खुश रहने के लिए, लाइफ की मीनिंग और पर्पस तलाशने के लिए, एक अच्छी क्वालिटी ऑफ़ लाइफ के लिए, आपकी स्किल सेट कितना डायवर्सिफाइड है, या उसका स्पेक्ट्रम कितना ब्रॉड है, इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है।
स्किल का मतलब केवल नौकरी और पैसा कमाने वाला स्किल भर नहीं होता है, जीवन को समझने और संभालने वाली स्किल भी होती है।
पहले के समय में, रोज़मर्रा के कामों के अलावा भी लोगों के पास बहुत सारे स्किल सेट होते थे। यह अलग से सीखे नहीं जाते थे, यह जीवन का हिस्सा होते थे।
जैसे मेरे घर के लोग ट्रैक्टर, इंजन की सर्विसिंग तक खुद कर लेते थे। थ्रेसर, क्रेशर जैसे काम भी संभाल लेते थे। मैं खुद अपने घर का बिजली का काफी काम कर लेता था। पाइप वाली वायरिंग तो नहीं, लेकिन नया घर बनते समय पंखा लगाना, ट्यूबलाइट जोड़ना, यह सब काम किसी मिस्त्री के बिना हो जाते थे।
मेरे जानने में कई लोग टीवी, रेडियो तक खोलकर ठीक कर देते थे। छोटे मोटे राजमिस्त्री के काम भी कर लेते थे। साइकिल बनाना, पंचर करना, यह सब सामान्य बात थी।
महिलाओं के पास तो और भी ज़्यादा स्किल सेट होता था। मम्मी चलते हुए लड़के के स्वेटर का डिज़ाइन देख कर वैसा ही बना लेती थीं। सिलाई, कढ़ाई आम बात थी। खाने में अचार, पापड़ से लेकर बहुत सी चीज़ें घर पर बनती थीं। घर चलाना खुद में एक पूरा स्किल था।
अब धीरे धीरे यह सारे स्किल सेट खत्म हो गए हैं।
अब आदमी अपने सीधे काम के अलावा कोई दूसरा काम नहीं करता। यहाँ तक कि अपना बर्तन, कपड़े, खाना बनाना, घर को ठीक से रखना, इसके लिए भी स्किल नहीं बची है।
तो एक खाली जगह बनी है।
और खाली जगह हमेशा खाली नहीं रहती।
इस जगह को किसी ना किसी ने भरना ही था, तो इसे भरा है 24 घंटे की एंटरटेनमेंट और रिडेंडेंट इनफॉर्मेशन ने।
अब समय और ऊर्जा, जो पहले स्किल सीखने और जीवन का हिस्सा बनाने में लगती थी, वह स्क्रीन में चली जाती है।
और इसका असर सीधे मेंटल पर दिखता है।
आदमी अब उतना काम नहीं करता, पर फिर भी थका रहता है। दिमाग भरा रहता है, पर संतुष्टि नहीं होती। एक अजीब सा खालीपन बना रहता है।
जरूरत केवल मोबाइल छोड़ने की नहीं है, जरूरत है उस खाली जगह को फिर से भरने की।
छोटे छोटे स्किल से शुरू करना पड़ेगा।अगर मेरा तरह गांधी जी पसंद हों तो चरखा चलाना सीखिए,
सूत कातकर एक अच्छी सी साड़ी या कोई और कपड़ा अपने पार्टनर को गिफ्ट कीजिए,
प्रेम भी बढ़ेगा,मन भी प्रसन्न होगा ।
अपना काम खुद करना, कुछ नया सीखना, हाथ से कुछ बनाना, यह सब “एक्स्ट्रा” नहीं है, यही जीवन का हिस्सा है।
धीरे धीरे यही चीज़ें जीवन में मीनिंग और पर्पस देती हैं
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