Tuesday, February 3, 2026

संत कबीरदास के अनुसार

संत कबीरदास के अनुसार साधना की शुरुआत 


1-कामी क्रोधी लालची , इनते भक्ति ना होय ।

भक्ति करै कोई सूरमा , जादि बरन कुल खोय । 


अर्थ:-

विषय वासना में लिप्त रहने वाले, क्रोधी स्वभाव वाले तथा लालची प्रवृति के प्राणियों से भक्ति नहीं होती । धन संग्रह करना, दान पूण्य न करना ये तत्व भक्ति से दूर ले जाते है । भक्ति वही कर सकता है जो अपने कुल , परिवार जाति तथा अहंकार का त्याग करके पूर्ण श्रद्धा एवम् विश्वास से कोई पुरुषार्थी ही कर सकता है । हर किसी के लिए संभव नहीं है ।


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2-रहना नहिं देस बिराना है।यह संसार कागद की पुडिया, बूँद पडे गलि जाना है।


यह संसार काँटे की बाडी, उलझ पुलझ मरि जाना है॥


यह संसार झाड और झाँखर आग लगे बरि जाना है। 

कहत कबीर सुनो भै साधु , सतगुरू नाम ठिकाना हैं l


3-परारब्ध पहिले बना , पीछे बना शरीर ।

कबीर अचम्भा है यही , मन नहिं बांधे धीर ।


अर्थ:-

कबीर दास जी मानव को सचेत करते हुए कहते है कि प्रारब्ध की रचना पहले हुई उसके बाद शरीर बना । यही आश्चर्य होता है कि यह सब जानकर भी मन का धैर्य नहीं बंधता अर्थात कर्म फल से आशंकित रहता है ।


4-जंत्र मंत्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय ।

सार शब्द जाने बिना, कागा हंस न होय ।।


अर्थ:-

जंत्र मंत्र का आडम्बर सब झूठ है, इसके चक्कर में पडकर अपना जीवन व्यर्थ न गँवाये । गूढ ज्ञान के बिना कौवा कदापि हंस नहीं बन सकता ।अर्थात दुर्गुण से परिपूर्ण आज्ञानी लोग कभी ज्ञानवान नहीं बन सकते ।


5-माला फेरत युग गया, मिटा ना मन का फेर ।

कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर ।।


अर्थ:-

हाथ में माला लेकर फेरते हुए युग व्यतीत हो गया फिर भी मन की चंचलता और संसारिक विषय रुपी मोह भंग नहीं हुआ । कबीर दास जी संसारिक प्राणियों को चेतावनी देते हुए कहते है- हे अज्ञानियों हाथ में जो माला लेकर फिरा रहे हो, उसे फेंक कर सर्वप्रथम अपने हृदय की शुध्द करो और एकाग्र चित्त होकार प्रभु का ध्यान करो ।


6-दस द्वारे का पींजरा, तामे पंछी मौन ।

रहे को अचरज भयै, गये अचम्भा कौन ।।


अर्थ:-


1-इस दस द्वारों शरीर में जो प्राण रुपी वायु है जिसके रहने से शरीर चलता फिरता है बातचीत करता है, आहार विहार करता है तथा संसार की सभी सुखों का उपभोग करता है। वह प्राणरूपी वायु शरीर के दस द्वारों में से किसी भी द्वार से निकल सकता है । इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है ।


2-शास्त्रों के अनुसार देह के नौ द्वार मानें गये हैं जो कि मृत्यु के समय शरीर के अन्दर रहनेवाले जीव के निर्गमन के लिए प्राकृतिक रूप से खुले रहते हैं। इनमें से सात द्वार दोनों आँखें, दोनों कान, नाक के दोनों नथुने और मुँह सिर में स्थित रहते हैं जिनसे पुण्यात्मा या सामान्य स्तर की पुण्यात्माओं के जीव निर्गमन करते हैं। मूत्रेन्द्रिय और उपस्थि(मलोत्सर्जन की इन्द्रिय) नीचे के द्वार हैं जिनसे पापियों के जीव निकलते हैं। इनसे भिन्न ब्रह्मरन्ध्र का द्वार है जो प्राकृतिक रूप से बन्द रहता है और योगसाधना (विशेष रूप से प्राणायाम व ध्यान) द्वारा खोला जाता है। यदि जीव इस द्वार से होकर शरीरत्याग करता है तो वह मुक्त हो जाता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता। इसी द्वार को दसवाँ द्वार कहा गया है।


3-दशम द्वार से निष्क्रमण की दशा में सामान्य निष्क्रमण की दशा की अपेक्षा शरीर के अत्यधिक सूक्ष्म अंश का निर्गमन होता है। सुषुम्णा के अन्दर वज्रनाडी है। वज्रनाडी के अन्दर चित्रनाडी है और चित्रनाडी के अन्दर ब्रह्मनाडी है। ब्रह्मनाडी के निचले सिरे पर मूलाधार चक्र है और ऊपर सबसे अन्त में ब्रह्मरन्ध्र का द्वार है। इसी ब्रह्मनाडी के रास्ते से जाकर जीव ब्रह्मरन्ध्र के द्वार से निकल पाता है। यह कहा जा सकता है कि जब सुषुम्णा तक को आधुनिक यन्त्रों तक से देखा नहीं जा सकता तो ब्रह्मनाडी और उसके अन्दर विचरण करनेवाले जीव की सूक्ष्मता की कल्पना ही की जा सकती है।


7-पांचतत्व का पूतरा, मानुष धरिया नाम ।

दिन चार के कारने , फिर फिर रोके ठाम ।।


अर्थ:-

पृथ्वी, जल, वायु, अग्नी और आकाश तत्व से मिलकर बने ढाँचे को ‘मनुष्य’ नाम रख दिया । चार दिन के क्षणिक सुख विलास में लिप्त होकर जीव ने अपने मोक्ष का द्वार बन्द कर लिया ।


8-भाला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख मांहि ।

मनवा तो चहु दिश फिरै, यह तो सुमिर न नांहि ।।


अर्थ:-

हाथ में माला फिर रही है और मुंह के बीच में जीभ फिर रही है तथा चंचल मन स्वच्छन्द रूप से चारों दिशाओ में घूम रहा है। फिर यह सुमिरन कहॅा हुआ ।यह तो सुमिरन करने का दिखावा है ।जब तक मन शान्त और एकाग्र नहीं होता तब तक सुमिरन संभव नहीं है ।


9-जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहिरे पानी पैठ।

जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ ॥


अर्थ:-


जो गहरे पानी में डूब कर खोजेगा उसे ही मोती मिलेगा। जो डूबने से डर

जायेगा ;वह किनारे बैठा रह जायेगा। आत्म ज्ञान प्राप्ति के लिये गहन साधना करनी पड़ती है।


10-ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय ।

औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय ॥


अर्थ:-


हमें ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए, जिससे दूसरों को शीतलता का अनुभव हो और साथ ही हमारा मन भी प्रसन्न हो उठे।मधुर वाणी औषधि के सामान होती है, जबकि कटु वाणी तीर के समान कानों से प्रवेश होकर संपूर्ण शरीर को पीड़ा देती है। मधुर वाणी से समाज में एक – दूसरे के प्रति प्रेम की भावना का संचार होता है। जबकि कटु वचनों से सामाजिक प्राणी एक – दूसरे के विरोधी बन जाते है। 


 11-दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय ।

बिना जीव की स्वाँस से, लोह भसम ह्वै जाय ॥


अर्थ:-


दुर्बल को कभी नहीं सताओ अन्यथा उसकी ‘हाय’ तुम्हें लग जायेगी । मरे हुए चमडे की धौकनी से लोहा भी भस्म ही जाता है । अर्थात- दुर्बल को कभी शक्तिहीन मत समझो ।


12-पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,


ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय। 


अर्थ;-


बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।


13-आबत गारी ऐक है, उलटत होय अनेक

कहै कबीर नहि उलटिये वाही ऐक का ऐक।


अर्थ:-


कोई एक गाली देता है तो उलटकर उसे भी गाली देने पर वह अनेक हो

जाता है।यदि उलट कर पुनः गाली नहीं दिया जाये तो वह एक का एक ही रह जाता है।


14-जो तोको कांटा बुबये ताको बो तू फूल

तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल।


अर्थ:-


जो तुम्हारे लिये काॅंटा बोये तुम उसके लिये फूल बोओ। तुम्हारा फूल तुम्हें फूल के रुप में मिल जायेगा ।परंतु उसका काॅंटा उसे तीन गुणा

अधिक काॅंटा के रुप में मिलेगा। अच्छे कर्म का फल अच्छा और बुरे का तीन गुणा बुरा फल मिलता है।


15-तीन ताप में ताप है , ताका अनंत उपाय ।

ताप आतम महाबली , संत बिना नहिं जाय ।।

दैहिक , दैविक और भौतिक... ये तीन ताप संसार में माने गये हैं । इन तापों से बचने के लिए लोग अनेकों उपाय करते है ।तीनों ताप में दुख है पर उनके उपाय हैं। परंतु आत्मा के ताप-अथार्त ज्ञान की प्राप्ति ,प्रभु से बिना साक्षात्कार संत की संगति के संभव नहीं है।


16-कस्तूरी कुंडल बसे , मृग ढूंढे बन माहिं ।


ऐसे घट घट राम है, दुनिया देखे नाहिं ।। 


अर्थ:-


अति सुगन्धित कस्तूरी मृग के नाभि में होती है , जब घास चरने के लिए मृग अपनी सिर नीचे करता है तो कस्तूरी के सुगन्ध उसे मिलती है और उसे ढूंढने के लिए वह जंगल में इधर उधर दौड़ता फिरता है ।जबकि कस्तूरी तो उसकी नाभि में है जिसका ज्ञान उसे नहीं है ।उसी प्रकार अविनाशी भगवान तुम्हारे अपने ह्रदय में ;इस संसार के कण कण में विद्यमान है; किन्तु सांसरिक प्राणी उन्हें देख नहीं पाते ।


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संत कबीरदास के अनुसार साधना की गहराई;-


1-धीरे-धीरे रे मना, धीरज से सब होय ।

माली सींचै सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय ॥


अर्थ;-


अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा, आज पेड़ लागाओगे तो कल फल नहीं आयेगा। इसी तरह धीरज जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है।


2-अष्ट सिद्धि नव निद्धि लौं , सबही मोह की खान ।

त्याग मोह की वासना , कहैं कबीर सुजान ।।


अर्थ;-

कबीर दास जी कहते हैं कि संसार की अष्ट सिद्धियां और नौं निधिया माया मोह का भंडार है, इस मोह रूपी वासना का त्याग करना ही उत्तम है क्योंकि ये कल्याण साधन के मार्ग की बाधा है ।


3-नैनन की कारी कोठरी, पुतली पलँग बिछाय ।


पलकों की चिक डारिकै, पिय को लिया रिझाय ॥


अर्थ;-


अपने प्रभु के लिए नेत्रों की कोठरी बनाकर पुतली रुपी पलंग बिछा दिया और पलकों की चिक दालकर अपने स्वामी को प्रसन्न कर लिया अर्थात् नयनों में प्रभु को बसाकर अपनी भक्ति अर्पित कर दी ।


 4-जपा मरे अजपा मरे ,अनहद हू मर जाये।

सुरत समानी शब्द में ,ताहि काल नही खाए।


अर्थ;-


1-कबीर कहते है कि ब्रह्मरन्ध्र पर नीचे के 5 कमलो के 5 जप मंत्र निष्प्रभावी हो जाते है, और अजपा जाप( ,जिसे साँसो की माला पे जपा जाता है, उसे अजपा जाप कहते है ) ब्रह्म एवम् परब्रह्म के लोक पार करते ही निष्प्रभावी हो जाते है| इसके बाद महासुन्न में अनहद धुन भी बंद हो जाती है, इस महासुन्न को सारनाम(सारशब्द) से पार करते है| यहाँ से आगे मकर तार की डोरी प्रारंभ होती है जिसे सारशब्द से पार करके सतलोक मे प्रवेश करते है| यहाँ काल से पूर्णतया मुक्ति मिल जाती है|


2-सुमिरण करते करते हम उसमे इतने लीन हो जायेंगे। फिर अचानक से अहसास होगा की

सुमिरण का तो पता नही। अजपा जाप शुरू हो गया।यानी अब बिना कोशिश के सुमिरण अपने आप चलने लगा।। दिन रात हमेशा अपने आप हो रहा है।फिर हम जपने वाले

नही रह जाते। फिर हम सुनने वाले बन जाते है।

3-फिर कुछ और गहराई में जाते है तो सुमिरण 'धुन' यानी साउंड में बदल जाता है। अब न हम जाप कर रहे है ,न जाप सुन रहे है। वो पीछे रह गया।अब तो सिर्फ ध्वनि होती है..

'झनकार धुन[' ;जिसको अनहद नाद कहते है।धीरे धीरे गहराई में जब उतरते है तो सब तरह

की ध्वनिसिर्फ एक साउंड में बदल जाती है।इस स्टेज पर जाप भी मर गया यानी सुमिरण पीछे रह गया।अजपा यानी तरह तरह की ध्वनियां भी गयी।। अब वो अवस्था आई; जहां सच्चा शब्द यानी कुल मालिक सामने प्रकट हुआ।और मेरी सूरत उस शब्द रूपी मालिक में समा गयी। 


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5-छिनहिं चढै छिन उतरै , सों तो प्रेम न होय ।

अघट प्रेमपिंजर बसै , प्रेम कहावै सोय ।।


अर्थ;

वह प्रेम जो क्षण भर में चढ़ जाता है और दुसरे क्षण उतर जाता है वह कदापि सच्चा प्रेम नहीं हो सकता क्योंकि सच्चे प्रेम का रंग तो इतना पक्का होता है कि एक बार चढ़ गया तो उतरता ही नहीं अर्थात प्रेम वह है जिसमें तन मन रम जाये ।


6-लाली मेरे लाल की, जित देखों तित लाल ।

लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल ॥


अर्थ;-


1-''मुझे हर जगह ईश्वरीय ज्योति दिखती है-अंदर, बाहर, हर जगह।लगातार ऐसी दैवी ज्योति देखते देखते, मैं भी ईश्वरीय हो गई हूँ |प्रभु का रंग कुछ ऐसा था कि चारो ओर ज्ञान स्वरूप लाली छाई हुई थी। मैंने सोचा मैं भी जाकर देखता हूँ और उनके समक्ष जाते ही वही रंग मेरा भी हो गया''। 2-जब तक मैं का भाव है, तभी तक तू भी है। मैं और तू एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।जब तक शिष्य हैं तभी तक गुरु भी हैं।वह प्रकाश तुम्हारा नहीं है; वह प्रकाश परमात्मा का है। जहां मैं नहीं, जहां तू नहीं, वहां जो शेष रह जाता है; उस शून्य का, उस सन्नाटे का-उसी का नाम परमात्मा है।


3-जैसे ही तुम शांत हो गए, इतनी भी अस्मिता न रही इतना भी अहंकार न रहा कि मैं हूं, मैं शिष्य हूं, मैं धार्मिक हूं, कि संन्यासी हूं, कि सत्य का खोजी हूं,अन्वेषी हूं-ऐसा कोई भाव ही न रहा; एक निर्भावदशा हो गई- तब अपूर्व प्रकाश का अनुभव होगा।  


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7-" जल में कुम्‍भ, कुम्‍भ में जल है, बाहर भीतर पानी

फूटा कुम्‍भ जल जलहीं समाना, यह तथ कह्यौ गयानी ।"


अर्थ :-


1-जिस प्रकार सागर में मिट्टी का घड़ा डुबोने पर उसके अन्दर - बाहर पानी ही पानी होता है , मगर फिर भी उस घट ( कुम्भ ) के अन्दर का जल बाहर के जल से अलग ही रहता है , इस पृथकता का कारण उस घट का रूप तथा आकार होते हैं, लेकिन जैसे ही वह घड़ा टूटता है , पानी पानी में मिल जाता है , सभी अंतर लुप्त हो जाते हैं I


2-ठीक उसी प्रकार यह विश्व ( ब्रह्माण्ड ) सागर समान है, चहुँ ओर चेतनता रूपी जल ही जल है, तथा हम जीव भी छोटे - छोटे मिट्टी के घड़ों समान हैं ( कुम्भ हैं ), जो पानी से भरे हैं , चेतना - युक्त हैं तथा हमारे शरीर रूपी कुम्भ को विश्व रूपी सागर से अलग करने वाले कारण हमारे रूप - रंग - आकार - प्रकार ही हैं I इस शरीर रूपी घड़े के फूटते ही अन्दर - बाहर का अंतर मिट जाएगा, पानी पानी में मिल जाएगाI जड़ता के मिटते ही चेतनता चारों ओर निर्बाध व्याप्त हो होगी; सारी विभिन्नताओं को पीछे छोड़ आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाएगी I


3-जब पानी भरने जाएं तो घडा जल में रहता है और भरने पर जल घड़े के अन्दर आ जाता हैI इस तरह देखें तो बाहर और भीतर पानी ही रहता है अथार्त पानी की ही सत्ता हैIजब घडा फूट जाए तो उसका जल जल में ही मिल जाता है ...अलगाव नहीं रहताI आत्मा-परमात्मा दो नहीं एक हैंI आत्मा परमात्मा में और परमात्मा आत्मा में विराजमान हैI अंतत: परमात्मा की ही सत्ता है I जब देह विलीन होती है तो वह परमात्मा का ही अंश हो जाती है ..उसी में समा जाती है ..एकाकार हो जाती हैI 


8-जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं ।

प्रेम गली अति साँकरी, ता मैं दो न समाहिं ॥


अर्थ;-


जब तक मन में अहंकार था तब तक ईश्वर का साक्षात्कार न हुआ, जब अहंकार (अहम) समाप्त हुआ तभी प्रभु मिले | जब ईश्वर का साक्षात्कार हुआ, तब अहंकार स्वत: ही नष्ट हो गया | ईश्वर की सत्ता का बोध तभी हुआ | प्रेम में द्वैत भाव नहीं हो सकता, प्रेम की संकरी (पतली) गली में केवल एक ही समा सकता है - अहम् या परम ! परम की प्राप्ति के लिए अहम् का विसर्जन आवश्यक है |


9-चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।


जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह।।


अर्थ;-


संत रहीम जी कहते है कि जिन्हें कुछ नहीं चाहिए वह राजाओं के राजा हैं। क्योंकि उन्हें न तो किसी चीज की चाह है, न ही चिन्ता और मन तो बिल्कुल बेपरवाह है। सरल शब्दों में समझाना चाहते है,कि ऐसा मनुष्य जिन्हें कुछ नहीं चाहिए वह अपने आप में ही राजा है|

वात-पित्त वाले लोग कौन-सी दाल खाएं

 Foods for Vata Pitta - वात-पित्त वाले लोग कौन-सी दाल खाएं? क्या दाल सच में आपको सूट नहीं करती? या फिर गड़बड़ है आपकी बॉडी टाइप में? क्या आपको दाल खाना अच्छा लगता है, लेकिन हर बार खाने के बाद पेट फूलकर गुब्बारे जैसा हो जाता है? 


या फिर सीने में इतनी तेज़ जलन होती है कि अगली बार दाल देखने का मन ही नहीं करता?

अगर हां, तो ज़रा रुकिए। प्रॉब्लम दाल में नहीं, आपकी प्रकृति (Body Type) में छुपी हो सकती है।


खासतौर पर अगर आपकी प्रकृति वात–पित्त की है - मतलब गैस भी जल्दी बनती है और शरीर में गर्मी भी तुरंत बढ़ जाती है - तो हो सकता है आप रोज़ ऐसी दालें खा रहे हों जो आपके पेट के अंदर “महाभारत” करा रही हों।


हम इस Post में बात करेंगे -

कौन सी दालें आपके लिए अमृत हैं और कौन सी दालें बन जाती हैं धीमा ज़हर।


वात–पित्त प्रकृति आखिर होती क्या है?

आयुर्वेद के अनुसार, वात–पित्त का मतलब है हवा + आग का कॉम्बिनेशन।


वात की वजह से शरीर में सूखापन, गैस, ब्लोटिंग होती है

पित्त की वजह से जलन, एसिडिटी, गर्मी और चिड़चिड़ापन


अब दिक्कत ये है कि ज़्यादातर दालें होती हैं रूक्ष (सूखी)।

सूखी चीज़ें वात को बढ़ाती हैं।

और अगर वही दाल गर्म तासीर की हुई, तो पित्त भी भड़क जाता है।


यानी गलत दाल = गैस + जलन = पेट का सत्यानाश 


दालों का सुपरहीरो: मूंग दाल 

पित्त वाले की लाइफसेवर है — मूंग दाल।

आयुर्वेद इसे यूं ही दालों का राजा नहीं कहता।

क्योंकि:


ये पचने में बहुत हल्की है

इसकी तासीर ठंडी होती है (शीतवीर्य)

ये वात और पित्त — दोनों को शांत रखती है


अगर आपका पेट अक्सर खराब रहता है, गैस बनती है या एसिडिटी रहती है —

तो पीली मूंग दाल आपके लिए किसी मेडिसिन से कम नहीं।


ये दालें बन सकती हैं आपकी मुसीबत

अब बात उन दालों की जो वात–पित्त वालों के लिए भारी पड़ सकती हैं।


1. कुलथी दाल (Horse Gram)

इसे किडनी स्टोन के लिए फायदेमंद माना जाता है, लेकिन

वात–पित्त वालों के लिए ये बहुत ज़्यादा गर्म है।


ये शरीर में इतनी गर्मी बढ़ा सकती है कि:


स्किन पर रैशेज़ आ जाएं

या नाक से खून आने लगे


2. चना और छोले

ये दालें होती हैं हद से ज़्यादा रूखी।


वात वालों के लिए गैस का परमाणु बम 

पचने में इतनी भारी कि आपकी पाचन अग्नि सुस्त पड़ जाए


3. राजमा

राजमा का स्वभाव होता है विदाही —

यानि पचते वक्त ये अंदर जलन पैदा करता है।


वात और पित्त — दोनों के लिए

राजमा से दूरी बनाना ही समझदारी है।


उड़द दाल: दोस्त या दुश्मन?

उड़द दाल को लेकर लोग कंफ्यूज़ रहते हैं।

असल में:


ये चिकनी होती है, इसलिए वात को शांत करती है

लेकिन इसकी तासीर गर्म होती है, जो पित्त को भड़का देती है


इसलिए नियम साफ है -

उड़द दाल सिर्फ सर्दियों में, वो भी लिमिट में।


अरहर (तुअर) दाल का सच

अरहर दाल पित्त के लिए ठीक मानी जाती है,

लेकिन एक प्रॉब्लम है - ये गैस बहुत बनाती है।


तो क्या इसे छोड़ दें?

नहीं।

बस सही तरीके से पकाना सीख लें।


कुकिंग सीक्रेट्स: दाल को बनाएं पेट-फ्रेंडली

अगर दाल सही तरीके से पकाई जाए, तो उसके साइड इफेक्ट काफी हद तक कम हो जाते हैं।


1. भिगोना ज़रूरी है

दाल को कम से कम 30 मिनट से 2 घंटे तक भिगोकर रखें।

इससे गैस बनाने वाले तत्व कम हो जाते हैं।


2. घी डालना मत भूलिए

वात–पित्त वालों के लिए घी किसी अमृत से कम नहीं।


पित्त की गर्मी को शांत करता है

वात के रूखेपन को खत्म करता है


3. सही मसालों का तड़का

तड़के में इस्तेमाल करें:


सौंफ — पेट की गर्मी शांत करती है

धनिया — पित्त को कंट्रोल करता है

जीरा — पाचन सुधारता है


फाइनल टेकअवे 

मूंग दाल और लाल मसूर को अपना बेस्ट फ्रेंड बनाइए

चना, छोले और राजमा से दूरी रखिए

दाल में घी और सौंफ का तड़का ज़रूर लगाइए


अगर आपको ये जानकारी काम की लगी हो, 

तो post को लाइक करें 

कमेंट में बताएं आपकी पसंदीदा दाल कौन सी है

और इसे उन दोस्तों के साथ ज़रूर शेयर करें

जो हर समय एसिडिटी की शिकायत करते रहते हैं 



श्वास रोग

 Ayurveda for Lungs - श्वास रोग में “एक दवा सब पर भारी” क्यों? इस Post में हम एक ऐसी आयुर्वेदिक औषधि की बात कर रहे हैं, जिसके बारे में आचार्य वाग्भट ने बहुत स्ट्रॉन्ग स्टेटमेंट दिया है। 


"श्वास और कास यानी पूरी रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट की बीमारियों में बाकी सारी दवाइयाँ एक तरफ, और ये एक औषधि एक तरफ।"


अगर आपको सांस फूलने की समस्या है, सूखी या बलगम वाली खांसी रहती है, गले में खराश, बार-बार कफ जमा होना, ब्रोंकाइटिस, पुराना टीबी, निमोनिया के बाद कमजोर फेफड़े, या स्मोकिंग की वजह से सांस की दिक्कत—तो ये Post आपके लिए बहुत ज़रूरी है।


इस post का मकसद सिर्फ नुस्खा बताना नहीं है, बल्कि यह समझाना है कि यह औषधि क्यों और कैसे काम करती है, ताकि आयुर्वेद का लॉजिक आपको क्लियर हो सके।


शास्त्रीय संदर्भ: वाग्भट ऋषि क्या कहते हैं?

आचार्य वाग्भट ने अष्टांग हृदय, चिकित्सा स्थान, अध्याय 3 के श्लोक 172 में कहा है—


“सर्वेषु श्वासकासेषु केवलं विभीतकी”


अर्थात श्वास और कास की सभी बीमारियों में केवल विभीतकी (बहेड़ा) ही पर्याप्त है।

इतना बड़ा क्लेम आयुर्वेद में बहुत कम दवाओं के लिए मिलता है।


यह औषधि कौन-सी है?

जिस औषधि की बात हो रही है, वह है विभीतकी, जिसे आम भाषा में बहेड़ा कहते हैं।

यह त्रिफला का एक महत्वपूर्ण घटक है, लेकिन श्वास-कास रोगों में इसका रोल अलग और बहुत पावरफुल माना गया है।


किन समस्याओं में बहेड़ा उपयोगी है?

अगर आपको इनमें से कोई भी समस्या है, तो विभीतकी उपयोगी मानी जाती है:


सांस फूलना

सूखी खांसी या कफ वाली खांसी

गले में बार-बार खराश या भारीपन

ब्रोंकाइटिस

स्मोकिंग के बाद सांस की दिक्कत

पुराने टीबी या निमोनिया के बाद कमजोर लंग्स

रात में कफ जम जाना, सुबह गला पूरी तरह भरा हुआ लगना

नाक से ज्यादा पानी गिरना, साइनस की समस्या


बहेड़ा कैसे लें? (प्रयोग विधि)

1. गुड़ के साथ गोली बनाकर

बहेड़ा पाउडर एक चुटकी

पुराना देसी गुड़ थोड़ा सा

दोनों मिलाकर चना दाने जितनी छोटी गोली बना लें

दिन में 4–5 बार, खाने के बाद चूसने की तरह लें


इसे एक बार में निगलना नहीं है, धीरे-धीरे मुंह में घुलने देना है।

क्योंकि श्वास रोग में आयुर्वेद बार-बार अल्प मात्रा में औषधि लेने को कहता है।


2. पाउडर + गर्म पानी

आधा चम्मच बहेड़ा पाउडर

हल्के गुनगुने पानी के साथ

खासकर रात में सोने से पहले


यह तरीका उन लोगों के लिए खास है जिनका गला रात में बंद हो जाता है और सुबह भारी कफ निकलता है।


अब आयुर्वेदिक लॉजिक समझिए 

श्वास रोग की जड़ कहाँ है?

आयुर्वेद के अनुसार श्वास रोग सीधे फेफड़ों से शुरू नहीं होता।

सबसे पहले गड़बड़ी होती है:


आमाशय (पेट) में

अग्नि (डाइजेस्टिव फायर) कमजोर होती है

रस धातु ठीक से नहीं बनती

रस धातु का मल = कफ, जो ज़्यादा बनने लगता है

यही कफ ऊपर जाकर छाती और लंग्स में जमा हो जाता है

यानी अगर पेट ठीक नहीं, तो सांस भी ठीक नहीं।


बहेड़ा किन गुणों की वजह से काम करता है?

आयुर्वेदिक गुण (Guna)

लघु – हल्का, कफ को तोड़ने वाला

रूक्ष – अतिरिक्त चिकनाई हटाता है

उष्ण – गर्म प्रकृति, वात-कफ शमन


विपाक

मधुर विपाक – यानी पाचन के बाद शरीर को संतुलन देता है


दोषों पर प्रभाव

वात को अनुलोमन करता है

कफ को विशेष रूप से कम करता है

पित्त को संतुलित रखता है


धातुओं पर प्रभाव: क्यों फेफड़ों के लिए खास है?

विभीतकी का प्रभाव इन धातुओं पर बताया गया है:


रस धातु

रक्त धातु

मांस धातु

मेद धातु


आयुर्वेद कहता है कि फेफड़ों (फुफ्फुस) की उत्पत्ति रक्त धातु से होती है।

जब रक्त धातु शुद्ध और मजबूत होती है, तो लंग्स भी मजबूत होते हैं।


बहेड़ा:


पाचन सुधारता है

रस और रक्त धातु को शुद्ध करता है

कफ का एक्सेस प्रोडक्शन रोकता है

सीधे नाक से लेकर लंग्स तक काम करता है


किन मरीजों में असर सबसे ज्यादा दिखता है?

जिनके सीने में भारी कफ भरा रहता है


जिनको पीला या सफेद गाढ़ा बलगम निकलता है

जिनकी खांसी लंबे समय से ठीक नहीं हो रही

जिनको रात में सांस लेने में ज्यादा दिक्कत होती है

ऐसे मामलों में बहेड़ा को आयुर्वेद “मोर देन हाफ ट्रीटमेंट” मानता है।


Conclusion: क्यों इसे श्वास रोग की स्पेशल दवा कहा गया?

यह पाचन की जड़ से इलाज करती है


कफ को सिर्फ दबाती नहीं, बनने से रोकती है

लंग्स, गला, नाक—पूरी रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट पर काम करती है

शास्त्रों में इसका स्पष्ट और स्ट्रॉन्ग उल्लेख है


इसीलिए आचार्य वाग्भट ने कहा—

श्वास रोग में अगर एक औषधि चुननी हो, तो विभीतकी पर्याप्त है।


अगर यह जानकारी आपको उपयोगी लगी, तो कमेंट में ज़रूर बताइए।


सिर्फ डायबिटीज़ वालों के लिए

 Ayurvedic Diet for Diabetes - डायबिटीज़ में सही खान-पान क्यों सबसे ज़रूरी है? इस पोस्ट में हम बात करेंगे कि डायबिटीज़ के मरीज़ों को अपना खान-पान कैसा रखना चाहिए और उनके लिए सबसे बेहतर डाइट प्लान क्या हो सकता है।


 लेकिन यह बात यहीं तक सीमित नहीं है। सच यह है कि जो डाइट प्लान हम जानेगें, वह सिर्फ डायबिटीज़ वालों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए फायदेमंद है जो भविष्य में कभी भी डायबिटीज़ नहीं चाहता।


यह डाइट उन लोगों के लिए भी उतनी ही ज़रूरी है जिनकी शुगर बॉर्डरलाइन रहती है, जिन्हें एसिडिटी की दवाइयाँ चल रही हैं या जिनमें डायबिटीज़ से जुड़ी जटिलताएँ जैसे डायबिटिक न्यूरोपैथी या रेटिनोपैथी शुरू हो चुकी हैं। कुल मिलाकर, अगर शरीर में किसी भी तरह की मेटाबॉलिक गड़बड़ी है, तो यह डाइट प्लान सबसे सुरक्षित और संतुलित विकल्प है।


इस पोस्ट में हम आसान टिप्स जानेगें। ये कोई सख्त नियम नहीं हैं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आसानी से अपनाई जा सकने वाली बातें हैं। 


1.आयुर्वेद की भोजन विधि: सिर्फ क्या नहीं, कैसे भी ज़रूरी है

आयुर्वेद में केवल यह नहीं बताया गया कि क्या खाना चाहिए, बल्कि यह भी बताया गया है कि खाना कैसे बनाना है और कैसे खाना है। भोजन बनाते समय मन शांत और प्रसन्न होना चाहिए। खाना घर का बना, सात्विक, ताज़ा और पचने में हल्का होना चाहिए।


खाना तभी खाना चाहिए जब सही मायने में भूख लगी हो। खाते समय टीवी, मोबाइल या बातचीत से दूरी बनाकर, शांत मन से, हर निवाले को अच्छे से चबाकर खाना चाहिए। यह पूरी प्रक्रिया शरीर और मन दोनों पर गहरा असर डालती है।


2. निदान परिवर्जन: बीमारी की जड़ पर काम करना

डायबिटीज़ के इलाज में आयुर्वेद का दूसरा बड़ा सिद्धांत है निदान परिवर्जन, यानी जिन कारणों से बीमारी हुई है, उन्हें हटाना। आचार्य चरक ने प्रमेह के कई कारण बताए हैं, जिनमें मधुमेह भी शामिल है।


अगर खान-पान की बात करें, तो बार-बार दही खाना, खासकर रात में दही लेना, बहुत ज़्यादा तरल आहार लेना, बार-बार पानी पीते रहना, अत्यधिक नॉनवेज खाना, नया चावल या नया अनाज ज़्यादा खाना, रोज़ाना मीठा या गुड़ से बने पदार्थों का अधिक सेवन करना – ये सभी कफ और मेद को बढ़ाने वाले कारण हैं, जो डायबिटीज़ को जन्म देते हैं।


आचार्य सुश्रुत ने भी ठंडी चीज़ों का अत्यधिक सेवन, बार-बार बासी भोजन, बहुत तला-भुना और ज़्यादा चिकनाई वाला खाना डायबिटीज़ को बढ़ाने वाला बताया है। इसलिए इन आदतों से दूरी बनाना बेहद ज़रूरी है।


3. सिर्फ कड़वा खाना सही नहीं: रसों का संतुलन समझिए

अक्सर जैसे ही किसी का शुगर लेवल बढ़ता है, उसे हर कोई सलाह देने लगता है कि अब कड़वा ज़्यादा खाओ, मीठा पूरी तरह बंद कर दो। लेकिन आयुर्वेद इस सोच से थोड़ा अलग है।


आयुर्वेद के अनुसार हमारा आहार षड्-रसात्मक होना चाहिए, यानी उसमें छह स्वाद होने चाहिए –

मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा) और कषाय (कसैला)।


मतलब यह नहीं कि मीठा पूरी तरह बंद कर दिया जाए, बल्कि यह ज़रूरी है कि किसी भी एक रस का अत्यधिक सेवन न हो।


a. मधुर रस: सही मात्रा में ज़रूरी क्यों है?

मधुर रस यानी मीठा स्वाद आयुर्वेद के अनुसार जन्म से ही शरीर के अनुकूल होता है। माँ का दूध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह सप्त धातुओं – रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र – को पोषण देता है।


मीठा रस त्वचा, बालों, इंद्रियों और ओज को बढ़ाता है और दीर्घायु में सहायक होता है। लेकिन जब यही मधुर रस ज़रूरत से ज़्यादा लिया जाए, तो कफ और चर्बी बढ़ाकर डायबिटीज़ की समस्या पैदा करता है।


b. डायबिटीज़ में सुरक्षित मधुर विकल्प क्या हैं?

आयुर्वेद ने ऐसे कई मधुर विकल्प बताए हैं जो संतुलन बनाए रखते हैं। जैसे देसी गाय का घी, जिसे दिन में 2 से 3 छोटे चम्मच तक लिया जा सकता है। यह मीठे स्वाद का होता है और शरीर के लिए पोषक है।


स्वर्णसिद्ध जल यानी सोने के टुकड़े के साथ उबला पानी भी बताया गया है। इसके अलावा शुद्ध शहद, जो कफ को कम करता है, सीमित मात्रा में लिया जा सकता है।


मौसमी फल, शतावरी, बला, अतिबला, विदारीकंद जैसी औषधियाँ भी मधुर रस में आती हैं और सही मात्रा में फायदेमंद हैं। वहीं आर्टिफिशियल स्वीटनर और शुगर-फ्री टैबलेट से बचना बेहतर है।


c. तिक्त रस: कड़वे स्वाद का सही इस्तेमाल

तिक्त रस यानी कड़वा स्वाद शरीर की सफाई में मदद करता है। यह बुखार, जलन, कीड़े, कफ और अतिरिक्त चर्बी को कम करता है, इसलिए डायबिटीज़ में उपयोगी माना जाता है।


करेले की सब्ज़ी, आम के पत्ते, मेथी-सौंफ की सब्ज़ी, मूंग दाल के साथ बनी हल्की सब्ज़ियाँ, धनिया-जीरा जैसे मसाले इस श्रेणी में आते हैं। ध्यान बस इतना रखना है कि जिन लोगों को एसिडिटी या सीने में जलन रहती है, वे मेथी का सेवन सीमित रखें।


d. कड़वे रस की सही मात्रा क्यों ज़रूरी है?

इसके साथ ही आप गिलोय की बेल के पत्तों का काढ़ा बना सकते हैं. लेकिन यहाँ मात्रा का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है। इन काढ़ों की सही मात्रा लगभग 20 से 30 मिली ही होती है।


आजकल बहुत से लोग सुबह-सुबह एक पूरा गिलास करेले का जूस पी लेते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह तरीका सही नहीं है। इतनी ज़्यादा मात्रा में लिया गया कड़वा रस न केवल पचने में भारी होता है, बल्कि शरीर को इसकी ज़रूरत भी नहीं होती। ऊपर से, डायबिटीज़ के कारणों में आयुर्वेद ने द्रव आहार यानी ज़्यादा लिक्विड डाइट को भी जिम्मेदार माना है।


इस तरह अगर बहुत ज़्यादा मात्रा में कड़वे जूस लिए जाएँ, तो फायदा सीमित होता है और नुकसान की संभावना बढ़ जाती है।


e. ज्यादा कड़वा लेने से नुकसान भी हो सकता है

एक और अहम बात यह है कि अगर लंबे समय तक बहुत ज़्यादा कड़वा या कसैला रस लिया जाए, तो इससे वात दोष बढ़ सकता है और धातु क्षय भी हो सकता है। आचार्य वाग्भट्ट ने इस बारे में साफ चेतावनी दी है।


आयुर्वेद में शरीर की बनावट के आधार पर लोगों को मोटे तौर पर दो समूहों में बाँटा गया है।

पहला समूह वे लोग जिनका वजन ज़्यादा है, शरीर में चर्बी अधिक है या जिनमें कफ दोष की प्रधानता के कारण डायबिटीज़ हुई है। ऐसे लोगों को कड़वा रस लेने से आमतौर पर फायदा होता है।


लेकिन दूसरा समूह वे लोग हैं जिनका शरीर पहले से ही दुबला है, जिनमें वात दोष अधिक है। अगर ऐसे लोग बहुत ज़्यादा कड़वा या कसैला रस लेने लगते हैं, तो उनमें भूख न लगना, जोड़ों में दर्द, अत्यधिक थकान और कमजोरी जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। इसलिए हर रस का सेवन शरीर की प्रकृति देखकर करना चाहिए।


4. डायबिटीज़ की सरल लेकिन असरदार आयुर्वेदिक औषधि

आयुर्वेद में डायबिटीज़ के लिए एक बेहद आसान और असरदार योग बताया गया है, जिसे निशा आमलक योग या हरिद्रा आमलक योग कहा जाता है। यहाँ निशा या हरिद्रा का मतलब है हल्दी और आमलक का मतलब है आंवला।


अगर आपको ताज़ा आंवला मिल जाता है, तो एक आंवला कद्दूकस करके उसमें दो से तीन चुटकी हल्दी मिलाएँ और इसे सुबह खाली पेट लें।

अगर आंवले का रस निकालना चाहें, तो 15 से 20 मिली आंवले के रस में थोड़ी सी हल्दी मिलाकर सुबह सेवन किया जा सकता है।


अगर कच्ची हल्दी उपलब्ध हो, तो उसे भी हल्का सा कद्दूकस करके आंवले के साथ लिया जा सकता है।

और अगर आंवला या ताज़ी हल्दी न मिले, तो आंवला चूर्ण के साथ थोड़ी सी हल्दी मिलाकर सेवन किया जा सकता है।


यह योग इसलिए खास है क्योंकि आंवला एक श्रेष्ठ रसायन है और हल्दी हमारे रोज़ के भोजन में भी रहती है। जब ये दोनों साथ आते हैं, तो डायबिटीज़ में बहुत अच्छा असर दिखाते हैं।


5. क्या रसोई के मसाले भी दवा बन सकते हैं?

अब सवाल आता है कि क्या हमारे किचन में मौजूद मसाले और अचार डायबिटीज़ में मदद कर सकते हैं? जवाब है – हाँ, अगर सही तरीके से इस्तेमाल किए जाएँ।


आजकल जो रेडीमेड अचार बाज़ार से आते हैं, उनमें प्रिज़र्वेटिव, फूड कलर और घटिया तेल मिला होता है। यही वजह है कि बहुत से लोगों को अचार खाने से एसिडिटी, सिरदर्द या जलन होने लगती है।


लेकिन घर का बना अचार, जैसे आंवले का अचार, हल्दी का अचार या करेले का अचार, डायबिटीज़ में औषधि की तरह काम करता है। इनमें इस्तेमाल होने वाले मसाले जैसे हल्दी, जीरा, सरसों और थोड़ा सा तेल खुद औषधीय गुण रखते हैं।


बस ध्यान इतना रखना है कि अचार को सब्ज़ी की तरह नहीं खाना है। इसकी मात्रा हमेशा सीमित रखें।


6. विरुद्ध आहार: गलत फूड कॉम्बिनेशन से बचें

आयुर्वेद में कुछ ऐसे फूड कॉम्बिनेशन बताए गए हैं जो साथ में लेने पर शरीर को नुकसान पहुँचाते हैं। इन्हें विरुद्ध आहार कहा जाता है।


जैसे रात में दही खाना, दही को गर्म करना, या बहुत ज़्यादा मात्रा में अकेले दही खाना शरीर के लिए ठीक नहीं है।

इसी तरह शहद और गर्म पानी का कॉम्बिनेशन भी आयुर्वेद के अनुसार विरुद्ध आहार माना गया है। भले ही शहद और गर्म पानी अलग-अलग अच्छे हों, लेकिन साथ में लेने पर यह शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है।


खट्टे फलों को दूध के साथ लेना, जैसे मिल्कशेक बनाकर पीना, अलग-अलग फलों को एक साथ मिलाकर खाना या उन पर कस्टर्ड डालकर खाना भी सही नहीं है।


7. ज़्यादा पानी और लिक्विड डाइट भी नुकसानदेह

आजकल “स्टे हाइड्रेटेड” के नाम पर लोग ज़रूरत से ज़्यादा पानी और जूस पीने लगे हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह भी डायबिटीज़ का एक बड़ा कारण है।


जब बिना प्यास के बार-बार पानी पिया जाता है, तो यह कफ दोष को बढ़ाता है और आम (अपचित पदार्थ) उत्पन्न करता है। इससे शरीर में चिपचिपापन और गीलापन बढ़ता है, जो आगे चलकर डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी और यूरिन से जुड़ी समस्याओं को जन्म देता है।


इसलिए पानी हमेशा प्यास के अनुसार और मौसम व शरीर की प्रकृति को ध्यान में रखकर ही पीना चाहिए।


8. बार-बार खाना सही है या गलत?

डायबिटीज़ में अक्सर सलाह दी जाती है कि थोड़ा-थोड़ा और बार-बार खाना चाहिए। लेकिन आयुर्वेद इसे “अध्यशन” कहता है।


अगर पिछला भोजन पूरी तरह पचा नहीं है और फिर भी आप दोबारा खाना खा लेते हैं, तो यह आम को बढ़ाता है और कफ दोष को बढ़ाता है। इससे शरीर में चिपचिपापन बढ़ता है और बीमारी गहराती है।


हर व्यक्ति की अग्नि अलग होती है। पित्त प्रकृति वालों की अग्नि तेज़ होती है, उन्हें जल्दी भूख लगती है। कफ प्रकृति वालों की अग्नि मंद होती है, उन्हें देर से भूख लगती है। वात प्रकृति वालों की भूख अनियमित होती है।


इसलिए खाना हमेशा अपनी पाचन शक्ति और भूख के अनुसार ही खाना चाहिए। एक ही नियम सभी पर लागू नहीं होता।


Conclusion: संतुलन ही सबसे बड़ा इलाज है

इस post में हमने डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए बेस्ट आयुर्वेदिक डाइट प्लान को आसान लेकिन प्रभावी टिप्स के रूप में समझा। यह डाइट प्लान कोई ज़बरदस्ती नहीं करता, बल्कि शरीर को संतुलन की ओर लौटने का मौका देता है। अगर आप इसे समझदारी से अपनाते हैं, तो न सिर्फ शुगर कंट्रोल में रहती है, बल्कि भविष्य की कई बीमारियों से भी बचाव होता है।


दर्द और थकान होती है

 Muscular Fatigue - क्या आपको भी बिना वजह ऐसा दर्द और थकान होती है? क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि अचानक शरीर में इतना ज़्यादा दर्द होने लगे कि आप किसी से कह बैठें—


“यार, आज तो शरीर टूट गया है… ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने डंडे से मारा हो या ज़ोर-ज़ोर से मुक्के मारे हों।”


कभी ऐसा भी हुआ कि दर्द के साथ इतनी ज़्यादा थकान हो जाए कि कुछ करने का मन ही न करे?

और सबसे अजीब बात ये कि ना कोई चोट लगी, ना गिरना हुआ, ना एक्सीडेंट-फिर भी दर्द ऐसा कि मानो किसी ने आकर पीट दिया हो।


ऐसे में मन में सबसे पहला सवाल यही आता है-

“आख़िर ये दर्द आया कहां से?”


इस Post में हम इसी सवाल का जवाब आयुर्वेद के नज़रिए से समझने वाले हैं।

साथ ही ये भी जानेंगे कि


ये दर्द क्यों होता है

शरीर के अंदर क्या गड़बड़ चल रही होती है

और आयुर्वेद में इसका इलाज क्या बताया गया है

साथ ही घर पर आप क्या-क्या कर सकते हैं


आयुर्वेद में दर्द को कैसे देखा जाता है?

आयुर्वेद में किसी भी बीमारी या दर्द को समझने का बेस बहुत साफ़ है-

वात, पित्त और कफ।


दुनिया की कोई भी बीमारी हो, किसी भी तरह का दर्द हो-

आयुर्वेद उसे इन्हीं तीन दोषों के आधार पर समझता और ट्रीट करता है।


अब हर तरह का दर्द, चाहे वो सिर का हो, दांत का हो, कमर का हो, घुटनों का हो, मसल्स का हो, जॉइंट्स का हो या फिर नर्व्स से जुड़ा दर्द-

आयुर्वेद के अनुसार उसका मूल कारण हमेशा वात होता है।


यह बात बिल्कुल क्लियर है।


जब दर्द ऐसा लगे जैसे डंडे या मुक्कों से मारा गया हो

वात अलग-अलग तरह से शरीर में दर्द पैदा करता है।

लेकिन एक खास तरह का दर्द ऐसा होता है जिसमें-


पूरे शरीर में टूटन महसूस होती है

मांसपेशियों में बहुत ज़्यादा दर्द होता है

ऐसा लगता है जैसे किसी ने ज़ोर-ज़ोर से मारा हो

और साथ में असहनीय थकान रहती है

मानो शरीर में जान ही नहीं बची हो।


आयुर्वेद कहता है, ऐसा दर्द तब होता है जब

वात बढ़कर शरीर की दो खास धातुओं में जाकर बैठ जाता है।


कौन-सी दो धातुएं ज़िम्मेदार हैं?

इन दो धातुओं के नाम हैं-


मांस धातु

मेद धातु


आयुर्वेद में कुल 7 धातुएं बताई गई हैं-

रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र।


सरल भाषा में समझें तो-


मांस धातु को हम मसल्स से जोड़ सकते हैं

मेद धातु को फैट टिश्यू से


जब बढ़ा हुआ वात इन दोनों धातुओं में प्रवेश करता है,

तब दर्द ऐसा लगता है जैसे डंडे या मुक्कों से मारा गया हो,

और शरीर में ज़बरदस्त थकान छा जाती है।


आयुर्वेद का श्लोक क्या कहता है?

आचार्य चरक ने इसे बहुत ही साफ़ शब्दों में बताया है।


चरक संहिता, चिकित्सा स्थान, अध्याय 28 में कहा गया है-


“दण्ड-मुष्टि हतं तथा सरुक् श्रम अत्यर्थम्

मांस-मेदो गते अनिले”


अर्थात-

जब वात मांस और मेद धातु में चला जाता है,

तो व्यक्ति को ऐसा दर्द और थकान होती है

जैसे उसे डंडे या मुक्कों से मारा गया हो।


आखिर वात बढ़ता क्यों है?

अब सवाल उठता है-

इतना वात बढ़ा कैसे?


इसके पीछे कई लाइफस्टाइल कारण होते हैं, जैसे-


ज़रूरत से ज़्यादा शारीरिक मेहनत

बहुत भारी वजन उठाना

ओवर-एक्सरसाइज़ या वेट ट्रेनिंग

लगातार ट्रैवल करना

रात में देर तक जागना

नींद पूरी न होना

लगातार मानसिक तनाव

ठंडी हवा, AC या पंखे में ज़्यादा देर बैठना

रूखा-सूखा खाना

लंबे उपवास

भूख लगने पर खाना टालना

पेशाब या मोशन को रोककर रखना

ये सभी आदतें शरीर में वात को तेज़ी से बढ़ाती हैं।


आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट क्या है?

आचार्य चरक ने सिर्फ कारण ही नहीं, इलाज भी बताया है।


1. विरेचन (Panchkarma)

सबसे पहले बताया गया है-

विरेचन।


विरेचन का मतलब है शरीर की गहरी सफाई।


इसमें-


कुछ दिनों तक घी का सेवन कराया जाता है

फिर पूरे शरीर की मालिश

और उसके बाद विशेष तरीके से लूज़ मोशन्स के ज़रिए शुद्धि


ये प्रक्रिया हमेशा अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर की देखरेख में ही होनी चाहिए।


2. बस्ति चिकित्सा

विरेचन के बाद

बस्ति यानी मेडिकेटेड एनीमा।


यह वात को कंट्रोल करने की सबसे प्रभावी थैरेपी मानी जाती है,

खासकर जब वात मांस और मेद धातु में बैठ गया हो।


घर पर क्या कर सकते हैं?

अब सबसे ज़रूरी सवाल-

घर पर हम क्या करें?


1. रोज़ाना अभ्यंग (तेल मालिश)

अभ्यंग यानी तेल से मालिश।

यह वात को शांत करने का सबसे आसान और असरदार तरीका है।


आयुर्वेद कहता है-

जो व्यक्ति रोज़ अभ्यंग करता है—


उसे जल्दी बुढ़ापा नहीं आता

थकान कम होती है


और वात के रोग नहीं होते


2. कौन-सा तेल?

सबसे बेस्ट-

तिल का तेल, खासकर ठंड के मौसम में।

अगर काले तिल का तेल मिल जाए तो और भी अच्छा।


नहाने से पहले पूरे शरीर की मालिश करें।


खाने में क्या शामिल करें?

लहसुन

लहसुन वात को कम करता है और मांस-मेद धातु पर काम करता है।


3–5 लहसुन की कलियां

तिल के तेल में हल्का सेंककर

खाने के साथ लें


दही

अच्छी तरह जमा हुआ दही—


उष्ण

स्निग्ध

वातशामक


हफ्ते में 2–3 बार ज़रूर लें, पर दिन में रात में नहीं।


उड़द का वड़ा

उड़द वात पर बेहतरीन काम करता है।

घर पर बना मेंदू वड़ा इस दर्द में मददगार हो सकता है।


लाइफस्टाइल में ज़रूरी बदलाव


पूरी नींद लें

ओवर-एक्सरसाइज़ से बचें

थकान होने पर रुकें

बेवजह खुद को ज़्यादा न झोंकें

ठंड और ड्राफ्ट से बचाव करें


दूध वाला उपाय

अगर दूध सूट करता है, तो-


1 ग्राम पिप्पली पाउडर

दूध + पानी में उबालकर

पी सकते हैं


यह वात और दर्द दोनों में मदद करता है।


अंत में

अगर दर्द ऐसा है जैसे किसी ने डंडे या मुक्कों से मारा हो

और साथ में गहरी थकान भी है-

तो इसे हल्के में न लें।

यह मांस और मेद धातु में बढ़े वात का संकेत हो सकता है।


डायबिटीज़ को कंट्रोल में

 Reverse Diabetes - डायबिटीज़ को कंट्रोल में रखने के लिए हमें क्या खाना चाहिए? डायबिटीज़ को नियंत्रण में रखने के लिए हमें यह समझना बहुत ज़रूरी है कि हमें किस तरह का खाना खाना चाहिए, ताकि वजन कंट्रोल में रहे, इंसुलिन की ज़रूरत न पड़े और डायबिटीज़ की जटिलताओं से बचा जा सके।


इसके लिए सबसे पहले आपको यह जान लेना चाहिए कि आपका खाना अनप्रोसेस्ड और घर का बना हुआ होना चाहिए।


किसी की बात मत सुनिए, किसी के कहने में मत आइए। बस एक नियम अपनाइए — घर का बना खाना खाइए।


सबसे पहले: प्रोसेस्ड फूड पूरी तरह छोड़िए

सबसे पहला और सबसे ज़रूरी नियम है कि आपको प्रोसेस्ड फूड पूरी तरह से बंद करना होगा।

जैसे:


Bread

बिस्कुट

नमकीन

पैकेट वाले जूस

कॉर्नफ्लेक्स

आइसक्रीम

कोल्ड ड्रिंक्स

चॉकलेट

सेवई

मैगी

पास्ता


हम सबको सुबह Bread खाने और चाय के साथ बिस्कुट खाने की आदत पड़ गई है। लेकिन ये सारे प्रोसेस्ड फूड लिवर को फैटी बना देते हैं।


जब लिवर फैटी हो जाता है, तो वहां इंसुलिन काम नहीं करता। नतीजा यह होता है कि ब्लड शुगर बढ़ने लगती है।


प्रोसेस्ड फूड के नुकसान

ये प्रोसेस्ड फूड:


फैटी लिवर बनाते हैं

इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाते हैं

LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं

हार्ट डिज़ीज़ का खतरा बढ़ाते हैं

भविष्य में कैंसर का risk बढ़ाते हैं

याददाश्त कम करते हैं

अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों का कारण बनते हैं

हमारे पूर्वज ऐसे खाने नहीं खाते थे। इसलिए उन्हें फैटी लिवर नहीं होता था।


चीनी: नुकसानदायक है

चीनी मत खाइए।

चीनी नुकसानदायक है।


हमें याद है कि जब हम छोटे थे, तो पूरे परिवार के लिए चीनी का कोटा होता था। पूरे परिवार को महीने में सिर्फ 2 किलो चीनी मिलती थी।

पांच लोग, और सिर्फ 2 किलो चीनी।


पेप्सी भी दो महीने में एक बार मिलती थी। 3 भाई बहन मिलकर एक ही बोतल बांट लेते थे।

पार्टी में भी बस बिस्कुट, रोटी और कभी-कभी नाश्ता होता था।


आज हालात उल्टे हैं। आज लगभग हर किसी को फैटी लिवर है।

आपका पेट जितना बड़ा होगा, आपका लिवर उतना ही मोटा होगा।


दूसरा नियम: अनाज कम करें

अगर आप ज़्यादा शारीरिक मेहनत नहीं करते, तो आपको ज़्यादा अनाज खाने की ज़रूरत नहीं है।

मजदूर और किसान इसलिए रोटी-चावल खा पाते हैं क्योंकि वे दिन भर मेहनत करते हैं।


हम लोग कुर्सी पर बैठने वाले लोग हैं। हम दिन में कितना व्यायाम करते हैं?

ज़्यादा से ज़्यादा एक घंटा।


अनाज क्या होते हैं?


रोटी

चावल

मक्का

ओट्स

बाजरा

ज्वार

रागी

जौ


इन सबमें कार्बोहाइड्रेट और ग्लूकोज़ होता है।

खाने के बाद अगर आप बैठे रहते हैं, तो शुगर बढ़ेगी ही।


पेट भरने का सही तरीका (बिना ज्यादा अनाज)

सिर्फ रोटी और चावल से पेट भरना ज़रूरी नहीं है।

ऐसे खाने को शामिल करें जिनमें अनाज न हो।


सभी लोगों के लिए एक आसान फार्मूला:


आधा किलो गेहूं का आटा

आधा किलो चने का आटा

आधा किलो सोयाबीन का आटा


इन्हें मिलाकर इस्तेमाल करें।


घी और मक्खन से मत डरिए

हर डायबिटीज़ के मरीज़ को रोज़ कम से कम 4 चम्मच घी या मक्खन खाना चाहिए।


इसके फायदे:


अच्छा कोलेस्ट्रॉल (HDL) 30% बढ़ता है

हार्ट के लिए बहुत अच्छा है

हार्ट अटैक का खतरा कम करता है


नट्स और प्रोटीन भरपूर खाइए

आप खुलकर खा सकते हैं:


बादाम

अखरोट

पिस्ता

काजू

मूंगफली


जब भी भूख लगे, एक मुट्ठी नट्स खा लीजिए। इससे शुगर नहीं बढ़ती।


इसके अलावा:


पनीर

सोयाबीन

सोयाबीन की दाल


जितना चाहें उतना खा सकते हैं।


एक संतुलित थाली कैसी हो?

1 रोटी (घी लगी हुई)

50 ग्राम पनीर

1 कटोरी दही

भरपूर सब्ज़ी

सलाद

हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ


इससे पेट अच्छी तरह भरता है।


खाने की फ्रीक्वेंसी और चाय-कॉफी

दिन में 2 बार खाने की कोशिश करें।

चाय 3 कप तक या कॉफी 2 कप तक पी सकते हैं।


चाय और कॉफी में मौजूद कैटेचिन:


एंटीऑक्सिडेंट है

हार्ट अटैक का रिस्क 11% तक कम करता है


दिन भर में आधा किलो फुल क्रीम दूध ले सकते हैं।

बस उसमें चीनी न डालें।


फल, बीज और मिठाई

रोज़ 1 फल खाएं (150–200 ग्राम से ज्यादा नहीं)


बहुत मीठे फल कम मात्रा में लें

आम के मौसम में आधा आम रोज़ खा सकते हैं


अच्छे बीज:


अलसी

चिया

कद्दू के बीज


आइसक्रीम, चॉकलेट कभी-कभी पार्टी में खा सकते हैं।

एक स्कूप लें, बांटकर खाएं।


वजन घटाइए, डायबिटीज़ उलट जाएगी

अगर आपका वजन 85 किलो है और आप वजन घटा लेते हैं, तो डायबिटीज़ रिवर्स हो सकती है।


कम कार्बोहाइड्रेट

ज़्यादा सलाद

नियमित व्यायाम


टीवी देखते समय भी डंबल उठाइए।

कार में बैठे हों तो बीच-बीच में चलिए।


फैटी लिवर का सच

फैटी लिवर घी, मक्खन या तेल से नहीं, बल्कि कार्बोहाइड्रेट से बनता है।


कार्बोहाइड्रेट के स्रोत:


रोटी

चावल

चीनी

गुड़

दूध

दही

फल


घी, मक्खन, सरसों का तेल, नारियल तेल, तिल का तेल — ये लिवर को नुकसान नहीं पहुंचाते।


आख़िरी बात

अगर आप वजन नहीं बढ़ाते, अनाज कम खाते हैं और एक्टिव रहते हैं, तो:


शुगर कंट्रोल में रहेगी

दवाइयों की ज़रूरत कम होगी

सेहत बेहतर रहेगी


समझदारी से खाइए, संतुलन बनाइए और एक्टिव रहिए।

 

HbA1c सात से नीचे क्यों नहीं आ रहा?

 HbA1c - HbA1c सात से नीचे क्यों नहीं आ रहा? डायबिटीज़ कंट्रोल को सही तरह समझना ज़रूरी है - डायबिटीज़ से जूझ रहे ज़्यादातर लोग एक ही सवाल बार-बार पूछते हैं- “हमारी शुगर तो कभी-कभी ठीक रहती है, फिर HbA1c सात से नीचे क्यों नहीं आ रहा?”


WHO की गाइडलाइन्स के मुताबिक अगर HbA1c 7 से कम है, तो उसे अच्छा कंट्रोल माना जाता है।

अगर 6 से नीचे आ जाए, तो उसे और बेहतर कंट्रोल कहा जाता है।

यानी हर डायबिटीज़ वाले व्यक्ति का टारगेट यही होना चाहिए कि HbA1c सात से नीचे आए।


लेकिन इसके लिए सिर्फ़ दवा खाना या कभी-कभार शुगर चेक करना काफ़ी नहीं होता।


HbA1c आखिर होता क्या है?

HbA1c को आसान भाषा में समझें तो यह

पिछले 2–3 महीनों की औसत ब्लड शुगर की रिपोर्ट होती है।


जब भी ब्लड में शुगर बढ़ती है, तो उसका एक हिस्सा हमारे खून में मौजूद हीमोग्लोबिन से चिपक जाता है।

इसी चिपकी हुई शुगर को कहा जाता है Glycosylated Hemoglobin, यानी HbA1c।


अगर खाली पेट शुगर ज़्यादातर समय 100 से कम

और खाने के बाद 140 से कम रहती है

तो HbA1c लगभग 6 के आसपास आ सकता है।


सिर्फ़ एक टाइम शुगर ठीक होना काफ़ी नहीं

यह सबसे बड़ी गलतफहमी है कि

“सुबह की शुगर ठीक है, तो कंट्रोल अच्छा है।”


HbA1c कम करने के लिए ज़रूरी है कि:


खाली पेट

नाश्ते के बाद

लंच से पहले और बाद

डिनर के आसपास


हर समय शुगर एक लिमिट में रहे।


टारगेट ये होना चाहिए:


खाली पेट: 100 से कम

खाने से पहले: 120 से कम


यह आसान नहीं है, लेकिन नामुमकिन भी नहीं।


HbA1c कम करना है तो Monitoring बदलनी पड़ेगी

अधिकतर लोग क्या करते हैं?

महीने में एक बार या दो महीने में एक बार शुगर चेक करवा लेते हैं।


लेकिन अगर HbA1c सात से नीचे लाना है,

तो कम से कम रोज़ एक बार शुगर चेक करना पड़ेगा।


हर दिन एक ही समय नहीं—


कभी खाली पेट

कभी नाश्ते के बाद

कभी लंच से पहले या बाद

कभी डिनर के आसपास


ताकि ये समझ आए कि

शुगर किस टाइम सबसे ज़्यादा बिगड़ रही है।


जब तक यह पता नहीं चलेगा, सुधार कैसे होगा?


इसी वजह से सिर्फ़ भारत में ही नहीं,

बल्कि अमेरिका और यूके जैसे देशों में भी

क़रीब 50% डायबिटीज़ मरीजों का HbA1c 8 से ऊपर रहता है।

कारण वही—डेली मॉनिटरिंग और लाइफस्टाइल कंट्रोल की कमी।


डाइट, एक्सरसाइज़ और दवा—तीनों का बैलेंस ज़रूरी

HbA1c कंट्रोल करने के लिए

सिर्फ़ दवा या सिर्फ़ डाइट से काम नहीं चलता।

तीनों का तालमेल ज़रूरी है।


1. कार्बोहाइड्रेट का सही हिसाब

डेली कैलोरी में:


कार्बोहाइड्रेट 50% से ज़्यादा नहीं होने चाहिए


हम इंडियन लोग ज़्यादातर:


रोटी

चावल

बाजरा

ओट्स

आलू

मटर

इनसे बहुत ज़्यादा कार्ब्स ले लेते हैं।


एक ग्राम कार्बोहाइड्रेट = 4 कैलोरी


अगर किसी की रोज़ की ज़रूरत 1600 कैलोरी है,

तो उसमें से अधिकतम:


200 ग्राम कार्बोहाइड्रेट ही लेने चाहिए।


कार्ब्स को पूरे दिन में सही तरह बाँटना

कार्ब्स एक साथ नहीं, पूरे दिन में फैलाकर लें:


नाश्ता: 20–25%

लंच: 25–30%

डिनर: 25–30%

बीच के स्नैक्स: बाकी


नाश्ता कैसा हो?

1 रोटी

थोड़ा स्प्राउट

दही

1–2 अंडे


इससे प्रोटीन और फाइबर बढ़ता है और शुगर धीरे बढ़ती है।


लंच में:

2 रोटी

बिना आलू की सब्ज़ी

दाल

दही या सलाद

चाहें तो थोड़ा चिकन या अंडा


डिनर हल्का रखें:

1 रोटी

सब्ज़ी

थोड़ा प्रोटीन

सलाद


स्नैक्स में:

10-15 बादाम

भुने चने

एक कप दूध

हल्की चाय (बिना शुगर)


छोटे हिस्सों में खाने से

शुगर धीरे बढ़ती है और कंट्रोल में रहती है।


एक्सरसाइज़ और रूटीन का रोल

डाइट के साथ-साथ:


रोज़ 30–40 मिनट तेज़ चलना

या कोई भी रेगुलर फिज़िकल एक्टिविटी


बहुत ज़रूरी है।


दवाइयाँ:


समय पर लें

और शुगर का रिकॉर्ड रखें


अगर शुगर बार-बार लिमिट से बाहर जा रही है,

तो पहले:


डाइट सुधारें

एक्सरसाइज़ बढ़ाएँ


और ज़रूरत पड़े तो डॉक्टर से सलाह लें।


HbA1c सात से नीचे लाना संभव है

अगर आप चाहते हैं कि HbA1c सच में सात से नीचे आए,

तो उसके लिए:


मेहनत

अनुशासन

और consistency


तीनों चाहिए।


यह कोई एक दिन का काम नहीं है,

लेकिन सही तरीके से किया जाए

तो कंट्रोल बिल्कुल मुमकिन है।


डायबिटीज़ को हराना नहीं,

समझदारी से मैनेज करना सीखना पड़ता है

नाभि खसकना: सच, भ्रम या आयुर्वेदिक लॉजिक?

 Navel Displacement - नाभि खसकना: सच, भ्रम या आयुर्वेदिक लॉजिक?

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप डॉक्टर के पास गए हों और उनसे कहा हो –

“डॉक्टर साहब, मेरी नाभि खसक गई है”?


और जवाब में डॉक्टर ने बिल्कुल straight बोल दिया हो –

“ऐसा कुछ नहीं होता, नाभि खसकने जैसी कोई बीमारी नहीं है”?


यहीं से confusion शुरू होता है।

क्योंकि दूसरी तरफ YouTube, Instagram, Facebook, हर जगह लोग बोल रहे हैं –

नाभि खसक गई, नाभि बिठवानी पड़ी, मटका लगवाया, लोटा रखा, किसी ने धागा बांधा।


अब सवाल उठता है -

ये सच में कोई problem है या बस एक गलतफहमी?

या फिर… दिक्कत नाभि की नहीं, किसी और चीज़ की है?


इसी topic को हम आयुर्वेद के नजरिए से detail में समझने वाले हैं।


नाभि खसकने पर लोगों को क्या-क्या दिक्कत होती है?

जिन लोगों को लगता है कि उनकी नाभि खसक गई है, वो ज़्यादातर ये complaints बताते हैं:


भूख बिल्कुल नहीं लगती

बहुत ज्यादा गैस बनती है

पेट में खिंचाव, फड़कन या कुछ “हिलता-डुलता” सा लगता है

अपच, ढकार, पेट ठीक से साफ न होना

वजन धीरे-धीरे कम होते जाना

पेट के आसपास लगातार दर्द या भारीपन


कुछ लोग ये भी कहते हैं कि

नाभि कभी नीचे चली जाती है,

कभी ऊपर,

कभी लेफ्ट, कभी राइट।


और ये सब अक्सर कब होता है?


अचानक भारी सामान उठाने के बाद

तेज़ लूज मोशन के बाद

ज़्यादा ट्रैवल करने पर

बहुत ज़्यादा थकावट या कमजोरी के बाद


आयुर्वेद क्या कहता है? 

आयुर्वेद के हिसाब से

“नाभि खसकना” कोई अलग बीमारी नहीं है।


ये एक symptom है।

और इसका root cause है — समान वायु का बिगड़ जाना।


अब ये समान वायु क्या है, वहीं से असली समझ शुरू होती है।


आयुर्वेद का बेसिक फंडा: दोष और वायु

आयुर्वेद में हर बीमारी को समझने के लिए हम सबसे पहले जाते हैं:


वात

पित्त

कफ


इनमें से वात को सबसे powerful दोष माना गया है।


और वात खुद पाँच हिस्सों में काम करता है:


प्राण वायु

उदान वायु

व्यान वायु

अपान वायु

समान वायु


नाभि का एरिया खास तौर पर समान वायु का क्षेत्र होता है।


समान वायु का काम क्या है?

समान वायु आपके digestion का पूरा control संभालती है।


इसका काम होता है:


खाना लेना

खाने को पचाना

पचे हुए खाने को अलग-अलग हिस्सों में बांटना

पोषण को पूरे शरीर में भेजना


और waste को नीचे की तरफ निकालने के लिए आगे भेजना


यानि digestion से लेकर nutrition तक — सब कुछ समान वायु पर depend करता है।


जब समान वायु बिगड़ती है, तब क्या होता है?

अब ध्यान दीजिए -

जिन complaints को लोग “नाभि खसकना” कहते हैं,

वही symptoms आयुर्वेद में समान वायु खराब होने के लक्षण बताए गए हैं।


जैसे:


शूल (Pain)

नाभि के आसपास लगातार दर्द

कभी सुई चुभने जैसा

कभी मरोड़ या ऐंठन

कभी खाने के बाद बढ़ता है

कभी खाली पेट ज्यादा दर्द करता है


गुल्म (Gas lump / moving gas)

पेट में गैस का गोला सा घूमता हुआ लगना

कभी ऊपर, कभी नीचे

कभी एक जगह टिकता ही नहीं


Modern science इसे कई बार “psychological” कह देती है,

लेकिन आयुर्वेद इसे वात की गड़बड़ी मानता है।


Digestive disorders

IBS

ग्रहणी

कब्ज

लूज मोशन

ब्लोटिंग

पेट साफ न होना


तो सीधा सा निष्कर्ष क्या निकला?

नाभि खसकना = समान वायु का बिगड़ जाना


अब अगला सवाल obvious है 

इसे ठीक कैसे करें?


समान वायु को ठीक करने का आयुर्वेदिक तरीका

आयुर्वेद में सिर्फ दवा नहीं,

दवा का टाइम भी उतना ही important होता है।


समान वायु के लिए दवा लेने का सही समय बताया गया है —

खाने के बीच में।


खाने के बीच में कैसे?

अगर 2 रोटी खाते हैं -

1 रोटी खाई - दवा ली - दूसरी रोटी खाई


अगर चावल खाते हैं -

आधा खाना - दवा - बाकी आधा खाना


इसे आयुर्वेद में कहते हैं समान काल।


अब सवाल: कौन सी दवा या चीज?

ये depend करता है कि

समान वायु के साथ कौन-सा दोष और बिगड़ा है।


जब समान वायु + पित्त बिगड़ा हो

लक्षण:


बहुत ज्यादा पसीना

खाने के समय sweating

शरीर में जलन

पेट में गर्मी

बार-बार प्यास, मुंह सूखना


क्या करें?

देसी A2 गाय का घी

1 चम्मच + चुटकी भर सेंधा नमक

खाने के बीच में

या

नागरमोथा (मुस्ता) पाउडर

 1/4 चम्मच + शहद

खाने के बीच में

या

शतावरी पाउडर

1/4 चम्मच + 1 चम्मच घी


जब समान वायु + कफ बिगड़ा हो

लक्षण:


बहुत ठंड लगना

पसीना कम आना

भूख बिल्कुल न लगना


क्या करें?

हरड़ पाउडर 1/2 चम्मच

सोंठ पाउडर 1/4 चम्मच


1–2 चुटकी सेंधा नमक

खाने के बीच में

या

50–100 ml छाछ (अगर सूट करे)


योग और लाइफस्टाइल सपोर्ट

पवनमुक्तासन

भुजंगासन


भारी काम अचानक न करें

ज्यादा देर भूखे न रहें

ओवर-exertion avoid करें


बार-बार नाभि खसकती है? Root treatment क्या है?

अगर बार-बार नाभि “बिठवानी” पड़ रही है,

तो temporary fix से काम नहीं चलेगा।


आयुर्वेदिक पंचकर्म options:

समान वायु + कफ

वमन + बस्ती


समान वायु + पित्त

विरेचन + बस्ती


ये treatments root से समस्या को ठीक करने में मदद करते हैं।


ठीक होने में कितना टाइम लगता है?

Simple cases - 2–3 महीने

IBS / ग्रहणी जैसे cases - 1 से 1.5 साल


Ready-made आयुर्वेदिक दवाइयाँ?

हाँ, मौजूद हैं:


हिंग्वाष्टक चूर्ण

लवण भास्कर

शंख वटी

लहसुनादि वटी

कुमारी आसव


लेकिन कौन सी दवा, कितनी, कब -

ये patient-to-patient बदलता है।


Conclusion

नाभि खसकना कोई अलग बीमारी नहीं,

बल्कि समान वायु के बिगड़ने का संकेत है।


इसके साथ कौन-सा दोष जुड़ा है,

उसी हिसाब से इलाज किया जाता है।


पित्त बढ़ गया है

 Home Remedies for Pitta - पित्त बढ़ गया है? घबराइए नहीं—इलाज आपके किचन में ही है - अगर आपको बार-बार जलन, मुंह में छाले, पूरे शरीर में अजीब सी गर्मी, बहुत ज़्यादा पसीना, हाथ-पैरों में आग लगने जैसा फील, या फिर पूरी बॉडी में बर्निंग सेंसेशन रहता है-तो समझ लीजिए पित्त ओवरएक्टिव हो चुका है।


इसके साथ अगर गुस्सा जल्दी आना, चिड़चिड़ापन, या फिर ब्लीडिंग से जुड़ी दिक्कतें (नाक से खून, पाइल्स में ब्लीडिंग, पीरियड्स में ज़्यादा ब्लड, स्किन पर लाल-लाल चकत्ते) भी जुड़ जाएं, तो ये सारे क्लासिक पित्त डिसऑर्डर के साइन हैं।


अब सवाल आता है-

“ठीक है, आयुर्वेद में इलाज तो बहुत बताए जाते हैं, लेकिन घर पर ऐसा क्या करें जिससे पित्त कंट्रोल में आए?”


आज हम बात करेंगे ऐसी 5 परफेक्ट चीज़ों की, जो:


आसानी से मिल जाती हैं

ज़्यादा महंगी नहीं हैं

और सही तरीके से इस्तेमाल की जाएं, तो पित्त को काफी हद तक शांत कर देती हैं


औषधि #1: कुष्मांड (पेठा / कोहड़ा / Ash Gourd)

सबसे पहले बात उस सब्ज़ी की जो पित्त के लिए किसी रामबाण से कम नहीं—कुष्मांड।

आप इसे पेठा, कोहड़ा, वाइट ऐश गार्ड या कहीं-कहीं पंपकिन भी कहते हैं (लेकिन यहां बात हरे छिलके और सफेद अंदर वाले कोहड़े की हो रही है)।


आयुर्वेद में इसके नाम में ही हिंट है-

“कु + ऊष्म”, यानी शरीर की ऊष्णता, हीट और जलन को दबाने वाली चीज़।


 यह:


शरीर की अंदरूनी गर्मी कम करता है

पित्त से जुड़े ब्लड डिसऑर्डर्स में मदद करता है

जलन, बर्निंग और ओवरहीटिंग को शांत करता है


कैसे लें?


सब्ज़ी बनाकर

जूस के रूप में

घी और मिश्री डालकर हलवे जैसा बनाकर

किसी भी फॉर्म में, बस इसे डाइट में शामिल करें।


शरद ऋतु

15 सितंबर से लेकर लगभग 15 नवंबर तक का समय आयुर्वेद में शरद ऋतु माना जाता है।

इस दौरान वातावरण और शरीर—दोनों में पित्त बढ़ता है।

अगर आप पित्त प्रकृति के हैं या आपको गर्मी ज़्यादा लगती है, तो इस मौसम में कुष्मांड को इग्नोर मत कीजिए।


इसीलिए शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की रोशनी में खीर रखकर खाने की परंपरा है—ताकि बढ़ी हुई गर्मी को शांत किया जा सके।


औषधि #2: आंवला (Amla / Amlaki)

दूसरी सुपरहिट और बजट-फ्रेंडली औषधि है—आंवला।

आयुर्वेद के अनुसार आंवला होता है:


शीत (बेहद ठंडा)

रूक्ष (ड्राय)


ये खासतौर पर उस पित्त के लिए बेस्ट है जिसे आयुर्वेद में “गीला पित्त” कहते हैं।


गीला पित्त क्या होता है?

बहुत ज़्यादा पसीना

खुजली और लाल चकत्ते

चिपचिपा मोशन, तेज़ जलन

खट्टा-कड़वा पानी, एसिडिटी

नाक, मुंह, पाइल्स या पीरियड्स में ज़्यादा ब्लीडिंग


इन सब कंडीशन्स में आंवला गेम-चेंजर है।


कैसे लें?


10–20 ml आंवला जूस

कच्चा आंवला काटकर

आंवले का पाउडर

या अगर सूट करता है तो आंवले का अचार


बोनस फायदा:

पित्त की वजह से बाल जल्दी सफेद होना, एजिंग जल्दी दिखना—इन सब में भी आंवला कमाल करता है।


औषधि #3: करेला - कड़वा, लेकिन असरदार

करेले का नाम सुनते ही लोग मुंह बना लेते हैं—

“छी, इतना कड़वा!”


लेकिन सच यही है कि इसी कड़वेपन में पित्त का इलाज छुपा है।


आयुर्वेद के अनुसार:


खट्टा, नमकीन, तीखा → पित्त बढ़ाते हैं

मीठा, कसैला, कड़वा → पित्त घटाते हैं


और इन तीनों में सबसे ताकतवर है—कड़वा रस (तिक्त रस)।


करेला:


अंदर की हीट कम करता है

छाले, जलन, पित्त वाली डिस्चार्ज को कंट्रोल करता है


कैसे खाएं?


घी में बनी करेले की सब्ज़ी

अगर पित्त है, तो करेले को लाइफस्टाइल से हटाइए मत—बस सही तरीके से खाइए।


औषधि #4: सिंघाड़ा (Water Chestnut)

अब बात उस चीज़ की जो:


ठंडी है

टेस्टी है

और शरीर को नरिशमेंट भी देती है


नाम है—सिंघाड़ा (संस्कृत: श्रृंगाटक)।


करेला पित्त घटाता है, लेकिन वज़न भी कम करता है।

अगर कोई बोले:

“मेरा पित्त तो है, लेकिन बॉडी पहले से ही कमज़ोर और सूखी है”


तो ऐसे केस में करेला नहीं—सिंघाड़ा बेहतर है।


कैसे लें?


कच्चा काटकर

सिंघाड़े का आटा

हलवा बनाकर

ये शुक्र धातु तक काम करता है,

जल्दी डिस्चार्ज, अंदरूनी जलन, और कमजोरी वाले केस में खास फायदेमंद।


औषधि #5: घी – पित्त शांत करने का राजा

आख़िर में, लेकिन सबसे ज़रूरी—घी (घृत)।


आयुर्वेद में पित्त को कंट्रोल करने के दो तरीके हैं:


दबाना (Shamana)

शरीर से बाहर निकालना (Shodhana)


पित्त को दबाने के लिए घी से बेहतर कुछ नहीं।


खासतौर पर उन लोगों के लिए:

जिन्हें बहुत गुस्सा आता है

जो ज़्यादा सोचते हैं

ब्रेन-वर्क, स्ट्रेस, लेट नाइट स्टडी

मानसिक थकान के कारण पित्त बढ़ा हुआ है


घी कैसे यूज़ करें?


रोज़ 10–15 ml खाने में

पैरों के तलवों पर मालिश

नाक में (नस्य)

मुंह के छालों में कुल्ला (देसी गाय का घी)


मज़बूत डाइजेशन वालों के लिए भैंस का घी भी चल सकता है।


जब ये सब करने के बाद भी पित्त कंट्रोल न हो…

अगर आपने खान-पान, ये सारी चीज़ें सब ट्राय कर लीं,

फिर भी पित्त बहुत ज़्यादा है—तो आयुर्वेद कहता है:


अब उसे दबाओ मत, निकालो।


इसके लिए:


विरेचन पंचकर्म (पित्त को मोशन के ज़रिये बाहर निकालना)

हर 6 महीने में रक्तमोक्षण (ब्लड निकालना)

लोकल पित्त में लीच थेरेपी / कपिंग


ये सब करने के बाद जब आप ऊपर बताई गई चीज़ें खाते हैं,

तो रिज़ल्ट कई गुना बेहतर आता है।


फाइनल बात

आज हमने सिर्फ 5 चीज़ों की बात की है,

लिस्ट इससे कहीं लंबी है।


अगर आप चाहते हैं:


और घरेलू उपाय

और फूड लिस्ट

या किसी खास पित्त प्रॉब्लम पर डीप वीडियो


तो कमेंट में ज़रूर बताइए:


आपने आज क्या सीखा

और अगला वीडियो किस टॉपिक पर चाहिए 



वात, पित्त और कफ तीनों बिगड़ जाएं तो क्या करें?

 Ayurvedic Tridosha Treatment - वात, पित्त और कफ तीनों बिगड़ जाएं तो क्या करें?

जब तीनों दोष बिगड़ जाएँ – इसे ही सन्निपात कहते हैं - आयुर्वेद में सबसे चुनौतीपूर्ण स्थिति तब मानी जाती है जब शरीर के तीनों दोष – वात, पित्त और कफ – एक साथ असंतुलित हो जाते हैं। इस अवस्था को सन्निपात कहा जाता है।


यहीं पर लोग सबसे बड़ी गलती करते हैं। वे किसी एक दोष को ठीक करने की दवा या उपाय शुरू करते हैं और अनजाने में दूसरा दोष और ज्यादा बिगड़ जाता है।


आज हम उन्हीं आयुर्वेदिक सिद्धांतों पर आधारित पाँच ऐसे तरीकों की बात करेंगे, जिनसे तीनों दोषों को एक साथ बैलेंस किया जा सकता है और शरीर को दोबारा ट्रैक पर लाया जा सकता है।


त्रिदोष क्यों बिगड़ते हैं – असली जड़ क्या है?

आयुर्वेद के अनुसार त्रिदोष का असंतुलन तब शुरू होता है जब जठराग्नि यानी डाइजेस्टिव फायर कमजोर पड़ जाती है।

कमज़ोर अग्नि की वजह से शरीर में आम यानी टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं और यहीं से रोगों की चेन रिएक्शन शुरू होती है।


इसीलिए इलाज की शुरुआत हमेशा अग्नि सुधारने से होती है, दवा से नहीं।


पहला स्टेप: लंघन – शरीर को खुद को साफ करने का मौका दें

सबसे पहले तीन दिन तक सिर्फ गुनगुना पानी पिएँ और मूंग दाल की पतली खिचड़ी लें।

आयुर्वेद में इसे लंघन कहा जाता है।


लॉजिक साफ़ है – जब सिस्टम पर लोड कम होगा, तभी शरीर खुद की सफाई कर पाएगा। यह शरीर को रीसेट करने जैसा है।


क्यों पहले वात को बैलेंस करना ज़रूरी है?

आयुर्वेद का एक मूल सिद्धांत है –

“वायुना विना दोषाणां गतिर्नास्ति”

मतलब, बिना वात के पित्त और कफ हिल भी नहीं सकते।


इसलिए जब तीनों दोष बिगड़े हों, तो सबसे पहले वात को शांत करना जरूरी है।


वात संतुलन का सबसे सरल उपाय

तिल के तेल से रोज़ हल्की मालिश।

यह शरीर के सूखेपन को खत्म करता है और नर्वस सिस्टम को शांत करता है।


दूसरा स्टेप: पित्त के लिए घी क्यों ज़रूरी है?

पित्त का मतलब सिर्फ गर्मी नहीं, बल्कि ओवरएक्टिव मेटाबॉलिज़्म भी है।

देसी घी पित्त को ठंडा करता है, लेकिन अग्नि को कमजोर नहीं करता।


इसीलिए पित्त संतुलन के लिए घी को आयुर्वेद में अमृत कहा गया है।


तीसरा स्टेप: कफ के लिए शहद और मूवमेंट

कफ का नेचर है भारीपन और जड़ता।

शहद कफ को काटता है और हल्का व्यायाम कफ को जमा नहीं होने देता।


ध्यान रहे – शहद हमेशा कच्चा लें, गर्म न करें।


जब तीनों दोष बिगड़े हों, तो डाइट कैसी होनी चाहिए?

ऐसी डाइट जो न बहुत ठंडी हो, न बहुत गर्म।

आयुर्वेद इसे सामान्य आहार कहता है।


अब अपनी थाली में ये पाँच बदलाव आज से शुरू करें।


1. अनाज – हल्का लेकिन पोषक

भारी गेहूं की रोटियाँ फिलहाल कम करें।

उसकी जगह:


पुराना चावल

जौ

मूंग की दाल


मूंग दाल इकलौती ऐसी दाल है जो वात, पित्त और कफ – तीनों को बैलेंस करती है।


2. सब्ज़ियाँ – हमेशा पकी हुई

कच्चा प्याज़ बिल्कुल बंद करें। यह वात बढ़ाता है।

हमेशा पकी हुई सब्ज़ियाँ खाएँ जैसे:


लौकी

तोरई

कद्दू

परवल


ये पचने में हल्की होती हैं और सिस्टम पर बोझ नहीं डालतीं।


3. फल – हर फल आपके लिए नहीं

इस समय सबसे सुरक्षित फल हैं:


अनार

पपीता


बहुत खट्टे या बहुत मीठे फलों से अभी दूरी बनाए रखें।


4. मसाले – कम लेकिन सही

लाल मिर्च को फिलहाल रसोई से बाहर रखें।

उसकी जगह:


जीरा

धनिया

सौंफ


ये तीनों मिलकर पाचन सुधारते हैं बिना पित्त को भड़काए।


5. कुकिंग फैट – देसी घी क्यों सबसे बेस्ट है?

रिफाइंड तेल छोड़ें।

देसी घी:


वात को चिकनाई देता है

पित्त को शांत करता है

कफ को जमा नहीं होने देता


इसीलिए यह त्रिदोष संतुलन का सबसे सुरक्षित फैट है।


शुरुआत समझ नहीं आ रही? ये करें

3 से 7 दिन तक सिर्फ मूंग दाल की खिचड़ी खाएँ।

यह आपके पाचन तंत्र के लिए फैक्ट्री रिसेट जैसा काम करता है।


कुछ चीज़ें जो तीनों दोषों पर काम करती हैं

1. आंवला

इकलौता फल जो:


पित्त को ठंडा करता है

वात को शांत करता है

कफ को सुखाता है


2. गिलोय

इसे त्रिदोष शामक कहा जाता है।

यह खून साफ करती है और शरीर में बैलेंस बनाती है।


3. त्रिफला – सही तरीके से लें

रात को गुनगुने पानी से लें - वात और पित्त को बाहर निकालता है

शहद के साथ लें - कफ को काटता है


दवा ले रहे हैं लेकिन गलत खाना खा रहे हैं?

तो त्रिदोष कभी ठीक नहीं होंगे।


इन विरुद्ध आहार से बचें:

दूध के साथ नमक या खट्टे फल

रात में दही

ठंडा पानी

ठंडा पानी वात और कफ को तुरंत बिगाड़ देता है।


समय का पालन – आयुर्वेद का सबसे अनदेखा नियम

रात 10 बजे तक सो जाएँ

सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें

रोज़ 15 मिनट अनुलोम-विलोम या नाड़ी शोधन करें


यह प्राण वायु को संतुलित करता है और तीनों दोषों को स्थिर करता है।


Conclusion

त्रिदोष को बैलेंस करने के लिए:


पाचन सुधारें

आंवला और गिलोय को शामिल करें

विरुद्ध आहार से बचें


त्रिदोष का इलाज धैर्य माँगता है, लेकिन सही दिशा में किया गया प्रयास शरीर को स्थायी संतुलन देता है।


Monday, February 2, 2026

गोत्र प्रवर वेद शाखा सूत्र देवता

 गोत्र प्रवर वेद शाखा सूत्र देवता 

हमारी महान् वैदिक परम्परा रही है कि हम सब अपने-अपने गोत्रों को याद रखते हैं । इसके लिए हमारे मनीषियों, ऋषियों ने कितनी अच्छी परम्परा शुरु की थी कि विभिन्न संस्कारों का प्रारम्भ संकल्प-पाठ से कराते थे, जिसके अन्तर्गत अपने पिता, प्रपिता, पितामह, प्रपितामह के साथ-साथ गोत्र, प्रवर, आदि का परिचय भी दिया जाता था । इसमें जन्मभूमि, भारतवर्ष का भी उल्लेख होता था। इसमें सृष्टि के एक-एक पल का गणन होता था और संवत् को भी याद रखा जाता था । यह परम्परा आज भी प्रचलित है, कुछ न्यूनताओं के साथ। गोत्र और प्रवर की आवश्यकता विवाह के समय भी होती है । इसलिए इसे जानना आवश्यक है । इसके अन्तर्गत हम इन पाँच विषयों पर चर्चा करेंगे : ---


1) गोत्र


2) प्रवर


3) वेद


4) शाखा


5) सूत्र


6) देवता


================================


(1) गोत्र : ----


गोत्र का अर्थ है, कि वह कौन से ऋषिकुल का है। या उसका जन्म किस ऋषिकुल में हुआ है। किसी व्यक्ति की वंश परंपरा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता है। हम सभी जानते हैं कि हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान हैं । इस प्रकार से जो जिस गोत्र ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया। 


#इन_गोत्रों_के_मूल_ऋषि :– 

अंगिरा, भृगु, अत्रि, कश्यप, वशिष्ठ, अगस्त्य, तथा कुशिक थे, और इनके वंश अंगिरस, भार्गव,आत्रेय, काश्यप, वशिष्ठ अगस्त्य, तथा कौशिक हुए। [ इन गोत्रों के अनुसार इकाई को "गण" नाम दिया गया, यह माना गया कि एक गण का व्यक्ति अपने गण में विवाह न कर अन्य गण में करेगा। इस तरह इन सप्त ऋषियों के पश्चात् उनकी संतानों के विद्वान ऋषियों के नामों से अन्य गोत्रों का नामकरण हुआ।


गोत्र शब्द का एक अर्थ गो जो पृथ्वी का पर्याय भी है । 'त्र' का अर्थ रक्षा करने वाला भी है। यहाँ गोत्र का अर्थ पृथ्वी की रक्षा करने वाले ऋषि से ही है। गो शब्द इंद्रियों का वाचक भी है, ऋषि मुनि अपनी इंद्रियों को वश में कर अन्य प्रजा जनो का मार्ग दर्शन करते थे, इसलिए वे गोत्र कारक कहलाए। ऋषियों के गुरुकुल में जो शिष्य शिक्षा प्राप्त कर जहा कहीं भी जाते थे, वे अपने गुरु या आश्रम प्रमुख ऋषि का नाम बतलाते थे, जो बाद में उनके वंशधरो में स्वयं को उनके वही गोत्र कहने की परंपरा पड़ गई। 


(2) प्रवर : ----


प्रवर का शाब्दिक अर्थ है--श्रेष्ठ । गोत्र और प्रवर का घनिष्ठ सम्बन्ध है । एक ही गोत्र में अनेक ऋषि हुए । वे ऋषि भी अपनी विद्वत्ता और श्रेष्ठता के कारण प्रसिद्ध हो गए । जिस गोत्र में जो व्यक्ति प्रसिद्ध हो जाता है, उस गोत्र की पहचान उसी व्यक्ति के नाम से प्रचलित हो जाती है । 


एक सामान्य उदाहरण देखिए :-


श्रीराम सूर्यवंश में हुए । इस वंश के प्रथम व्यक्ति सूर्य थे । आगे चलकर इसी वंश में रघु राजा प्रसिद्ध हो गए । तो आगे चलकर इनके नाम से ही रघुवंश या राघव वंश प्रचलित हो गया । इसी प्रकार इक्ष्वाकु भी प्रसिद्ध राजा हुए, तो उनके नाम से भी इस वंश का नाम इक्ष्वाकु वंश पड गया ।


इसी प्रकार ब्राह्मणों के ऋषि वंश में उदाहरण के साथ मिलान करें । जैसेः---वशिष्ठ ऋषि का वंश । वशिष्ठ के नाम से वशिष्ठ गोत्र चल पडा । अब इसी वंश में वाशिष्ठ, आत्रेय और जातुकर्ण्य ऋषि भी हुए , जो अति प्रसिद्धि को प्राप्त कर गए । अब इस वंश के तीन व्यक्ति अर्थात् तीन मार्ग हुए । इन तीनों के नाम से भी वंश का नाम पड गया । ये यद्यपि पृथक् हो गए, किन्तु इन तीनों का मूल पुरुष वशिष्ठ तो एक ही व्यक्ति है, अतः ये तीनों एक ही वंश के हैं, इसलिए ये तीनों आपस विवाह सम्बन्ध नहीं रख सकते । 


ये तीनों इस वंश श्रेष्ठ कहलाए, इसलिए ये प्रवर हैं । इस प्रकार एक गोत्र में तीन या पाँच प्रवर हो सकते हैं । भरद्वाज गोत्र में पाँच प्रवर हैं, अर्थात् इस गोत्र में पाँच ऋषि बहुत प्रसिद्धि को प्राप्त हो गए, इसलिए इनके नाम से भी गोत्र चल पडा, ये गोत्र ही प्रवर हैं । मूल गोत्र भरद्वाज है और इसके प्रवर ऋषि हुए---आंगिरस्, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, शौङ्ग, शैशिर ।


ये प्रवर तीसरी पीढी की सन्तान हो सकते हैं, या पाँचवी पीढी की । अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्---अष्टाध्यायी--4.1.162 सूत्रार्थ यह है कि पौत्र से लेकर जो सन्तान है, उसकी भी गोत्र संज्ञा होती है । अर्थात् पौत्र की तथा उससे आगे की सन्तानों की गोत्र संज्ञा होती है । इस सूत्र से गोत्र अर्थात् प्रवर की व्यवस्था है । इस व्यवस्था से या तो आप कह सकते हैं कि गोत्र और प्रवर एक ही है या फिर यह कह सकते हैं कि थोडा-सा अन्तर है । दोनों एक ही मूल पुरुष से जुड़े हुए हैं ।


प्रवर में यह व्यवस्था है कि प्रथम प्रवर गोत्र के ऋषि का होता है, दूसरा प्रवर ऋषि के पुत्र का होता है, तीसरा प्रवर गोत्र के ऋषि पौत्र का होता है । (यह व्यवस्था आधुनिक है । प्राचीन व्यवस्था पाणिनि के सूत्र से ज्ञात होता है, जो ऊपर दिया हुआ है ।) इस प्रकार प्रवर से उस गोत्र प्रवर्तक ऋषि की तीसरी पीढी और पाँचवी पीढी तक का पता लगता है । हम आपको एक बार और बता देना चाहते हैं कि एक समान गोत्र और प्रवर में विवाह निषिद्ध है । 


#कुछ_गोत्र_प्रवर : --


🔸(1) अगस्त्य---इसमें तीन प्रवर हैं---आगसस्त्य, माहेन्द्र, मायोभुव ।


🔹(2) उपमन्यु---वाशिष्ठ, ऐन्द्रप्रमद, आभरद्वसव्य ।


🔸(3) कण्व---आंगिरस्, घौर, काण्व ।


🔹(4) कश्यप---कश्यप, असित, दैवल ।


🔸(5) कात्यायन---वैश्वामित्र, कात्य, कील ।


🔹(6) कुण्डिन---वाशिष्ठ, मैत्रावरुण, कौण्डिन्य ।


🔸(7) कुशिक---वैश्वामित्र, देवरात, औदल ।


🔹(8) कृष्णात्रेय---आत्रेय, आर्चनानस, श्यावाश्व ।


🔸(9) कौशिक---वैश्वामित्र, आश्मरथ्य, वाघुल ।


🔹(10) गर्ग---आंगिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, गार्ग्य, शैन्य ।


🔸(11) गौतम---आंगिरस्, औचथ्य, गौतम ।


🔹(12) घृतकौशिक---वैश्वामित्र, कापातरस, घृत ।


🔸(13) चान्द्रायण---आंगिरस, गौरुवीत, सांकृत्य ।


🔹(14) पराशर---वाशिष्ठ, शाक्त्य, पाराशर्य ।


🔸(15) भरद्वाजः---आंगिरस्, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, शौङ्ग, शैशिर ।


🔹(16) भार्गव---भार्गव, च्यावन, आप्नवान्, और्व, जामदग्न्य ।


🔸(17) मौनस---मौनस, भार्ग्व, वीतहव्य ।


🔹(18) वत्स---भार्गव, च्यावन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य ।


#कुछ_प्रसिद्ध_गोत्रों_के_प्रवर_आदि_नीचे_लिखे_हैं :


🔸(1) कश्यप,


🔹(2) काश्यप के काश्यप, असित, देवल अथवा काश्यप, आवत्सार, नैधु्रव तीन प्रवर हैं। इस गोत्र के ब्राह्मण ये हैं - जैथरिया, किनवार, बरुवार, दन्सवार, मनेरिया, कुढ़नियाँ, नोनहुलिया, तटिहा, कोलहा, करेमुवा, भदैनी चौधरी, त्रिफला पांडे, परहापै, सहस्रामै, दीक्षित, जुझौतिया, बवनडीहा, मौवार, दघिअरे, मररें, सिरियार, धौलानी, डुमरैत, भूपाली आदि।


🔸(3) पराशर के वसिष्ठ, शक्‍ति, पराशर तीन प्रवर हैं। इस गोत्र के ब्राह्मण एकसरिया, सहदौलिया, सुरगणे हस्तगामे आदि है।


🔹(4) वसिष्ठ के वसिष्ठ, शक्‍ति, पराशर अथवा वसिष्ठ, भरद्वसु, इंद्र प्रमद ये तीन प्रवर हैं। ये ब्राह्मण कस्तुवार, डरवलिया, मार्जनी मिश्र आदि हैं। कोई वसिष्ठ, अत्रि, संस्कृति प्रवर मानते हैं।


🔸(5) शांडिल्य के शांडिल्य, असित, देवल तीन प्रवर हैं। दिघवैत, कुसुमी-तिवारी, नैनजोरा, रमैयापांडे, कोदरिए, अनरिए, कोराँचे, चिकसौरिया, करमहे, ब्रह्मपुरिए, पहितीपुर पांडे, बटाने, सिहोगिया आदि इस गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔹(6) भरद्वाज,


🔸(7) भारद्वाज के आंगिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज अथवा आंगिरस, गार्ग्य, शैन्य तीन प्रवर हैं। दुमटिकार, जठरवार, हीरापुरी पांडे, बेलौंचे, अमवरिया, चकवार, सोनपखरिया, मचैयांपांडे, मनछिया आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔹(8) गर्ग


🔸(9) गार्ग्य के आंगिरस, गार्ग्य, शैन्य तीन अथवा धृत, कौशिक मांडव्य, अथर्व, वैशंपायन पाँच प्रवर हैं। मामखोर के शुक्ल, बसमैत, नगवाशुक्ल, गर्ग आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔹(10) सावर्ण्य के भार्गव, च्यवन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य पाँच, या सावर्ण्य, पुलस्त्य, पुलह तीन प्रवर हैं। पनचोभे, सवर्णियाँ, टिकरा पांडे, अरापै बेमुवार आदि इस गोत्र के हैं।


🔸(11) वत्स के भार्गव, च्यवन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य पाँच, या भार्गव, च्यवन, आप्नवान तीन प्रवर हैं। दोनवार, गानामिश्र, सोनभदरिया, बगौछिया, जलैवार, शमसेरिया, हथौरिया, गगटिकैत आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔹(12) गौतम के आंगिरस बार्हिस्पत्य, भारद्वाज या अंगिरा, वसिष्ठ, गार्हपत्य, तीन, या अंगिरा, उतथ्य, गौतम, उशिज, कक्षीवान पाँच प्रवर हैं। पिपरामिश्र, गौतमिया, करमाई, सुरौरे, बड़रमियाँ दात्यायन, वात्स्यायन आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔸(13) भार्गव के भार्गव, च्यवन, आप्नवान, तीन या भार्गव, च्यवन आप्नवन, और्व, जायदग्न्य, पाँच प्रवर हैं, भृगुवंश, असरिया, कोठहा आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔹(14) सांकृति के सांकृति, सांख्यायन, किल, या शक्‍ति, गौरुवीत, संस्कृति या आंगिरस, गौरुवीत, संस्कृति तीन प्रवर हैं। सकरवार, मलैयांपांडे फतूहाबादी मिश्र आदि इन गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔸(15) कौशिक के कौशिक, अत्रि, जमदग्नि, या विश्‍वामित्रा, अघमर्षण, कौशिक तीन प्रवर हैं। कुसौझिया, टेकार के पांडे, नेकतीवार आदि इस गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔹(16) कात्यायन के कात्यायन, विश्‍वामित्र, किल या कात्यायन, विष्णु, अंगिरा तीन प्रवर हैं। वदर्का मिश्र, लमगोड़िया तिवारी, श्रीकांतपुर के पांडे आदि इस गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔸(17) विष्णुवृद्ध के अंगिरा, त्रासदस्यु, पुरुकुत्स तीन प्रवर हैं। इस गोत्र के कुथवैत आदि ब्राह्मण हैं! 


🔹(18) आत्रेय।


🔸(19) कृष्णात्रेय के आत्रेय, आर्चनानस, श्यावाश्‍व तीन प्रवर हैं। मैरियापांडे, पूले, इनरवार इस गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔹(20) कौंडिन्य के आस्तीक, कौशिक, कौंडिन्य या मैत्रावरुण वासिष्ठ, कौंडिन्य तीन प्रवर हैं। इनका अथर्ववेद भी है। अथर्व विजलपुरिया आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔸(21) मौनस के मौनस, भार्गव, वीतहव्य (वेधास) तीन प्रवर हैं।


🔹(22) कपिल के अंगिरा, भारद्वाज, कपिल तीन प्रवर हैं।

इस गोत्र के ब्राह्मण जसरायन आदि हैं।


🔸(23) तांडय गोत्र के तांडय, अंगिरा, मौद्गलय तीन प्रवर हैं।


🔹(24) लौगाक्षि के लौगाक्षि, बृहस्पति, गौतम तीन प्रवर हैं।


🔸(25) मौद्गल्य के मौद्गल्य, अंगिरा, बृहस्पति तीन प्रवर हैं।


🔹(26) कण्व के आंगिरस, आजमीढ़, काण्व, या आंगिरस, घौर, काण्व तीन प्रवर हैं।


🔸(27) धनंजय के विश्‍वामित्र, मधुच्छन्दस, धनंजय तीन प्रवर हैं।


🔹(28) उपमन्यु के वसिष्ठ, इंद्रप्रमद, अभरद्वसु तीन प्रवर हैं।


🔸(29) कौत्स के आंगिरस, मान्धाता, कौत्स तीन प्रवर हैं।


🔹(30) अगस्त्य के अगस्त्य, दाढर्यच्युत, इधमवाह तीन प्रवर हैं। अथवा केवल अगस्त्यही।


इसके सिवाय और गोत्रों के प्रवर प्रवरदर्पण आदि से अथवा ब्राह्मणों की वंशावलियों से जाने जा सकते हैं।ब्राम्हण का एकादश परिचय 1 गोत्र .गोत्र का अर्थ है कि वह कौन से ऋषिकुल का है या उसका जन्म किस ऋषिकुल से सम्बन्धित है । किसी व्यक्ति की वंश-परम्परा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। हम सभी जानते हें की हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान है, इस प्रकार से जो जिस ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया ।


विश्‍वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतम:।

अत्रिवर्सष्ठि: कश्यपइत्येतेसप्तर्षय:॥ 

सप्तानामृषी-णामगस्त्याष्टमानां 

यदपत्यं तदोत्रामित्युच्यते॥


विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। 


इस तरह आठ ऋषियों की वंश-परम्परा में जितने ऋषि (वेदमन्त्र द्रष्टा) आ गए वे सभी गोत्र कहलाते हैं। और आजकल ब्राह्मणों में जितने गोत्र मिलते हैं वह उन्हीं के अन्तर्गत है।


 सिर्फ भृगु, अंगिरा के वंशवाले ही उनके सिवाय और हैं जिन ऋषियों के नाम से भी गोत्र व्यवहार होता है। 


इस प्रकार कुल दस ऋषि मूल में है। इस प्रकार देखा जाता है कि इन दसों के वंशज ऋषि लाखों हो गए होंगे और उतने ही गोत्र भी होने चाहिए।


गोत्र शब्द एक अर्थ में गो अर्थात् पृथ्वी का पर्याय भी है ओर 'त्र' का अर्थ रक्षा करने वाला भी हे। यहाँ गोत्र का अर्थ पृथ्वी की रक्षा करें वाले ऋषि से ही है। 


गो शब्द इन्द्रियों का वाचक भी है, ऋषि- मुनि अपनी इन्द्रियों को वश में कर अन्य प्रजाजनों का मार्ग दर्शन करते थे, इसलिए वे गोत्रकारक कहलाए। 


ऋषियों के गुरुकुल में जो शिष्य शिक्षा प्राप्त कर जहा कहीं भी जाते थे , वे अपने गुरु या आश्रम प्रमुख ऋषि का नाम बतलाते थे, जो बाद में उनके वंशधरो में स्वयं को उनके वही गोत्र कहने की परम्परा आव.....

1 गोत्र .....


गोत्र का अर्थ है कि वह कौन से ऋषिकुल का है या उसका जन्म किस ऋषिकुल से सम्बन्धित है । किसी व्यक्ति की वंश-परम्परा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। 


हम सभी जानते हें की हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान है, इस प्रकार से जो जिस ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया ।


*विश्‍वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतम:।*

*अत्रिवर्सष्ठि: कश्यपइत्येतेसप्तर्षय:॥*

*सप्तानामृषी-णामगस्त्याष्टमानां* 

*यदपत्यं तदोत्रामित्युच्यते॥*


विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। 


इस तरह आठ ऋषियों की वंश-परम्परा में जितने ऋषि (वेदमन्त्र द्रष्टा) आ गए वे सभी गोत्र कहलाते हैं। और आजकल ब्राह्मणों में जितने गोत्र मिलते हैं वह उन्हीं के अन्तर्गत है।


 सिर्फ भृगु, अंगिरा के वंशवाले ही उनके सिवाय और हैं जिन ऋषियों के नाम से भी गोत्र व्यवहार होता है। 


इस प्रकार कुल दस ऋषि मूल में है। इस प्रकार देखा जाता है कि इन दसों के वंशज ऋषि लाखों हो गए होंगे और उतने ही गोत्र भी होने चाहिए।


गोत्र शब्द एक अर्थ में गो अर्थात् पृथ्वी का पर्याय भी है ओर 'त्र' का अर्थ रक्षा करने वाला भी हे। यहाँ गोत्र का अर्थ पृथ्वी की रक्षा करें वाले ऋषि से ही है। 


गो शब्द इन्द्रियों का वाचक भी है, ऋषि- मुनि अपनी इन्द्रियों को वश में कर अन्य प्रजाजनों का मार्ग दर्शन करते थे, इसलिए वे गोत्रकारक कहलाए। 


ऋषियों के गुरुकुल में जो शिष्य शिक्षा प्राप्त कर जहा कहीं भी जाते थे , वे अपने गुरु या आश्रम प्रमुख ऋषि का नाम बतलाते थे, जो बाद में उनके वंशधरो में स्वयं को उनके वही गोत्र कहने की परम्परा आविर्भसरयूपारीण सभी ब्राहमणों के मुख्य गाँव और गोत्र : 


गर्ग (शुक्ल- वंश)


गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|


(१) मामखोर (२) खखाइज खोर (३) भेंडी (४) बकरूआं (५) अकोलियाँ (६) भरवलियाँ (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं|


उपगर्ग (शुक्ल-वंश) 


उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|


बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार


यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|


गौतम (मिश्र-वंश)


गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे|


(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी


इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|


उप गौतम (मिश्र-वंश)


उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|


(१) कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े (६) कपीसा


इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति मानी जाति है|


वत्स गोत्र ( मिश्र- वंश)


वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|


(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (*गोत्र, प्रवर, वेद, शाखा, सूत्र, देवता*


हमारी महान् वैदिक परम्परा रही है कि हम सब अपने-अपने गोत्रों को याद रखते हैं । इसके लिए हमारे मनीषियों, ऋषियों ने कितनी अच्छी परम्परा शुरु की थी कि विभिन्न संस्कारों का प्रारम्भ संकल्प-पाठ से कराते थे, जिसके अन्तर्गत अपने पिता, प्रपिता, पितामह, प्रपितामह के साथ-साथ गोत्र, प्रवर, आदि का परिचय भी दिया जाता था । इसमें जन्मभूमि, भारतवर्ष का भी उल्लेख होता था। इसमें सृष्टि के एक-एक पल का गणन होता था और संवत् को भी याद रखा जाता था । यह परम्परा आज भी प्रचलित है, कुछ न्यूनताओं के साथ। गोत्र और प्रवर की आवश्यकता विवाह के समय भी होती है । इसलिए इसे जानना आवश्यक है । इसके अन्तर्गत हम इन पाँच विषयों पर चर्चा करेंगे : ---


1) गोत्र


2) प्रवर


3) वेद


4) शाखा


5) सूत्र


6) देवता


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(1) गोत्र : ----


गोत्र का अर्थ है, कि वह कौन से ऋषिकुल का है। या उसका जन्म किस ऋषिकुल में हुआ है। किसी व्यक्ति की वंश परंपरा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता है। हम सभी जानते हैं कि हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान हैं । इस प्रकार से जो जिस गोत्र ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया। 


इन गोत्रों के मूल ऋषि – अंगिरा, भृगु, अत्रि, कश्यप, वशिष्ठ, अगस्त्य, तथा कुशिक थे, और इनके वंश अंगिरस, भार्गव,आत्रेय, काश्यप, वशिष्ठ अगस्त्य, तथा कौशिक हुए। [ इन गोत्रों के अनुसार इकाई को "गण" नाम दिया गया, यह माना गया कि एक गण का व्यक्ति अपने गण में विवाह न कर अन्य गण में करेगा। इस तरह इन सप्त ऋषियों के पश्चात् उनकी संतानों के विद्वान ऋषियों के नामों से अन्य गोत्रों का नामकरण हुआ।


गोत्र शब्द का एक अर्थ गब्राह्मण वंशावली (गोत्र प्रवर परिचय)


सरयूपारीण ब्राह्मण या सरवरिया ब्राह्मण या सरयूपारी ब्राह्मण सरयू नदी के पूर्वी तरफ बसे हुए ब्राह्मणों को कहा जाता है। यह कान्यकुब्ज ब्राह्मणो कि शाखा है। श्रीराम ने लंका विजय के बाद कान्यकुब्ज ब्राह्मणों से यज्ञ करवाकर उन्हे सरयु पार स्थापित किया था। सरयु नदी को सरवार भी कहते थे। ईसी से ये ब्राह्मण सरयुपारी ब्राह्मण कहलाते हैं। सरयुपारी ब्राह्मण पूर्वी उत्तरप्रदेश, उत्तरी मध्यप्रदेश, बिहार छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में भी होते हैं। मुख्य सरवार क्षेत्र पश्चिम मे उत्तर प्रदेश राज्य के अयोध्या शहर से लेकर पुर्व मे बिहार के छपरा तक तथा उत्तर मे सौनौली से लेकर दक्षिण मे मध्यप्रदेश के रींवा शहर तक है। काशी, प्रयाग, रीवा, बस्ती, गोरखपुर, अयोध्या, छपरा इत्यादि नगर सरवार भूखण्ड में हैं।


एक अन्य मत के अनुसार श्री राम ने कान्यकुब्जो को सरयु पार नहीं बसाया था बल्कि रावण जो की ब्राह्मण थे उनकी हत्या करने पर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए जब श्री राम ने भोजन ओर दान के लिए ब्राह्मणों को आमंत्रित किया तो जो ब्राह्मण स्नान करने के बहाने से सरयू नदी पार करके उस पार चले गए ओर भोजन तथा दान समंग्री ग्रहण नहीं की वे ब्राह्मण सरयुपारीन ब्राह्मण कहे गए।


#सरयूपारीण_ब्राहमणों_के_मुख्य_गाँव : 


गर्ग (शुक्ल- वंश)


गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|


(१) मामखोर (२) खखाइज खोर (३) भेंडी (४) बकरूआं (५) अकोलियाँ (६) भरवलियाँ (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं।


उपगर्ग (शुक्ल-वंश):


उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|

(१)बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार

यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं।


गौतम (मिश्र-वंश):


गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे|

(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी

इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं।


उप गौतम (मिश्र-वंश):


उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|

(१) कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े (६) कपीसा

इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति मानी जाति है।


वत्स गोत्र (मिश्र- वंश):


वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|

(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (९) मकहडा

बताया जाता है की इनके वहा पांति का प्रचलन था अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है।


कौशिक गोत्र (मिश्र-वंश):


तीन गांवों से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है जो निम्न है।

(१) धर्मपुरा (२) सोगावरी (३) देशी


वशिष्ठ गोत्र (मिश्र-वंश):


इनका निवास भी इन तीन गांवों में बताई जाती है।

(१) बट्टूपुर मार्जनी (२) बढ़निया (३) खउसी


शांडिल्य गोत्र ( तिवारी,त्रिपाठी वंश) 


शांडिल्य ऋषि के बारह पुत्र बताये जाते हैं जो इन बाह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं।


(१) सांडी (२) सोहगौरा (३) संरयाँ (४) श्रीजन (५) धतूरा (६) भगराइच (७) बलूआ (८) हरदी (९) झूडीयाँ (१०) उनवलियाँ (११) लोनापार (१२) कटियारी, लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है।

इन्ही बारह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सरयूपारीण ब्राह्मण हैं। इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य त्रि प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ घराना, मणी घराना है, इन चारों का उदय, सोहगौरा गोरखपुर से है जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है। 


उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश):


इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं।

(१) शीशवाँ (२) चौरीहाँ (३) चनरवटा (४) जोजिया (५) ढकरा (६) क़जरवटा

भार्गव गोत्र (तिवारी या त्रिपाठी वंश):

भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें चार गांवों का उल्लेख मिलता है|

(१) सिंघनजोड़ी (२) सोताचक (३) चेतियाँ (४) मदनपुर।


भारद्वाज गोत्र (दुबे वंश):


भारद्वाज ऋषि के चार पुत्र बाये जाते हैं जिनकी उत्पत्ति इन चार गांवों से बताई जाती है|

(१) बड़गईयाँ (२) सरार (३) परहूँआ (४) गरयापार


कन्चनियाँ और लाठीयारी इन दो गांवों में दुबे घराना बताया जाता है जो वास्तव में गौतम मिश्र हैं लेकिन इनके पिता क्रमश: उठातमनी और शंखमनी गौतम मिश्र थे परन्तु वासी (बस्ती) के राजा बोधमल ने एक पोखरा खुदवाया जिसमे लट्ठा न चल पाया, राजा के कहने पर दोनों भाई मिल कर लट्ठे को चलाया जिसमे एक ने लट्ठे सोने वाला भाग पकड़ा तो दुसरें ने लाठी वाला भाग पकड़ा जिसमे कन्चनियाँ व लाठियारी का नाम पड़ा, दुबे की गादी होने से ये लोग दुबे कहलाने लगें। सरार के दुबे के वहां पांति का प्रचलन रहा है अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है।


सावरण गोत्र ( पाण्डेय वंश)


सावरण ऋषि के तीन पुत्र बताये जाते हैं इनके वहां भी पांति का प्रचलन रहा है जिन्हें तीन के समकक्ष माना जाता है जिनके तीन गाँव निम्न हैं| 


(१) इन्द्रपुर (२) दिलीपपुर (३) रकहट (चमरूपट्टी) 


सांकेत गोत्र (मलांव के पाण्डेय वंश)


सांकेत ऋषि के तीन पुत्र इन तीन गांवों से सम्बन्धित बाते जाते हैं|


(१) मलांव (२) नचइयाँ (३) चकसनियाँ


कश्यप गोत्र (त्रिफला के पाण्डेय वंश)


इन तीन गांवों से बताये जाते हैं।


(१) त्रिफला (२) मढ़रियाँ (३) ढडमढीयाँ 


ओझा वंश 


इन तीन गांवों से बताये जाते हैं।


(१) करइली (२) खैरी (३) निपनियां 


चौबे -चतुर्वेदी, वंश (कश्यप गोत्र)


इनके लिए तीन गांवों का उल्लेख मिलता है।


(१) वंदनडीह (२) बलूआ (३) बेलउजां 


एक गाँव कुसहाँ का उल्लेख बताते है जो शायद उपाध्याय वंश का मालूम पड़ता है।


ब्राह्मणों की वंशावली


भविष्य पुराण के अनुसार ब्राह्मणों का इतिहास है की प्राचीन काल में महर्षि कश्यप के पुत्र कण्वय की आर्यावनी नाम की देव कन्या पत्नी हुई। ब्रम्हा की आज्ञा से दोनों कुरुक्षेत्र वासनी

सरस्वती नदी के तट पर गये और कण् व चतुर्वेदमय सूक्तों में सरस्वती देवी की स्तुति करने लगे एक वर्ष बीत जाने पर वह देवी प्रसन्न हो वहां आयीं और ब्राम्हणो की समृद्धि के लिये उन्हें 

वरदान दिया। वर के प्रभाव कण्वय के आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए जिनका क्रमानुसार नाम था 👇👇


उपाध्याय,

दीक्षित,

पाठक,

शुक्ला,

मिश्रा,

अग्निहोत्री,

दुबे,

तिवारी,

पाण्डेय,

और

चतुर्वेदी।


इन लोगो का जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगो ने नत मस्तक हो सरस्वती देवी को प्रसन्न किया। बारह वर्ष की अवस्था वाले उन लोगो को भक्तवत्सला शारदा देवी ने अपनी कन्याए प्रदान की।

वे क्रमशः


उपाध्यायी,

दीक्षिता,

पाठकी,

शुक्लिका,

मिश्राणी,

अग्निहोत्रिधी,

द्विवेदिनी,

तिवेदिनी

पाण्ड्यायनी,

और

चतुर्वेदिनी कहलायीं।


फिर उन कन्याआं के भी अपने-अपने पति से सोलह-सोलह पुत्र हुए हैं वे सब गोत्रकार हुए जिनका नाम -


कष्यप,

भरद्वाज,

विश्वामित्र,

गौतम,

जमदग्रि,

वसिष्ठ,

वत्स,

गौतम,

पराशर,

गर्ग,

अत्रि,

भृगडत्र,

अंगिरा,

श्रंगी,

कात्याय,

और

याज्ञवल्क्य।


इन नामो से सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।

मुख्य 10 प्रकार ब्राम्हणों ये हैं-


🔸(1) तैलंगा,

🔸(2) महार्राष्ट्रा,

🔸(3) गुर्जर,

🔸(4) द्रविड,

🔸(5) कर्णटिका,

यह पांच "द्रविण" कहे जाते हैं, ये विन्ध्यांचल के दक्षिण में पाय जाते हैं। तथा विंध्यांचल के उत्तर मं पाये जाने वाले या वास करने वाले ब्राम्हण


🔹(1) सारस्वत,

🔹(2) कान्यकुब्ज,

🔹(3) गौड़,

🔹(4) मैथिल,

🔹(5) उत्कलये,

उत्तर के पंच गौड़ कहे जाते हैं। वैसे ब्राम्हण अनेक हैं जिनका वर्णन आगे लिखा है।

ऐसी संख्या मुख्य 115 की है। शाखा भेद अनेक हैं । इनके अलावा संकर जाति ब्राम्हण अनेक है।

यहां मिली जुली उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हणों की नामावली 115 की दे रहा हूं। जो एक से दो और 2 से 5 और 5 से 10 और 10 से 84 भेद हुए हैं,

फिर उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हण की संख्या शाखा भेद से 230 के लगभग है। तथा और भी शाखा भेद हुए हैं, जो लगभग 300 के करीब ब्राम्हण भेदों की संख्या का लेखा पाया गया है। उत्तर व दक्षिणी ब्राम्हणां के भेद इस प्रकार है 81 ब्राम्हाणां की 31 शाखा कुल 115 ब्राम्हण संख्या, मुख्य है -


(1) गौड़ ब्राम्हण,

(2)गुजरगौड़ ब्राम्हण (मारवाड,मालवा)

(3) श्री गौड़ ब्राम्हण,

(4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राम्हण,

(5) हरियाणा गौड़ ब्राम्हण,

(6) वशिष्ठ गौड़ ब्राम्हण,

(7) शोरथ गौड ब्राम्हण,

(8) दालभ्य गौड़ ब्राम्हण,

(9) सुखसेन गौड़ ब्राम्हण,

(10) भटनागर गौड़ ब्राम्हण,

(11) सूरजध्वज गौड ब्राम्हण(षोभर),

(12) मथुरा के चौबे ब्राम्हण,

(13) वाल्मीकि ब्राम्हण,

(14) रायकवाल ब्राम्हण,

(15) गोमित्र ब्राम्हण,

(16) दायमा ब्राम्हण,

(17) सारस्वत ब्राम्हण,

(18) मैथल ब्राम्हण,

(19) कान्यकुब्ज ब्राम्हण,

(20) उत्कल ब्राम्हण,

(21) सरवरिया ब्राम्हण,

(22) पराशर ब्राम्हण,

(23) सनोडिया या सनाड्य,

(24)मित्र गौड़ ब्राम्हण,

(25) कपिल ब्राम्हण,

(26) तलाजिये ब्राम्हण,

(27) खेटुवे ब्राम्हण,

(28) नारदी ब्राम्हण,

(29) चन्द्रसर ब्राम्हण,

(30)वलादरे ब्राम्हण,

(31) गयावाल ब्राम्हण,

(32) ओडये ब्राम्हण,

(33) आभीर ब्राम्हण,

(34) पल्लीवास ब्राम्हण,

(35) लेटवास ब्राम्हण,

(36) सोमपुरा ब्राम्हण,

(37) काबोद सिद्धि ब्राम्हण,

(38) नदोर्या ब्राम्हण,

(39) भारती ब्राम्हण,

(40) पुश्करर्णी ब्राम्हण,

(41) गरुड़ गलिया ब्राम्हण,

(42) भार्गव ब्राम्हण,

(43) नार्मदीय ब्राम्हण,

(44) नन्दवाण ब्राम्हण,

(45) मैत्रयणी ब्राम्हण,

(46) अभिल्ल ब्राम्हण,

(47) मध्यान्दिनीय ब्राम्हण,

(48) टोलक ब्राम्हण,

(49) श्रीमाली ब्राम्हण,

(50) पोरवाल बनिये ब्राम्हण,

(51) श्रीमाली वैष्य ब्राम्हण 

(52) तांगड़ ब्राम्हण,

(53) सिंध ब्राम्हण,

(54) त्रिवेदी म्होड ब्राम्हण,

(55) इग्यर्शण ब्राम्हण,

(56) धनोजा म्होड ब्राम्हण,

(57) गौभुज ब्राम्हण,

(58) अट्टालजर ब्राम्हण,

(59) मधुकर ब्राम्हण,

(60) मंडलपुरवासी ब्राम्हण,

(61) खड़ायते ब्राम्हण,

(62) बाजरखेड़ा वाल ब्राम्हण,

(63) भीतरखेड़ा वाल ब्राम्हण,

(64) लाढवनिये ब्राम्हण,

(65) झारोला ब्राम्हण,

(66) अंतरदेवी ब्राम्हण,

(67) गालव ब्राम्हण,

(68) गिरनारे ब्राम्हण


#ब्राह्मण_गौत्र_और_गौत्र_कारक_115_ऋषि 🚩


(1). अत्रि, (2). भृगु, (3). आंगिरस, (4). मुद्गल, (5). पातंजलि, (6). कौशिक,(7). मरीच, (8). च्यवन, (9). पुलह, (10). आष्टिषेण, (11). उत्पत्ति शाखा, (12). गौतम गोत्र,(13). वशिष्ठ और संतान (13.1). पर वशिष्ठ, (13.2). अपर वशिष्ठ, (13.3). उत्तर वशिष्ठ, (13.4). पूर्व वशिष्ठ, (13.5). दिवा वशिष्ठ, (14). वात्स्यायन,(15). बुधायन, (16). माध्यन्दिनी, (17). अज, (18). वामदेव, (19). शांकृत्य, (20). आप्लवान, (21). सौकालीन, (22). सोपायन, (23). गर्ग, (24). सोपर्णि, (25). शाखा, (26). मैत्रेय, (27). पराशर, (28). अंगिरा, (29). क्रतु, (30. अधमर्षण, (31). बुधायन, (32). आष्टायन कौशिक, (33). अग्निवेष भारद्वाज, (34). कौण्डिन्य, (34). मित्रवरुण,(36). कपिल, (37). शक्ति, (38). पौलस्त्य, (39). दक्ष, (40). सांख्यायन कौशिक, (41). जमदग्नि, (42). कृष्णात्रेय, (43). भार्गव, (44). हारीत, (45). धनञ्जय, (46). पाराशर, (47). आत्रेय, (48). पुलस्त्य, (49). भारद्वाज, (50). कुत्स, (51). शांडिल्य, (52). भरद्वाज, (53). कौत्स, (54). कर्दम, (55). पाणिनि गोत्र, (56). वत्स, (57). विश्वामित्र, (58). अगस्त्य, (59). कुश, (60). जमदग्नि कौशिक, (61). कुशिक, (62). देवराज गोत्र, (63). धृत कौशिक गोत्र, (64). किंडव गोत्र, (65). कर्ण, (66). जातुकर्ण, (67). काश्यप, (68). गोभिल, (69). कश्यप, (70). सुनक, (71). शाखाएं, (72). कल्पिष, (73). मनु, (74). माण्डब्य, (75). अम्बरीष, (76). उपलभ्य, (77). व्याघ्रपाद, (78). जावाल, (79). धौम्य, (80). यागवल्क्य, (81). और्व, (82). दृढ़, (83). उद्वाह, (84). रोहित, (85). सुपर्ण, (86). गालिब, (87). वशिष्ठ, (88). मार्कण्डेय, (89). अनावृक, (90). आपस्तम्ब, (91). उत्पत्ति शाखा, (92). यास्क, (93). वीतहब्य, (94). वासुकि, (95). दालभ्य, (96). आयास्य, (97). लौंगाक्षि, (98). चित्र, (99). विष्णु, (100). शौनक, (101).पंचशाखा, (102).सावर्णि, (103).कात्यायन, (104).कंचन, (105).अलम्पायन, (106).अव्यय, (107).विल्च, (108). शांकल्य, (109). उद्दालक, (110). जैमिनी, (111). उपमन्यु, (112). उतथ्य, (113). आसुरि, (114). अनूप और (110). आश्वलायन।


कुल संख्या 108 ही हैं, लेकिन इनकी छोटी-छोटी 7 शाखा और हुई हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर इनकी पूरी सँख्या 115 है।


💥 #ब्राह्मण_कुल_परम्परा_के_11_कारक 🚩


🔸(1) गोत्र 👉 व्यक्ति की वंश-परम्परा जहाँ और से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। इन गोत्रों के मूल ऋषि :– विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप। इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भरद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है। 


🔸(2) प्रवर 👉 अपनी कुल परम्परा के पूर्वजों एवं महान ऋषियों को प्रवर कहते हैं। अपने कर्मो द्वारा ऋषिकुल में प्राप्‍त की गई श्रेष्‍ठता के अनुसार उन गोत्र प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद होने वाले व्यक्ति, जो महान हो गए, वे उस गोत्र के प्रवर कहलाते हें। इसका अर्थ है कि कुल परम्परा में गोत्रप्रवर्त्तक मूल ऋषि के अनन्तर अन्य ऋषि भी विशेष महान हुए थे।


(🔸3) वेद 👉 वेदों का साक्षात्कार ऋषियों ने लाभ किया है। इनको सुनकर कंठस्थ किया जाता है। इन वेदों के उपदेशक गोत्रकार ऋषियों के जिस भाग का अध्ययन, अध्यापन, प्रचार प्रसार, आदि किया, उसकी रक्षा का भार उसकी संतान पर पड़ता गया, इससे उनके पूर्व पुरूष जिस वेद ज्ञाता थे, तदनुसार वेदाभ्‍यासी कहलाते हैं। प्रत्येक का अपना एक विशिष्ट वेद होता है, जिसे वह अध्ययन-अध्यापन करता है। इस परम्परा के अन्तर्गत जातक, चतुर्वेदी, त्रिवेदी, द्विवेदी आदि कहलाते हैं। 


🔸(4) उपवेद 👉 प्रत्येक वेद से सम्बद्ध विशिष्ट उपवेद का भी ज्ञान होना चाहिये। 


🔸(5) शाखा 👉 वेदों के विस्तार के साथ ऋषियों ने प्रत्येक एक गोत्र के लिए एक वेद के अध्ययन की परंपरा डाली है। कालान्तर में जब एक व्यक्ति उसके गोत्र के लिए निर्धारित वेद पढने में असमर्थ हो जाता था, तो ऋषियों ने वैदिक परम्परा को जीवित रखने के लिए शाखाओं का निर्माण किया। इस प्रकार से प्रत्येक गोत्र के लिए अपने वेद की उस शाखा का पूर्ण अध्ययन करना आवश्यक कर दिया। इस प्रकार से उन्‍होंने जिसका अध्‍ययन किया, वह उस वेद की शाखा के नाम से पहचाना गया।


🔸6) सूत्र 👉 प्रत्येक वेद के अपने 2 प्रकार के सूत्र हैं। श्रौत सूत्र और ग्राह्य सूत्र यथा शुक्ल यजुर्वेद का कात्यायन श्रौत सूत्र और पारस्कर ग्राह्य सूत्र है।


🔸(7) छन्द 👉 उक्तानुसार ही प्रत्येक ब्राह्मण को अपने परम्परा सम्मत छन्द का भी ज्ञान होना चाहिए।


🔸(8) शिखा 👉 अपनी कुल परम्परा के अनुरूप शिखा-चुटिया को दक्षिणावर्त अथवा वामावार्त्त रूप से बाँधने की परम्परा शिखा कहलाती है।


🔸(9) पाद 👉 अपने-अपने गोत्रानुसार लोग अपना पाद प्रक्षालन करते हैं। ये भी अपनी एक पहचान बनाने के लिए ही, बनाया गया एक नियम है। अपने-अपने गोत्र के अनुसार ब्राह्मण लोग पहले अपना बायाँ पैर धोते, तो किसी गोत्र के लोग पहले अपना दायाँ पैर धोते, इसे ही पाद कहते हैं।


🔸(10) देवता 👉 प्रत्येक वेद या शाखा का पठन, पाठन करने वाले किसी विशेष देव की आराधना करते हैं, वही उनका कुल देवता यथा भगवान् विष्णु, भगवान् शिव, माँ दुर्गा, भगवान् सूर्य इत्यादि देवों में से कोई एक आराध्‍य देव हैं। 


🔸(11) द्वार 👉 यज्ञ मण्डप में अध्वर्यु (यज्ञकर्त्ता) जिस दिशा अथवा द्वार से प्रवेश करता है अथवा जिस दिशा में बैठता है, वही उस गोत्र वालों की द्वार या दिशा कही जाती है।


सभी ब्राह्मण बंधुओ को मेरा नमस्कार बहुत दुर्लभ जानकारी है जरूर पढ़े। और समाज में सेयर करे हम क्या है इस तरह ब्राह्मणों की उत्पत्ति और इतिहास के साथ इनका विस्तार अलग अलग राज्यो में हुआ और ये उस राज्य के ब्राह्मण कहलाये।

ब्राह्मण बिना धरती की कल्पना ही नहीं की जा सकती इसलिए ब्राह्मण होने पर गर्व करो और अपने कर्म और धर्म का पालन कर सनातन संस्कृति की रक्षा करें।


गोत्र क्या है..? जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ?

आज से लगभग ढाई वर्ष पूर्व किसी Facebook User ने हमसे प्रश्न किया था की यदि माता-पिता में से पिता विधर्मी (अलग धर्म से) हो तो संतानों का गोत्र क्या होगा ?


इस प्रश्न ने मुझे बहुत प्रभावित किया था और मैंने इसका विस्तृत व्याख्यात्मक उत्तर दिया था । वो तो अब मुझसे संपर्क में हैं नहीं किन्तु उसका प्रश्न वर्तमान परिप्रेक्ष्य में परम् प्रासंगिक हैं ।


मुझे घोर आश्चर्य तब होता हैं जब सनातन धर्मानुयायियों को इतने गम्भीर तकनीकी प्रश्न पर निरुत्तर पाता हूँ । 

गोत्र मानवमात्र का होता हैं ; चाहे उसकी मान्यता गोत्रों में हो या चाहे न हो , चाहे वो सनातन धर्मानुयायी हो या न हो । आज इस लेख के माध्यम से मैं “गोत्र” इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयत्न करेंगे! 


#सुविधा एवम् सरलता की दृष्टि से पोस्ट को मैंने दो भागों में बांटा है :-


🔸1) गोत्र होते क्या हैं ?

🔸2) जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ? 


🔘1. गोत्र क्या हैं ?

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गोत्र मोटे तौर पर उन लोगों के समूह को कहते हैं जिनका वंश एक मूल पुरुष पूर्वज से अटूट क्रम में जुड़ा है । गोत्र जिसका अर्थ वंश भी है , यह एक ऋषि के माध्यम से शुरू होता है और हमें हमारे पूर्वजों की याद दिलाता है और हमें हमारे कर्तव्यों के बारे में बताता है । व्याकरण के प्रयोजनों के लिये पाणिनि में गोत्र की परिभाषा है 'अपात्यम पौत्रप्रभ्रति गोत्रम्' (४.१.१६२), अर्थात 'गोत्र शब्द का अर्थ है बेटे के बेटे के साथ शुरू होने वाली (एक ऋषि की) संतान् । गोत्र, कुल या वंश की संज्ञा है जो उसके किसी मूल पुरुष के अनुसार होती है ।


महाभारत के शान्तिपर्व (296-17, 18) में वर्णन है कि मूल चार गोत्र थे ; अंगिरा , कश्यप , वशिष्ठ और भृगु । बाद में आठ हो गए जब जमदन्गि, अत्रि, विश्वामित्र तथा अगस्त्य के नाम जुड़ गए । एक अन्य मान्यता है कि प्रारंभ में सात गोत्र थे कालांतर में दूसरे ऋषियों के सानिध्य के कारण अन्य गोत्र अस्तित्व में आये ।


#मेरे_विचार :- एक मान्यता के अनुसार सात पीढ़ी बाद सगापन खत्म हो जाता है अर्थात सात पीढ़ी बाद गोत्र का मान बदल जाता है और आठवी पीढ़ी के पुरुष के नाम से नया गोत्र आरम्भ होता है (हम इस मान्यता के प्रबल समर्थक हैं) । हम गोत्र को Scientific व्यवस्था मानते हैं एवम् जीवन के (और जीवन के बाद भी) प्रत्येक क्षेत्र में “गोत्रों” का व्यापक महत्त्व स्वीकार करते हैं ।


व्यावहारिक रूप में "गोत्र" से आशय पहचान से है , जो ब्राह्मणों के लिए उनके ऋषिकुल से होती है ।


🔘2. जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ?

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प्रत्येक मानव का गोत्र होता हैं , गोत्र एक Scientific व्यवस्था हैं । हिन्दू , मुस्लिम , ईसाई , अधर्मी , विधर्मी इन सबके गोत्र होते हैं – चाहे माने या न माने । कल्पना कीजिए एक बच्चा जिसे अपने माता-पिता के विषय में कुछ नहीं मालूम , उसका क्या होगा ?

उसे “कश्यप गोत्रीय” अर्थात “कश्यप गोत्र” का माना जाएगा ।

इसकी शास्त्रोक्त व्यवस्था देखिए :-


“गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने काश्यपं गोत्रमुच्यते।

यस्मादाह श्रुतिस्सर्वाः प्रजाः कश्यपसंभवाः।।“ (हेमाद्रि चन्द्रिका)


जिसका गोत्र अज्ञात हो उसे “कश्यप गोत्रीय" (कश्यप गोत्र का) माना जाएगा और यह एक शास्त्र सम्मत व्यवस्था है अर्थात् पूर्णतः निर्दोष व्यवस्था है।

सनातन संस्कृति विज्ञान