पदार्थ, पशु, मनुष्य और बुद्ध--चेतना के विकास क्रम
पदार्थ को अपने होने का कोई बोध नहीं होता।
तुमने कभी रास्ते के किनारे पड़े पत्थर को देखा? वह है — निश्चित ही है — लेकिन उसे यह पता नहीं कि वह है। उसे यह भी पता नहीं कि तुम उसके पास से गुज़र रहे हो। उसके भीतर कोई ज्योति नहीं जल रही, कोई साक्षी नहीं बैठा।
लेकिन तुम पत्थर को भी जानते हो और स्वयं को भी जान सकते हो।
यहीं से चेतना का जन्म होता है।
पदार्थ केवल अस्तित्व है; चेतना अस्तित्व का बोध है।
एक दर्पण को देखो। दर्पण के सामने जो आएगा, उसका प्रतिबिंब बन जाएगा, लेकिन दर्पण को कुछ पता नहीं कि उसमें कौन दिखाई दे रहा है।
मनुष्य भी यदि केवल यांत्रिक ढंग से जी रहा है — सुबह उठा, काम किया, खाया, सो गया — तो वह भी एक प्रकार का चलता-फिरता दर्पण है। उसमें जीवन तो है, लेकिन जागरण नहीं।
चेतना का अर्थ है — “मैं हूँ” का अनुभव।
और उससे भी गहरी चेतना है — “मैं कौन हूँ?” का प्रश्न।
गीता इसी को क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ कहती है।
शरीर क्षेत्र है — खेत की तरह। उसमें विचार उगते हैं, इच्छाएँ उगती हैं, स्मृतियाँ उगती हैं। लेकिन जो इन सबको देख रहा है, वह क्षेत्रज्ञ है — साक्षी।
पशु संसार को जानता है, लेकिन स्वयं को नहीं जानता। गाय घास खोज लेती है, पक्षी अपना घोंसला बना लेता है, कुत्ता अपने मालिक को पहचान लेता है — उन्हें जगत का उपयोग करना आता है, लेकिन वे यह नहीं पूछते — “मैं कौन हूँ?”
और दुख की बात यह है कि अधिकांश मनुष्य भी वहीं अटके हैं।
वे बाजार को जानते हैं, बैंक बैलेंस को जानते हैं, राजनीति को जानते हैं, दूसरों की गलतियों को जानते हैं — लेकिन स्वयं को नहीं जानते।
वे बाहर-बाहर जीते हैं। उनकी सारी इंद्रियाँ बाहर दौड़ रही हैं। आँखें वस्तुओं को देखती हैं, कान शब्दों को सुनते हैं, मन इच्छाओं के पीछे भागता है। लेकिन जिसने इन सबको देखना है, उस भीतर बैठे साक्षी की ओर कभी ध्यान नहीं जाता।
मनुष्य और बुद्ध में केवल इतना ही अंतर है — मनुष्य में आत्मज्ञान बीज की तरह छिपा है; बुद्ध में वही बीज फूल बन गया है।
बुद्ध कोई अलग प्राणी नहीं हैं। वे तुम्हारी ही संभावना हैं, तुम्हारा ही भविष्य हैं। हर मनुष्य के भीतर एक सोया हुआ बुद्ध बैठा है। लेकिन जागरण साधना माँगता है।
एक कहानी सुनो—
एक राजा ने अपने महल में हजारों दीपक जलवा रखे थे। रात को पूरा महल प्रकाश से भर जाता।
एक दिन उसने एक अंधे फकीर से पूछा, “क्या तुम्हें यह प्रकाश दिखाई देता है?”
फकीर हँसा और बोला, “प्रकाश बाहर बहुत है, लेकिन मेरी आँखें बंद हैं। जब तक आँख न खुले, तब तक हजार सूरज भी व्यर्थ हैं। आध्यात्मिक आयाम में यही मनुष्य की दशा है। परमात्मा हर तरफ है, चेतना हर क्षण बरस रही है, लेकिन भीतर की आँख बंद है।"
‘पुरुष’ शब्द बड़ा अद्भुत है।
पुर का अर्थ है — नगर, शरीर, यह संसार।
और जो इस नगर में रहते हुए भी जागा हुआ है, वही पुरुष है।
वह केवल बाहर को नहीं देखता; वह देखने वाले को भी देखता है।
क्रोध आया — वह उसे देखता है।
विचार उठे — वह उन्हें देखता है।
शरीर बूढ़ा हो रहा है — वह उसे भी देखता है।
धीरे-धीरे उसे अनुभव होता है —
“मैं शरीर नहीं हूँ, क्योंकि मैं शरीर को देख सकता हूँ।”
“मैं मन नहीं हूँ, क्योंकि मैं विचारों को आते-जाते देख सकता हूँ।”
जो देखा जा सकता है, वह तुम नहीं हो।
तुम तो देखने वाले हो।
यही साक्षीभाव पुरुष है।
यही शुद्ध चेतना है।
यही कृष्ण का “हिरण्यमय पुरुष” है — स्वर्णिम चेतना, जो शरीर और मन के पार है।
और जिस दिन तुमने इस भीतर के साक्षी को पहचान लिया, उसी दिन संसार बदल जाता है।
तब पत्थर भी वही है, वृक्ष भी वही हैं, आकाश भी वही है — लेकिन देखने वाला बदल गया।
और जब देखने वाला बदल जाता है, तब पूरा अस्तित्व दिव्य हो उठता है।
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