Thursday, February 12, 2026

हर इंसान की दुनिया अलग है

 आज के समय में ध्यान को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि उसके लिए अलग से समय चाहिए, एक शांत कमरा चाहिए, बंद आँखें चाहिए, और जीवन से थोड़ी दूरी चाहिए। जबकि सच यह है कि आज का मनुष्य दूरी नहीं, समावेश चाहता है। उसके पास बैठने का समय नहीं है, पर जीने का समय है। और जहाँ जीवन है, वहीं ध्यान भी हो सकता है।


आज कोई रातभर काम करता है, कोई अचानक मीटिंग में फँस जाता है, कोई यात्रा में है, कोई जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा है। ऐसे में अगर हम कहें कि “सुबह पाँच बजे बैठो, तभी शांति मिलेगी”, तो यह बात ज़्यादातर लोगों के लिए बोझ बन जाती है। ध्यान बोझ नहीं है। ध्यान तो राहत है।


हर इंसान की दुनिया अलग है। किसी का मन संगीत में घुल जाता है, किसी का पेड़ों को देखकर ठहरता है, कोई चलते-चलते भीतर उतर जाता है, कोई गाड़ी चलाते हुए, कोई अपने बच्चों को नहलाते समय, कोई रसोई में, कोई काम करते हुए, कोई प्रेम में, कोई मिलन के क्षणों में। रास्ते अलग हैं, अनुभव अलग हैं, लक्ष्य भी अलग हैं। इसलिए ध्यान का कोई एक आकार नहीं हो सकता।


अक्सर ऐसा भी होता है कि कुछ लोगों को एक ही विधि से शांति मिल जाती है। इसका कारण यह नहीं कि वही तरीका सबसे सही है, बल्कि इसलिए कि उन्होंने मन में पहले ही मान लिया होता है कि यही उन्हें शांति देगा। मन जहाँ भरोसा कर लेता है, वहाँ दरवाज़ा अपने आप खुल जाता है।


असल बात विधि की नहीं, उपस्थिति की है।


जब आप जो कर रहे हैं, उसमें पूरी तरह होते हैं तो वही ध्यान है।

जब आपकी इंद्रियाँ, आपका शरीर और आपका मन एक ही क्षण में हों तो वही ध्यान है।


देखिए, जब कोई खतरा सामने होता है, तब मन कहीं भटकता नहीं।

जब आपका बच्चा कुछ नया बना रहा होता है, तब आपकी पूरी चेतना उसी पर टिक जाती है।

उन क्षणों में कोई अभ्यास नहीं होता, फिर भी आप पूरी तरह जाग्रत होते हैं।


यही बात रोज़मर्रा के कामों में भी हो सकती है।


आप खाना बना रहे हैं तो मसालों की खुशबू को महसूस कीजिए, उबलते पानी की आवाज़ सुनिए, सब्ज़ी के रंग देखिए, चम्मच की हलचल को जानिए। उस समय सिर में बीते या आने वाले विचार चल रहे हों, तो उन्हें जाने दीजिए। काम मत छोड़िए। देखिएगा थोड़ी देर बाद ध्यान फिर लौट आता है। कभी ध्यान गायब, कभी विचार गायब यह खेल चलता रहता है। इसमें घबराने की कोई बात नहीं।


आप किसी रिश्ते में हैं तो सामने वाले की बात को सचमुच सुनिए। सिर्फ जवाब देने के लिए नहीं, समझने के लिए। अपने शब्दों को बोलते समय भी सजग रहिए कि वे कहाँ से आ रहे हैं। उस क्षण में मौजूद रहना ही सबसे बड़ी निकटता है।


आप दफ़्तर में हैं तो सिर्फ काम न करें, काम को देखें। आप क्या बना रहे हैं, किस दिशा में जा रहे हैं, आपका योगदान किस जगह जुड़ रहा है इस पर ठहरकर नजर डालिए। वहाँ भी गहराई संभव है।


आप चल रहे हैं तो कदमों की गति को जानिए।

आप गाड़ी चला रहे हैं तो सड़क, मोड़, आकाश, अपनी साँस सबको एक साथ महसूस कीजिए।

आप प्रेम में हैं तो उस क्षण को जल्दी खत्म करने की बजाय उसमें उतरिए।


ध्यान का मतलब जीवन से भागना नहीं है।

ध्यान का मतलब जीवन में पूरी तरह उतर जाना है।


हम अक्सर सोचते हैं कि ध्यान करने से जीवन बेहतर होगा।

पर सच यह है कि जीवन को बेहतर ढंग से जीना ही ध्यान है।


शुरुआत में यह टिकता नहीं। कुछ सेकंड में मन भाग जाता है। यह स्वाभाविक है। उसे जाने दीजिए। बस इतना ध्यान रखिए कि आप अपना काम न छोड़ें। धीरे-धीरे आप देखेंगे कि मन भागकर लौट आता है जैसे बच्चा खेलकर माँ की गोद में वापस आ जाता है।


आख़िरकार बात इतनी ही है 

आप जो कर रहे हैं, उसी में हो जाना।

आप जो सोच रहे हैं, उसे देखते रहना।

बिना खींचे, बिना रोके।


ध्यान कोई अलग चीज़ नहीं है जिसे जीवन में जोड़ना पड़े।

ध्यान वही है जो तब प्रकट होता है, जब जीवन से कुछ भी छूटा नहीं होता।


और शायद इसी कारण, जब यह समझ उतरती है, तो इंसान को कहीं जाने की जल्दी नहीं रहती

क्योंकि वह जहाँ है, वहीं पूरा है। 

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