Sunday, February 8, 2026

समस्याओं का खान बन चुका जीवन

 समस्याओं का खान बन चुका जीवन


जिस प्रकार कोयले की खान से निरंतर कोयला निकलता रहता है, जैसे कपड़ों की इंडस्ट्री में उत्पादन कभी रुकता नहीं, ठीक उसी प्रकार कुछ लोगों का जीवन मानो समस्याओं की खान बन जाता है। एक समस्या समाप्त भी नहीं होती कि उससे कहीं अधिक भारी, अधिक जटिल समस्या सामने आ खड़ी होती है। ऐसे लोगों का पूरा जीवन समस्याओं को सुलझाने में ही बीत जाता है।

उनके लिए जीवन जीना नहीं, बल्कि जीवन काटना बन जाता है।


वे दिन-रात संघर्ष करते हैं, समाधान खोजते हैं, परिस्थितियों से लड़ते हैं। बाहर से देखने पर वे सक्षम, जिम्मेदार और कभी-कभी बेहद सफल भी प्रतीत होते हैं। आर्थिक रूप से वे ऊँचाइयों तक पहुँच जाते हैं, समाज में सम्मान पा लेते हैं, लेकिन भीतर… भीतर एक खालीपन, एक बेचैनी, एक असमाप्त युद्ध चलता रहता है।


सफलता के पीछे छिपी अशांति


ऐसे लोग अक्सर मानसिक शांति की तलाश में इधर-उधर भटकते रहते हैं। कभी आध्यात्मिकता में, कभी रिश्तों में, कभी उपलब्धियों में, तो कभी यादों में।

वे पूछते हैं...

“मेरे जीवन में शांति क्यों नहीं है?”

“मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?”


उत्तर बहुत सरल है, लेकिन स्वीकार करना कठिन।


समस्या बाहर नहीं, पकड़ भीतर है


असल में समस्याएँ जीवन में आती-जाती रहती हैं यह तो हर व्यक्ति के साथ होता है। फर्क यहाँ है कि कुछ लोग समस्या को छोड़ देते हैं, और कुछ लोग उसे पकड़ कर बैठ जाते हैं।


आपने किसी एक ही चीज़ को कसकर पकड़ रखा है....


कोई बीता हुआ सुखद क्षण,


कोई अपमानजनक व्यवहार,


कोई अधूरी इच्छा,


या कोई ऐसा अनुभव जिसने आपको भीतर तक चोट पहुँचाई।


मान लीजिए जीवन में कभी कोई बेहद खुशी का पल आया था। वह पल बीत गया, लेकिन आप आज भी उसी में जी रहे हैं। वर्तमान कितना भी अच्छा हो, वह उस स्मृति से छोटा लगने लगता है।

या फिर किसी ने किसी परिस्थिति में आपके साथ गलत व्यवहार किया। वह घटना समाप्त हो चुकी है, लेकिन आप आज भी उसी क्षण को बार-बार जी रहे हैं। यहीं से समस्या जन्म लेती है।


स्मृति जब बोझ बन जाए


स्मृतियाँ स्वभाव से समस्या नहीं होतीं।

समस्या तब होती है जब स्मृति वर्तमान पर हावी हो जाती है।


जब हम किसी अनुभव को छोड़ नहीं पाते न सुख को, न दुःख को तब हमारा मन वहीं अटका रह जाता है। शरीर आगे बढ़ता रहता है, समय आगे चलता रहता है, लेकिन चेतना पीछे अटकी रह जाती है।

यही मानसिक द्वंद्व धीरे-धीरे जीवन को भारी बना देता है।


क्यों ऐसे लोग कभी शांत नहीं हो पाते


ऐसे लोग हमेशा “होना चाहिए था” और “ऐसा क्यों हुआ” के बीच झूलते रहते हैं।

वे वर्तमान को पूरी तरह जी ही नहीं पाते, क्योंकि उनका मन या तो अतीत में उलझा रहता है या भविष्य की चिंता में।


हर नई समस्या दरअसल पुरानी पकड़ का ही विस्तार होती है।

जब तक वह पकड़ छूटती नहीं, समस्याएँ रूप बदल-बदल कर आती रहती हैं।


समाधान कहाँ है?


समाधान बाहर नहीं है।

समाधान किसी व्यक्ति, धन, पद या उपलब्धि में नहीं है।


समाधान है....छोड़ने में।


बीते हुए सुख को सम्मान के साथ विदा करने में,


हुए अपमान को समझ के साथ जाने देने में,


और हर अनुभव को “सीख” बनाकर आगे बढ़ जाने में।


जब आप पकड़ छोड़ना सीख जाते हैं, तब समस्याएँ आना बंद नहीं होतीं, लेकिन वे आपको तोड़ना बंद कर देती हैं।


जीवन जीना सीखना


जीवन का उद्देश्य केवल समस्याओं को हल करना नहीं है।

जीवन का उद्देश्य है जीना, अनुभव करना और मुक्त रहना।


जिस दिन आप यह समझ जाते हैं कि हर क्षण नया है, और हर क्षण को पुराने बोझ के बिना जिया जा सकता है, उसी दिन समस्याओं की खान सूखने लगती है।


तब जीवन काटना नहीं पड़ता

तब जीवन अपने आप बहने लगता है।


"मोक्ष"","निर्वाण", "मुक्ति", सब एक ही है जो जीवन जी रहे यह जीवन आपका नही है, आपकों लगता कि मै जी रहा हूं मै हूं तो मुझे प्रमाण चाहीए आपसे, जैसे जीव जानवर पेड़ पौधे है वैसे ही मानव है, बस हम इसमें अधिक बुद्धि से हमारे अन्दर मै आ गया,मन बन गया, जिसने मन को समझा सृष्टि को समझ लिया संसार को समझ लिया, तब मुक्ति मोक्ष, निर्वाण सब के प्रमाण मिल गए, मन ऐसा राज, एक ऐसा रहस्य है, एक ऐसा भ्रम है, एक ऐसा प्रदा है, या जैसे प्रदा हटा की सब स्पष्ट हो जाता हैं, हमारा जीवन इस महिम पर्दे पर टिका है, और इसे तोड़ना, हटाना असंभव जैसा है, इसे नही मिटाया जा सकता है उसे समझा जा सकता है उसे छोटा किया जा सकता है लेकिन छोटा करने का ढंक मारना पीटना विरोध तप करना दमन करना काम नही आएगा! इसके लिए बुद्ध पुरुषो ने इसके विज्ञानिक मार्ग विकसित किए है, वैसे तो बुद्धि जीवी धर्म धार्मिक शास्त्र ने कई मार्ग खोजे है लेकिन कोई भी मार्ग सभी के लिएं सत्य साबित नही हुआ है, धर्म शास्त्र से मुनष्य को मार्ग मिलने चाहीए थे वे सभी मार्ग नाकाम साबित हुए उलटा जिस मन को छोटा करना था वह उल्टा शैतान का रूप धारण कर लिया, इन धर्म शैतानों कि वजह से सम्प्रदाय गुट, संस्थान धर्म गुरू पैदा हुए, इनकी वजह से कई हिंसा आतंकी घटना, देंगे हुए है  

जेसे सिनेमा घर में पर्दे की मुख्य भूमिका होती है,, पर्दे का हटाते ही फिल्म बंद हो जाती है, एक तो पर्दे पर प्रकाश आ रहा है वह ऊर्जा है प्राण है यदी अपने प्राण रोको तो फिल्म बंद हो जाती है और प्रदा हटाओ तो फिल्म बंद हो जाती हैं, अब कोइ दुसरा उपाय चाहीए, उर्जा तो हटा नही सकते है, और प्रदा भी हटा नही सकते है, अब पर्दे और मशीन के बीच में एक और राज है जिसने प्रदा भी नही हटे और मशीन भी नही हटे, अब प्रदा हमारा मन है फिल्म भी हमे देखना है किसी का विरोध नही करना है यह एक व्यवस्था है, पर्दे पर जो भी चल रह है उसका प्रभाव हमारे अन्दर घटित होता है, वैसे इस संसार में हमारे सामने जो भी घटित होता है तब हमारे अंदर सत्य झूठ प्रेम के लिए कुछ हमारे अंदर घट रहा है है वह मन है उसे सिर्फ देखो निपक्ष हो कर, जो घट रहा है उस पर प्रक्रिया नही करनी है, सिर्फ सिर्फ देखना है की यह मैं नही हूं, यह मेरी व्यवस्था नही है, इस देखने में एक दृष्टा का जन्म होता है, यह दृष्टा तुम्हारी आत्मा है, अभी जो भी आपने कर्म किए, भावनाए व्यक्त की वे सभी, एक व्यवस्था थी हमारे अन्दर उससे सब हो रहा है, इस व्यवस्था को हम अपनी व्यवस्था समझ रहे है यह भ्रम है, इसे समझ सकते है की यह सब हमारे अंदर पैदा करने में हमारा क्या हाथ है? यदि समझते है की जो क्रोध आने वाला था उसको आपने आने नही दीया ,जो लोभ पैदा होने वाला था आपने रोक दीया, जिस पर क्रोध कराना था और आपने करुणा प्रेम दे दिया तब आप अपने मालिक हुए, एक स्त्री को देख कर कामुकता का भाव रोक लिया तब आप आप है, लेकिन मेरी दृष्टी मे आप आप ही नही है, यह सब सृष्टि का खेल है, इसे खेल की भाती देखो, देखने की समता देखने की दृष्टी जितनी गहरी होगी तब जहा मन में जो घट रहा है जो मन में प्राण ऊर्जा खर्च हो रही है बहा धीरे धीरे वहा से धीरे धीर ऊर्जा बहाव खर्च कम हो जाता है है और दृष्टा मजबूत बन जता है जो तुम्हारी वास्तविक आत्मा है, जिसे ध्यान कहते है, इसी ध्यान में मुक्ति, मोक्ष, निर्वर्ण खिलता है बुद्धत्व, प्रज्ञा खिलती है, इसी ध्यान से एक वह कमजोर होता है जो माया है जो संसार है, और आध्यात्मिक का नया जन्म होता है

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