जब तुम किसी से इश्क़ करते हो,
तो तुम्हारा मन उसके इर्द-गिर्द घूमने लगता है।
अपेक्षाएँ जन्म लेती हैं, डर पैदा होता है—खो देने का डर, पा लेने की लालसा। और जहाँ लालसा है,
वहाँ पूर्ण सुकून कैसे हो सकता है?
#ओशो कहते हैं
कि प्रेम सबसे बड़ा जोखिम है। जिस दिन तुम प्रेम में पड़ते हो, उसी दिन तुम्हारा सुरक्षित संसार टूटने लगता है। अब तुम्हारा सुख-दुःख किसी और से जुड़ जाता है। तुम प्रतीक्षा करते हो, उम्मीद करते हो, डरते हो। और जहाँ डर है, वहाँ सुकून कैसे होगा?
"प्रेम की गली इतनी संकरी है"
कि वहाँ अहंकार और प्रेम दोनों साथ नहीं रह सकते। जब प्रेम आता है, तो तुम्हारा अहंकार घायल होता है। और अहंकार का घायल होना हमेशा अशांति पैदा करता है।
#मीरा को #कृष्ण से प्रेम था।
अगर वे केवल सुकून चाहतीं,
तो राजमहल में आराम से जीवन बिता सकती थीं।
लेकिन प्रेम ने उन्हें महलों से बाहर निकाल दिया।
समाज ने विरोध किया, परिवार ने तिरस्कार किया। प्रेम ने उन्हें चैन से बैठने नहीं दिया।
फिर भी मीरा दुखी नहीं थीं,
क्योंकि प्रेम का आनंद उनके लिए हर कष्ट से बड़ा था।
यही प्रेम का विरोधाभास है— बाहर तूफ़ान, भीतर उत्सव।
लोग #मजनूँ को पागल कहते थे।
वह रेगिस्तान में भटकता था,
लैला की याद में रोता था।
यदि सुकून ही जीवन का लक्ष्य होता,
तो मजनूँ सबसे बड़ा मूर्ख था।
लेकिन प्रेम ने उसे एक ऐसी गहराई दी,
जो साधारण लोगों को कभी नहीं मिलती।
#ओशो कहते हैं
कि प्रेमी अक्सर पागल दिखाई देते हैं, क्योंकि वे गणित नहीं देखते, केवल हृदय की सुनते हैं।
#सूफ़ी कहते हैं
कि जब तक प्रेम किसी व्यक्ति से है,
तब तक बेचैनी रहेगी। क्योंकि व्यक्ति बदल
सकता है, दूर जा सकता है, मर सकता है।
लेकिन जब प्रेम परमात्मा से हो जाता है,
तब पहली बार सुकून जन्म लेता है।
फ़रीद, रूमी, बुल्ले शाह—इन सबने प्रेम किया,
पर उनका प्रेम किसी एक इंसान तक सीमित नहीं था। वह प्रेम पूरे अस्तित्व के लिए था। इसलिए उनके प्रेम में जलन नहीं थी, अधिकार नहीं था, अपेक्षा नहीं थी।
ओशो कहते हैं:
"यदि तुम केवल सुकून चाहते हो, तो प्रेम मत करना। और यदि प्रेम करना चाहते हो, तो बेचैनी को भी स्वीकार करना होगा।"
लेकिन यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती।
जब प्रेम इतना गहरा हो जाता है
कि उसमें चाहत नहीं बचती, केवल समर्पण बचता है—तब वही प्रेम ध्यान बन जाता है।
और तब पहली बार प्रेम और सुकून एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहते।
तब प्रेम नदी की तरह बहता है
और भीतर हिमालय जैसा मौन होता है।
"संसार का इश्क़ बेचैन करता है,
परमात्मा का इश्क़ शांत कर देता है।
इसलिए प्रेम और सुकून साथ-साथ तभी मिलते हैं,
जब प्रेम किसी व्यक्ति से नहीं, अस्तित्व से हो।"
जानती हो, प्रेम को पानी की तरह होना था। हर उस जगह को भर देने के लिए जो रिक्त है। आसमान की रिक्तता कभी सुंदर नहीं लगी, न ही कभी सुंदर लगा तुम्हारा उदास चेहरा ! बादलों से भरा आसमान, चाँद को गोद में लिए आसमान, माँ की गोद में मुस्कुराता बच्चा और तुम्हारे चेहरे की हँसी; ये वही पानी की बूँदें हैं जिनसे हर रिक्त जगह को भरना है और भरना है उन तमाम जगहों को जो रिक्त हैं-मेरी और तुम्हारी अनुपस्थिति के कारण।
अगर स्वीकार करूँ तो मुझे ऐसे क्षणों में सिर्फ और सिर्फ़ तुम्हारी याद आती है। तुम्हारी याद उस गोद की तरह है जहाँ मैं दुनिया - जहान की परेशानियों के बावजूद भी सुकून से सो सकता हूँ। इन शहरों के शोर में मेरा एकांत हो तुम, जहाँ वक़्त बेवक़्त कभी भी लौटा जा सकता है, भागती दुनिया से इतर वहाँ ठहरा जा सकता है।
कितनी ही बार तुम्हारे होने भर ने मुझे मेरे होने का एहसास दिलाया है। तुम्हारे हाथों को छूने भर से किसी युद्ध को जीत लेने जितना आत्मविश्वास महसूस हुआ है। युद्ध से याद आया। हम तुम युद्ध ही तो लड़ रहे हैं, उस समाज से और उनके बनाए नियमों से जहाँ हमारे प्रेम को एक अदद सरकारी नौकरी से मापा जाता है। जबकि हम ऐसे भी खुश रह सकते हैं। खुशी का पैमाना सबके लिए अलग-अलग है, जैसे कि मेरे लिए तुम्हारा होना।
जानती हो कि रात इतनी शांत क्यों होती है ? इसलिए क्योंकि यह अच्छी तरह समझती है कि सुनना कितना जरूरी है। उन सभी लोगों की बातें, चीखें, रुदन और दिल की धड़कन जिन्हें दिन के शोर में नहीं सुना जा सकता है। दिन अमीरों की नुमाइश का रंगमंच है जबकि रात गरीबों और बेबस के लिए एक नंगा सा पर्दा।