मनुष्य शांति चाहता है।
उसे बताया गया है कि शांति सबसे बड़ी उपलब्धि है।
कि अगर शांति मिल जाए तो जीवन के सारे संघर्ष समाप्त हो जाएँगे।
और इसी विश्वास के साथ वह खोज पर निकल पड़ता है।
वह मंदिर जाता है, मठ जाता है, गुरुओं के चरणों में बैठता है।
किताबें पढ़ता है, मंत्र जपता है, ध्यान करता है, प्राणायाम करता है।
उसे लगता है कि शायद अभी कुछ कमी रह गई है।
थोड़ा और प्रयास चाहिए।
थोड़ी और साधना।
थोड़ा और त्याग।
लेकिन जितना वह प्रयास करता है, उतना ही भीतर बेचैनी बढ़ती जाती है।
क्योंकि जिसे शांति चाहिए, वही अशांति है।
यही सबसे गहरी बात है और सबसे कठिन भी।
मन सोचता है कि शांति कोई वस्तु है जिसे पाया जा सकता है, जैसे धन या सम्मान।
लेकिन शांति कोई उपलब्धि नहीं है।
वह तो तब प्रकट होती है जब पाने वाला ही शांत हो जाए।
अशांत मन जब शांति की खोज करता है तो उसकी हर खोज अशांति से ही जन्म लेती है।
उसकी पूजा भी अशांत होती है, उसका ध्यान भी अशांत, उसकी साधना भी अशांत।
बाहर से सब पवित्र दिखाई देता है, लेकिन भीतर वही भागता हुआ मन बैठा रहता है।
मनुष्य समझता है कि विधियों से सत्य मिल जाएगा।
कि कोई मंत्र, कोई आसन, कोई नियम उसे मुक्ति तक पहुँचा देगा।
लेकिन सत्य किसी विधि का परिणाम नहीं है।
वह तो तब प्रकट होता है जब विधियों का मोह टूट जाता है।
कबीर ने कहा था —
“जिसे तू खोज रहा है, वही तू है।”
लेकिन मन इस बात को स्वीकार नहीं कर पाता।
उसे कुछ करना है।
कुछ पाना है।
कुछ बनना है।
यही अहंकार है।
अहंकार कोई बुरी वस्तु नहीं, बस एक भ्रम है।
एक कल्पना कि “मैं कर्ता हूँ।”
कि “मैं अपने प्रयासों से सत्य तक पहुँच जाऊँगा।”
और यही भ्रम सबसे बड़ा पर्दा बन जाता है।
मनुष्य जीवन भर सीढ़ियाँ बनाता रहता है।
धर्म की सीढ़ियाँ, साधना की सीढ़ियाँ, ज्ञान की सीढ़ियाँ।
लेकिन सत्य किसी ऊँचाई पर नहीं बैठा।
वह यहीं है।
अभी है।
इस क्षण में है।
लेकिन मन वर्तमान को स्वीकार नहीं करता।
उसे हमेशा कहीं और पहुँचना है।
कुछ और बनना है।
और यही भागना दुख बन जाता है।
मनुष्य सोचता है कि वह प्रगति कर रहा है, जबकि वास्तव में वह स्वयं से दूर भाग रहा होता है।
शांति तब नहीं आती जब तुम बहुत कुछ कर लेते हो।
शांति तब आती है जब भीतर का “करने वाला” शांत हो जाता है।
एक क्षण के लिए बैठो।
कुछ मत करो।
ध्यान करने की भी कोशिश मत करो।
सिर्फ बैठो।
मन को भटकने दो।
साँस को अपने ढंग से चलने दो।
शरीर को ढीला छोड़ दो।
धीरे-धीरे तुम देखोगे कि भीतर एक मौन पहले से उपस्थित है।
वह तुम्हारे प्रयास से पैदा नहीं हुआ।
वह तो हमेशा से था।
तुम्हारी बेचैनी ही उसे ढँके हुए थी।
जैसे पानी में लगातार हाथ मारने से सतह धुँधली हो जाती है।
हाथ रुकते ही पानी साफ दिखाई देने लगता है।
ठीक वैसे ही, प्रयास रुकते ही शांति प्रकट होने लगती है।
मनुष्य बदलना चाहता है।
और यही उसका बंधन है।
अहंकार हमेशा कहता है -
“मैं अभी पर्याप्त नहीं हूँ। मुझे और बेहतर होना है।”
यही अधूरापन अहंकार की जड़ है।
लेकिन जिस क्षण तुम स्वयं को स्वीकार कर लेते हो, उसी क्षण भीतर कुछ पिघलने लगता है।
एक गहरा विश्राम उतरता है।
और उसी विश्राम में शांति खिलती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन रुक जाएगा।
कार्य होंगे, लेकिन उनमें तनाव नहीं होगा।
चलना होगा, लेकिन भीतर भागना नहीं होगा।
कर्म होंगे, लेकिन कर्ता का बोझ नहीं होगा।
जैसे वृक्ष खिलते हैं।
जैसे नदी बहती है।
जैसे साँस अपने आप चलती है।
सत्य किसी उपलब्धि का नाम नहीं है।
वह तो स्वाभाविकता है।
पूर्ण स्वीकार है।
पूर्ण जागरूकता है।
बस देखना सीखो।
बिना निर्णय के।
बिना सुधार की इच्छा के।
बिना भागे।
और तब धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगता है कि जिसे तुम जीवन भर खोजते रहे, वह कभी खोया ही नहीं था।
शांति कहीं बाहर नहीं है।
वह तुम्हारे प्रयासों के पीछे छिपी हुई तुम्हारी ही मौन प्रकृति है।
जब खोज समाप्त होती है, तभी शांति प्रकट होती है।
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