Tuesday, January 27, 2026

कहीं आप उलझ तो नहीं रहे…

 कहीं आप उलझ तो नहीं रहे…


अक्सर हम यह महसूस ही नहीं कर पाते कि हमारी ज़्यादातर ऊर्जा बड़ी समस्याओं में नहीं, बल्कि छोटी-छोटी बातों और घटनाओं में उलझकर ख़त्म हो जाती है। कोई हल्की-सी बात, किसी का एक वाक्य, बीती हुई कोई घटना, या भविष्य की बेवजह चिंता और हमारा मन उसी में अटक जाता है। धीरे-धीरे यही उलझन सकारात्मक ऊर्जा को कम और नकारात्मकता को बढ़ाने लगती है।


"छोटी बात, बड़ा असर"


मान लीजिए सुबह घर से निकलते समय किसी ने आपसे हल्की-सी कड़वी बात कह दी। बात छोटी थी, लेकिन आप पूरे रास्ते वही सोचते रहे।


ऑफिस पहुँचे तो मन काम में नहीं लगा


किसी और ने कुछ पूछा तो चिड़चिड़ाहट दिखी


शाम तक थकान ज़्यादा और संतुष्टि कम


असल में समस्या उस एक वाक्य की नहीं थी, समस्या थी उसी में उलझे रहना।


"मन की उलझन कैसे नकारात्मकता बनती है"


जब हम बार-बार किसी छोटी घटना को मन में दोहराते हैं, तो:


हमारा ध्यान वर्तमान से हट जाता है


मन शिकायत और तुलना में फँस जाता है


हम वो चीज़ें देख ही नहीं पाते जो सही चल रही होती हैं


जैसे...... 

“उसने ऐसा क्यों कहा?”

“मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?”

“मैंने तब ऐसा क्यों नहीं कहा?”


ये सवाल जवाब नहीं, ऊर्जा चूसने वाले जाल बन जाते हैं।


सकारात्मक ऊर्जा कहाँ से आती है


सकारात्मक ऊर्जा किसी जादू से नहीं आती। वो आती है:


स्वीकार करने से


छोड़ देने से


वर्तमान में रहने से


उदाहरण के लिए, बारिश में भीग गए


एक इंसान गुस्सा करेगा: “दिन ही खराब हो गया”


दूसरा मुस्कुराएगा: “चलो, आज कुछ अलग हुआ”


घटना एक ही थी, दृष्टिकोण अलग।


उलझने की आदत कैसे पहचानें


आप शायद छोटी बातों में उलझ रहे हैं अगर:


आप पुरानी बातों को बार-बार याद करते हैं


दूसरों की कही बात मन से नहीं उतरती


छोटी बात पर मन भारी हो जाता है


खुश रहने की वजह होते हुए भी खुशी नहीं मिलती


बाहर निकलने का रास्ता


1. हर बात पर प्रतिक्रिया ज़रूरी नहीं

कुछ बातें जवाब नहीं, खामोशी माँगती हैं।


2. जो बदला नहीं जा सकता, उसे छोड़ना सीखें

बीता हुआ समय वापस नहीं आता, लेकिन वो मन ज़रूर खराब कर सकता है अगर आप उसे पकड़े रखें।


3. खुद से सवाल पूछें

“क्या यह बात एक साल बाद मायने रखेगी?”

ज़्यादातर जवाब होता है...नहीं।


4. ध्यान को वर्तमान में लाएँ

एक गहरी साँस, आसपास देखें, अभी के पल को महसूस करें।


ज़िंदगी की मुश्किलें कम नहीं होतीं, लेकिन हमारी उलझनें उन्हें और भारी बना देती हैं।

हर छोटी बात को दिल पर लेना, खुद के साथ अन्याय है।

सकारात्मक ऊर्जा बचानी है तो सीखिए

ज़रूरत से ज़्यादा उलझना छोड़ना।


कहीं आप भी तो नहीं उलझ रहे…?

अगर हाँ, तो आज ही एक छोटी बात छोड़कर देखिए मन हल्का लगेगा। 


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