स्त्रियों का वाद–विवाद: आधुनिक समय में मन, मौन और मानसिक संघर्ष"
आधुनिक युग की स्त्री बोलती है, पर हर बार सुनी नहीं जाती।
वह तर्क करती है, पर उसे भावुक कह दिया जाता है।
वह असहमति जताती है, पर उसे झगड़ालू मान लिया जाता है।
स्त्री का वाद–विवाद आज केवल सामाजिक प्रश्न नहीं रह गया है,
यह उसके मन, आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा गहरा विषय बन चुका है।
1. “धीरे बोलो” की सीख और मन पर उसका बोझ
आज की शिक्षित और कामकाजी स्त्री को बार-बार यह सिखाया जाता है....
शांत रहोगी तो समझदार कहलाओगी
ज़्यादा बोलोगी तो कठिन समझी जाओगी
तर्क करोगी तो रिश्ते बिगड़ेंगे
ये बातें धीरे-धीरे उसके मन में यह विचार बैठा देती हैं कि
उसकी आवाज़ ही समस्या है।
आधुनिक उदाहरण:
कार्यालय की बैठक में जब कोई महिला किसी योजना पर प्रश्न उठाती है, तो कहा जाता है....
“इस विषय को इतना व्यक्तिगत मत बनाइए।”
पर वही प्रश्न कोई पुरुष रखे तो उसे सूझबूझ कहा जाता है।
यह अनुभव स्त्री के मन में एक चुपचाप चलने वाला संघर्ष पैदा करता है क्या मेरी सोच कमज़ोर है, या मुझे कम आँका जा रहा है?
2. घर के भीतर का वाद–विवाद और सिखाई गई चुप्पी
आज के घरों में स्त्री बोल सकती है,
पर हर विषय पर नहीं।
वह रसोई पर सुझाव दे सकती है
पर जीवन के निर्णयों पर नहीं
वह बच्चों पर राय दे सकती है
पर अपने सपनों पर नहीं
बार-बार उसकी बात टाल दी जाती है, और कहा जाता है...
“घर की शांति के लिए चुप रहना बेहतर है।”
यह चुप्पी बाहर से शांति लगती है,
पर भीतर यह भावनात्मक थकान बन जाती है।
धीरे-धीरे स्त्री बोलना नहीं छोड़ती,
वह बोलने की इच्छा खोने लगती है।
3. सामाजिक माध्यम और नई तरह का मानसिक दबाव
आज स्त्रियों के पास अपनी बात रखने के मंच हैं,
पर साथ ही अपमान और आक्रमण भी।
उदाहरण:
जब कोई स्त्री घरेलू हिंसा, माहवारी, मातृत्व का दबाव या कार्यस्थल की असमानता पर लिखती है, तो उसे कहा जाता है....
दिखावा कर रही है
परिवार बदनाम कर रही है
समस्या है तो सहन क्यों नहीं करती
यह विवाद विचारों पर नहीं,
उसके चरित्र पर किया जाता है।
लगातार ऐसी प्रतिक्रियाएँ स्त्री के मन में भय, घबराहट और आत्मग्लानि पैदा करती हैं।
अंततः वह फिर चुप हो जाती है।
4. रिश्तों में तर्क और अनुभव का否करण
आधुनिक रिश्तों में एक सूक्ष्म मानसिक हिंसा दिखाई देती है।
उदाहरण:
स्त्री कहती है....
“तुम मेरी बात बिना सुने टाल देते हो।”
उत्तर मिलता है....
“तुम हर बात को बढ़ा देती हो।”
“तुम्हारी सोच ही गलत है।”
यह तर्क नहीं,
बल्कि स्त्री के अनुभव को झुठलाना है।
धीरे-धीरे वह अपने ही मन पर शक करने लगती है शायद मैं ही गलत हूँ।
5. स्त्री का सबसे कठिन वाद–विवाद: स्वयं से
सबसे गहरा संघर्ष बाहर नहीं,
स्त्री के भीतर चलता है
बोलूँ तो रिश्ते टूटेंगे
चुप रहूँ तो खुद टूट जाऊँगी
सही हूँ, फिर भी अपराधबोध क्यों है?
यह आंतरिक वाद–विवाद उसे मानसिक रूप से थका देता है।
कई स्त्रियाँ मुस्कुराती रहती हैं,
पर भीतर से खाली होती जाती हैं।
6. मानसिक स्वास्थ्य और दबाई गई आवाज़
आज स्त्रियों में बढ़ती मानसिक समस्याओं का एक बड़ा कारण यह भी है कि
उनकी भावनाओं को महत्व नहीं दिया जाता
उनके अनुभवों को नकार दिया जाता है
उनकी असहमति को अपराध बना दिया जाता है
अभिव्यक्त न की गई भावनाएँ समाप्त नहीं होतीं,
वे मन पर बोझ बनकर रह जाती हैं।
7. वाद–विवाद नहीं, स्वीकार्यता चाहिए
स्त्री को झगड़ने का शौक नहीं है।
वह केवल यह चाहती है कि
उसकी बात सुनी जाए
उसके अनुभव को सच माना जाए
उसकी असहमति को अपमान न समझा जाए
स्त्री का वाद–विवाद दरअसल यह कहना है.... “मैं भी सोचती हूँ, महसूस करती हूँ, और मेरी अनुभूति भी वास्तविक है।”
जिस दिन समाज स्त्री की आवाज़ से डरना छोड़ देगा,
शायद उस दिन स्त्री खुद से लड़ना बंद कर सकेगी।
स्त्री की चाहत क्या है।
एक विद्वान को फांसी लगने वाली थी।
राजा ने कहा, आपकी जान बख्श दुंगा यदि सही उत्तर बता देगा तो
*प्रशन : आखिर स्त्री चाहती क्या है ??*
विद्वान ने कहा, मोहलत मिले तो पता कर के बता सकता हूँ।
राजा ने एक साल की मोहलत दे दी और साथ में बताया कि अगर उतर नही मिला तो फांसी पर चढा दिये जाओगे,
विद्वान बहुत घूमा बहुत लोगों से मिला पर कहीं से भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला।
आखिर में किसी ने कहा दूर एक जंगल में एक भूतनी रहती है वही बता सकती है।
भूतनी ने कहा कि मै इस शर्त पर बताउंगी यदि तुम मुझसे शादी करो।
उसने सोचा, जान बचाने के लिए शादी की सहमति देदी।
शादी होने के बाद भूतनी ने कहा, चूंकि तुमने मेरी बात मान ली है, तो मैंने तुम्हें खुश करने के लिए फैसला किया है कि 12 घन्टे मै भूतनी और 12 घन्टे खूबसूरत परी बनके रहूंगी,
अब तुम ये बताओ कि दिन में भूतनी रहूँ या रात को?
उसने सोचा यदि वह दिन में भूतनी हुई तो दिन नहीं कटेगा, रात में हुई तो रात नहीं कटेगी।
अंत में उस विद्वान कैदी ने कहा, जब तुम्हारा दिल करे परी बन जाना, जब दिल करे भूतनी बनना।
ये बात सुनकर भूतनी ने प्रसन्न हो के कहा, चूंकि तुमने मुझे अपनी मर्ज़ी की करने की छूट देदी है, तो मै हमेशा ही परी बन के रहा करूँगी।
यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है।
*स्त्री अपनी मर्जी का करना चाहती है।
*यदि स्त्री को अपनी मर्ज़ी का करने देंगे तो ,
*वो परी बनी रहेगी वरना भूतनी
😃😃☹☹
फैसला आप का ,
ख़ुशी आपकी
सभी विवाहित पुरुषों को समर्पित। 😉😀😃