Monday, January 19, 2026

सुभाष चंद्र बोस

सुभाष चंद्र बोस



 

★★★ जन्म :

 

23 जनवरी 1897

 

★★★ स्वर्गवास :

 

18 अगस्त 1945

 

★★★ नारा :

 

तुम मुझे खून दो, मै तुम्हे आजादी दूंगा।।

★★★ उपलब्धियां :

 

सुभाष चन्द्र बोस ने तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा और जय हिन्द जैसे प्रसिद्द नारे दिए, भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास की, 1938 और 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, 1939 में फॉरवर्ड ब्लाक का गठन किया, अंग्रेजों को देश से निकालने के लिए आजाद हिन्द फ़ौज की स्थापना की

 

सुभाष चंद्र बोस को नेता जी भी बुलाया जाता है। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रख्यात नेता थे| हालाँकि देश की आज़ादी में योगदान का ज्यादा श्रेय महात्मा गाँधी और नेहरु को दिया जाता है मगर सुभाष चन्द्र बोस का योगदान भी किसी से कम नहीं था|

★★★ प्रारंभिक जीवन :

 

उनका जन्म जनवरी 23 सन 1897 में उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता जानकी नाथ बोस प्रख्यात वकील थे। उनकी माता प्रभावती देवी सती और धार्मिक महिला थीं। प्रभावती और जानकी नाथ की 14 संतानें थीं जिसमें छह बेटियां और आठ बेटे थे। सुभाष उनमें से नवें स्थान पर थे। सुभाष बचपन से ही पढ़ने में होनहार थे। उन्होंने दसवीं की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था और स्नातक में भी वो प्रथम आए थे। कलकत्ता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से उन्होंने दर्शनशास्त्र में स्तानक की डिग्री हासिल की थी।

 

उसी दौरान सेना में भर्ती हो रही थी। उन्होंने भी सेना में भर्ती होने का प्रयास किया परंतु आंखें खराब होने के कारण उनको अयोग्य घोषित कर दिया गया। वे स्वामी विवेकानंद के अनुनायक थे। अपने परिवार की इच्छा के अनुसार वर्ष 1919 में वे भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए इंग्लैंड पढ़ने गये।

★★★ कैरियर :

 

भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए उन्होंने 1920 में आवेदन किया और इस परीक्षा में उनको न सिर्फ सफलता मिली बल्कि उन्होंने चैथा स्थान भी हासिल किया। वे जलियावाला बाग के नरसंहार के बहुत व्याकुल हुए और 1921 में प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया। भारत वापस आने के बाद नेता जी गांधीजी के संपर्क में आए और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। गांधी जी के निर्देशानुसार उन्होंने देशबंधु चितरंजन दास के साथ काम करना शुरू किया। उन्होंने बाद में चितरंजन दास को अपना राजनैतिक गुरु बताया था। अपनी सूझ-बूझ और मेहनत से सुभाष बहुत जल्द ही कांग्रेस के मुख्य नेताओं में शामिल हो गए| 1928 में जब साइमन कमीशन आया तब कांग्रेस ने इसका विरोध किया और काले झंडे दिखाए। 1928 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कोलकाता में हुआ।

 

इस अधिवेशन में अंग्रेज सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिए एक साल का वक्त दिया गया| उस दौरान गांधी जी पूर्ण स्वराज की मांग से सहमत नहीं थे। वहीं सुभाष को और जवाहर लाल नेहरू को पूर्ण स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था। 1930 में उन्होंने इंडीपेंडेंस लीग का गठन किया। सन 1930 के सिविल डिसओबिडेंस आन्दोलन के दौरान सुभाष को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। गांधीजी-इरविन पैक्ट के बाद 1931 में उनकी रिहाई हुई| सुभाष ने गाँधी-इरविन पैक्ट का विरोध किया और  सिविल डिसओबिडेंस आन्दोलन को रोकने के फैसले से भी वह खुश नहीं थे|

सुभाष को जल्द ही बंगाल अधिनियम के अंतर्गत दोबारा जेल में डाल दिया गया। इस दौरान उनको करीब एक साल तक जेल में रहना पड़ा और बाद में बीमारी की वजह से उनको जेल से रिहाई मिली। उनको भारत से यूरोप भेज दिया गया। वहां उन्होंने, भारत और यूरोप के मध्य राजनैतिक और सांकृतिक संबंधों को बढ़ाने के लिए कई शहरों में केंद्र स्थापित किये| उनके भारत आने पर पाबंदी होने बावजूद वो भारत आए और परिणामतः उन्हें 1 साल के लिए जेल जाना पड़ा । 1937 के चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी 7 राज्यों में सत्ता में आई और इसके बाद सुभाष को रिहा किया गया| इसके कुछ समय बाद सुभाष कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन (1938) में अध्यक्ष चुने गए| अपने कार्यकाल के दौरान सुभाष ने राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया।

 

1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में सुभाष को दोबारा अध्यक्ष चुन लिया गया| इस बार सुभाष का मुकाबला पट्टाभि सीतारमैया से था। सीतारमैया को गांधीजी का पूर्ण समर्थन प्राप्त था फिर भी 203 मतों से सुभाष चुनाव जीत गए। इस दौरान द्वितीय विश्वयुध्द के बादल भी मडराने लगे थे और सुभाष ने अंग्रेजों को 6 महीने में देश छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया। सुभाष के इस रवैय्ये का विरोध गांधीजी समेत कांग्रेस के अन्य लोगों ने भी किया जिसके कारण उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और फॉरवर्ड ब्लाक की स्थापना की|

सुभाष ने अंग्रजों द्वारा भारत के संसाधनों का द्वितीय विश्व युद्ध में उपयोग करने का घोर विरोध किया और इसके खिलाफ जन आन्दोलन शुरू किया|  उनके इस आंदोलन को जनता का जबरदस्त समर्थन मिल रहा था। इसलिए उन्हें कोलकाता में कैद कर नजरबन्द रखा गया| जनवरी 1941 में सुभाष अपने घर से भागने में सफल हो गए और अफगानिस्तान के रास्ते जर्मनी पहुँच गए। दुश्मन का दुश्मन, दोस्त होता है वाली  धारणा के मद्देनजर उन्होंने ब्रिटिश राज को भारत से निकालने के लिए जर्मनी और जापान से मदद की गुहार लगायी। जनवरी 1942 में उन्होंने रेडियो बर्लिन से प्रसारण करना शुरू किया जिससे भारत के लोगों में उत्साह बढ़ा।

 

वर्ष 1943 में वो जर्मनी से सिंगापुर आए। पूर्वी एशिया पहुंचकर उन्होंने रास बिहारी बोस से स्वतंत्रता आन्दोलन का कमान लिया और आजाद हिंद फौज का गठन करके युद्ध की तैय्यारी शुरू कर दी। आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना मुख्यतः जापानी सेना द्वारा अंग्रेजी फौज से पकड़े हुए भारतीय युद्धबन्दियों को लेकर किया गया था। इसके बाद सुभाष को नेताजी कहा जाने लगा| अब आजाद हिन्द फ़ौज भारत की ओर बढ़ने लगी और सबसे पहले अंदमान और निकोबार को आजाद किया| आजाद हिंद फौज बर्मा की सीमा पार करके 18 मार्च 1944 को भारतीय भूमि पर आ धमकी।

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान और जर्मनी के हार के साथ, आजाद हिन्द फ़ौज का सपना पूरा नहीं हो सका|

★★★ मृत्यु :

 

ऐसा माना जाता है कि 18 अगस्त 1945 में एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु ताईवान में हो गयी परंतु उसका दुर्घटना का कोई साक्ष्य नहीं मिल सका। सुभाष चंद्र की मृत्यु आज भी विवाद का विषय है और भारतीय इतिहास सबसे बड़ा संशय है।



जयप्रकाश नारायण

 

जयप्रकाश नारायण

 

★★★ जन्म :

11 अक्टूबर 1902, सिताबदियारा, सारण, बिहार

★★★ स्वर्गवास :

8 अक्टूबर, 1979, पटना, बिहार

★★★ कार्य: स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, राजनेता :

जे.पी. अथवा लोक नायक के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और राजनेता थे। उन्हें मुख्यतः 1970 में इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है। भारत सरकार ने उन्हें सन 1998 में मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा। सन 1965 में उन्हें समाज सेवा के लिए मैगसेसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। वर्ष 1957 में उन्होंने राजनीति छोड़ने का निर्णय लिया पर 1960 के दशक के अंत में वे राजनीति में पुनः सक्रिय रहे। जे.पी. इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के विरुद्ध थे और गिरते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने 1977 में विपक्ष को एकजुट कर इंदिरा गांधी को चुनाव में हरा दिया।

★★★ प्रारंभिक जीवन :

जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के सारण जिले के सिताबदियारा गाँव में हुआ। उनके पिता का नाम हर्सुल दयाल श्रीवास्तव और माता का नाम फूल रानी देवी था। वो अपनी माता-पिता की चौथी संतान थे। जब जयप्रकाश 9 साल के थे तब वो अपना गाँव छोड़कर कॉलेजिएट स्कूल में दाखिला लेने के लिए पटना चले गए। स्कूल में उन्हें सरस्वती, प्रभा और प्रताप जैसी पत्रिकाओं को पढने का मौका मिला। उन्होंने भारत-भारती, मैथिलीशरण गुप्त और भारतेंदु हरिश्चंद्र के कविताओं को भी पढ़ा। इसके अलावा उन्हें भगवत गीता पढने का भी अवसर मिला।

1920 में जब जयप्रकाश 18 वर्ष के थे तब उनका विवाह प्रभावती देवी से हुआ। विवाह के उपरान्त जयप्रकाश अपनी पढाई में व्यस्त थे इसलिए प्रभावती को अपने साथ नहीं रख सकते थे इसलिए प्रभावती विवाह के उपरांत कस्तूरबा गांधी के साथ गांधी आश्रम मे रहीं। मौलाना अबुल कलाम आजाद के भाषण से प्रभावित होकर उन्होंने पटना कॉलेज छोड़कर बिहार विद्यापीठ में दाखिला ले लिया। बिहार विद्यापीठ में पढाई के पश्चात सन 1922 में जयप्रकाश आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चले गए।

अमेरिका जाकर उन्होंने जनवरी 1923 में बर्कले विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। अमेरिका में अपनी पढाई का खर्चा उठाने के लिए उन्होंने खेतों, कंपनियों, रेस्टोरेन्टों इत्यादि में कार्य किया। इसी दौरान उन्हें श्रमिक वर्ग के परेशानियों का ज्ञान हुआ और वे मार्क्स के समाजवाद से प्रभावित हुए। इसके पश्चात उन्होने एम.ए. की डिग्री हासिल की पर पी.एच.डी पूरी न कर सके क्योंकि माताजी की तबियत ठीक न होने के कारण उन्हें भारत वापस लौटना पड़ा।

★★★ भारत वापसी और स्वाधीनता आन्दोलन :

जयप्रकाश नारायण जब 1929 में अमेरिका से लौटे तब स्वतंत्रता संग्राम तेज़ी पर था। धीरे-धीरे उनका संपर्क जवाहर लाल नेहरु और महात्मा गाधी से हुआ और वो स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बने। 1932 मे सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान जब गांधी, नेहरु समेत अन्य महत्वपूर्ण कांग्रेसी जेल चले गए तब उन्होने भारत के अलग-अलग हिस्सों मे आन्दोलन को दिशा दी। ब्रिटिश सरकार ने अन्ततः उन्हें भी मद्रास में सितंबर 1932 मे गिरफ्तार कर लिया गया और नासिक जेल भेज दिया। नासिक जेल में उनकी मुलाकात अच्युत पटवर्धन, एम. आर. मासानी, अशोक मेहता, एम. एच. दांतवाला, और सी. के. नारायणस्वामी जैसे नेताओं से हुई। इन नेताओं के विचारों ने कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी (सी.एस.पी) की नींव रखी। जब कांग्रेस ने 1934 मे चुनाव मे हिस्सा लेने का फैसला किया तब कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी ने इसका विरोध किया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया और ऐसे अभियान चलाये जिससे सरकार को मिलने वाला राजस्व रोका जा सके। इस दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 9 महीने की कैद की सज़ा सुनाई गई। उन्होने गांधी और सुभाष चंद्र बोस के बीच मतभेदों को सुलझाने का प्रयास भी किया। सन 1942 में भारत छोडो आंदोलन के दौरान वे हजारीबाग जेल से फरार हो गए थे।

★★★ आजादी के बाद और आपातकाल :

आजादी के बाद कई सरकारों ने घोटाले और षड़यंत्र किए जिनसे देश और समाज का बहुत नुकसान हुआ। देश में महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी व्याप्त थी ऐसे समय में जय प्रकाश नारायण ने आगे आकर युवाओं के माध्यम से जनता को एकत्रित किया। उन्होंने कहा ये सारी समस्याएं तभी दूर हो सकती हैं, जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रान्ति-सम्पूर्ण क्रान्ति आवश्यक है। उनके अहिंसावादी आंदोलन की सूरत को देखकर कुछ लोगों ने उन्हें आजाद भारत के गांधी की उपाधि दी थी। जे.पी. आन्दोलन बिहार से शुरू होकर पूरे भारत में कब फैल गया पता ही नहीं चला।

जे.पी. एक जमाने में कांग्रेस के सहयोगी थे लेकिन आजादी के लगभग दो दशक बाद आई इंदिरा गांधी सरकार के भ्रष्ट व अलोकतांत्रिक तरीकों ने उन्हें कांग्रेस और इंदिरा के विरोध में खड़ा कर दिया। इसी बीच सन 1975 में अदालत में इंदिरा गांधी पर चुनावों में भ्रष्टाचार का आरोप साबित हो गया और जयप्रकाश ने विपक्ष को एकजुट कर उनके इस्तीफे की मांग की। इसके परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय आपातकाल लागू कर दिया और जे.पी. समेत हजारों विपक्षी नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया। जनवरी 1977 को इंदिरा गाँधी सरकार ने आपातकाल हटाने का फैसला किया। मार्च 1977 में चुनाव हुए  और लोकनायक के “संपूर्ण क्रांति आदोलन” के चलते भारत में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी।

★★★ निधन :

आन्दोलन के दौरान ही उनका स्वास्थ्य बिगड़ना शुरू हो गया था। आपातकाल में जेल में बंद रहने के दौरान उनकी तबियत अचानक 24 अक्टूबर 1976 को ख़राब हो गयी और 12 नवम्बर 1976 को उन्हें रिहा कर दिया गया। मुंबई के जसलोक अस्पताल में जांच के बाद पता चला की उनकी किडनी ख़राब हो गयी थी जिसके बाद वो डायलिसिस पर ही रहे। जयप्रकाश नारायण का निधन 8 अक्टूबर, 1979 को पटना में मधुमेह और ह्रदय रोग के कारण हो गया।


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स्वामी विवेकानंद...

स्वामी विवेकानन्द



 

★★★ जन्म :

12 जनवरी, 1863 कलकत्ता

★★★ स्वर्गवास :

4 जुलाई, 1902 बेलूर

 

★★★ उपलब्धियां :

एक युवा संन्यासी के रूप में भारतीय संस्कृति की सुगन्ध विदेशों में बिखरने वाले साहित्य, दर्शन और इतिहास के प्रकाण्ड विद्वान थे। विवेकानन्द जी का मूल नाम 'नरेंद्रनाथ दत्त' था, जो कि आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द के नाम से विख्यात हुए। युगांतरकारी आध्यात्मिक गुरु, जिन्होंने हिन्दू धर्म को गतिशील तथा व्यवहारिक बनाया और सुदृढ़ सभ्यता के निर्माण के लिए आधुनिक मानव से पश्चिमी विज्ञान व भौतिकवाद को भारत की आध्यात्मिक संस्कृति से जोड़ने का आग्रह किया। कलकत्ता के एक कुलीन परिवार में जन्मे नरेंद्रनाथ चिंतन, भक्ति व तार्किकता, भौतिक एवं बौद्धिक श्रेष्ठता के साथ-साथ संगीत की प्रतिभा का एक विलक्षण संयोग थे। भारत में स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

★★★ जीवन परिचय :

श्री विश्वनाथदत्त पाश्चात्य सभ्यता में आस्था रखने वाले व्यक्ति थे। श्री विश्वनाथदत्त के घर में उत्पन्न होने वाला उनका पुत्र नरेन्द्रदत्त पाश्चात्य जगत् को भारतीय तत्त्वज्ञान का सन्देश सुनाने वाला महान विश्व-गुरु बना। स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता), भारत में हुआ। रोमा रोलाँ ने नरेन्द्रदत्त (भावी विवेकानन्द) के सम्बन्ध में ठीक कहा है- 'उनका बचपन और युवावस्था के बीच का काल योरोप के पुनरूज्जीवन-युग के किसी कलाकार राजपुत्र के जीवन-प्रभात का स्मरण दिलाता है।'

बचपन से ही नरेन्द्र में आध्यात्मिक पिपासा थी। सन् 1884 में पिता की मृत्यु के पश्चात परिवार के भरण-पोषण का भार भी उन्हीं पर पड़ा। स्वामी विवेकानन्द ग़रीब परिवार के थे। नरेन्द्र का विवाह नहीं हुआ था। दुर्बल आर्थिक स्थिति में स्वयं भूखे रहकर अतिथियों के सत्कार की गौरव-गाथा उनके जीवन का उज्ज्वल अध्याय है। नरेन्द्र की प्रतिभा अपूर्व थी। उन्होंने बचपन में ही दर्शनों का अध्ययन कर लिया। ब्रह्मसमाज में भी वे गये, पर वहाँ उनकी जिज्ञासा शान्त न हुई। प्रखर बुद्धि साधना में समाधान न पाकर नास्तिक हो चली।

★★★ शिक्षा :

1879 में 16 वर्ष की आयु में उन्होंने कलकत्ता से प्रवेश परीक्षा पास की। अपने शिक्षा काल में वे सर्वाधिक लोकप्रिय और एक जिज्ञासु छात्र थे। किन्तु हरबर्ट स्पेन्सर के नास्तिकवाद का उन पर पूरा प्रभाव था। उन्होंने से स्नातक उपाधि प्राप्त की और ब्रह्म समाज में शामिल हुए, जो हिन्दू धर्म में सुधार लाने तथा उसे आधुनिक बनाने का प्रयास कर रहा था।

★★★ रामकृष्ण से भेंट :

युवावस्था में उन्हें पाश्चात्य दार्शनिकों के निरीश्वर भौतिकवाद तथा ईश्वर के अस्तित्व में दृढ़ भारतीय विश्वास के कारण गहरे द्वंद्व से गुज़रना पड़ा। परमहंस जी जैसे जौहरी ने रत्न को परखा। उन दिव्य महापुरुष के स्पर्श ने नरेन्द्र को बदल दिया। इसी समय उनकी भेंट अपने गुरु रामकृष्ण से हुई, जिन्होंने पहले उन्हें विश्वास दिलाया कि ईश्वर वास्तव में है और मनुष्य ईश्वर को पा सकता है। रामकृष्ण ने सर्वव्यापी परमसत्य के रूप में ईश्वर की सर्वोच्च अनुभूति पाने में नरेंद्र का मार्गदर्शन किया और उन्हें शिक्षा दी कि सेवा कभी दान नहीं, बल्कि सारी मानवता में निहित ईश्वर की सचेतन आराधना होनी चाहिए।

यह उपदेश विवेकानंद के जीवन का प्रमुख दर्शन बन गया। कहा जाता है कि उस शक्तिपात के कारण कुछ दिनों तक नरेन्द्र उन्मत्त-से रहे। उन्हें गुरु ने आत्मदर्शन करा दिया था। पचीस वर्ष की अवस्था में नरेन्द्रदत्त ने काषायवस्त्र धारण किये। अपने गुरु से प्रेरित होकर नरेंद्रनाथ ने सन्न्यासी जीवन बिताने की दीक्षा ली और स्वामी विवेकानंद के रूप में जाने गए। जीवन के आलोक को जगत के अन्धकार में भटकते प्राणियों के समक्ष उन्हें उपस्थित करना था। स्वामी विवेकानंद ने पैदल ही पूरे भारत की यात्रा की।

★★★ देश का पुनर्निर्माण :

रामकृष्ण की मृत्यु के बाद उन्होंने स्वयं को हिमालय में चिंतनरूपी आनंद सागर में डुबाने की चेष्टा की, लेकिन जल्दी ही वह इसे त्यागकर भारत की कारुणिक निर्धनता से साक्षात्कार करने और देश के पुनर्निर्माण के लिए समूचे भारत में भ्रमण पर निकल पड़े। इस दौरान उन्हें कई दिनों तक भूखे भी रहना पड़ा। इन छ्ह वर्षों के भ्रमण काल में वह राजाओं और दलितों, दोनों के अतिथि रहे। उनकी यह महान यात्रा कन्याकुमारी में समाप्त हुई, जहाँ ध्यानमग्न विवेकानंद को यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की ओर रुझान वाले नए भारतीय वैरागियों और सभी आत्माओं, विशेषकर जनसाधारण की सुप्त दिव्यता के जागरण से ही इस मृतप्राय देश में प्राणों का संचार किया जा सकता है।

भारत के पुनर्निर्माण के प्रति उनके लगाव ने ही उन्हें अंततः 1893 में शिकागो धर्म संसद में जाने के लिए प्रेरित किया, जहाँ वह बिना आमंत्रण के गए थे, परिषद में उनके प्रवेश की अनुमति मिलनी ही कठिन हो गयी। उनको समय न मिले, इसका भरपूर प्रयत्न किया गया। भला, पराधीन भारत क्या सन्देश देगा- योरोपीय वर्ग को तो भारत के नाम से ही घृणा थी। एक अमेरिकन प्रोफेसर के उद्योग से किसी प्रकार समय मिला और 11 सितंबर सन् 1893 के उस दिन उनके अलौकिक तत्वज्ञान ने पाश्चात्य जगत को चौंका दिया। अमेरिका ने स्वीकार कर लिया कि वस्तुत: भारत ही जगद्गुरु था और रहेगा।

स्वामी विवेकानन्द ने वहाँ भारत और हिन्दू धर्म की भव्यता स्थापित करके ज़बरदस्त प्रभाव छोड़ा। 'सिस्टर्स ऐंड ब्रदर्स ऑफ़ अमेरिका' (अमेरिकी बहनों और भाइयों) के संबोधन के साथ अपने भाषण की शुरुआत करते ही 7000 प्रतिनिधियों ने तालियों के साथ उनका स्वागत किया। विवेकानंद ने वहाँ एकत्र लोगों को सभी मानवों की अनिवार्य दिव्यता के प्राचीन वेदांतिक संदेश और सभी धर्मों में निहित एकता से परिचित कराया। सन् 1896 तक वे अमेरिका रहे। उन्हीं का व्यक्तित्व था, जिसने भारत एवं हिन्दू-धर्म के गौरव को प्रथम बार विदेशों में जागृत किया।

धर्म एवं तत्वज्ञान के समान भारतीय स्वतन्त्रता की प्रेरणा का भी उन्होंने नेतृत्व किया। स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे- 'मैं कोई तत्ववेत्ता नहीं हूँ। न तो संत या दार्शनिक ही हूँ। मैं तो ग़रीब हूँ और ग़रीबों का अनन्य भक्त हूँ। मैं तो सच्चा महात्मा उसे ही कहूँगा, जिसका हृदय ग़रीबों के लिये तड़पता हो।'

★★★ शिष्यों का समूह :

पाँच वर्षों से अधिक समय तक उन्होंने अमेरिका के विभिन्न नगरों, लंदन और पेरिस में व्यापक व्याख्यान दिए। उन्होंने जर्मनी, रूस और पूर्वी यूरोप की भी यात्राएं कीं। हर जगह उन्होंने वेदांत के संदेश का प्रचार किया। कुछ अवसरों पर वह चरम अवस्था में पहुँच जाते थे, यहाँ तक कि पश्चिम के भीड़ भरे सभागारों में भी। यहाँ उन्होंने समर्पित शिष्यों का समूह बनाया और उनमें से कुछ को अमेरिका के 'थाउज़ेंड आइलैंड पार्क' में आध्यात्मिक जीवन में प्रशिक्षित किया। उनके कुछ शिष्यों ने उनका भारत तक अनुसरण किया। स्वामी विवेकानन्द ने विश्व भ्रमण के साथ उत्तराखण्ड के अनेक क्षेत्रों में भी भ्रमण किया जिनमें अल्मोड़ा तथा चम्पावत में उनकी विश्राम स्थली को धरोहर के रूप में सुरक्षित किया गया है।

★★★ वेदांत धर्म :

1897 में जब विवेकानंद भारत लौटे, तो राष्ट्र ने अभूतपूर्व उत्साह के साथ उनका स्वागत किया और उनके द्वारा दिए गए वेदांत के मानवतावादी, गतिशील तथा प्रायोगिक संदेश ने हज़ारों लोगों को प्रभावित किया। स्वामी विवेकानन्द ने सदियों के आलस्य को त्यागने के लिए भारतीयों को प्रेरित किया और उन्हें विश्व नेता के रूप में नए आत्मविश्वास के साथ उठ खड़े होने तथा दलितों व महिलाओं को शिक्षित करने तथा उनके उत्थान के माध्यम से देश को ऊपर उठाने का संदेश दिया। स्वामी विवेकानन्द ने घोषणा की कि सभी कार्यों और सेवाओं को मानव में पूर्णतः व्याप्त ईश्वर की परम आराधना बनाकर वेदांत धर्म को व्यवहारिक बनाया जाना ज़रूरी है।

वह चाहते है कि भारत पश्चिमी देशों में भी आध्यात्मिकता का प्रसार करे। स्वामी विवेकानन्द ने घोषणा की कि सिर्फ़ अद्वैत वेदांत के आधार पर ही विज्ञान और धर्म साथ-साथ चल सकते हैं, क्योंकि इसके मूल में अवैयक्तिक ईश्वर की आधारभूत धारणा, सीमा के अंदर निहित अनंत और ब्रह्मांड में उपस्थित सभी वस्तुओं के पारस्परिक मौलिक संबंध की दृष्टि है। उन्होंने सभ्यता को मनुष्य में दिव्यता के प्रतिरूप के तौर पर परिभाषित किया और यह भविष्यवाणी भी की कि एक दिन पश्चिम जीवन की अनिवार्य दिव्यता के वेदांतिक सिद्धान्त की ओर आकर्षित होगा।

विवेकानंद के संदेश ने पश्चिम के विशिष्ट बौद्धिकों, जैसे विलियम जेम्स, निकोलस टेसला, अभिनेत्री सारा बर्नहार्ड और मादाम एम्मा काल्व, एंग्लिकन चर्च, लंदन के धार्मिक चिंतन रेवरेंड कैनन विल्वरफ़ोर्स, और रेवरेंड होवीस तथा सर पैट्रिक गेडेस, हाइसिंथ लॉयसन, सर हाइरैम नैक्सिम, नेल्सन रॉकफ़ेलर, लिओ टॉल्स्टॉय व रोम्यां रोलां को भी प्रभावित किया। अंग्रेज़ भारतविद ए. एल बाशम ने विवेकानंद को इतिहास का पहला व्यक्ति बताया, जिन्होंने पूर्व की आध्यात्मिक संस्कृति के मित्रतापूर्ण प्रत्युत्तर का आरंभ किया और उन्हें आधुनिक विश्व को आकार देने वाला घोषित किया।

★★★ मसीहा के रूप में :

अरबिंदो घोष, सुभाषचंद्र बोस, सर जमशेदजी टाटा, रबींद्रनाथ टैगोर तथा महात्मा गांधी जैसे महान व्यक्तियों ने स्वामी विवेकानन्द को भारत की आत्मा को जागृत करने वाला और भारतीय राष्ट्रवाद के मसीहा के रूप में देखा। विवेकानंद 'सार्वभौमिकता' के मसीहा के रूप में उभरे। स्वामी विवेकानन्द पहले अंतरराष्ट्रवादी थे, जिन्होंने 'लीग ऑफ़ नेशन्स' के जन्म से भी पहले वर्ष 1897 में अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, ठबंधनों और क़ानूनों का आह्वान किया, जिससे राष्ट्रों के बीच समन्वय स्थापित किया जा सके।

★★★ स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित :

विवेकानंद ने 1 मई 1897 में कलकत्ता में रामकृष्ण मिशन और 9 दिसंबर 1898 को कलकत्ता के निकट गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की। उनके अंग्रेज़ अनुयायी कैप्टन सर्वियर और उनकी पत्नी ने हिमालय में 1899 में 'मायावती अद्वैत आश्रम' खोला। इसे सार्वभौमिक चेतना के अद्वैत दृष्टिकोण के एक अद्वितीय संस्थान के रूप में शुरू किया गया और विवेकानंद की इच्छानुसार, इसे उनके पूर्वी और पश्चिमी अनुयायियों का सम्मिलन केंद्र बनाया गया। विवेकानंद ने बेलूर में एक दृश्य प्रतीक के रूप में सभी प्रमुख धर्मों के वास्तुशास्त्र के समन्वय पर आधारित रामकृष्ण मंदिर के भावी आकार की रूपरेखा भी बनाई, जिसे 1937 में उनके साथी शिष्यों ने पूरा किया।

★★★ ग्रन्थों की रचना :

'योग', 'राजयोग' तथा 'ज्ञानयोग' जैसे ग्रंथों की रचना करके विवेकानन्द ने युवा जगत को एक नई राह दिखाई है, जिसका प्रभाव जनमानस पर युगों-युगों तक छाया रहेगा। कन्याकुमारी में निर्मित उनका स्मारक आज भी उनकी महानता की कहानी कह रहा है।

★★★ मृत्यु :

उनके ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि विश्वभर में है। जीवन के अंतिम दिन उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा एक और विवेकानंद चाहिए, यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है। प्रत्यदर्शियों के अनुसार जीवन के अंतिम दिन भी उन्होंने अपने 'ध्यान' करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रात: दो तीन घंटे ध्यान किया। उन्हें दमा और शर्करा के अतिरिक्त अन्य शारीरिक व्याधियों ने घेर रखा था।

उन्होंने कहा भी था, 'ये बीमारियाँ मुझे चालीस वर्ष के आयु भी पार नहीं करने देंगी।' 4 जुलाई, 1902 को बेलूर में रामकृष्ण मठ में उन्होंने ध्यानमग्न अवस्था में महासमाधि धारण कर प्राण त्याग दिए। उनके शिष्यों और अनुयायियों ने उनकी स्मृति में वहाँ एक मंदिर बनवाया और समूचे विश्व में विवेकानंद तथा उनके गुरु रामकृष्ण के संदेशों के प्रचार के लिए 130 से अधिक केंद्रों की स्थापना कीl


भारत की आध्यात्मिक और बौद्धिक परंपरा में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल इतिहास नहीं होते, बल्कि चेतना बन जाते हैं। स्वामी विवेकानंद ऐसा ही एक नाम है। 12 जनवरी 1863 को जन्मे इस महान संत, दार्शनिक और समाज सुधारक ने बहुत कम आयु में वह कर दिखाया, जिसे पीढ़ियाँ केवल समझने का प्रयास करती हैं। उनकी जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाना केवल एक औपचारिक निर्णय नहीं था, बल्कि यह स्वीकारोक्ति थी कि भारत का भविष्य, उसकी युवा चेतना, विवेकानंद के विचारों से ही दिशा पा सकता है। यह दिन हर साल युवाओं को यह याद दिलाने आता है कि शक्ति बाहर नहीं, भीतर होती है, और जब भीतर की आग जागती है, तब राष्ट्र बदलते हैं।


राष्ट्रीय युवा दिवस: एक तारीख नहीं, एक विचार


12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने का उद्देश्य केवल श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि स्वामी विवेकानंद के विचारों को जीवित रखना है। भारत सरकार ने 1984 में इस दिन को मान्यता दी और 1985 से इसे पूरे देश में मनाया जाने लगा। इसके पीछे की सोच साफ थी—युवाओं में आत्मविश्वास, जिम्मेदारी और राष्ट्र निर्माण की भावना को जाग्रत करना। विवेकानंद का जीवन इस बात का प्रमाण है कि युवा उम्र कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत हो सकती है, यदि दिशा सही हो।


कोलकाता का नरेंद्र: जहां से यात्रा शुरू हुई


स्वामी विवेकानंद का जन्म कोलकाता में हुआ। बचपन का नाम था नरेंद्रनाथ दत्त। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाई कोर्ट के प्रसिद्ध वकील थे और माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक, सुसंस्कृत और दृढ़ व्यक्तित्व की धनी थीं। बचपन से ही नरेंद्र असाधारण प्रतिभा के मालिक थे। संगीत, दर्शन, तर्क और साहित्य में उनकी रुचि गहरी थी। ईश्वर को लेकर उनके मन में प्रश्न थे, जिज्ञासा थी, और यही जिज्ञासा उन्हें साधारण जीवन से असाधारण यात्रा की ओर ले गई।


शिक्षा, खोज और रामकृष्ण परमहंस से मिलन


नरेंद्र ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई के दौरान ही उनके भीतर सत्य की खोज और गहरी होती चली गई। इसी खोज ने उन्हें परमहंस रामकृष्ण से मिलाया। यह मिलन केवल गुरु-शिष्य का नहीं था, बल्कि चेतना का संयोग था। रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य में नरेंद्र का जीवन पूरी तरह बदल गया। यही नरेंद्र आगे चलकर स्वामी विवेकानंद बने। ब्रह्म समाज से जुड़ाव, वेदांत का अध्ययन और समाज की पीड़ा को नजदीक से देखने का अनुभव—इन सबने उनके विचारों को आकार दिया।


शिकागो का मंच और भारत की वैश्विक पहचान


1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनका भाषण केवल शब्द नहीं था, वह भारत की आत्मा की आवाज़ था। “मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों” से शुरू हुआ उनका संबोधन आज भी इतिहास के सबसे प्रभावशाली भाषणों में गिना जाता है। उस दिन दुनिया ने भारत को एक नए दृष्टिकोण से देखा—एक ऐसे देश के रूप में, जो सहिष्णुता, करुणा और आध्यात्मिक गहराई का प्रतीक है। इस एक भाषण ने स्वामी विवेकानंद को वैश्विक पहचान दिला दी और भारत को सम्मान।


रामकृष्ण मिशन और सेवा का दर्शन


स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन और बेलूर मठ की स्थापना की। उनके लिए धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं था, बल्कि मानव सेवा का माध्यम था। उनका मानना था कि भूखे को रोटी खिलाना, बीमार की सेवा करना और अशिक्षित को शिक्षा देना ही सच्ची ईश्वर-भक्ति है। आज भी रामकृष्ण मिशन शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा के क्षेत्र में इसी विचार को आगे बढ़ा रहा है।


गिरता स्वास्थ्य, अडिग संकल्प


जीवन के अंतिम वर्षों में स्वामी विवेकानंद कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। अस्थमा, मधुमेह और अनिद्रा ने शरीर को कमजोर कर दिया था, लेकिन मन अडिग रहा। स्वास्थ्य गिरने के कारण वे 1901 की विश्व धर्म संसद में शामिल नहीं हो सके, फिर भी लेखन, ध्यान और मिशन के विस्तार में लगे रहे। उनका मानना था कि शरीर नश्वर है, लेकिन कार्य अमर होते हैं।


आखिरी दिन: ध्यान और महासमाधि


4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में उनका अंतिम दिन भी अन्य दिनों जैसा ही शुरू हुआ। सुबह लंबा ध्यान, छात्रों को शुक्ल यजुर्वेद और योग का ज्ञान, और वैदिक कॉलेज की योजना पर चर्चा। शाम होते-होते वे फिर ध्यान में लीन हो गए और शिष्यों को स्पष्ट निर्देश दिए कि उन्हें बाधित न किया जाए। रात लगभग 9:20 बजे ध्यान की अवस्था में ही उन्होंने महासमाधि ले ली। शिष्यों का मानना था कि उन्होंने शरीर नहीं छोड़ा, बल्कि चेतना को पूर्णता तक पहुंचाया।


पहले ही कह दिया था: जीवन का उद्देश्य पूरा हो चुका


स्वामी विवेकानंद अक्सर कहते थे कि वे 40 वर्ष से अधिक नहीं जिएंगे। उनका विश्वास था कि उनका कार्य पूरा हो चुका है—भारत और विश्व को आत्मविश्वास, सेवा और आध्यात्मिक जागरण का मार्ग दिखाना। 39 वर्ष की आयु में उनका देहांत हुआ, लेकिन उनके विचार आज भी जीवित हैं।


वो विरासत जो कभी समाप्त नहीं होगी


शिक्षा में व्यावहारिकता, मानव सेवा को धर्म बनाना, भारतीय संस्कृति पर गर्व, धार्मिक सहिष्णुता, योग और ध्यान का वैश्विक प्रचार—ये सब स्वामी विवेकानंद की अमर देन हैं। उनका संदेश “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए” आज भी युवाओं की नसों में ऊर्जा भर देता है।


स्वामी विवेकानंद केवल एक संत नहीं थे। वे एक विचार थे। एक चेतावनी थे। और एक आश्वासन थे—कि यदि युवा जाग गया, तो भारत अजेय बन सकता है।


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Sunday, January 18, 2026

प्रेम

 प्रेम


प्रेम अलग है, जीवन अलग है, समाज अलग है।


 प्रेम इन सब बातो से परे है, प्रेम समाज से परे होकर जीता है और वो उसका अपना ही समाज होता है। प्रेम की असफलता के कई कारण हो सकते है पर प्रेम के होने का सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण हो सकता है और वो प्रेम ही है।


प्रेम हमेशा ही अधूरा होता है। 


जिसे हम पूर्णता समझते है, वो कभी भी प्रेम नहीं हो सकता। प्रेम का कैनवास इतना बड़ा होता है कि एक ज़िन्दगी उसमे समाई नहीं जा सकती है।


जब आप प्रेम में होते है तो आपको पता चलता है कि आप एक ज़िन्दगी भी जी रहे है.....और ज़िन्दगी ; परत दर परत ज़िन्दगी के रहस्य खोलती है, जिसे आप सिर्फ प्रेम ही समझते है और प्रेम में ही जीते है.... और ऐसा जादू सिर्फ और सिर्फ प्रेम में ही होता है...! 


 असली प्रेम तो प्रेम में होना ही होता है, प्रेम में पड़ना, प्रेम में गिरना, प्रेम करना इत्यादि सिर्फ उपरी सतह के प्रेम होते है। 


असली प्रेम तो बस प्रेम में होना, प्रेम ही हो जाना होता है।


प्रेम बस प्रेम ही ! और कुछ नहीं !


एक अच्छा साथी आपको कभी इस बात को लेकर उलझन में नहीं डालेगा कि आपकी जगह उसके जीवन में क्या है।वह आपसे समय, कोशिश या भरोसे के लिए कभी नहीं तरसाएगा।

एक अच्छा साथी तब भी आपको सही तरीके से संभालेगा जब वह थका हुआ हो।जब वह पूरी तरह समझ न पाए फिर भी वह परवाह करना चुनेगा।

वह आपको सुनेगा, बिना यह महसूस कराए कि आप ज़रूरत से ज़्यादा भावुक हैं।वह आपकी भावनाओं को नकारेगा नहीं, उनका सम्मान करेगा।

वह सार्वजनिक जगहों पर भी और निजी पलों में भी आपकी भावनाओं का हिफ़ाज़त करेगा। एक अच्छा साथी आपकी सहनशक्ति को परखने के लिए सीमाएँ नहीं लांघता।वह खेल नहीं खेलता, अचानक ग़ायब नहीं होता और आपको कभी भी बदले जा सकने जैसा महसूस नहीं कराता।

वह बेचैनी नहीं..सुकून लाता है। वह गोपनीयता से ज़्यादा ईमानदारी चुनता है। बहानों से ज़्यादा कोशिश।

खोखले वादों से ज़्यादा निरंतरता। अगर आपको पहले ग़लत तरीके से प्यार मिला है,तो सही प्यार थोड़ा अनजाना लग सकता है लेकिन वह कभी बोझिल नहीं लगता।

प्यार को जीने की जंग नहीं होनी चाहिए और अगर यह पढ़ते हुए आप कम में समझौता कर रहे हैं,तो यह याद रखिए बुनियादी सम्मान आपको कमाना नहीं पड़तासही इंसान आपको अच्छा व्यवहार देगा, इसलिए नहीं कि आपने माँगा, बल्कि इसलिए कि वह चाहता है।


प्रेम को अक्सर एक समझौते की तरह देखा जाता है। दो लोगों के बीच तय की गई सीमाएँ, अपेक्षाएँ, वादे, और सुरक्षा की भाषा। ये सब सामाजिक ढाँचे के भीतर उपयोगी हो सकते हैं, पर इनसे प्रेम की गहराई नहीं खुलती। जब प्रेम को केवल रिश्ता मान लिया जाता है, तब वो धीरे धीरे लेन-देन बन जाता है। मैं तुम्हें ये देता हूँ, तुम मुझे वो दो। इस गणित में भावना बची रह सकती है, पर मौन खो जाता है।


बहुत लोग प्रेम को स्थिरता से जोड़ते हैं। नौकरी की तरह, घर की तरह, एक सुरक्षित जगह की तरह। पर जो चीज़ सुरक्षित लगती है, वही कई बार डर से बनी होती है। खोने का डर, अकेले रह जाने का डर, अस्वीकार हो जाने का डर। इस डर के भीतर जो जुड़ाव बनता है, वो अक्सर प्रेम कहलाता है, पर असल में वो एक दूसरे को पकड़ने की कोशिश होती है।


जब कोई कहता है, "मैं तुमसे प्रेम करता हूँ," तो अक्सर इसका मतलब होता है, "तुम मेरी ज़रूरत पूरी करते हो।" ये ज़रूरत भावनात्मक हो सकती है, मानसिक हो सकती है, सामाजिक भी। पर ज़रूरत के भीतर स्वतंत्रता नहीं होती। वहाँ एक अदृश्य अनुबंध होता है, जिसमें दोनों पक्ष एक दूसरे से कुछ माँगते रहते हैं, भले शब्दों में न कहें।


जहाँ "तुम" केंद्र बन जाते हो:


प्रेम का पहला स्तर अक्सर दूसरे को केंद्र बनाता है। सब कुछ उसके चारों ओर घूमने लगता है। उसकी पसंद, उसकी नाराज़गी, उसकी स्वीकृति। ये अवस्था मीठी भी लग सकती है, क्योंकि इसमें समर्पण का स्वाद होता है। पर इस समर्पण में छिपी रहती है एक सूक्ष्म अपेक्षा, कि दूसरा भी वैसा ही करे। जब ऐसा नहीं होता, तो भीतर हल्की सी चोट लगती है।


इस स्तर पर ईर्ष्या जन्म लेती है। डर कि कहीं दूसरा किसी और का न हो जाए, कहीं उसका ध्यान बँट न जाए। प्रेम यहाँ एक सुंदर भावना कम और एक पहरेदार अधिक बन जाता है। हर हँसी, हर देर से आया संदेश, हर बदला हुआ स्वर भीतर सवाल खड़ा कर देता है। बाहर मुस्कान रहती है, भीतर हिसाब चलता रहता है।


इस अवस्था में प्रेम दूसरे को जानने से ज़्यादा, उसे सुरक्षित रखने की कोशिश बन जाता है। जैसे कोई कीमती वस्तु हो, जिसे खोना नहीं है। और जहाँ वस्तु का भाव आ जाता है, वहाँ स्वतंत्रता धीरे धीरे सिकुड़ने लगती है। प्रेम अब खुला आकाश नहीं रहता, एक बाड़ा बन जाता है।


जहाँ "मैं" छिपकर शासन करता है:


धीरे धीरे प्रेम का दूसरा रूप उभरता है, जहाँ केंद्र दूसरा नहीं, बल्कि खुद बन जाता है। यहाँ कहा जाता है, "मैं ऐसा हूँ," "मेरी ज़रूरत ये है," "मुझे ऐसा साथी चाहिए।" प्रेम अब दर्पण बन जाता है, जिसमें इंसान खुद को देखने लगता है। दूसरा व्यक्ति एक साधन की तरह हो जाता है, जिसके ज़रिए खुद को पूरा महसूस किया जा सके।


इस स्तर पर संबंधों में भाषा बदल जाती है। त्याग की जगह अधिकार आ जाता है। समझ की जगह तर्क। कोमलता की जगह शर्तें। कहा नहीं जाता, पर भीतर लिखा रहता है, "मैंने इतना किया, तुमने क्या किया?" प्रेम अब बहाव नहीं रहता, एक खाता बन जाता है।


इस अवस्था में भी टकराव पैदा होता है, पर वजह अलग होती है। पहले डर था कि दूसरा बदल न जाए, अब डर होता है कि मेरा रूप न टूट जाए। मेरी पहचान, मेरी छवि, मेरी अपेक्षाएँ। जब दूसरा इनसे अलग चलता है, तो उसे गलत कहा जाता है, या स्वार्थी, या असंवेदनशील। प्रेम अब देखने का माध्यम नहीं, मापने का औज़ार बन जाता है।


जहाँ "मैं" और "तुम" दोनों गिर जाते हैं:


एक तीसरी अवस्था भी होती है, जो बहुत कम जानी जाती है, और और भी कम जी जाती है। यहाँ न दूसरा केंद्र होता है, न खुद। यहाँ प्रेम किसी व्यक्ति के चारों ओर नहीं घूमता, बल्कि एक ऐसी दृष्टि बन जाता है जिसमें व्यक्ति दिखाई देते हैं, पर केंद्र नहीं रहते।


इस अवस्था में संबंध रहते हैं, पर पकड़ नहीं रहती। साथ होता है, पर स्वामित्व नहीं होता। बोलचाल होती है, पर भीतर हिसाब नहीं चलता। अगर दूसरा बदलता है, तो दर्द हो सकता है, पर अपमान नहीं होता। क्योंकि यहाँ प्रेम को किसी पहचान से बाँधा नहीं गया होता।


इस अवस्था में ईर्ष्या नहीं पनपती, क्योंकि तुलना नहीं होती। डर नहीं टिकता, क्योंकि खोने की भाषा ही नहीं रहती। जो है, वो है। जो चला जाए, वो गया। ये सुनने में कठोर लगता है, पर भीतर से ये बहुत शांत होता है। जैसे नदी बहती है, किसी पत्थर से चिपकती नहीं।


इस प्रेम में कोई घोषणा नहीं होती। कोई कहता नहीं कि अब मैं ऊँचे स्तर पर पहुँच गया हूँ। यहाँ कोई स्तर भी नहीं बचता। बस एक ऐसी निकटता होती है, जिसमें दो शरीर होते हैं, दो जीवन होते हैं, पर देखने की जगह एक होती है।


लहर और पानी का संकेत:


अलगाव की अनुभूति अक्सर भाषा से बनती है। मैं अलग हूँ, तुम अलग हो। मेरी कहानी अलग, तुम्हारी अलग। पर जैसे लहर और पानी को अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही चेतना के स्तर पर ये विभाजन टिक नहीं पाता। लहर ऊँची है, नीची है, तेज़ है, धीमी है, पर पानी वही रहता है।


जब प्रेम इस पानी को पहचान लेता है, तब व्यक्ति का रूप गौण हो जाता है। नाम, भूमिका, अतीत, सब सतह पर रह जाते हैं। भीतर एक ही गति चलती है, एक ही स्पंदन। यहाँ प्रेम देना या लेना नहीं रहता, बस घटित होता है।


इस अवस्था में किसी को सुधारने की इच्छा नहीं होती। न खुद को, न दूसरे को। क्योंकि सुधार की धारणा में भी एक आदर्श छिपा होता है, और आदर्श के साथ तुलना आती है। यहाँ कोई आदर्श नहीं, कोई लक्ष्य नहीं। बस एक खुला देखना है, जिसमें जो है, वही पर्याप्त है।


ऐसा प्रेम रोमांचक नहीं लगता। इसमें न नाटक है, न ऊँची भावनात्मक लहरें। पर इसमें गहराई होती है, जो किसी शब्द से नहीं पकड़ी जा सकती। जैसे गहरा समुद्र, ऊपर से शांत, भीतर अनगिनत धाराएँ।


प्रेम और आत्म-बोध:


जब प्रेम किसी व्यक्ति से बड़ा हो जाता है, तब वो आत्म-बोध से जुड़ जाता है। आत्म-बोध किसी विशेष अनुभव का नाम नहीं, बल्कि इस साफ़ समझ का नाम है कि देखने वाला और जो देखा जा रहा है, वो अलग नहीं हैं। इस समझ में संबंध अपने आप सरल हो जाते हैं।


यहाँ प्रेम कर्तव्य नहीं रहता। कोई ये नहीं कहता कि मुझे ऐसा करना चाहिए। जो होता है, स्वाभाविक होता है। सहायता हो, दूरी हो, साथ हो, मौन हो, सब बिना तनाव के घटता है।


इस अवस्था में शांति कोई उपलब्धि नहीं होती, बल्कि एक स्वाभाविक वातावरण बन जाती है। जैसे सुबह की ठंडी हवा, जो किसी प्रयास से नहीं आती, बस आती है। प्रेम यहाँ साधन नहीं, परिणाम भी नहीं। ये बस एक तरीका है देखने का, जिसमें दुनिया टुकड़ों में नहीं दिखती।


और जब दुनिया टुकड़ों में नहीं दिखती, तब संघर्ष का आधार अपने आप ढीला पड़ जाता है। क्योंकि लड़ाई हमेशा हिस्सों के बीच होती है, पूरे के भीतर नहीं।


स्त्री और पुरुष

 स्त्री और पुरुष का रिश्ता तब सुंदर होता है

           जब दोनों एक दूसरे की थकान समझ लेते है,

           और बिना बोले एक दूसरे का सहारा बन जाते है।


            प्रेम तब पवित्र होता है,

            जब स्त्री सम्मान दे, और पुरुष संवेदनाएं समझे __

            यही से रिश्तों की जड़े गहरी होती है।


            स्त्री दिन से जुड़ती है, पुरुष जिम्मेदारी से.....

            जब दोनों एक दूसरे की भाषा सीख लेते है,

            तभी प्रेम पूर्ण होता है।


            रिश्ता शरीर से नहीं, आत्मा से बंधे तो लंबा चलता है 

            क्योंकि सुंदरता बदलती है, पर समझ और विश्वास नहीं।


            स्त्री को साथ चाहिए, पुरुष को विश्वास __

            जब दोनों को दोनों मिल जाएँ, तो जीवन वरदान बन जाता है


            जहां पुरुष सुरक्षा बनता है, और स्त्री शांति __

            वही प्रेम अपना असली रूप लेता है।


            स्त्री और पुरुष तब परिपक्क होते है,

            जब जीत हार भूल कर रिश्ते को साथ निभाने की कला सीख जाते है।


            जहां स्त्री को सुना जाता है,

            और पुरुष को समझा जाता है__

            वहां प्रेम संघर्ष नहीं, एक साधना बन जाता है।


            रिश्ता तब मजबूत होता है, जब दोनों में से कोई भी 

            खुद को "सही" साबित करने पर अड़ा न हो__

            बल्कि "हम" को बचाने पर टिका हो।


            स्त्री प्रेम में गहराई लाती है, पुरुष प्रेम में स्थिरता__

            और इन दोनों का संतुलन ही घर को घर बनाता है।


                                                            

सुंदरता और रिश्तों की दर्शनशास्त्र

 सुंदरता और रिश्तों की दर्शनशास्त्र...


सुंदरता, जो हम देखते हैं, वह अक्सर केवल प्रकाश की परत होती है एक झिलमिलाहट, एक चमक, एक तात्कालिक आकर्षण। हम इसे देखकर निर्णय करते हैं, और उसी पर भरोसा कर रिश्तों की नींव रखते हैं। पर क्या यह वास्तविक सुंदरता है..???


वास्तविक सुंदरता वह है जो दिखाई नहीं देती। वह हमारी आँखों से नहीं, बल्कि हमारे अंतरमन की दृष्टि से महसूस की जाती है। चेहरे की रेखाएँ, चमक-धमक, मापी-तुली आकृतियाँ ये सब समय के साथ फीके पड़ जाते हैं। वह जो आज हमें लुभा रहा है, कल वही सामान्य, यहां तक कि उबाऊ भी लग सकता है।


हम अपने रिश्तों में अक्सर वही गलती करते हैं हम बाहरी आकर्षण को मूल्य देते हैं और आत्मा की गहराई को अनदेखा कर देते हैं। और यही अनदेखा की गई गहराई समय के साथ अपनी उपस्थिति जताती है वह झगड़े में, शिकायतों में, अनसुलझे सवालों में प्रकट होती है।


सोचिए....क्या कुरूपता वास्तव में उस व्यक्ति में है? या यह हमारी चयन की दृष्टि में कमी है? जब हमने रिश्ता बनाते समय केवल चमक और दिखावे को चुना, तो हमारे मन की अपेक्षाएँ इतनी बड़ी हो जाती हैं कि कोई भी असली इंसान उसे पूरा नहीं कर सकता। इसलिए जो कभी सुंदर था, वही अब संदिग्ध और बेस्वाद लगने लगता है।


दुनिया में हर इंसान अपने आप में अद्वितीय और सुंदर है। हर आत्मा में अपनी रचनात्मकता, सहनशीलता और प्रेम छिपा है। किसी की हँसी में, किसी की चुप्पी में, किसी की संवेदनशीलता में सौंदर्य छिपा है। पर हमने उसे बाज़ार में रख दिया, जहाँ मूल्य तय होता है केवल देखने और दिखाने की क्षमता से।


और इसलिए रिश्ते न केवल टिकते नहीं, बल्कि जल्दी खत्म हो जाते हैं। क्योंकि बाहरी सुंदरता एक छलावा है, एक रूपक, जो समय के साथ बदलता है। केवल आत्मिक सुंदरता वही है जो स्थायी है, जो समय के आँच में और भी गहरी होती है।


संबंध का असली विज्ञान यही है जो दिल से महसूस किया जाए।

जो आत्मा को समझे, उसकी गहराई में उतर सके।

जो खामोशी में भी सुकून दे,

और अंतरात्मा को छू सके।


यदि हम चाहें कि हमारे रिश्ते स्थायी हों, तो हमें सौंदर्य की परिभाषा बदलनी होगी।

हमें चमक-धमक से परे देखना होगा।

हमें उस इंसान के भीतर की रचना, उसकी संवेदनाएँ, उसके विचार और उसका जीवन दृष्टिकोण देखना होगा।


क्योंकि जब आत्मा से आत्मा जुड़ती है,

वह संबंध अनंत और अटूट बन जाता है।

वह संबंध केवल आँखों के लिए नहीं, बल्कि मन और आत्मा के लिए होता है।


और वही सच्ची सुंदरता है जो समय के साथ फीकी नहीं होती, बल्कि गहरी होती जाती है।


AI के दौर...

 AI के दौर में सच्चाई, मेहनत और भरोसे की लड़ाई


कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI ने रचनात्मक दुनिया को नई दिशा दी है, लेकिन इसी के साथ उसने समाज को एक नई और गहरी कशमकश में भी डाल दिया है। यह कशमकश है—सच्चाई और संदेह के बीच, मेहनत और भ्रम के बीच, इंसान और मशीन के बीच।

आज यदि कोई व्यक्ति किसी विषय पर गंभीरता से लिखता है, तो यह काम किसी एक सेकंड में नहीं होता। कई बार दो-दो घंटे लग जाते हैं शब्दों को गढ़ने में, भावनाओं को पंक्तियों में ढालने में। लेख लिखने के बाद भी यात्रा खत्म नहीं होती। उसी कंटेंट के अनुरूप दृश्य की कल्पना की जाती है, स्थान चुना जाता है, भाव तय किया जाता है और फिर जाकर एक तस्वीर क्लिक होती है। सही रोशनी का इंतज़ार, सही पोज़, सही भाव—यह सब समय और धैर्य मांगता है।

लेकिन अफ़सोस, इतनी मेहनत को नकारने में किसी को एक पल भी नहीं लगता।

बस एक वाक्य—“ये तो AI से बनी है।”

और घंटों की साधना, ईमानदारी और सच्चाई को झूठ के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

क्या अब घोड़े पर बैठना असंभव हो गया है?

क्या गंगा के किनारे बैठकर तस्वीर खिंचवाना अविश्वसनीय हो गया है?

या फिर अब हर सुंदर, सजीव और प्रभावशाली तस्वीर को संदेह की नजर से देखना हमारी आदत बन गई है?

तस्वीरें केवल दृश्य नहीं होतीं। वे किसी के शौक, मेहनत, समय और भावनाओं का प्रमाण होती हैं। किसी को तस्वीरें क्लिक कराने का शौक है—यह उसका अधिकार है, उसकी अभिव्यक्ति है। लेकिन आज स्थिति यह है कि वास्तविक तस्वीरों को भी AI की उपज कहकर खारिज कर दिया जाता है। यह केवल तकनीकी भ्रम नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का पतन है।

मैं स्पष्ट रूप से कहती हूँ—ऐसे AI पर रोक लगनी चाहिए, जो हर चीज़ में संदेह पैदा कर रहा है।

जो तकनीक रचनात्मकता को बढ़ाने के लिए बनी थी, वही आज इंसान की सच्चाई पर सवाल उठा रही है। यह स्वीकार्य नहीं है।

यदि AI से तस्वीरें बनाई जा रही हैं, तो उन पर स्पष्ट और अनिवार्य वॉटरमार्क होना चाहिए—Artificial Intelligence का। ताकि असली तस्वीरें अपनी पहचान के साथ खड़ी रह सकें और मेहनत करने वाले को बार-बार खुद को साबित न करना पड़े।

तकनीक का काम सुविधा देना है, अविश्वास फैलाना नहीं।

जब सच्चाई को प्रमाण देना पड़े और झूठ सहज स्वीकार कर लिया जाए, तब समझ लेना चाहिए कि समस्या तस्वीरों में नहीं—व्यवस्था में है।

आज ज़रूरत है तकनीक को अपनाने की, लेकिन विवेक और संवेदना के साथ। AI का उपयोग हो, लेकिन इंसान की मेहनत की कीमत पर नहीं। क्योंकि अंततः यह लड़ाई तस्वीरों की नहीं है—

यह लड़ाई भरोसे की है।

स्त्रियाँ एक भ्रमित पुरुष से प्रेम करती हैं

 स्त्रियाँ एक भ्रमित पुरुष से प्रेम करती हैं। वे हमेशा किसी भ्रमित पुरुष की तलाश में रहती हैं—किसी ऐसे की जो थोड़ा पागल, थोड़ा सनकी हो। क्योंकि पागलपन में एक आकर्षण होता है; जो व्यक्ति उन्मत्त, भ्रमित होता है, उसमें एक खास चुंबकत्व होता है। वह संभावनाओं से भरा होता है, सपनों से भरा होता है। स्त्रियाँ स्वप्नदर्शी से प्रेम करती हैं।


और पुरुष? पुरुष एक समझदार, स्थिर स्त्री से प्रेम करते हैं—नहीं तो वे सचमुच पागल हो जाएँ—उन्हें धरती पर टिकाए रखने के लिए। स्त्री धरती का प्रतीक है। पुरुष को स्त्री की ज़रूरत है, क्योंकि उसके अपने अस्तित्व में जड़ें नहीं होतीं। उसे स्त्री चाहिए—वह गर्म धरती, वह गहरी मिट्टी—जहाँ वह अपनी जड़ें फैला सके और धरती से जुड़ा रह सके। वह डरता है—उसके पास पंख तो हैं, लेकिन जड़ें नहीं। और उसे भय है कि यदि वह धरती को थामे नहीं रहा, तो कहीं वह उड़ न जाए, अनंत आकाश में विलीन न हो जाए, और फिर लौटना संभव न रहे। यही डर लोगों को स्त्रियों के पीछे दौड़ाता है।


और स्त्री के पास पंख नहीं होते। उसके पास जड़ें होती हैं—गहरी जड़ें; स्त्री शुद्ध धरती है। और उसे डर है कि यदि वह अकेली रह गई, तो वह कभी अज्ञात में उड़ नहीं पाएगी। पुरुष स्त्री के बिना नहीं रह सकता, क्योंकि तब वह अपनी जड़ें खो देता है। वह बस एक आवारा बन जाता है।


फिर उसका कहीं कोई ठिकाना नहीं रहता। ज़रा उस पुरुष को देखो जिसके जीवन में कोई स्त्री नहीं है: वह कहीं का नहीं रहता, उसका कोई घर नहीं होता, वह बहता हुआ लकड़ी का टुकड़ा बन जाता है—लहरें उसे जहाँ चाहें ले जाती हैं—जब तक कि वह कहीं किसी स्त्री के साथ उलझ न जाए; तब घर का जन्म होता है। शोधकर्ता कहते हैं कि ‘घर’ स्त्री की रचना है। यदि पुरुष अकेला रहता, तो न घर होता और न ही सभ्यता।


स्त्री के बिना पुरुष एक भटका हुआ यात्री है, एक आवारा। इसलिए देर-सवेर उसे जड़ें जमाने की ज़रूरत पड़ती है। स्त्री उसकी धरती बन जाती है। जब तक पुरुष अपने भीतर कुछ ऐसा नहीं खोज लेता जो उसकी धरती बन सके, जब तक वह अपनी ही आंतरिक स्त्री को नहीं खोज लेता, तब तक उसे बाहरी स्त्री की तलाश करनी ही पड़ेगी।”


बेटियों को समझाया जाए

अवैध संबंधों से सिर्फ संस्कार ही बचा सकते हैं...

बेटियों को समझाया जाए कि ऐसे संबंध ही ना बने जो अनैतिक हो ☝️

बेटियों को गुड टच बैड टच का पाठ पढ़ाया जाए।

बेटियों को समझाया जाए की शादी से पहले किसी को ग़लत तरीके से टच करने ना दे ।


स्त्री हो या पुरुष,किसी से दोस्ती रखो तो फासला भी रखो, 

((क्योंकि आजकल लेस्बियन सेक्स फिर समलैंगिक शादी की बाढ़ सी आ गई है))


यदि कोई प्रेम भी करता है तो शादी के बाद ही शारीरिक संबंध बनाने के लिए कहो अगर वह इंतजार करता है तो ही वह सच्चा प्रेमी है वरना तुम्हारा शोषण होना तय है..!!इतना सस्ता ना समझे कि कोई भी तुम्हें निचोड़ कर चला जाए..!

......... ...... ......... ...... ........ ...... ..... ..... .....

नारी का शरीर एक शक्ति का रूप है, वह सृजन करती है प्रकृति की सहायिका है, हर कोई उसका सम्मान करें इससे पहले नारी को खुद अपना सम्मान करना होगा। किसी को इतना करीब आने की इजाजत ही न दे चाहे कोई भी हो..❗

हर रिश्ते की कुछ मर्यादाएं होती है, जिन्हें हमें नहीं लांघनी चाहिए..

ग़लत राह पर जाते देख माता-पिता, भाई या पति की फटकार और हिदायतें वही लक्ष्मण रेखाएं हैं, जो हमें नहीं लांघनी चाहिए..!


सम्भोग के बाद का पल

 "सम्भोग के बाद का पल"


सम्भोग केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि ऊर्जा, मन और इंद्रियों का जटिल समन्वय है। उसके बाद का क्षण भी उतना ही गहन और संवेदनशील होता है। पुरुष और स्त्री दोनों का अनुभव अलग होता है, और उसे समझना आत्म-जागरूकता और आपसी सामंजस्य के लिए आवश्यक है।


1. पुरुष का अनुभव


सम्भोग के बाद पुरुष का शरीर और मन अचानक शिथिल और आराम की ओर झुकता है।


शारीरिक अनुभव:


लिंग ढीला पड़ता है, मांसपेशियों में थकान।


हृदय गति धीरे-धीरे सामान्य हो जाती है।


साँसें लंबी, धीमी और गहरी हो जाती हैं।


शरीर भारीपन और ऊर्जा के बहाव की कमी महसूस करता है।


मानसिक स्थिति:


पुरुष आत्मनिरीक्षण की ओर झुकता है।


अनुभव को पचाने और ऊर्जा को स्थिर करने की आवश्यकता होती है।


संवेदनाओं पर ध्यान कम हो जाता है; मन अंदर की ओर केंद्रित होता है।


इंद्रिय अनुभव:


स्पर्श और नज़दीकी की तीव्रता कम।


आंखें आधी बंद, शरीर शिथिल और आराम की स्थिति में।


पुरुष इस समय अनुभव को अंदर की दुनिया में संजोता है। यह समय उसके लिए एकांत और मानसिक स्थिरता का है।


2. स्त्री का अनुभव


स्त्री का शरीर सम्भोग के बाद भी ऊर्जावान और संवेदनशील बना रहता है। उसका अनुभव अभी भी तीव्र और विस्तृत होता है।


शारीरिक अनुभव:


त्वचा पर हल्की गर्माहट, हर स्पर्श में संवेदना।


स्तन, योन और हाथ-पैर में हल्की हलचल, ऊर्जा पूरे शरीर में फैलती है।


श्वास गहरी और नियमित, कभी-कभी हृदय की धड़कन तेज़।


मानसिक स्थिति:


साझा अनुभव की चाह, भावनाओं और संवेदनाओं के केंद्र में बनी रहती है।


मानसिक रूप से अभी भी जुड़ी हुई और जागरूक।


इंद्रिय अनुभव:


हर हल्का स्पर्श, हर साँस, हर हृदय की धड़कन उसे भीतर से खिला हुआ और आनंदित महसूस कराती है।


संवेदनाएं गहरी और जीवंत बनी रहती हैं।


स्त्री इस समय अनुभव को बाहरी और साझा रूप में जीती है। यह पल उसके लिए खिलने और जुड़ने का समय है।


3. ऊर्जा का प्रवाह और सामंजस्य


सम्भोग के बाद यह अंतर केवल शारीरिक नहीं, बल्कि ऊर्जा का प्रवाह है।


पुरुष ऊर्जा को बाहर छोड़ देता है और थकान अनुभव करता है।


स्त्री वह ऊर्जा ग्रहण करती है और उसे अपने भीतर फैलती हुई स्फूर्ति और आनंद के रूप में अनुभव करती है।


यही अंतर उनके भावनात्मक और मानसिक व्यवहार में दिखाई देता है।


यदि दोनों इस अंतर को समझें और स्वीकार करें, तो यह क्षण केवल शारीरिक संतोष का नहीं बल्कि भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक जुड़ाव का भी स्रोत बन सकता है।


4. पल की सूक्ष्मता: स्पर्श, साँस और हृदय की धड़कन


कल्पना कीजिए इस पल को:


पुरुष की आँखें आधी बंद, शरीर शिथिल, और प्रत्येक साँस धीरे-धीरे बाहर निकलती है।


स्त्री की आँखें चमक रही हैं, हाथ और त्वचा संवेदनाओं को महसूस कर रहे हैं।


उसका हृदय तेज़ धड़क रहा है, उसकी ऊर्जा अभी भी बह रही है।


पुरुष के शरीर से ऊर्जा बाहर बह चुकी है, स्त्री के शरीर में वही ऊर्जा खिल रही है।


यह पल दो अलग दृष्टिकोणों के बीच सामंजस्य का है: पुरुष अपने अंदर, स्त्री बाहर की ओर फिर भी अनुभव जुड़ा हुआ।


सम्भोग के बाद का क्षण सिर्फ शारीरिक क्रिया का नहीं, बल्कि ऊर्जा, मन और इंद्रियों का गहन अनुभव है।


पुरुष: थकान और एकांत में अनुभव को आत्मनिरीक्षण में पचा रहा।


स्त्री: ऊर्जा में खिलना और साझा अनुभव की चाह।


यदि यह अंतर समझा जाए और स्वीकार किया जाए, तो यह पल दोनों के बीच गहरा, संतुलित और सूक्ष्म जुड़ाव बन सकता है।


संभोग_में_शीघ्र_स्खलन...


पचहत्तर प्रतिशत पुरुष शीघ्रपात के शिकार हैं—पचहत्तर प्रतिशत! गहन मिलन के पहले ही वे स्खलित हो जाते हैं और क्रीड़ा समाप्त हो जाती है। और नब्बे प्रतिशत स्त्रियां कभी आर्गाज्म को नहीं उपलब्ध हांती हैं, कभी संभोग के शिखर सुख को नहीं पहुंच पाती हैं—नब्बे प्रतिशत स्त्रियां!

यही कारण है कि अक्सर स्त्रियां चिड़चिड़ी और क्रोधी होती हैं। उन्हें ऐसा होना ही है। कोई औषधि उन्हें शांत नहीं बना सकती है, कोई दर्शनशास्त्र, धर्म या नीति उन्हें अपने पुरुषों के प्रति सहृदय नहीं बना सकती। वे अतृप्त हैं। वे क्रुद्ध हैं। और आधुनिक मनोविज्ञान और तंत्र दोनों कहते हैं कि जब तक स्त्री काम— भोग में गहन तृप्ति को नहीं प्राप्त होती, वह परिवार के लिए समस्या बनी रहेगी। जिससे वह वंचित रह गई है,वह चीज उसे क्षुब्ध रखेगी और वह हमेशा झगड़ालू बनी रहेगी।

तो अगर तुम्हारी पत्नी हमेशा लड़ती—झगड़ती रहती है तो पूरी स्थिति पर फिर से विचार करो। इसमें पत्नी का ही कसूर नहीं है, हो सकता है कि उसका कारण तुम्हीं हो। और आर्गाज्म को न उपलब्ध होने के कारण स्त्रियां काम—विमुख हो जाती हैं, वे आसानी से काम— भोग में उतरने को नहीं राजी होतीं। उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है, वे संभोग में जाने को राजी नहीं होतीं। और वे क्यों राजी हों यदि उन्हें इससे गहन सुख की उपलब्धि ही नहीं होती?

सच तो यह है कि स्त्रियों को लगता है कि पुरुष उनका उपयोग करते हैं, उनका शोषण करते हैं। उन्हें लगता है कि हम कोई वस्तु हैं जिसका उपयोग करके फेंक दिया जाता है। पुरुष तो संतुष्ट हो जाता है, क्योंकि वह स्खलित हो जाता है। फिर वह करवट लेकर सो जाता है। लेकिन स्त्री आंसू बहाती रहती है। वह अनुभव उसके लिएतृप्तिदायी नहीं होता है। उसे लगता है कि मेरा उपयोग किया गया है। हो सकता है,उसके पति, प्रेमी या मित्र को उससे राहत मिली हो, लेकिन वह खुद अतृप्त रह जाती है।

सौ में से नब्बे स्त्रियां तो यह भी नहीं जानती हैं कि आर्गाज्म क्या है, काम—समाधि क्या है। उन्हें कभी इसका अनुभव ही नहीं हुआ। वे कभी उस शिखर को नहीं छू पाती हैं, जहां उनके शरीर का रोआं—रोआं आर्गाज्म से कंपित हो उठे, भरपूर हो जाए। यह अनुभव उनके लिए अनजाना ही रहता है!!!


तुम्हें कैसे पता चलता है कि कोई तुम्हें प्रेम करता है।

तुम्हें कैसे पता चलता है कि कोई तुम्हें प्रेम करता है।

तुम एक स्त्री या एक पुरुष के प्रेम में पड़ते हो, क्या तुम सही-सही बता सकते हो कि इस स्त्री ने तुम्हें क्यों आकर्षित किया? निश्चय ही तुम उसकी आत्मा नहीं देख सकते, तुमने अभी तक अपनी आत्मा को ही नहीं देखा है। तुम उसका मनोविज्ञान भी नहीं देख सकते क्योंकि किसी का मन पढ़ना आसान काम नहीं है। तो तुमने इस स्त्री में क्या देखा? तुम्हारे शरीर विज्ञान में, तुम्हारे हार्मोन में कुछ ऐसा है जो इस स्त्री के शरीर विज्ञान की ओर, उसके हार्मोन की ओर, उसकी केमिस्ट्री की ओर आकर्षित हुआ है। यह प्रेम प्रसंग नहीं है, यह रासायनिक प्रसंग है।


जरा सोचो, जिस स्त्री के प्रेम में तुम हो वह यदि डाक्टर के पास जाकर अपना सैक्स बदलवा ले और मूछें और दाढ़ी ऊगाने लगे तो क्या तब भी तुम इससे प्रेम करोगे? कुछ भी नहीं बदला, सिर्फ केमिस्ट्री, सिर्फ हार्मोन। फिर तुम्हारा प्रेम कहां गया?


सिर्फ एक प्रतिशत लोग थोड़ी गहरी समझ रखते हैं। कवि, चित्रकार, संगीतकार, नर्तक या गायक के पास एक संवेदनशीलता होती है जो शरीर के पार देख सकती है। वे मन की, हृदय की सुंदरताओं को महसूस कर सकते हैं क्योंकि वे खुद उस तल पर जीते हैं।


इसे एक बुनियादी नियम की तरह याद रखो: तुम जहां भी रहते हो उसके पार नहीं देख सकते। यदि तुम अपने शरीर में जीते हो, स्वयं को सिर्फ शरीर मानते हो तो तुम सिर्फ किसी के शरीर की ओर आकर्षित होओगे। यह प्रेम का शारीरिक तल है। लेकिन संगीतज्ञ , चित्रकार, कवि एक अलग तल पर जीता है। वह सोचता नहीं, वह महसूस करता है। और चूंकि वह हृदय में जीता है वह दूसरे व्यक्ति का हृदय महसूस कर सकता है। सामान्यतया इसे ही प्रेम कहते हैं। यह विरल है। मैं कह रहा हूं शायद केवल एक प्रतिशत, कभी-कभार।

पहली बात, संभोग को इस तरह मत लो जैसे कि कहीं और पहुंचना है,,,,इसे साधन की भांति मत लो,,,,,यह अपने में ही साध्य है,,,,इसका कोई लक्ष्य नहीं यह कोई माध्यम नहीं.... 


दूसरी बात भविष्य की मत सोचो,,,, वर्तमान में स्थित रहो। अगर तुम काम-कृत्य के आरंभिक भोग में वर्तमान में नहीं हो सकते तो तुम कभी भी वर्तमान में नहीं टिक सकते,,,,क्योंकि इस कृत्य की प्रकृति ही ऐसी है कि तुम वर्तमान में फेंक दिए जाते हो,,,, वर्तमान में स्थित रहो। दो शरीरों दो आत्माओं के मिलन का सुख भोगो और एक दूसरे में लीन हो जाओ, एक दूसरे में पिघल जाओ। भूल जाओ कि तुम्हें कहीं पहुंचना है। उस क्षण में स्थित रहो कहीं जाना नहीं है पिघल जाओ। प्रेम की उष्मा पिघला कर एक दूसरे में विलीन हो जाने की परिस्थिति बनाओ। 


इसी कारण अगर प्रेम नहीं है तो संभोग शीघ्रता में किया गया एक कृत्य है। तुम दूसरे का उपयोग कर रहे हो दूसरा साधन मात्र है। और दूसरा तुम्हारा उपयोग कर रहा है। तुम दोनों एक दूसरे का शोषण कर रहे हो एक दूसरे में विलीन नहीं हो रहे। प्रेम में तुम एक दूसरे में खो जाते हो। प्रारंभ में यह एक दूसरे में खो जाना एक नई दृष्टि देगा...


प्रेम पूर्ण नहीं होता और उसे कभी पूर्ण होना भी नहीं था। उसमें कमियाँ होती हैं,गलतफ़हमियाँ होती हैं,

कुछ शांत ठहराव होते हैं और ऐसे पल भी

जो धैर्य की परीक्षा लेते हैं।

लेकिन तुम्हारे साथ यह प्रेम सच्चा लगता है।

सुरक्षित लगता है। वास्तविक लगता है।

सच्चा प्रेम हर चीज़ सही करने का नाम नहीं है।

यह उस वक़्त भी एक-दूसरे को चुनने का नाम है

जब हालात आसान न हों।

यह थामे रखने में है,ज़्यादा सुनने में है,

बार-बार माफ़ करने में है और ठहरे रहने में है

इसलिए नहीं कि सब कुछ परफेक्ट है,

बल्कि इसलिए कि यह रिश्ता क़ीमती है।

तुम्हारे साथ प्रेम स्वाभाविक लगता है।

न दिखावटी,न ज़बरदस्ती का।

बस दो दिल जो सीख रहे हैं,

बढ़ रहे हैं और सबसे सच्चे रूप में

एक-दूसरे से प्रेम कर रहे हैं।