मनुष्य का जीवन एक विचित्र विरोधाभास से भरा हुआ है। वह जितना पाना चाहता है, उतना ही भीतर से खाली महसूस करता जाता है। बाहर की दुनिया में वह निरंतर संग्रह करता है धन, वस्तुएं, संबंध, प्रतिष्ठा पर भीतर कहीं एक ऐसी रिक्तता बनी रहती है, जिसे कोई भी बाहरी वस्तु भर नहीं पाती। यही जीवन का गूढ़ रहस्य है, जिसे समझे बिना मनुष्य जीवनभर भटकता रहता है।
कल्पना कीजिए एक ऐसे पात्र की, जिसे आप कितना भी भरें, वह कभी नहीं भरता। यह कोई जादू नहीं, बल्कि मनुष्य के मन का स्वभाव है। मन हमेशा और चाहता है। जो मिल गया, वह पर्याप्त नहीं लगता; जो नहीं मिला, वही आकर्षक लगता है। यही कारण है कि उपलब्धियों के बाद भी संतोष नहीं आता। यह असंतोष ही मनुष्य को निरंतर दौड़ाता है एक लक्ष्य से दूसरे लक्ष्य की ओर, एक इच्छा से दूसरी इच्छा की ओर।
जब मनुष्य इस अंतहीन दौड़ से थक जाता है, तब वह दिशा बदलता है। जो पहले भोग में लगा था, वह त्याग की ओर मुड़ता है। जो पहले संग्रह कर रहा था, वह छोड़ने लगता है। लेकिन यह परिवर्तन भी अक्सर सतही होता है। कारण यह है कि भीतर का “चाहने वाला” वही रहता है। पहले वह पाने में सक्रिय था, अब छोड़ने में सक्रिय हो जाता है। दोनों ही स्थितियों में एक बात समान रहती है “मैं कर रहा हूं” का भाव।
यही “कर्ता-भाव” जीवन की सबसे बड़ी उलझन है। जब तक मनुष्य स्वयं को हर क्रिया का कर्ता मानता है, तब तक वह बंधन में रहता है। चाहे वह भोग कर रहा हो या त्याग, दोनों ही स्थितियों में वह अपने अहंकार को ही पोषित कर रहा होता है। इसीलिए केवल दिशा बदलने से समाधान नहीं मिलता।
समाधान एक तीसरे मार्ग में छिपा है साक्षी-भाव में। साक्षी-भाव का अर्थ है, जीवन को घटित होते हुए देखना, बिना उसमें उलझे। जैसे कोई दर्शक किसी नाटक को देखता है वह हंसता है, भावुक होता है, पर भीतर जानता है कि वह केवल देखने वाला है। उसी तरह यदि मनुष्य अपने विचारों, इच्छाओं और कर्मों को देखने लगे, तो धीरे-धीरे वह उनसे मुक्त होने लगता है।
साक्षी-भाव कोई पलायन नहीं है, न ही यह जीवन से दूरी बनाना है। यह तो जीवन के बीचों-बीच रहते हुए भी भीतर से शांत और सजग रहने की अवस्था है। व्यक्ति अपना काम करता है, संबंध निभाता है, जिम्मेदारियां उठाता है पर भीतर एक गहरी जागरूकता बनी रहती है कि वह केवल एक माध्यम है, अंतिम कर्ता नहीं।
जब यह भाव गहराता है, तब मन की अतृप्ति स्वतः कम होने लगती है। इच्छाएं आती हैं, जाती हैं पर वे व्यक्ति को बांध नहीं पातीं। धीरे-धीरे भीतर एक स्थिरता जन्म लेती है, जो किसी बाहरी परिस्थिति पर निर्भर नहीं होती। यही स्थिरता वास्तविक संतोष का आधार बनती है।
जीवन की सच्चाई यह है कि बाहर की दुनिया को पूरी तरह बदल पाना संभव नहीं, पर अपने देखने के ढंग को बदला जा सकता है। जैसे ही देखने का दृष्टिकोण बदलता है, वैसे ही अनुभव बदल जाता है। जहां पहले अभाव दिखाई देता था, वहां अब पूर्णता का अनुभव होने लगता है।
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