साथ करें, और उन अपराधों को भी पहचानें जो शोर नहीं मचाते, लेकिन अंदर ही अंदर इंसान को तोड़ देते हैं।


क्योंकि अपराध का सबसे खतरनाक रूप वही होता है,

जो दिखता नहीं, पर रोज़ घटता है।

पूजा से पहले स्नान क्यूँ

 पूजा से पहले स्नान: केवल एक रस्म नहीं, एक गहरा विज्ञान 

हम अक्सर सुनते हैं कि पूजा-पाठ, जप या होम से पहले स्नान अनिवार्य है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसके पीछे का वास्तविक कारण क्या है? हमारे शास्त्र इस पर क्या कहते हैं?

यह सिर्फ शरीर की धूल-मिट्टी धोने के बारे में नहीं है, बल्कि यह मन और आत्मा की शुद्धि की पहली सीढ़ी है।

📜 शास्त्रों का मत:

1️⃣ कूर्मपुराण के अनुसार, सोये हुए व्यक्ति के मुख से निरंतर लार बहती है, जिससे शरीर अशुद्ध हो जाता है। प्रातः स्नान न केवल इस अशुद्धि को दूर करता है, बल्कि दुःस्वप्न और बुरे विचारों का भी नाश करता है।

2️⃣ भविष्यपुराण स्पष्ट करता है कि स्नान के बिना चित्त की निर्मलता और भावशुद्धि संभव नहीं है।

3️⃣ देवीभागवत में चेतावनी दी गई है कि स्नान किए बिना किए गए दिन भर के सभी कर्म फलहीन हो जाते हैं।

✨ दो प्रकार की पवित्रता:

केवल जल और साबुन से बाहरी शरीर को धोना ही पर्याप्त नहीं है। सच्ची पवित्रता तब आती है जब बाहरी स्नान के साथ-साथ 'भीतरी स्नान' भी हो।

बाहरी शुद्धि: जल और सात्विक आहार से।

भीतरी शुद्धि: काम, क्रोध, लोभ और अहंकार जैसे विकारों को त्यागने से।

🌿 स्नान के 10 अद्भुत लाभ (विश्वामित्र स्मृति):

विधिपूर्वक प्रातः स्नान करने वाले को रूप, तेज, बल, पवित्रता, आयु, आरोग्य, निर्लोभता, तप, मेधा (बुद्धि) की प्राप्ति होती है और दुःस्वप्नों का नाश होता है।

निष्कर्ष:

स्कंदपुराण कहता है, "जिसने मन का मैल धो डाला है, वही वास्तव में शुद्ध है।" इसलिए, अगली बार जब आप पूजा से पहले स्नान करें, तो केवल शरीर को नहीं, अपने मन को भी विकारों से मुक्त करने का संकल्प लें।

बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए संपूर्ण, शास्त्रीय और व्यावहारिक मार्ग

 बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए संपूर्ण, शास्त्रीय और व्यावहारिक मार्ग 


🔹 चरण 1: संस्कार की नींव (घर से शुरुआत)


• माता-पिता का आचरण ही पहला पाठ

• सत्य, अनुशासन और करुणा का दैनिक अभ्यास

• तुलना नहीं, आत्मविश्वास का पोषण


🔹 चरण 2: शिक्षा व बुद्धि-विकास (बुध–बृहस्पति संतुलन)


• प्रतिदिन अध्ययन का निश्चित समय

• माँ सरस्वती की वंदना / “ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः” (11 जप)

• बुधवार को हरी सब्ज़ी / फल का सेवन शुभ


🔹 चरण 3: दिनचर्या और मानसिक स्थिरता


• ब्रह्ममुहूर्त में उठने की आदत

• 5–10 मिनट प्राणायाम व मौन अभ्यास

• पर्याप्त नींद और स्क्रीन-टाइम सीमित


🔹 चरण 4: वास्तु व वातावरण (शिक्षा-अनुकूल ऊर्जा)


• पढ़ाई की दिशा: पूर्व या उत्तर

• स्टडी टेबल साफ और रोशनी पर्याप्त

• सकारात्मक प्रतीक: पिरामिड / पौधा / दीपक


🔹 चरण 5: आहार और शारीरिक ऊर्जा


• सात्त्विक, घर का बना भोजन

• जंक फूड और अधिक मीठा सीमित

• जल पीने की सही आदत


🔹 चरण 6: आधुनिक कौशल + रचनात्मकता


• पढ़ाई के साथ खेल, संगीत या कला

• डिजिटल संतुलन—टेक्नोलॉजी साधन बने, बाधा नहीं

• छोटे निर्णय स्वयं लेने दें (निर्णय-क्षमता विकसित होती है)


🔹 चरण 7: माता-पिता के लिए शास्त्रीय संदेश ❤️


• उपदेश कम, उदाहरण अधिक

• दबाव नहीं, दिशा दें

• हर बच्चा अलग है—उसकी प्रकृति को पहचानें


✨ निष्कर्ष (गहन सत्य):

संस्कार + शिक्षा + धैर्य = बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की सबसे मजबूत कुंजी 🌱


भूत-प्रेत और आत्माओं के 42 रहस्यमयी प्रकार


क्या आपको लगता है कि भूत सिर्फ एक तरह के होते हैं? जी नहीं! हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में आत्माओं के अलग-अलग नाम और काम हैं। पढ़िए यह रोंगटे खड़े कर देने वाली लिस्ट: 👇

1️⃣ भूत: सामान्य मृत आत्मा।

2️⃣ प्रेत: बिना क्रियाकर्म के मरे, पीड़ित लोग।

3️⃣ हाडल: बिना नुकसान पहुँचाए शरीर में आने वाली।

4️⃣ चेतकिन: दुर्घटना करवाने वाली चुड़ैल।

5️⃣ मुमिई: मुंबई के घरों में दिखने वाली।

6️⃣ विरिकस: लाल कोहरे में छिपी डरावनी आवाज।

7️⃣ मोहिनी: प्यार में धोखा खाई आत्मा।

8️⃣ शाकिनी: शादी के बाद दुर्घटना में मृत औरत।

9️⃣ डाकिनी: मोहिनी और शाकिनी का मिश्रित रूप।

10️⃣ कुट्टी चेतन: बच्चे की आत्मा (तांत्रिक नियंत्रित)।

11️⃣ ब्रह्मोदोइत्यास: (बंगाल) धर्म भ्रष्ट ब्राह्मण आत्मा।

12️⃣ सकोंधोकतास: (बंगाल) रेल दुर्घटना में कटे सिर वाली आत्मा।

13️⃣ निशि: (बंगाल) अँधेरे में रास्ता दिखाने/भटकाने वाली।

14️⃣ कोल्ली देवा: (कर्नाटक) जंगल में टॉर्च लेकर घूमने वाली।

15️⃣ कल्लुर्टी: (कर्नाटक) आधुनिक रिवाजों से मरे लोग।

16️⃣ किचचिन: (बिहार) हवस की भूखी आत्मा।

17️⃣ पनडुब्बा: (बिहार) डूबकर मरने वालों की आत्मा।

18️⃣ चुड़ैल: (उत्तर भारत) बरगद पर लटकाने वाली।

19️⃣ बुरा डंगोरिया: (असम) सफ़ेद कपड़े, पगड़ी और घोड़े पर सवार।

20️⃣ बाक: (असम) झीलों के पास घूमने वाली।

21️⃣ खबीस: (पाक/खाड़ी देश) जिन्न परिवार की गंदगी पसंद आत्मा।

22️⃣ घोड़ा पाक: (असम) घोड़े जैसे खुर वाली आत्मा।

23️⃣ बीरा: (असम) परिवार को खो देने वाली।

24️⃣ जोखिनी: (असम) पुरुषों को मारने वाली।

25️⃣ पुवाली भूत: (असम) घर का सामान चुराने वाली।

26️⃣ रक्सा: (छत्तीसगढ़) कुंवारे मरने वालों की खतरनाक आत्मा।

27️⃣ मसान: (छत्तीसगढ़) नरबलि लेने वाली प्राचीन प्रेत आत्मा।

28️⃣ चटिया मटिया: (छत्तीसगढ़) बौने भूत, चोर प्रवृत्ति के।

29️⃣ बैताल: पीपल निवासी, सफ़ेद और खतरनाक।

30️⃣ चकवा/भुलनभेर: (MP/महाराष्ट्र) रास्ता भटकाने वाली।

31️⃣ उदु: (छत्तीसगढ़) तालाब/नहर में आदमी को खाने वाली।

32️⃣ गल्लारा: (छत्तीसगढ़) धमाचौकड़ी मचाने वाली।

33️⃣ भंवेरी: नदी में भंवर बनाकर डुबोने वाली।

34️⃣ गरूवा परेत: ट्रेन से कटी गाय-बैलों की आत्मा।

35️⃣ हंडा: गड़े खजाने की रक्षा करने वाला प्रेत (लालची को खा जाता है)।

36️⃣ सरकट्टा: (छत्तीसगढ़) सिर कटा खतरनाक प्रेत।

37️⃣ ब्रह्म: ब्राह्मणों की बेहद शक्तिशाली आत्मा, जो पूजा से ही शांत होती है।

38️⃣ जिन्न: अग्नि तत्व वाली मुस्लिम शक्ति।

39️⃣ शहीद: युद्ध/दुर्घटना में मृत, मजारों पर पूजने वाली शक्तियां।

40️⃣ बीर: लड़ाकू और उग्र स्वभाव वाली आत्मा।

41️⃣ सटवी: हवा में रहकर उदासी फैलाने वाली स्त्री आत्मा।

⚠️ चेतावनी: यह जानकारी लोक-मान्यताओं पर आधारित है।


प्राण और आकर्षण

 प्राण और आकर्षण

 स्त्री-पुरुष क्यों दूसरे स्त्री-पुरुषों के प्रति आकर्षित हैं। आजकल इसका कारण है-अपान प्राण। जो एक से संतुष्ट नहीं हो सकता, वह कभी संतुष्ट नहीं होता। उसका जीवन एक मृग- तृष्णा है। इसलिए भारतीय-योग में ब्रह्मचर्य-आश्रम का यही उद्देश्य रहा है कि 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करे। इसका अर्थ यह नहीं कि पुरष-नारी की ओर देखे भी नहीं। 

ऐसा नहीं था प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्य को अभ्यास कराता था जिसमें अपान-प्राण और कूर्म-प्राण को साधा जा सके और आगे का गृहस्थ-जीवन सफल रहे।

यही इसका गूढ़ रहस्य था।

प्राचीन काल में चार आश्रमों का बड़ा ही महत्व था। 

इसके पीछे गंभीर आशय था। जीवन को संतुलित कर स्वस्थ रहकर अपने कर्म को पूर्ण करना उद्देश्य रहता था। लेकिन आज के मनुष्य का जीवन ताश के पत्तों की तरह बिखरा-बिखरा रहता है। वह समेटना चाहता है, लेकिन जीवन है, कि समेटने में नहीं आता। 

यही अशांति का कारण है। जीवन में प्राण का महत्व है।समान-प्राण और कृकल-प्राण का महत्व अपान-प्राण की ही तरह समान-प्राण भी काफी महत्वपूर्ण है। 

समान-प्राण नाभि के मध्य में रहता है। उसका कार्य पेट के पाचन-तंत्र को दुरुस्त करना है। गरमाहट और पित्त,चंचलता और उत्साह, शरीर में तेज आदि समान-प्राण की ही देन है। त्वचा में कोमलता, चमक ,भूख लगना कृकल-प्राण का कार्य है। सर्दी का कम लगना समान प्राण और कृकल-प्राण के संयोजन की विशेषता है। 

भूख लगना, स्फूर्ति, उत्साह, शरीर में तेज, सर्दी कम लगना,

समान-प्राण और कृकल-प्राण के स्पन्दन पर निर्भर करता है। जिन पुरषों में समान-प्राण का स्पन्दन कम होता है,उन्हें सर्दी अधिक लगती है। 

स्नान करना सर्दी में बड़ा कष्टकारी रहता है उनके लिए। गर्म-कपड़े पहनने पर भी उन्हें सर्दी महसूस होती रहती है। जरा-सा भोजन करते ही पेट भरा-भरा सा लगने लगता है। मनुष्य के पास सब कुछ होते हुए भी वह खिन्न बना रहता है। असंतुष्ट रहता है। शरीर का कोई-न-कोई अंग बीमार ही बना रहता है। पेट का भारीपन, थकान, आँखों की कमज़ोरी आदि रोग अक्सर घेरे रहते हैं।

आयुर्वेद ने सारे रोगों की जड़ पेट को माना है। यदि पेट ठीक है तो शरीर में रोगों की सम्भावना कम रहती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि समान-प्राण ही हमारे स्वास्थ्य का मुख्य कारण है। तंत्र-योग में प्राण-साधना एक कठिन क्रिया है। अगर प्राण नहीं सधता तो तंत्र की सारी क्रिया व्यर्थ है।तंत्र में 'प्राणकर्षिणी-विद्या' की साधना काफी दुरूह है, लेकिन साधक उसे साधता है। बिना प्राण साधे ध्यान, समाधि, सूक्ष्म लोक का विचरण, देहातीत का अनुभव प्राप्त होना संभव नहीं है। जिस प्रकार पुरुष के बिना प्रकृति अपनी लीला नहीं कर सकती, उसी प्रकार पांच महा-प्राण बिना पांच-लघुप्राण संतुलित नहीं हो सकते। महाप्राण और लघुप्राण शिव और शक्ति के प्रतीक हैं। जिस तरह बिना शिव-शक्ति के चराचर जगत शून्य है, ब्रह्माण्ड स्पन्दनहीन है, उसी प्रकार दसों-प्राणों का स्पन्दन ही जीवन है। प्राणों का रहस्यमय सञ्चालन 'प्राणतोषणी-क्रिया' तंत्र का काफी गूढ़ विषय है। यह क्रिया अगर सध जाय तो साधक-प्राण पर नियंत्रण कर शरीर के तापमान को प्रकृति के अनुसार घटा-बढ़ा सकता है। प्राण को सहस्रार में स्थापित कर सैकड़ों-वर्षो तक समाधि को उपलब्ध हो सकता है। कुण्डलिनी-योग में षट्चक्र- भेदन बिना प्राणों के सन्धान के सम्भव नहीं। तंत्र ने प्राण को असीम ऊर्जा माना है।

 उदान प्राण का निवास कण्ठ-प्रदेश है। इसे साधने में "श्री" और "समृद्धि" दोनों का उदय होता है। कण्ठ-प्रदेश को लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। इसी कारण स्वर्ण आभूषण-गले में धारण किया जाता है। कण्ठ को 'स्फुटाग्रन्थ' भी कहा गया है। स्फुटा को जागृत करने के लिए मोती की माला, रत्न और स्वर्ण आभूषण धारण करना शुभ होता है। उदान के पूर्ण होने पर मनुष्य कभी अभाव ग्रस्त नहीं होता। साधक प्राण की विशेष क्रिया द्वारा 'स्फुटा-ग्रंथि' जागृत कर लेता है। भौतिक व आध्यात्मिक-सुख जब चाहे प्राप्त कर सकता है। 

लेकिन विरले-साधक ही इसका उपयोग भौतिक-सुखों के लिए करते हैं। उनका उद्देश्य वाक्-सिद्धि और मन्त्र-सिद्धि के लिए होता है।

धनंजन-प्राण का स्पन्दन सम्पूर्ण-शरीर में सूक्ष्म-रूप से होता रहता है। 

वह सभी प्राणों का प्रमुख है, क्योंकि उसका सूक्ष्म सञ्चालन सूक्ष्म-केंद्रों के आलावा शरीर के "बाह्य-सूक्ष्म-तरंगों" को भी करता है आकर्षित। इसलिये कपाल-प्रदेश में इसका मुख्य-निवास माना गया है जहाँ सहस्रार-चक्र है, शिव-शक्ति का सामरस्य-मिलन है। इसीको तंत्र में शिवलोक कहा गया है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है-

"प्राणों में मैं धनञ्जय-प्राण हूँ।" 

 हमारा मस्तिष्क रहस्यमय है। विज्ञान भी अभी तक इसके रहस्यों को पूर्णरूप से उजागर नहीं कर पाया है। यह अद्भुत सुप्त शक्तियों का भण्डार है। संसार में ऐसे अनेक महान-पुरुष हुये हैं जिन्होंने अपनी अद्भुत-प्रतिभा से लोगों को हैरत में डाल दिया। जाने-अनजाने यह धनंजन-प्राण का ही चमत्कार है। 

इसमें शिथिलता आने पर या स्पन्दन कम हो जाने पर मानसिक बीमारियां, चिन्ता, डिप्रेशन आदि का शिकार हो जाता है व्यक्ति। मस्तिष्क का विकास धनंजय प्राण पर ही निर्भर है।

हज़ारों वर्ष पहले ऋषि-महर्षियों ने प्राण पर बेहद गम्भीर विचार किया था। साथ ही यह अनुसंधान किया था कि यदि प्राण कुपित हो जाय या मंद पड़ जाय तो उसे सन्धान कैसे किया जाय। लेकिन योग हो या तंत्र हो- गुरु के निर्देशन के बगैर नहीं करना चाहिये। 

नहीं तो लाभ के वजाय हानि उठानी पड़ सकती है। इसीलिए योग को परम ज्ञान और तंत्र को गुह्य ज्ञान कहा गया है। प्राणों को साधने की क्रियायें दसों-प्राणों का संयोजन-नियोजन करने, कुप्रवृत्तियों का निवारण करने और प्राणशक्ति पर अधिकार प्राप्त करने, साथ ही आत्मिक उन्नति के लिए प्राण-विद्या का रहस्य अवश्य जानना चाहिये।

चाहे वह योगी हो या साधक हो या हो गृहस्थ। योगशास्त्र में प्राणों को साधने के लिए काफी क्रियाएँ हैं लेकिन उनमें से कुछ यहाँ दी जा रही हैं। बन्ध, मुद्रा, प्राणायाम और ध्यान-

ये मुख्य हैं योगशास्त्र में। प्राण को साधने के लिए मुख्य तीन बन्ध हैं-

1. मूलबंध, 2. जालंधर बन्ध, 3. उड्डीयान बन्ध।

1. मूलबंध-- प्राणायाम की सहायता से यह सिद्ध होता है। इससे अपान प्राण स्थिर हो जाता है। वीर्य-स्तंभन होता है। वीर्य-उर्ध्वभाग की ओर अग्रसर होता है। अपान-प्राण का स्पन्दन बढ़ जाता है और मूलाधार स्थित कुण्डलिनी पर भी प्रभाव पड़ता है। उसमें ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। अपान प्राण और कूर्म प्राण दोनों पर मूलबन्ध का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रक्त-संचार ठीक होता है।

2. जालंधर-बन्ध- श्वास-क्रिया पर अधिकार होता है। ज्ञान-तंतु बलवान होते हैं। इसकी क्रिया से 16 ऊर्जा क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ता है। विशुद्ध-चक्र को जागृत करने में इसकी बड़ी भूमिका होती है। हठयोग प्रदीपिका में इसका विस्तार से वर्णन आया है।

3. उड्डीयान बन्ध- जीवनी शक्ति को बढाने के लिए परम सहायक सिद्ध होता है। नाभि-स्थित समान और कृकल-प्राणों में स्थिरता लाता है। 

सुषुम्ना-नाड़ी को खोलने में सहायक है और स्वाधिष्ठान चक्र चैतन्य करता है। कुण्डलिनी-शक्ति को जागृत करने में ये तीनों अत्यन्त सहायक होते हैं।

वात प्रकृति: समस्याएँ क्यों होती हैं और समाधान क्या है?

Ayurveda Vata Balance - वात प्रकृति: समस्याएँ क्यों होती हैं और समाधान क्या है? इस पोस्ट में खासतौर पर यह समझने की कोशिश करेंगे कि वात प्रकृति वाले लोगों को कौन-कौन सी दिक्कतें ज़्यादा होती हैं और आयुर्वेद के अनुसार उनका practical समाधान क्या है।


वात प्रकृति का मतलब होता है — हवा प्रधान शरीर। यानी जिन लोगों में वायु तत्व ज्यादा होता है, उनके शरीर और दिमाग पर हवा का असर सबसे ज्यादा दिखाई देता है। और जहां हवा ज्यादा होगी, वहां instability, dryness और movement भी ज्यादा होंगे।


1. वात की सबसे पहली समस्या: रूखापन (Dryness)

वात का सबसे प्रमुख गुण है रूक्षता यानी सूखापन।

इसी वजह से वात प्रकृति वालों में सबसे पहले ये लक्षण दिखते हैं:


स्किन का ड्राई रहना

बालों का रूखा और बेजान होना

होंठ, एड़ियां, नाक जल्दी फटना

स्किन में cracks आना


सिर्फ शरीर ही नहीं, दिमाग भी ड्राई हो जाता है।

जिसका रिज़ल्ट होता है:


जल्दी चिड़चिड़ापन

छोटी-छोटी बातों पर irritation

frustration

mood swings

anxiety और depression


समाधान: स्नेह का उपयोग

आयुर्वेद का एक सीधा नियम है -

रूक्ष के अपोज़िट स्नेह।


मतलब जहां dryness है, वहां तेल, चिकनाहट और गरमाहट चाहिए।


वात प्रकृति वालों के लिए तेल सबसे बड़ी दवा है।

और सभी तेलों में तिल का तेल (Sesame Oil) वात को सबसे बेहतर तरीके से संतुलित करता है।


लेकिन ध्यान रहे -

तेल सिर्फ बाहर से लगाने के लिए नहीं,

अंदर से लेना (Internal Snehapan) भी उतना ही ज़रूरी है।


तिल का तेल: अंदर से कैसे लें? (Internal Use)

तिल का तेल (Sesame Oil) वात को सबसे बेहतर तरीके से संतुलित करता है।

लेकिन लेने का तरीका सही होना चाहिए, वरना फायदा की जगह नुकसान हो सकता है।


1. खाली पेट – सबसे असरदार तरीका

सुबह उठकर


1/2 से 1 चम्मच शुद्ध तिल का तेल

गुनगुने पानी या गुनगुने दूध के साथ लें


यह तरीका:


आंतों की dryness दूर करता है

गैस और कब्ज में राहत देता है

नसों और जोड़ों को पोषण देता है


2. भोजन में उपयोग – रोज़ का सुरक्षित उपाय

सब्ज़ी, दाल या खिचड़ी में


1–2 चम्मच तिल का तेल मिलाएं

खाना हमेशा गरम होना चाहिए


यह तरीका:


पाचन को smooth बनाता है

वात को धीरे-धीरे शांत करता है

शरीर को स्थिरता देता है


3. घी के साथ संयोजन (Vata Weakness में)

अगर बहुत ज़्यादा कमजोरी, थकान या dryness हो:


1/2 चम्मच देसी घी + 1/2 चम्मच तिल का तेल

दोपहर के भोजन के साथ लें


यह combination:


वात को गहराई से शांत करता है

हड्डियों और नसों को ताकत देता है


4. कब्ज और हार्ड स्टूल में

रात को सोने से पहले


1 चम्मच तिल का तेल + गुनगुना दूध


यह तरीका:


आंतों को चिकना करता है

सुबह natural motion लाने में मदद करता है


 ज़रूरी सावधानियाँ

ठंडे शरीर में तेल न लें

सर्दी, कफ, भारीपन या बुखार में internal oil avoid करें

हमेशा गरम वातावरण और गरम भोजन के साथ लें

मात्रा कम से शुरू करें


2. अभ्यंग: वात की सबसे श्रेष्ठ चिकित्सा

आयुर्वेद साफ कहता है -

वात रोगों की सबसे बड़ी दवा है रोज़ का तेल मालिश (अभ्यंग)।


कैसे करें?

स्नान से पहले तिल का तेल हल्का गुनगुना करें

पूरे शरीर पर लगाएं


खास ध्यान दें:


सिर

कान

पैर के तलवे


संस्कृत में इसे कहा गया है — शिर, श्रवण, पाद

यानी जहां-जहां से हवा शरीर में ज्यादा असर डालती है।


तेल जितना ज़्यादा, वात उतना कम।


3. वात और हड्डियों का सीधा कनेक्शन

वायु का सीधा संबंध होता है अस्थि धातु (हड्डियों) से।

इसलिए वात बढ़ते ही सबसे पहले असर पड़ता है:


joints pain

cervical issues

teeth sensitivity

enamel weak होना

nails का टूटना

bones का कमजोर होना


क्या करें?

नाक में रोज़ 2-2 बूंद तिल का तेल

तेल से कुल्ला (oil pulling)

पूरे शरीर पर तेल मालिश


आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से बस्ती चिकित्सा

(खासतौर पर बारिश के मौसम में)


4. वात का दूसरा गुण: लघुता (Lightness)

वात प्रकृति वाले लोग अक्सर:


underweight होते हैं

जल्दी weight lose करते हैं

bones पतली होती हैं

शरीर दुबला और सूखा रहता है

सिर्फ शरीर ही नहीं, दिमाग भी हल्का और तेज़ चलता रहता है -

overthinking, continuous thoughts, restlessness।


समाधान: गुरु (Heavy) आहार

वात वालों को हल्का खाना नहीं, बल्कि भारी और nourishing खाना चाहिए।


जैसे:


उड़द की दाल

उड़द की खीर

उड़द वड़ा

मीठी चीज़ें: गुड़, मिश्री, गन्ना


मीठा स्वाद वात के लिए सबसे अच्छा माना गया है।


 उड़द की दाल: वात बढ़ाने वाली या वात शांत करने वाली?

ज़्यादातर लोग उड़द की दाल से डरते हैं।

कहते हैं -

“गैस बनाती है, भारी है, वात बढ़ाती है।”


पर आयुर्वेद में सच थोड़ा अलग है।


 उड़द की दाल का मूल स्वभाव

उड़द की दाल:


स्निग्ध (चिकनी) होती है

उष्ण (गरम प्रभाव वाली) होती है

गुरु (भारी) होती है

बल्य (ताकत देने वाली) होती है


और याद रखो —

वात = रूक्ष + शीत + लघु

उड़द = स्निग्ध + उष्ण + गुरु


यानी सिद्धांत रूप से उड़द वात का अपोज़िट है।


फिर लोगों को लगता क्यों है कि उड़द वात बढ़ाता है?

क्योंकि समस्या उड़द नहीं है,

तरीका गलत है।


 उड़द की दाल: वातवर्धक नहीं, सही संस्कार से वातनाशक

आयुर्वेद में संस्कार का अर्थ होता है -

किसी द्रव्य को सही तरीके से तैयार करना, ताकि उसका गुण बदल जाए।


इसलिए आयुर्वेद कहता है:


संस्कारो हि गुणान्तराधानम्

(संस्कार से पदार्थ के गुण बदल जाते हैं)


 गलत संस्कार = वातवृद्धि

जब उड़द:


बिना भिगोए

बिना अग्नि-दीपक द्रव्यों के

गलत समय पर

गलत कॉम्बिनेशन में


खाई जाती है,

तो वह अपचित रहती है,

और वही अपचित उड़द

लोगों को वातवर्धक लगती है।


असल दोष उड़द में नहीं,

संस्कार के अभाव में है।


उड़द की खीर: संस्कारित उड़द का उदाहरण

उड़द की खीर आयुर्वेद में एक संस्कारित प्रयोग है।


यहाँ उड़द का संस्कार होता है:


पहले भिगोना

फिर पकाना

दूध और घी के साथ कॉम्बिनेशन 

हल्के उष्ण मसालों का प्रयोग


इस संस्कार के बाद उड़द:


बल्य बनती है

वातशामक होती है

अस्थि और मज्जा धातु को पोषण देती है


इसीलिए खीर को

कमज़ोरी, क्षय और वात विकार में उपयोग किया गया है।


उड़द वड़ा: समस्या पदार्थ नहीं, संस्कार है

उड़द वड़ा भी आयुर्वेद में दोषकारी नहीं माना गया है,

अगर उसका संस्कार ठीक हो।


सही संस्कार में:


उड़द भिगोई हुई हो

अदरक, हींग, जीरा डाला गया हो

ताज़े तेल में तलन हो

दोपहर में सेवन हो


तब वही उड़द वड़ा:

वात को स्थिर करता है, बल देता है।


गलत संस्कार में:


ठंडी संगति

रात में सेवन

बासी तेल


तो वही वड़ा

वातवर्धक अनुभव होता है।


5. वात और ठंड का रिश्ता

वात प्रकृति वालों को ठंड सबसे ज्यादा परेशान करती है।


ठंड आते ही:


गैस बढ़ना

पाचन बिगड़ना

जोड़ों में दर्द

हाथ-पैर कांपना


समाधान: उष्ण (गरम) चीजें

हमेशा गरम पानी पिएं

ठंडा पानी avoid करें

खाना हमेशा गरम हो

घी + हल्के गरम मसाले इस्तेमाल करें


मीठा, खट्टा और नमकीन — ये तीनों रस वात को संतुलित करते हैं।


6. हवा से बचाव क्यों ज़रूरी है?

वात का सीधा असर कानों पर पड़ता है।


इसलिए:


कान ढक कर रखें

पंखे की direct हवा से बचें

बाइक चलाते समय हेलमेट ज़रूर पहनें

सिर ढक कर रखें (इसीलिए पगड़ी/दुपट्टे की परंपरा थी)

सुबह की धूप वात वालों के लिए प्राकृतिक औषधि है।


7. खुरदुरापन और उसका इलाज

वात वालों में खुरदुरापन सिर्फ स्किन का नहीं, behavior का भी होता है:


बेचैनी

ज्यादा बोलना

restless nature


समाधान:

मक्खन

दही (हफ्ते में 1-2 बार)

आंवला के साथ दही

ये चीज़ें वात को smooth करती हैं।


8. चंचलता: वात की सबसे बड़ी चुनौती

वात प्रकृति वाले:


शांत बैठ नहीं पाते

उंगलियां चलती रहती हैं

बालों से खेलते रहते हैं

बोलते रहते हैं

सोते वक्त भी दिमाग चलता रहता है


समाधान:

जो चीज़ें जमीन के नीचे उगती हैं, वो वात को स्थिर करती हैं:


हल्दी

अश्वगंधा

शतावरी

सूरन (जिमीकंद)


9. वात वालों के लिए जीवनशैली के नियम

आयुर्वेद साफ कहता है:


स्नेह का ज़्यादा प्रयोग

तेल मालिश

घी का सेवन

गर्म वातावरण

एसी और direct हवा से दूरी


पंचकर्म में बस्ती चिकित्सा वात के लिए सर्वोत्तम मानी गई है।


10. दिमाग की शांति: सबसे ज़रूरी उपाय

वात वालों को meditation और slow pranayama बहुत ज़रूरी है।


कई वात प्रकृति वाले जब आंख बंद करते हैं तो डर लगता है।

ध्यान उसी डर को खत्म करने की दवा है।


जितना मन शांत,

उतनी सेहत बेहतर।


Conclusion - वात प्रकृति कोई बीमारी नहीं है,

लेकिन अगर उसकी सही देखभाल न हो तो 80 से ज्यादा रोगों का कारण बन सकती है।


तेल, घी, गरमाहट, स्थिरता और शांति -

यही वात वालों की असली दवा है।


वात दोष को कैसे कम करें- 

* वात दोष शरीर में हवा (वायु) और आकाश तत्व से बना होता है। जब यह बढ़ जाता है तो शरीर में सूखापन, दर्द, गैस, चिंता, अनिद्रा, जोड़ों में दर्द, कब्ज जैसी समस्याएँ होने लगती हैं। आयुर्वेद में वात को संतुलित रखने के लिए खान-पान, दिनचर्या, उपचार और योग बहुत जरूरी माना गया है।

🌿 वात दोष कम करने के लिए क्या करना चाहिए

✅ नियमित दिनचर्या अपनाएँ

* समय पर सोना और उठना चाहिए।

* रोज़ हल्का व्यायाम करना चाहिए़।

* शरीर को गर्म रखना चाहिए।

* रोज़ तेल से मालिश (तिल का तेल या सरसों का तेल) करना चाहिए।

✅ गर्म और ताज़ा भोजन खाएँ

* ठंडा और बासी भोजन वात को बढ़ाता है, इसलिए हमेशा गर्म और ताज़ा खाना खाना चाहिए।

✅ मानसिक तनाव कम रखें

* ध्यान (Meditation) और प्राणायाम वात संतुलित करने में बहुत मदद करते हैं।

🥗 वात दोष में क्या खाना चाहिए?

* घी और तिल का तेल, गर्म दूध

* मूंग दाल, गेहूं, चावल

* पकी हुई सब्जियां (लौकी, गाजर, कद्दू, शकरकंद)

* पके हुए मीठे फल (केला, आम, पपीता, चीकू)

* सूप और खिचड़ी

* मेवे (बादाम, अखरोट – भिगोकर)

- वात दोष में क्या नहीं खाना चाहिए

* सूखा और ठंडा खाना नहीं खाना चाहिए।

* ज्यादा मसालेदार और तीखा भोजन न ले।

* फास्ट फूड और पैकेट फूड को अवॉइड करो।

* ज्यादा चाय और कॉफी न ले।

* कच्ची सब्जियां ज्यादा मात्रा में न ले।

* ज्यादा उपवास या भूखे नहीं रहना चाहिए।

🌿 वात दोष के आयुर्वेदिक उपचार-

👉 अभ्यंग (तेल मालिश)

*तिल के तेल से रोज़ मालिश वात को शांत करने का सबसे अच्छा तरीका माना गया है।

👉 बस्ती कर्म (औषधि युक्त एनिमा)

आयुर्वेद में वात रोगों का मुख्य उपचार बस्ती को माना गया है। यह पंचकर्म चिकित्सा का हिस्सा है।

👉 घृत सेवन

गाय का घी वात को संतुलित करता है और शरीर को पोषण देता है।

👉 औषधियाँ

अश्वगंधा

दशमूल

त्रिफला (कब्ज में उपयोगी)

(इनका सेवन वैद्य की सलाह से करना चाहिए)

🧘 वात दोष कम करने के योग

* पवनमुक्तासन

* बालासन

* वज्रासन

* भुजंगासन

* मकरासन

🌬 प्राणायाम

* अनुलोम-विलोम

* नाड़ी शोधन

* भ्रामरी


Sunday, February 8, 2026

समस्याओं का खान बन चुका जीवन

 समस्याओं का खान बन चुका जीवन


जिस प्रकार कोयले की खान से निरंतर कोयला निकलता रहता है, जैसे कपड़ों की इंडस्ट्री में उत्पादन कभी रुकता नहीं, ठीक उसी प्रकार कुछ लोगों का जीवन मानो समस्याओं की खान बन जाता है। एक समस्या समाप्त भी नहीं होती कि उससे कहीं अधिक भारी, अधिक जटिल समस्या सामने आ खड़ी होती है। ऐसे लोगों का पूरा जीवन समस्याओं को सुलझाने में ही बीत जाता है।

उनके लिए जीवन जीना नहीं, बल्कि जीवन काटना बन जाता है।


वे दिन-रात संघर्ष करते हैं, समाधान खोजते हैं, परिस्थितियों से लड़ते हैं। बाहर से देखने पर वे सक्षम, जिम्मेदार और कभी-कभी बेहद सफल भी प्रतीत होते हैं। आर्थिक रूप से वे ऊँचाइयों तक पहुँच जाते हैं, समाज में सम्मान पा लेते हैं, लेकिन भीतर… भीतर एक खालीपन, एक बेचैनी, एक असमाप्त युद्ध चलता रहता है।


सफलता के पीछे छिपी अशांति


ऐसे लोग अक्सर मानसिक शांति की तलाश में इधर-उधर भटकते रहते हैं। कभी आध्यात्मिकता में, कभी रिश्तों में, कभी उपलब्धियों में, तो कभी यादों में।

वे पूछते हैं...

“मेरे जीवन में शांति क्यों नहीं है?”

“मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?”


उत्तर बहुत सरल है, लेकिन स्वीकार करना कठिन।


समस्या बाहर नहीं, पकड़ भीतर है


असल में समस्याएँ जीवन में आती-जाती रहती हैं यह तो हर व्यक्ति के साथ होता है। फर्क यहाँ है कि कुछ लोग समस्या को छोड़ देते हैं, और कुछ लोग उसे पकड़ कर बैठ जाते हैं।


आपने किसी एक ही चीज़ को कसकर पकड़ रखा है....


कोई बीता हुआ सुखद क्षण,


कोई अपमानजनक व्यवहार,


कोई अधूरी इच्छा,


या कोई ऐसा अनुभव जिसने आपको भीतर तक चोट पहुँचाई।


मान लीजिए जीवन में कभी कोई बेहद खुशी का पल आया था। वह पल बीत गया, लेकिन आप आज भी उसी में जी रहे हैं। वर्तमान कितना भी अच्छा हो, वह उस स्मृति से छोटा लगने लगता है।

या फिर किसी ने किसी परिस्थिति में आपके साथ गलत व्यवहार किया। वह घटना समाप्त हो चुकी है, लेकिन आप आज भी उसी क्षण को बार-बार जी रहे हैं। यहीं से समस्या जन्म लेती है।


स्मृति जब बोझ बन जाए


स्मृतियाँ स्वभाव से समस्या नहीं होतीं।

समस्या तब होती है जब स्मृति वर्तमान पर हावी हो जाती है।


जब हम किसी अनुभव को छोड़ नहीं पाते न सुख को, न दुःख को तब हमारा मन वहीं अटका रह जाता है। शरीर आगे बढ़ता रहता है, समय आगे चलता रहता है, लेकिन चेतना पीछे अटकी रह जाती है।

यही मानसिक द्वंद्व धीरे-धीरे जीवन को भारी बना देता है।


क्यों ऐसे लोग कभी शांत नहीं हो पाते


ऐसे लोग हमेशा “होना चाहिए था” और “ऐसा क्यों हुआ” के बीच झूलते रहते हैं।

वे वर्तमान को पूरी तरह जी ही नहीं पाते, क्योंकि उनका मन या तो अतीत में उलझा रहता है या भविष्य की चिंता में।


हर नई समस्या दरअसल पुरानी पकड़ का ही विस्तार होती है।

जब तक वह पकड़ छूटती नहीं, समस्याएँ रूप बदल-बदल कर आती रहती हैं।


समाधान कहाँ है?


समाधान बाहर नहीं है।

समाधान किसी व्यक्ति, धन, पद या उपलब्धि में नहीं है।


समाधान है....छोड़ने में।


बीते हुए सुख को सम्मान के साथ विदा करने में,


हुए अपमान को समझ के साथ जाने देने में,


और हर अनुभव को “सीख” बनाकर आगे बढ़ जाने में।


जब आप पकड़ छोड़ना सीख जाते हैं, तब समस्याएँ आना बंद नहीं होतीं, लेकिन वे आपको तोड़ना बंद कर देती हैं।


जीवन जीना सीखना


जीवन का उद्देश्य केवल समस्याओं को हल करना नहीं है।

जीवन का उद्देश्य है जीना, अनुभव करना और मुक्त रहना।


जिस दिन आप यह समझ जाते हैं कि हर क्षण नया है, और हर क्षण को पुराने बोझ के बिना जिया जा सकता है, उसी दिन समस्याओं की खान सूखने लगती है।


तब जीवन काटना नहीं पड़ता

तब जीवन अपने आप बहने लगता है।


"मोक्ष"","निर्वाण", "मुक्ति", सब एक ही है जो जीवन जी रहे यह जीवन आपका नही है, आपकों लगता कि मै जी रहा हूं मै हूं तो मुझे प्रमाण चाहीए आपसे, जैसे जीव जानवर पेड़ पौधे है वैसे ही मानव है, बस हम इसमें अधिक बुद्धि से हमारे अन्दर मै आ गया,मन बन गया, जिसने मन को समझा सृष्टि को समझ लिया संसार को समझ लिया, तब मुक्ति मोक्ष, निर्वाण सब के प्रमाण मिल गए, मन ऐसा राज, एक ऐसा रहस्य है, एक ऐसा भ्रम है, एक ऐसा प्रदा है, या जैसे प्रदा हटा की सब स्पष्ट हो जाता हैं, हमारा जीवन इस महिम पर्दे पर टिका है, और इसे तोड़ना, हटाना असंभव जैसा है, इसे नही मिटाया जा सकता है उसे समझा जा सकता है उसे छोटा किया जा सकता है लेकिन छोटा करने का ढंक मारना पीटना विरोध तप करना दमन करना काम नही आएगा! इसके लिए बुद्ध पुरुषो ने इसके विज्ञानिक मार्ग विकसित किए है, वैसे तो बुद्धि जीवी धर्म धार्मिक शास्त्र ने कई मार्ग खोजे है लेकिन कोई भी मार्ग सभी के लिएं सत्य साबित नही हुआ है, धर्म शास्त्र से मुनष्य को मार्ग मिलने चाहीए थे वे सभी मार्ग नाकाम साबित हुए उलटा जिस मन को छोटा करना था वह उल्टा शैतान का रूप धारण कर लिया, इन धर्म शैतानों कि वजह से सम्प्रदाय गुट, संस्थान धर्म गुरू पैदा हुए, इनकी वजह से कई हिंसा आतंकी घटना, देंगे हुए है  

जेसे सिनेमा घर में पर्दे की मुख्य भूमिका होती है,, पर्दे का हटाते ही फिल्म बंद हो जाती है, एक तो पर्दे पर प्रकाश आ रहा है वह ऊर्जा है प्राण है यदी अपने प्राण रोको तो फिल्म बंद हो जाती है और प्रदा हटाओ तो फिल्म बंद हो जाती हैं, अब कोइ दुसरा उपाय चाहीए, उर्जा तो हटा नही सकते है, और प्रदा भी हटा नही सकते है, अब पर्दे और मशीन के बीच में एक और राज है जिसने प्रदा भी नही हटे और मशीन भी नही हटे, अब प्रदा हमारा मन है फिल्म भी हमे देखना है किसी का विरोध नही करना है यह एक व्यवस्था है, पर्दे पर जो भी चल रह है उसका प्रभाव हमारे अन्दर घटित होता है, वैसे इस संसार में हमारे सामने जो भी घटित होता है तब हमारे अंदर सत्य झूठ प्रेम के लिए कुछ हमारे अंदर घट रहा है है वह मन है उसे सिर्फ देखो निपक्ष हो कर, जो घट रहा है उस पर प्रक्रिया नही करनी है, सिर्फ सिर्फ देखना है की यह मैं नही हूं, यह मेरी व्यवस्था नही है, इस देखने में एक दृष्टा का जन्म होता है, यह दृष्टा तुम्हारी आत्मा है, अभी जो भी आपने कर्म किए, भावनाए व्यक्त की वे सभी, एक व्यवस्था थी हमारे अन्दर उससे सब हो रहा है, इस व्यवस्था को हम अपनी व्यवस्था समझ रहे है यह भ्रम है, इसे समझ सकते है की यह सब हमारे अंदर पैदा करने में हमारा क्या हाथ है? यदि समझते है की जो क्रोध आने वाला था उसको आपने आने नही दीया ,जो लोभ पैदा होने वाला था आपने रोक दीया, जिस पर क्रोध कराना था और आपने करुणा प्रेम दे दिया तब आप अपने मालिक हुए, एक स्त्री को देख कर कामुकता का भाव रोक लिया तब आप आप है, लेकिन मेरी दृष्टी मे आप आप ही नही है, यह सब सृष्टि का खेल है, इसे खेल की भाती देखो, देखने की समता देखने की दृष्टी जितनी गहरी होगी तब जहा मन में जो घट रहा है जो मन में प्राण ऊर्जा खर्च हो रही है बहा धीरे धीरे वहा से धीरे धीर ऊर्जा बहाव खर्च कम हो जाता है है और दृष्टा मजबूत बन जता है जो तुम्हारी वास्तविक आत्मा है, जिसे ध्यान कहते है, इसी ध्यान में मुक्ति, मोक्ष, निर्वर्ण खिलता है बुद्धत्व, प्रज्ञा खिलती है, इसी ध्यान से एक वह कमजोर होता है जो माया है जो संसार है, और आध्यात्मिक का नया जन्म होता है

30–35 की उम्र में हार्ट अटैक क्यों बढ़ रहे हैं

 Diet and Heart - 30–35 की उम्र में हार्ट अटैक क्यों बढ़ रहे हैं? आज सबसे बड़ा सवाल यही है - 30 से 35 साल की उम्र में लोग अचानक ICU कैसे पहुँच रहे हैं?


लोग जिम जा रहे हैं, स्टेप्स गिन रहे हैं, वॉच में कैलोरी ट्रैक कर रहे हैं,

फिर भी हार्ट अटैक क्यों?


ग्राउंड रियलिटी ये है कि

साइलेंट रिस्क्स बढ़ते जा रहे हैं,

और उनका सबसे बड़ा कारण है हमारी रोज़ की डाइट।


2 दशक से ज्यादा की प्रैक्टिस और पेशेंट्स देखने के बाद

एक बात crystal clear हो जाती है-

आज के यंग लोगों में हार्ट अटैक का सबसे बड़ा कारण

रोज़ खाने में की जाने वाली छोटी-छोटी गलतियाँ हैं।


इस POST में हम समझेंगे:


आर्टरीज कैसे ब्लॉक होती हैं

हार्ट अटैक का असली मैकेनिज़्म क्या है

कौन से फूड्स आज से ही रोकने चाहिए

और उनके देसी, रियलिस्टिक, सस्टेनेबल स्वैप्स


हार्ट अटैक होता कैसे है? बेसिक्स समझ लो

आपकी आर्टरीज वो रास्ते हैं

जिनके ज़रिए हार्ट से ऑक्सीजन और न्यूट्रिएंट्स

पूरे शरीर तक पहुँचते हैं।


लेकिन जब इन रास्तों के अंदर

धीरे-धीरे प्लाक जमा होने लगता है-

जिसमें फैट, कैल्शियम, प्रोटीन और इम्यून सेल्स का मिक्स होता है-

तो आर्टरी की लुमन संकरी होने लगती है।


इस पूरी प्रोसेस को कहते हैं

एथेरोस्क्लेरोसिस।


प्लाक बनने के 3 बड़े कारण

1. मेटाबॉलिक इम्बैलेंस

जब हम रोज़

शुगर ड्रिंक्स, मैदा, वाइट ब्रेड, पेस्ट्री जैसे

रिफाइंड कार्ब्स खाते हैं-


तो ब्लड शुगर और इंसुलिन दोनों हाई रहते हैं।


एक समय बाद एक्स्ट्रा शुगर

लिवर में जाकर ट्राइग्लिसराइड्स में बदलती है

(De Novo Lipogenesis)।


इससे:


ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ते हैं

LDL यानी “बुरा कोलेस्ट्रॉल” ज्यादा खतरनाक बनता है

छोटे पार्टिकल्स आर्टरी की वॉल में घुस जाते हैं

और वहीं से प्लाक बनना शुरू होता है।


2. इनफ्लेमेशन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस

रिहीटेड डीप फ्राई ऑयल्स,

इंडस्ट्रियल ट्रांस फैट्स,

और बहुत हाई टेम्परेचर पर पका खाना-


ये सब मिलकर

ऑक्सीडाइज्ड लिपिड्स और

Advanced Glycation End Products बनाते हैं।


ये कंपाउंड्स

आर्टरी की अंदरूनी लेयर

(एंडोथेलियम) को इरिटेट कर देते हैं।


इरिटेटेड एंडोथेलियम

ऐसे बिहेव करता है

जैसे गीली सीमेंट-

जिसमें नया प्लाक आसानी से चिपक जाता है।


3. हाई ब्लड प्रेशर और मैकेनिकल स्ट्रेस

एक्सेस नमक,

सिडेंटरी लाइफ,

मेंटल स्ट्रेस और जेनेटिक्स-


इन सबसे BP बढ़ता है।


हाई BP में

आर्टरी वॉल पर ज्यादा प्रेशर पड़ता है,

जैसे नदी में बहुत तेज़ बहाव।


इससे प्लाक अनस्टेबल हो जाता है।

ऊपर की लेयर फट सकती है।


शरीर इसे चोट समझकर

प्लेटलेट्स भेज देता है

और वहीं क्लॉट बन जाता है।


अगर ये क्लॉट

कोरोनरी आर्टरी ब्लॉक कर दे-

तो रिज़ल्ट होता है

एक्यूट हार्ट अटैक।


हार्ट अटैक के इमरजेंसी सिग्नल

अगर कभी:


तेज़ चेस्ट पेन

लेफ्ट आर्म या जॉ में दर्द

अचानक पसीना

घबराहट या बेहोशी


ऐसा लगे तो

देरी मत कीजिए- तुरंत अस्पताल जाइए।


अब बात करते हैं रोज़ के सबसे खतरनाक फूड्स की

1. इंडस्ट्रियल ट्रांस फैट्स

वनस्पति घी,

पार्शियली हाइड्रोजनेटेड ऑयल,

मार्जरीन,

पफ पेस्ट्री, पैटीज़, नमकीन-


इनके लिए ज़ीरो टॉलरेंस रखें।


लेबल पर

“Hydrogenated” या “Partially Hydrogenated”

लिखा दिखे-

तो वापस शेल्फ पर रख दें।


रोज़ के लिए:

सरसों तेल, मूंगफली तेल, ऑलिव ऑयल (फ्रेश, लिमिटेड)


2. डीप फ्राइड और रिहीटेड ऑयल

जितना ज्यादा फ्राइड फूड,

उतना ज्यादा हार्ट डिज़ीज़ का रिस्क।


फ्राई करना ही है तो:


एयर फ्राई

बेक

ग्रिल

या ताज़े ऑयल में हल्का sauté


और रिहीटेड ऑयल-

सीधा NO।


3. शुगर स्वीटन बेवरेजेस

कोल्ड ड्रिंक्स,

पैकेज जूस,

एनर्जी ड्रिंक्स-


ये लिक्विड शुगर हैं।


सबसे तेज़

ब्लड शुगर और इंसुलिन स्पाइक

यहीं से होता है।


फैटी लिवर - हार्ट अटैक रिस्क एक्सेलेरेटर।


बेस्ट ऑप्शन:

पानी, नींबू पानी, ब्लैक टी, ब्लैक कॉफी


4. अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स

पैकेज फूड्स में:


रिफाइंड स्टार्च

एडेड शुगर

एक्सेस सोडियम

फाइबर और प्रोटीन लगभग ज़ीरो।

डेली स्टेपल मत बनाइए।


देसी स्वैप्स:

पोहा, उपमा, दलिया, ओट्स, रोस्टेड चना, पीनट्स


5. प्रोसेस्ड मीट्स

सॉसेज, सलामी, बेकन, हैम-


सोडियम और एडिटिव्स से भरे होते हैं।


हार्ट रिस्क से इनका लिंक

कई स्टडीज़ में दिख चुका है।


बेहतर:

फ्रेश फिश, ग्रिल्ड चिकन, पनीर, टोफू, दालें


6. रिफाइंड ग्रेन्स

मैदा ब्रेड, बिस्किट, नूडल्स, पेस्ट्री-


फाइबर निकल चुका होता है,

GI हाई हो जाता है।


स्वैप करें:

होल व्हीट, ज्वार, बाजरा, रागी, ओट्स, ब्राउन राइस


लेबल पढ़ना सीखिए — ये स्किल जान बचाती है

पैकेट उठाते ही 3 चीज़ें देखें:


एडेड शुगर

सोडियम

ट्रांस फैट्स


अगर 100g में

सोडियम > 400 mg है - अवॉयड


डेली हार्ट-सेफ रूटीन (रियल लाइफ)

पानी: 2–3 लीटर

स्टेप्स: 8–10 हजार

स्ट्रेंथ ट्रेनिंग: हफ्ते में 3 बार

नींद: 7–8 घंटे


डाइट + मूवमेंट + नींद

यही असली हार्ट प्रोटेक्शन है।


क्रोध और मन

क्रोध अक्सर हमें बाहरी परिस्थितियों का परिणाम लगता है। हम कहते हैं कि फलां व्यक्ति ने गुस्सा दिलाया, स्थिति खराब थी, इसलिए प्रतिक्रिया हुई। पर यदि ईमानदारी से देखा जाए, तो क्रोध बाहर से नहीं आता। बाहर सिर्फ़ एक घटना घटती है। भीतर जो विस्फोट होता है, वो हमारे अपने मन की संरचना से पैदा होता है। बाहरी दुनिया एक चिंगारी दे सकती है, पर आग का ईंधन भीतर जमा रहता है।


मन को हम अपना कहते हैं, पर दिन भर में कितनी बार मन हमारी बात मानता है। हम तय करते हैं कि शांत रहेंगे, पर एक शब्द सुनते ही भीतर उबाल उठ जाता है। हम निश्चय करते हैं कि आज चिंता नहीं करेंगे, पर वही विचार बार बार लौट आता है। ये विरोधाभास दिखाता है कि मन पर हमारा स्वामित्व उतना सीधा नहीं जितना हम मानते हैं। यही दूरी तनाव की जड़ है।


जब मन निर्देशों का पालन नहीं करता, तब एक आंतरिक संघर्ष शुरू होता है। एक हिस्सा आदेश देता है, दूसरा हिस्सा विरोध करता है। यही खिंचाव धीरे धीरे चिड़चिड़ाहट, असंतोष और फिर क्रोध में बदल जाता है। क्रोध सिर्फ़ किसी घटना पर प्रतिक्रिया नहीं है, ये भीतर चल रहे लंबे युद्ध का अचानक दिखने वाला चेहरा है।


मन का असहयोग और भीतर की दरार:


हम अपने शरीर की भाषा समझना सीख लेते हैं, पर मन की कार्यप्रणाली अक्सर अनजानी रहती है। शरीर थकता है, तो आराम चाहिए। पेट भूखा है, तो भोजन चाहिए। पर मन की भूख अलग है। वो स्मृति से चलता है, तुलना से चलता है, अधूरे अनुभवों से चलता है। जब ये धारा अनियंत्रित होती है, तो मन लगातार उत्तेजना खोजता रहता है।


उत्तेजना न मिले तो बेचैनी पैदा होती है। कोई हमें पहचान न दे, तो चोट लगती है। अपेक्षा पूरी न हो, तो भीतर दबा हुआ असंतोष सतह पर आता है। ये सब मिलकर मन में एक ऐसा दबाव बनाते हैं, जिसे हम अक्सर पहचानते नहीं। जब कोई छोटी सी घटना उस दबाव को छूती है, तो विस्फोट हो जाता है। हम कहते हैं, बात छोटी थी पर गुस्सा बड़ा हो गया।


असल में बात छोटी नहीं होती। वो सिर्फ़ ट्रिगर होती है। भीतर जमा इतिहास प्रतिक्रिया देता है। हर पुराना अपमान, हर अधूरी इच्छा, हर तुलना उस क्षण में सक्रिय हो जाती है। इसलिए क्रोध वर्तमान से ज्यादा अतीत का बोझ लेकर आता है। हम सामने वाले को नहीं देख रहे होते, हम अपने ही इतिहास से लड़ रहे होते हैं।


मन का असहयोग इसी कारण गहरा लगता है। हम वर्तमान में जीना चाहते हैं, पर मन अतीत की भाषा बोलता है। जब ये खाई समझ में नहीं आती, तो व्यक्ति खुद से नाराज़ होने लगता है। आत्म-दोष भी क्रोध का एक सूक्ष्म रूप है, जो भीतर की ऊर्जा को और विषैला बना देता है।


नियंत्रण की इच्छा और उलझता हुआ मन:


बहुत लोग सोचते हैं कि समाधान नियंत्रण में है। मन को अनुशासन से बाँध दो, विचारों को दबा दो, भावनाओं को रोक दो। थोड़े समय के लिए ये काम करता हुआ लगता है। पर दबाया हुआ मन शांत नहीं होता, वो सिर्फ़ सतह के नीचे जमा होता रहता है। जैसे ढक्कन बंद कर देने से उबलता पानी ठंडा नहीं हो जाता।


नियंत्रण की इच्छा भी मन का ही हिस्सा है। वही मन खुद को पकड़ने की कोशिश करता है। इससे एक गोल चक्कर बनता है। पकड़ने वाला और पकड़ा जाने वाला दोनों एक ही स्रोत से आते हैं। इस संघर्ष में ऊर्जा खर्च होती रहती है। व्यक्ति थकता है, फिर अचानक टूटता है, और क्रोध फिर से लौट आता है।


यदि ध्यान से देखा जाए, तो मन को नियंत्रित करने की कोशिश में छिपा डर दिखता है। हमें डर है कि अगर मन खुला छोड़ दिया, तो वो हमें नुकसान पहुँचा देगा। इसलिए हम उसे बाँधना चाहते हैं। पर डर से जन्मा नियंत्रण कभी शांति नहीं देता। वो सिर्फ़ सतर्कता और तनाव पैदा करता है।


समझ का रास्ता अलग है। यहाँ नियंत्रण नहीं, निरीक्षण है। मन क्या कर रहा है, ये देखना। बिना निर्णय के देखना। जैसे कोई वैज्ञानिक प्रयोग देख रहा हो। जब विचार उठता है, उसे तुरंत सही या गलत कहने की जगह सिर्फ़ नोटिस करना। इस देखने में दूरी नहीं, जागरूकता है।


देखना, समझना और ऊर्जा का बदलना:


जब मन को बिना दबाए देखा जाता है, तो एक नई गुणवत्ता जन्म लेती है। देखने वाला और देखा जाने वाला धीरे धीरे अलग नहीं रहते। व्यक्ति समझने लगता है कि क्रोध कोई दुश्मन नहीं, बल्कि ऊर्जा का एक विकृत रूप है। वही ऊर्जा अगर स्पष्ट देखी जाए, तो बदलने लगती है।


क्रोध के क्षण में शरीर की धड़कन तेज होती है, सांस बदलती है, विचार संकुचित हो जाते हैं। अगर उस समय कोई सिर्फ़ इन परिवर्तनों को देख सके, बिना कहानी जोड़े, तो क्रोध की पकड़ ढीली पड़ने लगती है। क्योंकि कहानी ही उसे ईंधन देती है। विचार बार बार घटना को दोहराता है, और आग जलती रहती है।


जब कहानी टूटती है, तो सिर्फ़ ऊर्जा बचती है। ऊर्जा स्वयं में न अच्छी है, न बुरी। उसका रूप ही समस्या बनता है। समझ की रोशनी में वही ऊर्जा स्पष्टता में बदल सकती है। व्यक्ति प्रतिक्रिया की जगह उत्तर देने लगता है। प्रतिक्रिया यांत्रिक है, उत्तर जागरूक है।


इस अवस्था में मन आदेश से नहीं चलता, समझ से चलता है। आदेश हमेशा बाहर से आता है, समझ भीतर से उठती है। जब भीतर स्पष्टता होती है, तो अनुशासन थोपना नहीं पड़ता। क्रिया स्वाभाविक हो जाती है। जैसे कोई कुशल संगीतकार हर सुर को मजबूरी से नहीं, सहजता से छूता है।


आंतरिक जिम्मेदारी का बोध:


बाहरी दुनिया अनिश्चित है। लोग बदलेंगे, परिस्थितियाँ बदलेंगी, योजनाएँ टूटेंगी। यदि हमारी शांति इन सब पर टिकी है, तो जीवन लगातार अस्थिर रहेगा। आंतरिक जिम्मेदारी का अर्थ है ये स्वीकार करना कि प्रतिक्रिया हमारी है। घटना बाहर है, पर अनुभव भीतर जन्म लेता है।


ये स्वीकार करना आसान नहीं है। क्योंकि तब दोष देने की जगह कम हो जाती है। पर इसी स्वीकार में स्वतंत्रता छिपी है। जब व्यक्ति देखता है कि उसकी अशांति उसकी अपनी संरचना से आती है, तब बदलाव संभव होता है। वरना जीवन शिकायतों का सिलसिला बन जाता है।


आंतरिक जिम्मेदारी का मतलब भावनाओं को नकारना नहीं। क्रोध उठेगा, दुख उठेगा, भय उठेगा। पर उनके साथ अंधी पहचान टूटने लगती है। व्यक्ति कह सकता है, क्रोध है, पर मैं सिर्फ़ क्रोध नहीं हूँ। इस दूरी में जगह बनती है, और उसी जगह में समझ साँस लेती है।


मन को समझना कोई एक दिन का काम नहीं। ये निरंतर देखने की प्रक्रिया है। हर संबंध में, हर प्रतिक्रिया में, हर विचार में खुद को पढ़ना। जैसे एक जीवित पुस्तक, जो हर क्षण नया पन्ना खोलती है। इस पढ़ने में धैर्य चाहिए, पर यही धैर्य धीरे धीरे मन को अपना घर बना देता है।


जब मन घर बनता है, तो क्रोध अनचाहा मेहमान नहीं लगता। वो आता है, देखा जाता है, और चला जाता है। पीछे एक साफ़ आकाश बचता है, जहाँ भावनाएँ बादलों की तरह गुजरती हैं, पर आकाश स्वयं नहीं टूटता। उसी आकाश में आंतरिक शांति की संभावना हमेशा मौजूद रहती है।


पहले मन में भाव आता है, कामना इच्छा होती है।भाव शब्द रूप धर कर विचार बनता है। विचार से धारणा बनती है सशक्त धारणा के साथ सशक्त संकल्प चाहिए, फिर धारणा पर निरंतर ध्यान चाहिए। ध्यान की निरंतरता बनी रहे इसके लिए नियम संयम चाहिए। फिर समाधि घटित होती है।समाधि धारणा का फलित हो जाना है। इच्छा की पूर्ति सफलता समाधि है। सांसारिक कार्यों में सफलता के लिए यही सूत्र कार्य करते हैं। धारणा कमजोर हुई, तो सफलता नहीं मिलती है। धारणा भले सशक्त हो और ध्यान कमजोर हो तो भी सफलता नहीं मिलती। यदि अपनी योजना पर ठीक से ध्यान न दिया जाए तो असफलता मिलती ही है। 

-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि।

यम के पांच प्रकार हैं, 1-अहिंसा -बिना कारण किसी को दुख पहुंचाना।यानि व्यर्थ क्रिया न करना।

2- सत्य,-सच्चे मन से कार्य करना।

3- अस्तेय - चोरी न करना। अर्थात श्रम से बचने के लिए छद्म उपाय न करना।

4- ब्रह्मचर्य - जबतक सफलता न मिले तबतक मन को किसी भी अन्य विषय राग में न लगाना। अर्थात भोग विलास न करना।

5- अपरिग्रह - योजना में उपयोगी वस्तुओं के अतिरिक्त अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह न करना। अन्यथा अनावश्यक वस्तुओं को संभालने में ही ऊर्जा व्यय होती रहेगी।जो योजना की सफलता में बाधक बनेगी।


नियम के भी प्रकार हैं,-शौच, संतोष,तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणिधान।

शौच स्वच्छता, संतोष धैर्य, स्वाध्याय निरंतर सक्रिय रहना, ईश्वर प्राणिधान, सफलता के लिए ईश्वर पर विश्वास, अर्थात संशय रहित होना।

आसन -कार्य योजना के शारीरिक सुविधा हेतु बैठना,स्थिर होना,।

प्राणायाम स्वांस को संतुलित रखना,कार्य के समय स्वांस का असंतुलन शरीर को रुग्ण करेगा तथा कार्य में बाधा आयेगी। अतः स्वांस नियंत्रित रहना चाहिए।

प्रत्याहार -जब स्वांस नियंत्रित रहती है तो मन की चंचलता निरुद्ध होती है।मन बाह्य विषयों में नहीं जा पाता है। 

धारणा जब मन थिर होता है तब हम चित्त को कार्ययोजना,विषय पर केन्द्रित करते हैं।

ध्यान जब हम एकाग्र चित्त से धारणा अनुसार कार्य करते हैं।

समाधि,धारणा ध्यान के द्वारा प्राप्त परिपक्व अवस्था समाधि है। 

किसी कार्य की सफलता के लिए योग के इन सूत्रों का पालन अनिवार्य है। 

जब भी व्यक्ति किसी कार्य में सफल होता है।तब वह उन्हीं सूत्रों का पालन कर रहा होता है।भले ही उसे पतंजलि योग सूत्रों का ज्ञान न हो।

यह सूत्र सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों ही जगत में समान रूप से प्रभावी हैं।


प्यारा फरवरी

फरवरी आते ही मजनू, गलियों में मँडराते हैं,

जेबें खाली होती हैं, पर ख्वाब बड़े सजाते हैं।

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​●रोज़ डे (Rose Day):

वो अस्सी रुपये का गुलाब,कल दस का बिकता था,

पहले उसी के दम पर, सच्चा प्यार टिकता था।

काँटे तो मुफ्त मिलते हैं, फूलों के दाम भारी हैं,

ये प्यार है या शायद फूलों की कालाबाजारी है।

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​●प्रपोज़ डे (Propose Day):

दूसरे दिन घुटनों के बल, सब हाँ सुनने को मरते हैं,

कल किसी और से आज किसी और से कसमें भरते हैं।

रिजेक्शन का डर ऐसा है, जैसे बोर्ड का कोई परचा हो,

डर बस इस बात का है, कि फालतू में न खर्चा हो।

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 ​●चॉकलेट डे (Chocolate Day):

तीसरे दिन तो मिठास का, ऐसा सैलाब आता है,

शुगर की फिक्र छोड़ो, बस कैडबरी का राज आता है।

अजीब विडंबना है देखिये, कड़वे रिश्तों के दौर में,

लोग वफ़ा ढूँढ रहे हैं, डार्क चॉकलेट के शोर में।

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​●टेडी डे (Teddy Day):

चौथे दिन वो रुई का भालू, सोफे की शोभा बढ़ाता है,

दो दिन बाद वही टेडी, धूल की चादर ओढ़ सो जाता है।

इंसान को वक़्त नहीं देते, खिलौनों से दिल बहलाते हैं,

आशिक अपनी सारी कमाई, रुई के ढेर में लुटाते हैं।

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​●प्रॉमिस डे (Promise Day):

पाँचवें दिन वादों की, झड़ी ज़ोरों से लगती है,

चाँद-तारे तोड़ लाऊँगा, ये बात सच्ची लगती है।

पर हकीकत तो ये है, कि वफ़ा उठाने का वादा नहीं होता,

और सात समंदर पार जाने का, इरादा नहीं होता।

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​●हग डे और किस डे (Hug & Kiss Day):

छठे और सातवें दिन, नज़ाकत और बढ़ जाती है,

मर्यादा और शर्म की रेखा, थोड़ी सी थरथराती है।

बजरंग दल के खौफ में, पार्कों में जो छिपते हैं,

वही वीर योद्धा फिर, सिंगल होने पर लिखते हैं।

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​● एंटी-वैलेंटाइन वीक 

जब गुलाबी बुखार उतरता है, तब असली होश आता है,

फरवरी का दूसरा हफ्ता, हकीकत से मिलाता है।

कल तक जो बाबू-शोना थे, अब वो केस लगते हैं,

वैलेंटाइन के बाद वाले दिन, थोड़े कलेश लगते हैं।

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​●स्लैप डे (Slap Day):

पंद्रह तारीख को सारा रोमांस, हवा हो जाता है,

इश्क़ का भूत थप्पड़ खाकर, फ़ना हो जाता है।

ये थप्पड़ गाल पर नहीं, गुमराह यादों पर पड़ता है,

जो कल तक सर चढ़ा था, वो अब पैरों में पड़ा रहता है।

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​●किक डे (Kick Day):

सोलह को लात मारो, उन पुरानी कड़वी बातों को,

जो नींद उड़ा ले जाती थी, उन लंबी काली रातों को।

गिफ्ट वापस करने का कष्ट, अब उठाना छोड़ दो,

यादों को फुटबॉल बनाओ, और किक मार कर तोड़ दो।

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​●परफ्यूम डे (Perfume Day):

सत्रह को आती है महक, ज़रा खुद की शख्सियत की,

अब ज़रूरत नहीं रही, किसी गैर की अहमियत की।

खुद को इतना महकाओ, कि एक्स को भी जलन हो जाए,

तुम्हारी खुशबू देख कर, उसका नया वाला मौन हो जाए।

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​●फ्लर्टिंग डे (Flirting Day):

अठारह को फिर से पंख, ज़रा फड़फड़ाने लगते हैं,

मजनू पुराने पिंजरे से, बाहर आने लगते हैं।

ये रियल वाला इश्क़ नहीं, बस हल्की-फुल्की मस्ती है,

क्योंकि आज के दौर में, वफ़ा थोड़ी सस्ती है।

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​●कन्फेशन डे (Confession Day):

उन्नीस को सच बोलने का, एक दौरा सा पड़ता है,

हमसे गलती हुई ये मानने को, दिल करता है।

कोई कहता है सॉरी, कोई कहता है तुम बेमिसाल हो,

कोई कहना चाहता है - ए करेजा तुम बड़ी बवाल हो।

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​●मिसिंग डे (Missing Day):

बीस तारीख को थोड़ी, पुरानी टीस जागती है,

तन्हाई के साए में, याद फिर से भागती है।

पर ये याद प्यार की नहीं, बस खालीपन का बहाना है,

पुराने जख्मों को खुरच कर, खुद को फिर रुलाना है।

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​●ब्रेकअप डे (Breakup Day):

इक्कीस को अंततः,आज़ादी का बिगुल बजता है,

बिना किसी रिलेशनशिप के, अब चेहरा सजता है।

न कॉल्स का झंझट, न मैसेज का है इंतज़ार,

मुबारक हो आपको, आप जीत गए ये जंग-ए-प्यार।।

फरवरी बीतते-बीतते, जेब और दिल दोनों खाली हैं,

आशिकों के चेहरों पर, अब छाई थोड़ी लाली है।