देह को इस दृश्यमान जगत से लगन लगी है, परंतु जिस परम ज्योति से यह देह स्पंदित होती है, जिस प्राण-ऊर्जा से इसमें जीवन का संचार होता है, उसकी लौ तो सीधे परमानंद से जुड़ी है। यह एक ऐसा भीतर का आकर्षण है, एक ऐसी
स्वतः स्फूर्त आंतरिक क्रिया है जो अपने साथ एक निश्चित, दिव्य ऊर्जा का प्रवाह नित्य बहाती रहती है। इसके विपरीत, बाहरी ऊर्जा का सबसे अधिक क्षय हमारी सांसारिक और मानसिक क्रियाओं में होता है। जब
दो विरोधी तत्वों के बीच निरंतर खिंचाव, तुलना, सम्मोहन, तर्क और द्वंद्व चलता रहता है, तो वह द्वंद्व वास्तव में एक आंतरिक मंथन बन जाता है। इस मंथन से जो अमृत स्वरूप अनुभव प्राप्त होते हैं, वे अमूल्य हैं। वे पल
भर में अज्ञान के समस्त आवरणों को ध्वस्त कर चित्त को अनेकों भ्रमों से मुक्त कर देते हैं। परंतु, यह एक बिल्कुल भिन्न और गहरा विषय है, पहले हम मूल बात पर आते हैं।
यह देह जगत के साथ संबंध और यारी निभाना पसंद करती है, परंतु जिस मूल तत्व से इस देह का प्राकट्य हुआ है, उसे केवल उस परमानंद की यारी ही सुहाती है। मनुष्य की देह नित्य ऐसे ही कार्यों में उलझी रहती है जिससे वह संसार के बंधनों में और कसती चली जाए। उसकी रुचि, उसकी अनुभूतियाँ केवल देह और संसार से संबंधित भौतिक क्रियाओं तक ही सीमित रह जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, जीव नित्य नए बंधनों की तलाश में भटक रहा है; वह उन्हीं विषयों, भोगों और इंद्रिय-सुखों की इच्छा करता है जो वास्तव में उसे बांधने का कार्य कर रहे हैं। परिणाम यह होता है कि देह पूरी तरह जगत के अधीन हो जाती है और चित्त बिना सोचे-समझे, बिना विवेक का उपयोग किए केवल सांसारिक विषयों का भोग, चिंतन और भाव ग्रहण करने लगता है। मनुष्य अनजाने में ही देह और चित्त को वासनाओं और भोगों की जंजीरों से जकड़ता चला जाता है।
साधना और ध्यान का मूल कार्य इन्हीं अनेक आवरणों को नष्ट करना है। वे उस अदृश्य ग्रंथि (गांठ) को खोलने का कार्य करते हैं, जिसने व्यक्ति के चित्त को सम्मोहन, भय, काम, क्रोध और लोभ के जाल में इस प्रकार फंसा रखा है कि चेतना उस उच्च ऊर्जा का अनुभव ही नहीं कर पाती जो भीतर नित्य स्पंदित हो रही है। इस संसार ने अपने चारों ओर अनेकों आवरण ओढ़ रखे हैं और खुद को एक ऐसे केंद्र में स्थापित कर रखा है जहाँ सभी जीव उत्पन्न होते हैं, चरते-विचरते हैं—अर्थात जन्म लेते हैं, युवा होते हैं, वृद्ध होते हैं—और अंत में इसी देह को छोड़कर वापस उसी मूल ऊर्जा में लीन हो जाते हैं। इसे यदि सीधे शब्दों में कहा जाए, तो यह संसार एक महा-गर्भ की भाँति है, जिसमें सभी देहधारी जीव उसी परम ऊर्जा से उत्पन्न होते हैं, उसी की संवेदनाओं, भावों और विचारों के सहारे अपनी सांसारिक यात्रा पूरी करते हैं और अंततः देह जगत का भोगी मात्र बनकर रह जाता है।
देह इस भौतिक जगत का भोगी है—अर्थात प्रकृति जो कुछ भी प्रकट कर रही है, चाहे वे व्यक्ति हों, वस्तुएं हों, या स्त्री-पुरुष के संबंध हों, देह उन्हीं में रमती है।
और चित्त? चित्त इन सभी के पीछे छिपे 'विषयों' का भोगी है। वह इन्हीं दृश्य वस्तुओं, साधनों, संसाधनों और इंद्रिय-भोग के विषयों की कामना करता है। विडंबना देखिए, जब ये साधन प्राप्त हो जाते हैं, तो मन में गहरा मोह उत्पन्न कर देते हैं, और जब प्राप्त नहीं होते, तो उनकी कल्पनाएं और
उनसे उपजा दुख चेतना पर हावी हो जाता है। अर्थात, मनुष्य दोनों ही अवस्थाओं में निरंतर एक युद्ध लड़ रहा है। इस परम सत्य को जान लेना कि यह पूरी वास्तविकता भी मन का ही बुना हुआ एक जाल है, यही महाज्ञान है, यही महाविद्या है।
अनुभव जब बहुत गहरा और तीव्र होता है, तो उसे शब्दों की सीमाओं में बांधना सचमुच असंभव सा हो जाता है। जब चेतना की गति तीव्र होती है, तो वाणी केवल उसका अनुगमन करने का प्रयास भर कर सकती है। जो इस अवस्था से गुजरते हैं, वे भली-भांति जानते हैं कि हर आंतरिक अनुभूति को शब्द दे पाना इस मानव देह और बुद्धि के वश में नहीं है।
No comments:
Post a Comment