क्रोध अक्सर हमें बाहरी परिस्थितियों का परिणाम लगता है। हम कहते हैं कि फलां व्यक्ति ने गुस्सा दिलाया, स्थिति खराब थी, इसलिए प्रतिक्रिया हुई। पर यदि ईमानदारी से देखा जाए, तो क्रोध बाहर से नहीं आता। बाहर सिर्फ़ एक घटना घटती है। भीतर जो विस्फोट होता है, वो हमारे अपने मन की संरचना से पैदा होता है। बाहरी दुनिया एक चिंगारी दे सकती है, पर आग का ईंधन भीतर जमा रहता है।
मन को हम अपना कहते हैं, पर दिन भर में कितनी बार मन हमारी बात मानता है। हम तय करते हैं कि शांत रहेंगे, पर एक शब्द सुनते ही भीतर उबाल उठ जाता है। हम निश्चय करते हैं कि आज चिंता नहीं करेंगे, पर वही विचार बार बार लौट आता है। ये विरोधाभास दिखाता है कि मन पर हमारा स्वामित्व उतना सीधा नहीं जितना हम मानते हैं। यही दूरी तनाव की जड़ है।
जब मन निर्देशों का पालन नहीं करता, तब एक आंतरिक संघर्ष शुरू होता है। एक हिस्सा आदेश देता है, दूसरा हिस्सा विरोध करता है। यही खिंचाव धीरे धीरे चिड़चिड़ाहट, असंतोष और फिर क्रोध में बदल जाता है। क्रोध सिर्फ़ किसी घटना पर प्रतिक्रिया नहीं है, ये भीतर चल रहे लंबे युद्ध का अचानक दिखने वाला चेहरा है।
मन का असहयोग और भीतर की दरार:
हम अपने शरीर की भाषा समझना सीख लेते हैं, पर मन की कार्यप्रणाली अक्सर अनजानी रहती है। शरीर थकता है, तो आराम चाहिए। पेट भूखा है, तो भोजन चाहिए। पर मन की भूख अलग है। वो स्मृति से चलता है, तुलना से चलता है, अधूरे अनुभवों से चलता है। जब ये धारा अनियंत्रित होती है, तो मन लगातार उत्तेजना खोजता रहता है।
उत्तेजना न मिले तो बेचैनी पैदा होती है। कोई हमें पहचान न दे, तो चोट लगती है। अपेक्षा पूरी न हो, तो भीतर दबा हुआ असंतोष सतह पर आता है। ये सब मिलकर मन में एक ऐसा दबाव बनाते हैं, जिसे हम अक्सर पहचानते नहीं। जब कोई छोटी सी घटना उस दबाव को छूती है, तो विस्फोट हो जाता है। हम कहते हैं, बात छोटी थी पर गुस्सा बड़ा हो गया।
असल में बात छोटी नहीं होती। वो सिर्फ़ ट्रिगर होती है। भीतर जमा इतिहास प्रतिक्रिया देता है। हर पुराना अपमान, हर अधूरी इच्छा, हर तुलना उस क्षण में सक्रिय हो जाती है। इसलिए क्रोध वर्तमान से ज्यादा अतीत का बोझ लेकर आता है। हम सामने वाले को नहीं देख रहे होते, हम अपने ही इतिहास से लड़ रहे होते हैं।
मन का असहयोग इसी कारण गहरा लगता है। हम वर्तमान में जीना चाहते हैं, पर मन अतीत की भाषा बोलता है। जब ये खाई समझ में नहीं आती, तो व्यक्ति खुद से नाराज़ होने लगता है। आत्म-दोष भी क्रोध का एक सूक्ष्म रूप है, जो भीतर की ऊर्जा को और विषैला बना देता है।
नियंत्रण की इच्छा और उलझता हुआ मन:
बहुत लोग सोचते हैं कि समाधान नियंत्रण में है। मन को अनुशासन से बाँध दो, विचारों को दबा दो, भावनाओं को रोक दो। थोड़े समय के लिए ये काम करता हुआ लगता है। पर दबाया हुआ मन शांत नहीं होता, वो सिर्फ़ सतह के नीचे जमा होता रहता है। जैसे ढक्कन बंद कर देने से उबलता पानी ठंडा नहीं हो जाता।
नियंत्रण की इच्छा भी मन का ही हिस्सा है। वही मन खुद को पकड़ने की कोशिश करता है। इससे एक गोल चक्कर बनता है। पकड़ने वाला और पकड़ा जाने वाला दोनों एक ही स्रोत से आते हैं। इस संघर्ष में ऊर्जा खर्च होती रहती है। व्यक्ति थकता है, फिर अचानक टूटता है, और क्रोध फिर से लौट आता है।
यदि ध्यान से देखा जाए, तो मन को नियंत्रित करने की कोशिश में छिपा डर दिखता है। हमें डर है कि अगर मन खुला छोड़ दिया, तो वो हमें नुकसान पहुँचा देगा। इसलिए हम उसे बाँधना चाहते हैं। पर डर से जन्मा नियंत्रण कभी शांति नहीं देता। वो सिर्फ़ सतर्कता और तनाव पैदा करता है।
समझ का रास्ता अलग है। यहाँ नियंत्रण नहीं, निरीक्षण है। मन क्या कर रहा है, ये देखना। बिना निर्णय के देखना। जैसे कोई वैज्ञानिक प्रयोग देख रहा हो। जब विचार उठता है, उसे तुरंत सही या गलत कहने की जगह सिर्फ़ नोटिस करना। इस देखने में दूरी नहीं, जागरूकता है।
देखना, समझना और ऊर्जा का बदलना:
जब मन को बिना दबाए देखा जाता है, तो एक नई गुणवत्ता जन्म लेती है। देखने वाला और देखा जाने वाला धीरे धीरे अलग नहीं रहते। व्यक्ति समझने लगता है कि क्रोध कोई दुश्मन नहीं, बल्कि ऊर्जा का एक विकृत रूप है। वही ऊर्जा अगर स्पष्ट देखी जाए, तो बदलने लगती है।
क्रोध के क्षण में शरीर की धड़कन तेज होती है, सांस बदलती है, विचार संकुचित हो जाते हैं। अगर उस समय कोई सिर्फ़ इन परिवर्तनों को देख सके, बिना कहानी जोड़े, तो क्रोध की पकड़ ढीली पड़ने लगती है। क्योंकि कहानी ही उसे ईंधन देती है। विचार बार बार घटना को दोहराता है, और आग जलती रहती है।
जब कहानी टूटती है, तो सिर्फ़ ऊर्जा बचती है। ऊर्जा स्वयं में न अच्छी है, न बुरी। उसका रूप ही समस्या बनता है। समझ की रोशनी में वही ऊर्जा स्पष्टता में बदल सकती है। व्यक्ति प्रतिक्रिया की जगह उत्तर देने लगता है। प्रतिक्रिया यांत्रिक है, उत्तर जागरूक है।
इस अवस्था में मन आदेश से नहीं चलता, समझ से चलता है। आदेश हमेशा बाहर से आता है, समझ भीतर से उठती है। जब भीतर स्पष्टता होती है, तो अनुशासन थोपना नहीं पड़ता। क्रिया स्वाभाविक हो जाती है। जैसे कोई कुशल संगीतकार हर सुर को मजबूरी से नहीं, सहजता से छूता है।
आंतरिक जिम्मेदारी का बोध:
बाहरी दुनिया अनिश्चित है। लोग बदलेंगे, परिस्थितियाँ बदलेंगी, योजनाएँ टूटेंगी। यदि हमारी शांति इन सब पर टिकी है, तो जीवन लगातार अस्थिर रहेगा। आंतरिक जिम्मेदारी का अर्थ है ये स्वीकार करना कि प्रतिक्रिया हमारी है। घटना बाहर है, पर अनुभव भीतर जन्म लेता है।
ये स्वीकार करना आसान नहीं है। क्योंकि तब दोष देने की जगह कम हो जाती है। पर इसी स्वीकार में स्वतंत्रता छिपी है। जब व्यक्ति देखता है कि उसकी अशांति उसकी अपनी संरचना से आती है, तब बदलाव संभव होता है। वरना जीवन शिकायतों का सिलसिला बन जाता है।
आंतरिक जिम्मेदारी का मतलब भावनाओं को नकारना नहीं। क्रोध उठेगा, दुख उठेगा, भय उठेगा। पर उनके साथ अंधी पहचान टूटने लगती है। व्यक्ति कह सकता है, क्रोध है, पर मैं सिर्फ़ क्रोध नहीं हूँ। इस दूरी में जगह बनती है, और उसी जगह में समझ साँस लेती है।
मन को समझना कोई एक दिन का काम नहीं। ये निरंतर देखने की प्रक्रिया है। हर संबंध में, हर प्रतिक्रिया में, हर विचार में खुद को पढ़ना। जैसे एक जीवित पुस्तक, जो हर क्षण नया पन्ना खोलती है। इस पढ़ने में धैर्य चाहिए, पर यही धैर्य धीरे धीरे मन को अपना घर बना देता है।
जब मन घर बनता है, तो क्रोध अनचाहा मेहमान नहीं लगता। वो आता है, देखा जाता है, और चला जाता है। पीछे एक साफ़ आकाश बचता है, जहाँ भावनाएँ बादलों की तरह गुजरती हैं, पर आकाश स्वयं नहीं टूटता। उसी आकाश में आंतरिक शांति की संभावना हमेशा मौजूद रहती है।
पहले मन में भाव आता है, कामना इच्छा होती है।भाव शब्द रूप धर कर विचार बनता है। विचार से धारणा बनती है सशक्त धारणा के साथ सशक्त संकल्प चाहिए, फिर धारणा पर निरंतर ध्यान चाहिए। ध्यान की निरंतरता बनी रहे इसके लिए नियम संयम चाहिए। फिर समाधि घटित होती है।समाधि धारणा का फलित हो जाना है। इच्छा की पूर्ति सफलता समाधि है। सांसारिक कार्यों में सफलता के लिए यही सूत्र कार्य करते हैं। धारणा कमजोर हुई, तो सफलता नहीं मिलती है। धारणा भले सशक्त हो और ध्यान कमजोर हो तो भी सफलता नहीं मिलती। यदि अपनी योजना पर ठीक से ध्यान न दिया जाए तो असफलता मिलती ही है।
-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि।
यम के पांच प्रकार हैं, 1-अहिंसा -बिना कारण किसी को दुख पहुंचाना।यानि व्यर्थ क्रिया न करना।
2- सत्य,-सच्चे मन से कार्य करना।
3- अस्तेय - चोरी न करना। अर्थात श्रम से बचने के लिए छद्म उपाय न करना।
4- ब्रह्मचर्य - जबतक सफलता न मिले तबतक मन को किसी भी अन्य विषय राग में न लगाना। अर्थात भोग विलास न करना।
5- अपरिग्रह - योजना में उपयोगी वस्तुओं के अतिरिक्त अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह न करना। अन्यथा अनावश्यक वस्तुओं को संभालने में ही ऊर्जा व्यय होती रहेगी।जो योजना की सफलता में बाधक बनेगी।
नियम के भी प्रकार हैं,-शौच, संतोष,तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणिधान।
शौच स्वच्छता, संतोष धैर्य, स्वाध्याय निरंतर सक्रिय रहना, ईश्वर प्राणिधान, सफलता के लिए ईश्वर पर विश्वास, अर्थात संशय रहित होना।
आसन -कार्य योजना के शारीरिक सुविधा हेतु बैठना,स्थिर होना,।
प्राणायाम स्वांस को संतुलित रखना,कार्य के समय स्वांस का असंतुलन शरीर को रुग्ण करेगा तथा कार्य में बाधा आयेगी। अतः स्वांस नियंत्रित रहना चाहिए।
प्रत्याहार -जब स्वांस नियंत्रित रहती है तो मन की चंचलता निरुद्ध होती है।मन बाह्य विषयों में नहीं जा पाता है।
धारणा जब मन थिर होता है तब हम चित्त को कार्ययोजना,विषय पर केन्द्रित करते हैं।
ध्यान जब हम एकाग्र चित्त से धारणा अनुसार कार्य करते हैं।
समाधि,धारणा ध्यान के द्वारा प्राप्त परिपक्व अवस्था समाधि है।
किसी कार्य की सफलता के लिए योग के इन सूत्रों का पालन अनिवार्य है।
जब भी व्यक्ति किसी कार्य में सफल होता है।तब वह उन्हीं सूत्रों का पालन कर रहा होता है।भले ही उसे पतंजलि योग सूत्रों का ज्ञान न हो।
यह सूत्र सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों ही जगत में समान रूप से प्रभावी हैं।
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