AI के दौर में सच्चाई, मेहनत और भरोसे की लड़ाई
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI ने रचनात्मक दुनिया को नई दिशा दी है, लेकिन इसी के साथ उसने समाज को एक नई और गहरी कशमकश में भी डाल दिया है। यह कशमकश है—सच्चाई और संदेह के बीच, मेहनत और भ्रम के बीच, इंसान और मशीन के बीच।
आज यदि कोई व्यक्ति किसी विषय पर गंभीरता से लिखता है, तो यह काम किसी एक सेकंड में नहीं होता। कई बार दो-दो घंटे लग जाते हैं शब्दों को गढ़ने में, भावनाओं को पंक्तियों में ढालने में। लेख लिखने के बाद भी यात्रा खत्म नहीं होती। उसी कंटेंट के अनुरूप दृश्य की कल्पना की जाती है, स्थान चुना जाता है, भाव तय किया जाता है और फिर जाकर एक तस्वीर क्लिक होती है। सही रोशनी का इंतज़ार, सही पोज़, सही भाव—यह सब समय और धैर्य मांगता है।
लेकिन अफ़सोस, इतनी मेहनत को नकारने में किसी को एक पल भी नहीं लगता।
बस एक वाक्य—“ये तो AI से बनी है।”
और घंटों की साधना, ईमानदारी और सच्चाई को झूठ के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
क्या अब घोड़े पर बैठना असंभव हो गया है?
क्या गंगा के किनारे बैठकर तस्वीर खिंचवाना अविश्वसनीय हो गया है?
या फिर अब हर सुंदर, सजीव और प्रभावशाली तस्वीर को संदेह की नजर से देखना हमारी आदत बन गई है?
तस्वीरें केवल दृश्य नहीं होतीं। वे किसी के शौक, मेहनत, समय और भावनाओं का प्रमाण होती हैं। किसी को तस्वीरें क्लिक कराने का शौक है—यह उसका अधिकार है, उसकी अभिव्यक्ति है। लेकिन आज स्थिति यह है कि वास्तविक तस्वीरों को भी AI की उपज कहकर खारिज कर दिया जाता है। यह केवल तकनीकी भ्रम नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का पतन है।
मैं स्पष्ट रूप से कहती हूँ—ऐसे AI पर रोक लगनी चाहिए, जो हर चीज़ में संदेह पैदा कर रहा है।
जो तकनीक रचनात्मकता को बढ़ाने के लिए बनी थी, वही आज इंसान की सच्चाई पर सवाल उठा रही है। यह स्वीकार्य नहीं है।
यदि AI से तस्वीरें बनाई जा रही हैं, तो उन पर स्पष्ट और अनिवार्य वॉटरमार्क होना चाहिए—Artificial Intelligence का। ताकि असली तस्वीरें अपनी पहचान के साथ खड़ी रह सकें और मेहनत करने वाले को बार-बार खुद को साबित न करना पड़े।
तकनीक का काम सुविधा देना है, अविश्वास फैलाना नहीं।
जब सच्चाई को प्रमाण देना पड़े और झूठ सहज स्वीकार कर लिया जाए, तब समझ लेना चाहिए कि समस्या तस्वीरों में नहीं—व्यवस्था में है।
आज ज़रूरत है तकनीक को अपनाने की, लेकिन विवेक और संवेदना के साथ। AI का उपयोग हो, लेकिन इंसान की मेहनत की कीमत पर नहीं। क्योंकि अंततः यह लड़ाई तस्वीरों की नहीं है—
यह लड़ाई भरोसे की है।
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