"प्रकाश की ओर"
सूर्य की पहली किरणें वैशाली के आम्रवन को स्वर्णिम आभा से नहला रही थीं। बुद्ध अपने पाँच सौ भिक्षुओं के साथ विहार में विराजमान थे। उनके मुख पर अलौकिक शांति थी। सारिपुत्र और मौद्गल्यायन भी उनके साथ थे।
"भंते!" एक युवा भिक्षु ने नतमस्तक होकर पूछा, "क्या सच्चा धर्म कभी स्थापित हो पाएगा? आज भी लोग केवल बाह्याचार में उलझे हैं।"
बुद्ध की आँखों में करुणा की चमक थी। वे जानते थे कि जब तक सच्चे कार्यकर्ताओं का एक संगठन तैयार नहीं होगा, तब तक उनके सिद्धांतों का समुचित प्रसार संभव नहीं है।
"देखो," उन्होंने शांत स्वर में कहा, "धर्म सरल है, स्पष्ट है। पर लोग उसे जटिल बना देते हैं। जैसे इस आम्रवन में कुछ वृक्ष फलों से लदे हैं, कुछ केवल पत्तों से। वैसे ही कुछ लोग सच्चे धर्म को समझते हैं, कुछ केवल दिखावे में लगे रहते हैं।"
तभी एक दूसरे भिक्षु ने आकर सूचना दी कि नगर की प्रसिद्ध वेश्या अंबपाली उनके दर्शन के लिए आ रही है।
"उसे आने दो," बुद्ध ने कहा।
कुछ भिक्षुओं के चेहरों पर असमंजस की रेखाएँ उभरीं। एक वेश्या का आगमन! पर बुद्ध की आँखों में वही करुणा थी।
अंबपाली अपने रथ से उतरी। उसके मन में द्वंद्व था - एक ओर अपना पेशा, दूसरी ओर धर्म की ओर खिंचाव। धीरे-धीरे वह बुद्ध के निकट आई और चरणों में झुक गई।
"भंते!" उसने कहा, "मैं आपको और संघ को कल भोजन का निमंत्रण देना चाहती हूँ।"
बुद्ध ने मौन रहकर स्वीकृति दी।
इसी समय वैशाली के लिच्छवि सरदार वहाँ आ पहुंचे। उन्हें जब पता चला कि बुद्ध ने अंबपाली का निमंत्रण स्वीकार कर लिया है, तो वे स्तब्ध रह गए।
"भंते!" उन्होंने कहा, "हमारा निमंत्रण स्वीकार कीजिए। हम एक लाख मुद्राएँ देंगे।"
बुद्ध ने शांत स्वर में कहा, "मैं पहले ही अंबपाली का निमंत्रण स्वीकार कर चुका हूँ।"
अगले दिन अंबपाली ने बुद्ध और संघ को भोजन कराया। भोजन के पश्चात वह बुद्ध के सामने विनम्र भाव से बैठी।
"भंते!" उसकी आँखों में आंसू थे, "मैं न केवल अपना आम्रवन, बल्कि अपना समस्त जीवन संघ को समर्पित करना चाहती हूँ।"
बुद्ध ने मौन स्वीकृति दी। उनकी आँखों में करुणा थी। वे जानते थे कि समाज में स्त्रियों और शूद्रों के साथ कैसा व्यवहार होता है। धर्म के नाम पर उन्हें कैसे अपमानित किया जाता है।
इसी समय कीटागिरि से कुछ भिक्षु आए। उन्होंने खबर दी कि वहाँ के छह वर्गीय भिक्षुओं ने सारी सामग्री आपस में बाँट ली है। सारिपुत्र और मौद्गल्यायन को ठहरने की जगह भी नहीं दी जा रही।
बुद्ध के माथे पर चिंता की रेखाएँ उभरीं। उन्होंने कहा, "जो साधु वेश धारण करके भी सुख-सामग्री का संग्रह करता है, वह धर्म का पाखंडी है। साधु का सबसे बड़ा लक्षण अपरिग्रह है।"
फिर उन्होंने निर्देश दिया कि पाँच चीजें कभी बाँटी नहीं जा सकतीं - आराम, विहार, शय्या, बर्तन और उपकरण। ये सब संघ की सामूहिक संपत्ति हैं।
उनकी आँखों में गहरी करुणा थी। वे देख रहे थे कि कैसे स्वार्थ और संग्रह की प्रवृत्ति धीरे-धीरे संघ में भी प्रवेश कर रही है। जैसे कोई विषबेल किसी स्वस्थ वृक्ष को अपनी जकड़ में ले रही हो।
तभी एक युवा भिक्षु ने पूछा, "भंते, हम कैसे जानें कि कौन सा मार्ग सही है? हर कोई अपने धर्म को श्रेष्ठ बताता है।"
बुद्ध मुस्कुराए...
बुद्ध की मुस्कान में करुणा थी। उन्होंने कहा, "कालाम भाइयो, संदेह स्वाभाविक है। किसी बात को केवल इसलिए मत मानो कि बहुत से लोग उसे मानते हैं। किसी बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह शास्त्रों में लिखी है। हर बात को अपने विवेक की कसौटी पर परखो।"
उनकी वाणी में सत्य का तेज था। आसपास बैठे भिक्षुओं की आँखें चमक उठीं।
तभी वहाँ एक हलचल हुई। कुछ लोग एक व्यक्ति को घसीटते हुए ला रहे थे। यह अंगुलिमाल था - वही क्रूर डाकू जो अपने शिकारों की अंगुलियों की माला पहनता था।
"इसे मार डालो!" भीड़ चिल्ला रही थी।
बुद्ध शांत खड़े रहे। उनकी आँखों में वही करुणा थी। वे धीरे से बोले, "क्रोध से क्रोध कभी शांत नहीं होता। क्रोध शांत होता है प्रेम से।"
अंगुलिमाल ने उनकी ओर देखा। उसकी आँखों में पहली बार भय नहीं, आश्चर्य था। इस निर्भय संन्यासी को देखकर उसके भीतर कुछ टूटने लगा।
"मैंने हजारों को मारा है," वह कांपते स्वर में बोला।
"तब तूने हजारों बार अपने को भी मारा है," बुद्ध ने कहा, "अब समय है जीवन का नया अर्थ खोजने का।"
अंगुलिमाल की आँखों से आंसू बहने लगे। उसने बुद्ध के चरणों में गिरकर कहा, "मुझे शरण दीजिए भंते!"
बुद्ध ने उसे उठाया। भीड़ स्तब्ध थी। एक क्रूर हत्यारा कैसे एक क्षण में बदल सकता है?
"देखो," बुद्ध बोले, "जैसे सूर्य की एक किरण घने अंधकार को चीर सकती है, वैसे ही सत्य की एक झलक भी मनुष्य के भीतर छिपी दिव्यता को जगा सकती है।"
वह दिन धर्म के इतिहास में एक और स्वर्णिम अध्याय बन गया...
उसी समय जेतवन से एक विचलित करने वाला समाचार आया। सुंदरी नाम की एक भिक्षुणी की हत्या कर दी गई थी। और अफवाह फैलाई जा रही थी कि यह बुद्ध संघ का कारनामा है।
बुद्ध शांत थे। उनके चेहरे पर वही करुणा थी। कुछ भिक्षु व्याकुल हो उठे।
"भंते!" आनंद ने चिंतित स्वर में कहा, "यह आप पर बड़ा कलंक है।"
"आनंद," बुद्ध बोले, "सत्य कभी कलंक से नहीं डरता। जैसे कमल कीचड़ में खिलता है पर कीचड़ उसे छू नहीं पाता, वैसे ही सत्य का मार्ग विरोधों के बीच से होकर गुजरता है।"
सारिपुत्र ने कहा, "पर भंते, लोग क्या सोचेंगे?"
"लोग सदा सोचते रहे हैं सारिपुत्र। जब मैंने राजमहल छोड़ा, तब भी लोगों ने सोचा। जब मैंने छह वर्ष की कठोर तपस्या छोड़ी, तब भी लोगों ने सोचा। जब मैंने स्त्रियों और शूद्रों को संघ में प्रवेश दिया, तब भी लोगों ने सोचा।"
उनकी वाणी में अदभुत तेज था। वे आगे बोले, "हमारा मार्ग सत्य का है। सत्य को किसी की सहमति की आवश्यकता नहीं होती।"
तभी राजा बिंबिसार के दूत आए। उन्होंने बताया कि षड्यंत्रकारियों को पकड़ लिया गया है। वे नशे में धुत थे और उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है।
"उन्हें क्या दंड दिया जाए भंते?" दूत ने पूछा।
बुद्ध की आँखों में करुणा की लहर उठी। वे बोले, "उन्हें संघ में प्रवेश दो। जो पाप से जल रहे हैं, उन्हें धर्म की शीतलता का अधिकार है।"
सभी स्तब्ध थे। दंड के स्थान पर करुणा? प्रतिशोध के स्थान पर प्रेम?
"भंते!" आनंद की आँखों में आंसू थे, "आपकी करुणा अनंत है।"
बुद्ध मुस्कुराए, "करुणा ही तो धर्म का प्राण है आनंद। बिना करुणा के धर्म मरुस्थल है, जहाँ कोई फूल नहीं खिलता..."
संध्या ढल रही थी। विहार में एक विशेष सभा का आयोजन था। सभी प्रमुख भिक्षु एकत्र थे। बुद्ध ने अपनी चिंता व्यक्त की।
"देखो," उन्होंने कहा, "संघ बढ़ रहा है, पर साथ ही चुनौतियाँ भी बढ़ रही हैं। कुछ लोग केवल दीक्षा लेकर ही धन्य हो गए हैं - ऐसा मानते हैं। कुछ लोग संपत्ति और सुविधाओं के मोह में फँस रहे हैं।"
सारिपुत्र ने कहा, "भंते, छह वर्गीय भिक्षुओं की करतूतें तो आप देख ही रहे हैं।"
बुद्ध की आँखों में गहरी चिंता थी। "हाँ सारिपुत्र, यही तो खतरा है। जब साधु भी सांसारिक मोह में फँसने लगें, तब धर्म का पतन निश्चित है।"
तभी एक युवा भिक्षु ने प्रश्न किया, "भंते, क्या हम सामूहिक जीवन को त्यागकर एकांत में तपस्या नहीं कर सकते?"
बुद्ध मुस्कुराए। "नहीं वत्स, एकांत भी एक प्रकार का पलायन है। हमें समाज के बीच रहकर ही धर्म का प्रकाश फैलाना है। जैसे दीपक अंधेरे में ही अपना महत्व रखता है।"
फिर उन्होंने आगे कहा, "इसलिए मैं कहता हूँ - संघ की संपत्ति सामूहिक है। कोई भी वस्तु व्यक्तिगत नहीं है। विहार, शय्या, भोजन - सब साझा है। यही सच्चा साधु धर्म है।"
आनंद ने पूछा, "और जो इस मार्ग से भटक जाएँ?"
"उन्हें प्रेम से समझाओ आनंद। क्रोध से नहीं। जैसे माँ अपने भटके हुए बच्चे को वापस बुलाती है। पर साथ ही सख्ती भी जरूरी है। जैसे वैद्य कड़वी दवा भी देता है, मरीज के हित के लिए।"
सभा में गहरी शांति छा गई। सूर्य की अंतिम किरणें विहार की दीवारों पर सुनहरी आभा बिखेर रही थीं...
रात्रि का प्रथम प्रहर था। चंद्रमा की शीतल चाँदनी विहार के प्रांगण में फैली हुई थी। बुद्ध अपने कक्ष में ध्यानमग्न थे। तभी आनंद ने प्रवेश किया।
"भंते!" उसकी आवाज में व्याकुलता थी, "सारिपुत्र... सारिपुत्र नहीं रहे।"
बुद्ध की आँखें खुलीं। उनके चेहरे पर वही शांत भाव था।
"क्या हुआ आनंद?" उन्होंने पूछा।
"नालंदा के पास नालक ग्राम में..." आनंद का गला रुंध गया, "उनका देहांत हो गया। मेरा शरीर जड़ हो गया है भंते! चारों ओर अंधकार छा गया है।"
बुद्ध शांत थे। उन्होंने धीरे से कहा, "क्यों आनंद, ऐसा क्यों कहते हो? क्या सारिपुत्र अपने साथ शील ले गए? समाधि ले गए? प्रज्ञा ले गए?"
आनंद की आँखों से आंसू बह रहे थे। "नहीं भंते! पर वे मेरे गुरु थे, मार्गदर्शक थे। उनकी करुणा, उनका ज्ञान..."
बुद्ध उठे और खिड़की के पास गए। बाहर चाँदनी में एक विशाल वृक्ष खड़ा था।
"देखो आनंद," वे बोले, "जैसे इस वृक्ष की एक शाखा टूट जाए तो क्या वृक्ष मर जाता है? सारिपुत्र ने जो ज्ञान दिया, जो करुणा सिखाई, वह तो जीवित है। उसे अपने भीतर जगाए रखो।"
फिर उन्होंने कहा, "अपना दीपक स्वयं बनो आनंद। किसी दूसरे का सहारा मत खोजो। धर्म को ही अपना दीपक बनाओ।"
आनंद के चेहरे पर एक नई समझ उभरी...
विहार में एक नया विवाद उठ खड़ा हुआ। कुछ भिक्षु जाति-पाँति का भेदभाव करने लगे थे। कोई कहता - "ब्राह्मण कुल से आए भिक्षु को पहले भोजन मिलना चाहिए।" कोई कहता - "क्षत्रिय कुल के भिक्षु श्रेष्ठ हैं।"
बुद्ध ने इस विवाद को सुना। उनकी आँखों में एक अजीब-सी पीड़ा थी।
"भिक्षुओ!" उन्होंने कहा, "क्या सूर्य की किरणें पूछती हैं कि किस जाति के खेत में प्रकाश डालें? क्या वर्षा की बूँदें पूछती हैं कि किस कुल के आँगन में बरसें?"
सभी भिक्षु शांत हो गए।
बुद्ध आगे बोले, "जन्म से कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। कर्म से होता है। जो पहले प्रव्रजित हुआ, वही बड़ा है - चाहे वह किसी भी जाति का हो।"
एक युवा भिक्षु ने पूछा, "भंते, पर शास्त्रों में तो वर्ण-व्यवस्था का विधान है?"
बुद्ध मुस्कुराए, "शास्त्र मनुष्य के लिए हैं, मनुष्य शास्त्रों के लिए नहीं। जो मनुष्य को बाँधे, वह धर्म नहीं। जो मनुष्य को जोड़े, वही सच्चा धर्म है।"
उनकी वाणी में सत्य का ऐसा तेज था कि सारा विवाद शांत हो गया। सभी भिक्षु समझ गए कि धर्म का मार्ग समानता का मार्ग है...
सूर्यास्त का समय था। बुद्ध कुशीनगर की ओर जा रहे थे। रास्ते में एक वृक्ष के नीचे विश्राम के लिए रुके। आनंद पास ही बैठा था।
"आनंद!" बुद्ध ने कहा, "मैं अब थक गया हूँ। मेरा निर्वाण काल निकट है।"
आनंद चौंक पड़ा। "भंते! ऐसा मत कहिए..."
बुद्ध मुस्कुराए। "क्या तुम्हें याद है आनंद, जब सारिपुत्र गए थे, तब मैंने क्या कहा था? जो उत्पन्न होता है, उसका विनाश निश्चित है।"
आनंद की आँखों में आंसू थे। बुद्ध ने कहा, "रोओ मत आनंद। मैं जा रहा हूँ, पर धर्म रह जाएगा। मेरा शरीर जाएगा, पर मेरी शिक्षाएँ रहेंगी।"
फिर उन्होंने चारों ओर देखा। दूर क्षितिज पर सूर्य डूब रहा था। आकाश लाल-सुनहरा हो रहा था।
"देखो आनंद," वे बोले, "जैसे सूर्य डूबता है तो भी उसका प्रकाश नहीं मरता। रात होती है, फिर भी सुबह का विश्वास रहता है। वैसे ही धर्म का प्रकाश कभी नहीं मरता।"
उनकी वाणी में अद्भुत शांति थी। वे आगे बोले, "इसलिए कहता हूँ - अपना दीपक स्वयं बनो। धर्म को दीपक बनाओ। और याद रखो - करुणा ही धर्म का प्राण है।"
आकाश में पक्षियों का एक झुंड उड़ता जा रहा था। प्रकृति मौन थी, जैसे महापुरुष के अंतिम वचन सुन रही हो...
"भिक्षुओं!" बुद्ध की आवाज में अपार करुणा थी, "मेरे जाने के बाद मेरी बातों को पत्थर की लकीर मत समझना। हर बात को विवेक की कसौटी पर परखना।"
आनंद ने पूछा, "भंते, और जो लोग धर्म को तोड़-मरोड़कर पेश करें?"
"वह होगा आनंद। जहाँ प्रकाश है, वहाँ छाया भी होगी। कुछ लोग धर्म के नाम पर अंधविश्वास फैलाएंगे। कुछ लोग मेरी मूर्तियाँ बनाएंगे। कुछ मंदिर बनाएंगे।"
बुद्ध रुके। उनकी आँखों में गहरी करुणा थी।
"पर तुम मेरी एक बात हमेशा याद रखना - धर्म का सार है करुणा। जो करुणा से खाली है, वह धर्म नहीं। जैसे अंबपाली ने अपना सब कुछ त्यागकर करुणा का मार्ग चुना। जैसे अंगुलिमाल ने हिंसा छोड़कर प्रेम का मार्ग अपनाया।"
सूर्य पूरी तरह डूब चुका था। चारों ओर संध्या का धुंधलका फैल रहा था। दूर कहीं एक पक्षी कर्कश स्वर में चीख रहा था।
"और एक बात," बुद्ध बोले, "धर्म को जाति-पाँति के बंधनों में मत बाँधना। मैंने जीवन भर इन बंधनों के विरुद्ध संघर्ष किया है। जल सबकी प्यास बुझाता है, हवा सबको साँस देती है - धर्म भी ऐसा ही होना चाहिए।"
आनंद के आंसू थम नहीं रहे थे...
रात्रि का अंतिम प्रहर था। कुशीनगर के शाल वृक्षों के बीच बुद्ध लेटे थे। चारों ओर भिक्षु-संघ एकत्र था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे।
"भिक्षुओं!" बुद्ध की आवाज धीमी थी पर स्पष्ट, "मेरी अंतिम शिक्षा सुनो। धर्म को कभी संपत्ति का मोह मत बनने देना। आज छह वर्गीय भिक्षुओं की तरह कुछ लोग सुख-सामग्री में लिप्त हैं। कल और लोग होंगे। मठों में धन जमा होगा। यही धर्म का सबसे बड़ा शत्रु है।"
एक क्षण के लिए वे रुके। फिर बोले, "याद रखो - साधु का सबसे बड़ा लक्षण है अपरिग्रह। जो जितना कम रखेगा, उतना मुक्त होगा।"
आकाश में एक तारा टूटा और क्षण भर में विलीन हो गया।
"देखो!" बुद्ध ने कहा, "जैसे यह तारा था और नहीं रहा, वैसे ही सब नश्वर है। पर प्रकाश अमर है। धर्म का प्रकाश भी अमर है। उसे जीवित रखना तुम्हारे हाथ में है।"
उनकी साँसें धीमी पड़ने लगीं। आनंद रो पड़ा।
"आनंद!" बुद्ध मुस्कुराए, "रोओ मत। मैंने जो सिखाया, उसे जीवित रखो। और याद रखो - अपना दीपक स्वयं बनो।"
यह कहकर महापरिनिर्वाण की शांति में वे लीन हो गए। पूर्व दिशा में प्रभात की पहली किरण फूटी। एक नए युग का आरंभ हो रहा था...