Wednesday, February 11, 2026

खुद से न लड़े… खुद को दोस्त बनाए

 खुद से न लड़े… खुद को दोस्त बनाए


अक्सर इंसान की ज़िंदगी लड़ाई में ही गुजर जाती है।

कभी जीत की चाह में, कभी हार के डर में।

लड़ाई में हमेशा दो ही परिणाम होते हैं हार या जीत।

और हैरानी की बात यह है कि जीतने वाला भी शांत नहीं होता,

और हारने वाला टूट जाता है।


लड़ाई के बाद किसी को थोड़ा फायदा मिलता है,

तो किसी को गहरा नुकसान।

लेकिन सुकून, संतुलन और स्पष्टता

ये शायद ही किसी के हिस्से आती हैं।


आज इंसान की प्रवृत्ति को धीरे-धीरे

लड़ाकू स्वभाव में बदला जा रहा है।

दुनिया को कुछ ताकतवर लोग इस तरह डिज़ाइन कर रहे हैं

कि हर चीज़ युद्ध जैसी दिखने लगी है।


पढ़ाई अब सीखने की प्रक्रिया नहीं रही,

वह प्रतियोगिता बन गई है।

रिश्ते अपनापन नहीं रहे,

वे तुलना और शर्तों में बदल गए हैं।

पहचान आत्मबोध नहीं,

ब्रांड और स्टेटस बन गई है।


घर, ज़मीन, सामान

सब कुछ पाने की दौड़ बन गया है।

रोज़गार और व्यापार रचना नहीं,

प्रतिस्पर्धा की जंग बन चुके हैं।

यहाँ तक कि पहनावा, खान-पान

और दिखावा भी मुकाबले में बदल गया है।


धीरे-धीरे इंसान इस दुनिया को

रणक्षेत्र समझने लगता है।

क्योंकि उसका दिमाग़ उसी तरह ढाला जा रहा है।


जैसा माहौल होता है,

वैसा ही दिमाग़ बनता है।

अगर चारों ओर संघर्ष है,

तो भीतर भी संघर्ष पैदा होगा।

अगर चारों ओर तुलना है,

तो आत्म-संदेह जन्म लेगा।


तो फिर इंसान करे क्या?


क्या सब छोड़ दे?

क्या जंगल चला जाए?

नहीं।


समाधान भागने में नहीं है,

समाधान है भीतर की दिशा बदलने में।


इंसान जाने-अनजाने उसी भीड़ का हिस्सा बन जाता है।

लड़ता है, दौड़ता है,

खुद को साबित करने में लगा रहता है।

पूरी ज़िंदगी किसी न किसी से आगे निकलने की कोशिश में निकल जाती है।


और फिर सवाल उठता है

“आपने बिना लड़े क्या हासिल किया है?”


लेकिन असली सवाल यह होना चाहिए

जो आपने हासिल किया,

क्या वह सच में लड़ाई थी?

या आप पहले से ही उसके काबिल थे?


लड़ाई और प्रयास का अंतर


लड़ाई वहाँ होती है जहाँ


डर प्रेरणा बन जाए


तुलना ईंधन बन जाए


अहंकार दिशा तय करे


प्रयास वहाँ होता है जहाँ


स्पष्टता हो


धैर्य हो


खुद से ईमानदारी हो


लड़ाई थका देती है।

प्रयास निखार देता है।


जो इंसान हर समय लड़ रहा है,

वह असल में दूसरों से नहीं,

अपने भीतर के डर से लड़ रहा होता है।


सिस्टम आपको लड़ाकू क्यों बनाना चाहता है?


क्योंकि शांत इंसान को नियंत्रित करना मुश्किल होता है।

जागरूक इंसान को डराना मुश्किल होता है।

और जो खुद से संतुष्ट है,

वह आसानी से खरीदा नहीं जा सकता।


इसलिए पहले...

कमी का एहसास पैदा किया जाता है।

फिर डर।

फिर प्रतियोगिता।

और अंत में

“तुम काफी नहीं हो” का भाव।


और इंसान दौड़ता रहता है

बिना यह पूछे कि

दौड़ किस दिशा में है?


भीड़ से अलग रास्ता


जो इस भीड़ का हिस्सा नहीं बनता,

वही अलग पथ पर चलता है।


वह रास्ता आसान नहीं होता।

वहाँ ताली नहीं मिलती।

वहाँ तुरंत पहचान नहीं मिलती।


लेकिन वहीं

गहराई मिलती है।

स्पष्टता मिलती है।

और असली आत्मसम्मान जन्म लेता है।


अलग रास्ता चुनने वाला इंसान

धीरे चलता है,

लेकिन भटकता नहीं।


सफल वही नहीं जो सबसे आगे है।

सफल वह है

जो रात को चैन से सो सके।

जिसे खुद से नज़र चुरानी न पड़े।

जिसकी ऊर्जा टूटी न हो।


अगर आपने बहुत कुछ पाया,

लेकिन खुद को खो दिया

तो वह सौदा बहुत महँगा था।


जीवन युद्ध नहीं, साधना है


जीवन कोई युद्ध नहीं है

जहाँ सबको हराना हो।

यह कोई प्रतियोगी परीक्षा नहीं है।


जीवन एक साधना है

सीखने की,

समझने की,

और परिपक्व होने की।


यहाँ कोई दुश्मन नहीं,

सिर्फ अलग-अलग यात्राएँ हैं।


जिस दिन इंसान यह समझ लेता है


 “मुझे किसी से आगे नहीं निकलना,

मुझे बस खुद के करीब पहुँचना है।”


उसी दिन लड़ाई खत्म हो जाती है।


और जब लड़ाई खत्म होती है,

तब जीवन शुरू होता है।


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