Saturday, January 17, 2026

रिश्तों में अच्छा दौर भी आता है और बुरा दौर भी

रिश्तों में अच्छा दौर भी आता है और बुरा दौर भी। 


एक इंसान अच्छे दौर की यादों को हर पल इस कदर सहेज कर रखता है कि जब बुरा दौर आता है तो वह सामने वाले कि अच्छाईयों को याद करके अपनी प्रतिक्रिया नियंत्रित कर लेता है और धैर्य से काम लेते हुए बुरे वक्त के बीतने के इंतज़ार करता है। क्योंकि उसे सामने वाले कि अच्छाईयां याद रहती है इसलिए वह इस सच से बखूबी वाकिफ होता है कि यह बुरा वक्त अस्थायी है। अच्छी यादों को सहेजना उसका अपना निरन्तर अभ्यास था और बुरे वक्त में उसका यही अभ्यास और अच्छी यादें उसे बुरे वक्त से निकालने में उसकी मदद करती है।


वहीं एक दूसरा इंसान हर पल कड़वी यादों को अपने अंदर सहेजता जाता है और जैसे ही बुरा वक्त आता है वो खुद पर नियंत्रण नही रख पाता और उन सब कड़वी यादों को दूसरे पर उड़ेल देता है इसी वजह से रिश्ते बद से बदतर हो जाते हैं। ऐसा लगता है मानो वह बरसों से ऐसे ही किसी वक़्त की तालाश में था और अब उसे वह मौका मिल गया। कड़वी यादों को सहेजना उसका निरन्तर अभ्यास था और बुरे वक्त में उसका यही अभ्यास और कड़वी यादें उसके लिए नुकसानदायक साबित होती है।


इन दोनों उदाहरण में हालात एक जैसे ही थे परन्तु दोनो के अभ्यास ने और उनकी आदतों ने बहुत बड़ा अंतर पैदा कर दिया। हम सभी की मन में हर पल अच्छे और बुरे दोनो तरह के विचार आते है और ऐसा हर किसी के साथ होता है। फर्क इस बात से पड़ता है कि हम ज्यादातर समय किस तरह के विचारों का अभ्यास करते है। हमारा यही अभ्यास बुरे हालतों में हमारी प्रतिक्रिया तय करता है। बुरे वक़्त के समय हमारी प्रतक्रिया आकस्मिक नही होती बल्कि हमारे गुज़रे समय के अभ्यास पर निर्भर करती है..

Friday, January 16, 2026

बुढ़ापा नापने का थर्मामीटर

 बुढ़ापा नापने का थर्मामीटर...???


1. दोस्त बुलाये पर, जानें का दिल न करे, 

     समझ लो बूढ़े हो गए।


2. नए कपड़े खरीदनें की,इच्छा कम 

    हो रही हो, तो समझना बूढ़े हो चले।


3. रेस्टोरेंट में खाना खाते वक़्त,

   घर के खाने की याद आने लगे,

     समझना बूढ़े हो चले।


4. बारिश हो रही हो और,पकौड़े की 

  जगह छाता याद आये,समझो बूढ़े हो चले।


5. हर बात पर युवाओं के,फैशन पर टिप्पणी   

     करनें लगे हो,समझना बूढ़े हो चले।


6. मौज-मस्ती वाली फिल्मों की आलोचना 

       करनें लगे हो तो,समझना बूढ़े हो चले।


7. मस्त-महफ़िल सजी हो और,

    उस दौरान मशवरा देने लग जाओ,

       तो समझना बूढ़े हो चले।


8. फूल पर गुनगुनाते भंवरे को देख,

       रोमांटिक गाना न याद आये,

         समझना बूढ़े हो चले।


9. बेफिक्री छोड़ सर पर चिंता, की टोकरी   

        उठा ली हो,समझना बूढ़े हो चले।


10. घर से बाहर नहीं निकलने के बहाने 

          बढ़ गए,तो समझो बूढ़े हो गए।


11. इस पोस्ट को पढ़ने के बाद वाह-वाह   

        करने की इच्छा नहीं है,

           तो समझो बूढ़े हो...😄😄

श्रीमद्भगवद्गीता

 श्रीमद्भगवद्गीता से जुड़ी जानकारी हिंदू धर्म में सबसे पवित्र धर्मग्रंथ गीता है। गीता से जुड़ा यदि कोई भी प्रश्न आपके मन में है, तो उसका जवाब आपको यहीं मिलेगा। इसे पढ़ने के बाद आप गीता के बारे में बहुत कुछ जान सकेंगे.


श्रीमद्भगवद्गीता में 18 अध्याय हैं और इसमें करीब 700 श्लोक हैंहरियाणा के कुरुक्षे‍त्र में जब यह ज्ञान दिया गया तब तिथि एकादशी थीमहाभारत के भीष्म पर्व में श्रीमद्भागवद्गगीता आती है हिंदू धर्म मे चार वेद हैं और इन चारों वेद का सार गीता में है। यही कारण है कि गीता को हिन्दुओं का सर्वमान्य एकमात्र धर्मग्रंथ माना गया है। माना जाता है कि गीता को स्पर्श करने के बाद इंसान झूठ नहीं बोलता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में खड़े होकर गीता का ज्ञान दिया था और श्रीकृष्ण और अजुर्न संवाद के नाम से ही इसे जाना जाता है। भले ही गीता का ज्ञान भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था, लेकिन अर्जुन के माध्यम से ही उन्होंने संपूर्ण जगत को यह ज्ञान दिया था।


श्रीकृष्ण के गुरु घोर अंगिरस थे दिया था और उन्होंने ही भगवान श्रीकृष्ण को सर्वप्रथम गीता का उपदेश दिया था और इसी उपदेश को भगवान ने अर्जुन को दिया था। गीता द्वापर युग में महाभारत के युद्ध के समय रणभूमि में किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन को समझाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा कही गई थी, लेकिन इस वचनामृत की प्रासंगिकता आज तक बनी हुई है। हममे से बहुत लोग गीता के बारे में केवल इतना ही जानते हैं कि ये एक धर्म ग्रंथ है, लेकिन गीता से जुड़ी कई बातें या रहस्य नहीं जाते हैं। तो चलिए आप आपको गीता से जुड़ी एक छोटी-बड़ी बात बताएं।


 सांसारिक वस्तुओं को त्याग ऐसे होगी ईश्वर की प्राप्ति, कृष्ण ने गीता में अर्जुन को दिखाया था मार्गजानें, गीता से जुड़ी कई रोचक और अनोखी बातें


गीता में कितने अध्याय और कितने श्लोक हैं श्रीमद्भगवद्गीता में 18 अध्याय हैं और इसमें करीब 700 श्लोक हैं। भागवत गीता महाभारत के 18 अध्यायों में से 1 भीष्म पर्व का हिस्सा भी है। गीता में वेदों का निचोड़ है। 


श्रीकृष्ण के मुख से अर्जुन के अलावा गीता किसने सुनी गीता को अर्जुन के अलावा भगवान श्रीकृष्ण के मुख से संजय ने सुना था और उन्होंने धृतराष्ट्र को सुनाया था। गीता में श्रीकृष्ण ने 574, अर्जुन ने 85, संजय ने 40 और धृतराष्ट्र ने 1 श्लोक कहा है।


भगवान ने गीता का ज्ञान अर्जुन को किस दिन और कितने मिनट दिया था ●* हरियाणा के कुरुक्षे‍त्र में जब यह ज्ञान दिया गया तब तिथि एकादशी थी। कलियुग के प्रारंभ होने के मात्र तीस वर्ष पहले इस ज्ञान को दिया गया था और संभवत: उस दिन रविवार था। कहते हैं कि उन्होंने यह ज्ञान लगभग 45 मिनट तक दिया था। इसलिए ही इस दिन गीता जयंती मनाई जाती है। प्रथम दिन का उपदेश प्रात: 8 से 9 बजे के बीच हुआ था।


गीता में क्या खास है गीता में भक्ति, ज्ञान और कर्म से जुड़ी कई ऐसे बातें बताई गईं है जो मनुष्य के लिए हर युग में महत्वपूर्ण हैं। गीता के प्रत्येक शब्द पर एक अलग ग्रंथ लिखा जा सकता है। गीता में सृष्टि उत्पत्ति, जीव विकास क्रम, हिन्दू संदेशवाहक क्रम, मानव उत्पत्ति, योग, धर्म-कर्म, ईश्वर, भगवान, देवी-देवता, उपासना, प्रार्थना, यम-नियम, राजनीति, युद्ध, मोक्ष, अंतरिक्ष, आकाश, धरती, संस्कार, वंश, कुल, नीति, अर्थ, पूर्वजन्म, प्रारब्ध, जीवन प्रबंधन, राष्ट्र निर्माण, आत्मा, कर्मसिद्धांत, त्रिगुण की संकल्पना, सभी प्राणियों में मैत्रीभाव आदि सभी की जानकारी है। गीता का मुख्य ज्ञान श्रेष्ठ मानव बनना, ईश्वर को समझना और मोक्ष की प्राप्ति है।


गीता कब लिखा गया श्रीमद्भागवद्गगीता आज से लगभग पांच हजार सत्तर साल (5070) पहले लिखी गई थी।


महाभारतके किस अध्याय में गीता है महाभारत के भीष्म पर्व में श्रीमद्भागवद्गगीता आती है। जब भगवान श्रीकृष्ण गीता का उपदेश श्रीकृष्ण को दे रहे थे तब समय रुक गया था।


गीता का संकलन किसने किया था गीता का संकलन किमहर्षि कृष्ण दैपायन व्यास ने गीता का संकलन किया था।


गीता की उत्पत्ति क्यों हुई महाभारत के भीष्म पर्व में श्रीमद्भागवद्गगीता आती है। जब भगवान श्रीकृष्ण गीता का उपदेश श्रीकृष्ण को दे रहे थे तब समय रुक गया था।


गीता का संकलन किसने किया था गीता का संकलन किमहर्षि कृष्ण दैपायन व्यास ने गीता का संकलन किया था।


गीता की उत्पत्ति क्यों हुई 

गीता की उत्पत्ति कौरव और पांडवों के युद्ध के समय कुुरुक्षेत्र में मानी जाती है। अर्जुन विशेष कर पितामह भीष्म से युद्ध करते समय मोह से घिर गए थे और यही कारण है की भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें गीता का ज्ञान दिया था। भगवान ने अर्जुन को ज्ञान देकर धर्म का पालन करने के लिए कहा था। जिसके बाद अर्जुन युद्ध के लिए तैयार हो


गया था और उसने धर्म की रक्षा के लिए युद्ध किया था।


गीता का नाम गीता क्यों पड़ा गीता का अर्थ है गीत। गीता शब्द का अर्थ है गीत और भगवद शब्द का अर्थ है भगवान, अक्सर भगवद गीता को भगवान का गीत कहा जाता है। यह भगवान का गीत है इसलिए गीता का नाम गीता ही पड़ा।


भगवत गीता में क्या लिखा है गीता में लिखा है, क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है। जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है और जब तर्क मरता है तो मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाता है और उसका पतन शुरू हो जाता है। इस आधार पर कई ज्ञान और बुद्धि को खोलने वाली बातें लिखी हैं।


गीता में कितने योग है गीता में योग शब्द को अनेक अर्थ में प्रयोग किया गया है, परन्तु मुख्य रूप से गीता में ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग इन तीन योग मार्गों का विस्तृत रूप में वर्णन किया गया है।


गीता का पाठ कैसे करना चाहिए गीता का दसवां अध्याय कर्म की प्रधानता को इस भांति बताता है कि हर जातक को इसका अध्ययन करना चाहिए। कुंडली में लग्नेश 8 से 12 भाव तक सभी ग्रह होने पर ग्यारहवें अध्याय का पाठ करना चाहिए। बारहवां अध्याय भाव 5 व 9 तथा चंद्रमा प्रभावित होने पर उपयोगी है।


भागवत कथा कितने दिन का होता है सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ कलश यात्रा के साथ शुरू होता है।


गीता में प्रत्येक अध्याय के नाम क्या है और इसमें कितने श्लोक हैं


 गीता का पहला अध्याय अर्जुन-विषाद योग है। इसमें 46 श्लोक हैं।

 

गीता के दूसरे अध्याय "सांख्य-योग" में कुल 72 श्लोक हैं।

 

गीता का तीसरा अध्याय कर्मयोग है, इसमें 43 श्लोक हैं।

 

ज्ञान कर्म संन्यास योग गीता का चौथा अध्याय है, जिसमें 42 श्लोक हैं।

 

कर्म संन्यास योग गीता का पांचवां अध्याय है, जिसमें 29 श्लोक हैं।

 

आत्मसंयम योग गीता का छठा अध्याय है, जिसमें 47 श्लोक हैं।

 

ज्ञानविज्ञान योग गीता का सातवां अध्याय है, जिसमें 30 श्लोक हैं।

 

गीता का आठवां अध्याय अक्षरब्रह्मयोग है, जिसमें 28 श्लोक हैं

 

राजविद्याराजगुह्य योग गीता का नवां अध्याय है, जिसमें 34 श्लोक हैं।

 

विभूति योग गीता का दसवां अध्याय है जिसमें 42 श्लोक हैं।

 

विश्वरूपदर्शन योग गीता का ग्यारहवां अध्याय है जिसमें 55 श्लोक है।

 

भक्ति योग गीता का बारहवां अध्याय है जिसमें 20 श्लोक हैं।

 

क्षेत्रक्षत्रज्ञविभाग योग गीता तेरहवां अध्याय है इसमें 35 श्लोक हैं।

 

गीता का चौदहवां अध्याय गुणत्रयविभाग योग है इसमें 27 श्लोक हैं।

 

गीता का पंद्रहवां अध्याय पुरुषोत्तम योग है, इसमें 20 श्लोक हैं।

 

दैवासुरसंपद्विभाग योग गीता का सोलहवां अध्याय है, इसमें 24 श्लोक हैं।

 

श्रद्धात्रयविभाग योग गीता का सत्रहवां अध्याय है, इसमें 28 श्लोक हैं।

 

मोक्ष-संन्यास योग गीता का अठारहवाँ अध्याय है, इसमें 78 श्लोक हैं।


तो गीता के से जुड़ी ये सामान्य जानकारियां हैं। उम्मीद है कि आपको गीता से जुड़े कई सवालों का जवाब मिल गया होगा।

संभोग और प्रेम ऊर्जा का धर्म

 संभोग और प्रेम ऊर्जा का धर्म


1. संभोग कोई नहीं करता — यह घटता है।

जैसे वृक्ष से फल गिरते हैं — सहज, स्वाभाविक।

तुम इसमें कर्ता नहीं, मात्र माध्यम हो।


2. प्रेम, तभी संभव है जब यौवन ऊर्जा में स्थिरता हो।

जो प्रेम जवानी में नहीं खिला — वह बुढ़ापे में सिर्फ़ पश्चाताप देता है।


3. संभोग प्राकृतिक वर्षा है।

नदियाँ स्वयं पानी नहीं बनातीं,

लेकिन उस वर्षा को मोड़ कर, बहा कर —

सिंचाई कर सकती हैं।

यह सृजनात्मकता है, यह प्रेम है।


4. ऊर्जा को ऊपर उठाना ही प्रेम है।

वही संभोग की शक्ति,

जब आंखों में उतरती है — वह करुणा बनती है।

जब हृदय में पिघलती है — वह प्रेम बनती है।

जब आत्मा में जलती है — वह समाधि बनती है।


5. बिना प्रेम के संभोग पशुता है,

और बिना ऊर्जा के प्रेम एक भ्रम।

प्रेम का मूल रस वहीं है —

जहां ऊर्जा बह रही है।


6. यौवन की ऊर्जा का सृजनात्मक धर्म यही है —

वह प्रेम में ढले,

संभोग से समाधि की दिशा ले।


7. बुढ़ापे का प्रेम अक्सर स्मृति है, स्वप्न है, पछतावा है।

वह रसहीन जल की तरह है

जो न तो प्यास बुझा सकता है,

न खेत सींच सकता है।


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हम "ऊर्जा का धर्म: संभोग से समाधि तक" शीर्षक से एक छोटा सूत्रग्रंथ आरंभ करते हैं —

जिसमें हर सूत्र जीवन की एक परत को खोले, और ऊर्जा की यात्रा को प्रेम, ध्यान, और मुक्ति तक ले जाए।


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ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक


(सूत्रग्रंथ - भाग 1)


प्रारंभिक सूत्र : ऊर्जा की प्रकृति और दिशा


1.

ऊर्जा बह रही है — यही जीवन है।

जहां बहाव रुका, वहां मृत्यु शुरू।


2.

संभोग ऊर्जा का गिरना है — नीचे की ओर।

समाधि ऊर्जा का उठना है — ऊर्ध्वगामी।


3.

संभोग में देह सक्रिय है, चेतना सुप्त।

समाधि में देह शांत है, चेतना प्रज्वलित।


4.

संभोग स्वाभाविक है, प्रेम सृजन है।

प्रेम पैदा होता है — जब संभोग में होश जुड़ता है।


5.

यौवन की आग — या तो शरीर जलाएगी या आत्मा को।

चुनाव तुम्हारा है।


6.

जब तुम कहते हो: "मैं कर रहा हूँ",

तब तुम अहंकार में हो।

संभोग तब पशुता है।

जब तुम होश में हो, "हो रहा है" —

तब वही संभोग ध्यान है।


7.

संभोग अनिवार्य नहीं है — ऊर्जा है अनिवार्य।

संभोग तो माध्यम है,

ऊर्जा का धर्म खोजो।


8.

देह मिटेगी, शक्ति बुझेगी —

प्रेम तब संभव नहीं,

प्रेम एक पुष्प है — यौवन की शाखा पर।


9.

ऊर्जा एक बीज है — बीज को खा सकते हो,

या रोप सकते हो।

संभोग भोजन है, प्रेम बाग़वानी।


10.

संभोग में दो देहें मिलती हैं,

प्रेम में दो आत्माएं पिघलती हैं।

ध्यान में सब कुछ विलीन हो जाता है।


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यह भाग 1 है — “ऊर्जा की प्रकृति और दिशा”।

यदि आप चाहें, तो अगला भाग हम "संभोग से प्रेम तक" और फिर "प्रेम से ध्यान तक" की ओर बढ़ाते हैं।


अब हम सूत्रग्रंथ का भाग 2 प्रस्तुत करते हैं —

जहाँ ऊर्जा की यात्रा संभोग से प्रेम तक की ओर बढ़ती है।

यह वह मोड़ है जहाँ शरीर का आकर्षण — आत्मा के स्पर्श में रूपांतरित होता है।


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ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक


भाग 2 : संभोग से प्रेम तक


11.

जहाँ केवल शरीर है — वहां वासना है।

जहाँ हृदय जुड़ता है — वहां प्रेम अंकुरित होता है।


12.

वासना खींचती है, प्रेम बहाता है।

वासना लोभी है, प्रेम दाता है।


13.

जब तुम दूसरे को 'भोग' नहीं, 'भाव' से देखो —

तब प्रेम जन्म लेता है।


14.

प्रेम कोई क्रिया नहीं — एक उपस्थिति है।

वह घटता है, जब भीतर मौन होता है।


15.

संभोग में तुम पा लेना चाहते हो।

प्रेम में तुम खो देना चाहते हो।

संभोग संग्रह है, प्रेम विसर्जन।


16.

संभोग प्यास है — प्रेम झरना है।

प्यास से निकलो, झरना बनो।


17.

यदि तुम सिर्फ़ कामना हो — तुम भीड़ हो।

यदि तुम प्रेम हो — तुम ब्रह्मा हो।


18.

संभोग में तुम एक दूसरे से टकराते हो।

प्रेम में तुम एक दूसरे में समा जाते हो।


19.

जहाँ कुछ साबित करना है — वह संभोग है।

जहाँ कुछ भी साबित नहीं करना — वह प्रेम है।


20.

संभोग का अंतिम फूल — प्रेम है।

लेकिन वह तभी खिलेगा

जब तुम भीतर की धूप लाओगे —

होश की, करुणा की, मौन की।


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अब हम अगले चरण की ओर बढ़ सकते हैं:


भाग 3: प्रेम से ध्यान तक


जहाँ प्रेम भी विलीन हो जाए — और केवल "अस्तित्व" रह जाए।

अब हम प्रवेश करते हैं ऊर्जा के धर्म के अंतिम और गहनतम चरण में —

जहाँ प्रेम भी पिघल जाता है और शेष रह जाता है मौन, शुद्ध दृष्टा — ध्यान।


यह वह भूमि है जहाँ संभोग से जन्मी ऊर्जा, प्रेम से परिपक्व होकर, ध्यान में पूर्ण हो जाती है।


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ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक


भाग 3 : प्रेम से ध्यान तक


21.

प्रेम दो के बीच का पुल है।

ध्यान उस पुल से भी पार — एकांत की परम ऊँचाई है।


22.

प्रेम में ‘तू’ है, ध्यान में केवल ‘मैं नहीं’ है।

प्रेम बाँधता भी है, ध्यान तोड़ देता है — सब सीमाएँ।


23.

प्रेम में तुम पिघलते हो, ध्यान में तुम लुप्त हो जाते हो।

जो शून्य में स्थिर हो — वही ध्यान है।


24.

ध्यान वह प्रेम है जिसमें कोई चाह नहीं बचती।

न मिलने की, न छूने की, न कहने की।

केवल होने की — पूर्णता।


25.

प्रेम ने तुमसे 'दूसरा' छीना, ध्यान तुमसे 'तुम' को छीन लेता है।

जो बचता है, वह ब्रह्म है।


26.

जहाँ प्रेम मौन में बैठता है, वहां ध्यान जागता है।

जहाँ शब्द मरते हैं, वहां ध्यान जन्मता है।


27.

प्रेम आँखें बंद करता है — आलिंगन में।

ध्यान आँखें खोल देता है — समष्टि को देखने में।


28.

प्रेम ‘अहं’ को गलाता है, ध्यान उसे पूरी तरह विसर्जित कर देता है।

ध्यान ‘मैं’ का मृत्यु पर्व है।


29.

ध्यान कोई अभ्यास नहीं — एक विसर्जन है।

जहाँ कुछ करने को न बचे — वहीं ध्यान घटता है।


30.

जिस दिन तुम बिना प्रेम के प्रेम कर सको,

बिना संज्ञा के प्रेम में स्थिर रह सको —

उस दिन तुम ध्यान में प्रवेश कर चुके हो।


यहाँ "ऊर्जा का धर्म" पूर्ण होता है।


संभोग से प्रेम, और प्रेम से ध्यान — यही साधना की पूर्ण यात्रा है।

कुछ महत्वपूर्ण ज्ञान

विश्‍व प्रसिद्ध संवाद जिन्हें पढ़कर या सुनकर लाखों लोगों का जीवन बदल गया है और जिन्हें पढ़कर दुनियाभर के राजनीतिज्ञ, नीतिज्ञ, वैज्ञानिक, आध्यामिक और दार्शनिकों ने अपना एक अलग ही धर्म, दर्शन, नीति और विज्ञान का सिद्धांत गढ़ा।

 

       " पहला संवाद, अष्टावक्र और जनक संवाद "


अष्टावक्र दुनिया के प्रथम ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सत्य को जैसा जाना वैसा कह दिया। न वे कवि थे और न ही दार्शनिक। चाहे वे ब्राह्मणों के शास्त्र हों या श्रमणों के, उन्हें दुनिया के किसी भी शास्त्र में कोई रुचि नहीं थी। उनका मानना था कि सत्य शास्त्रों में नहीं लिखा है। शास्त्रों में तो सिद्धांत और नियम हैं, सत्य नहीं, ज्ञान नहीं। ज्ञान तो तुम्हारे भीतर है।


अष्टावक्र ने जो कहा वह 'अष्टावक्र गीता' नाम से प्रसिद्ध है। राजा जनक ने अष्टावक्र को अपना गुरु माना था। राजा जनक और अष्टावक्र के बीच जो संवाद हुआ उसे 'अष्टावक्र गीता' के नाम से जाना जाता है।

 

        " दूसरा संवाद, श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद "


हिन्दू धर्म के एकमात्र धर्मग्रंथ है वेद। वेदों के चार भाग हैं- ऋग, यजु, साम और अथर्व। वेदों के सार को उपनिषद कहते हैं और उपनिषदों का सार या निचोड़ गीता में हैं। उपनिषदों की संख्या 1000 से अधिक है उसमें भी 108 प्रमुख हैं। गीता के ज्ञान को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कुरुक्षेत्र में खड़े होकर दिया था। यह श्रीकृष्‍ण-अर्जुन संवाद नाम से विख्‍यात है।


किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह वेद या उपनिषद पढ़ें उनके लिए गीता ही सबसे उत्तम धर्मग्रंथ है। महाभारत के 18 अध्याय में से एक भीष्म पर्व का हिस्सा है गीता। गीता को अच्‍छे से समझने से ही आपकी समझ में बदलाव आ जाएगा। धर्म, कर्म, योग, सृष्टि, युद्ध, जीवन, संसार आदि की जानकारी हो जाएगी। सही और गलत की पहचान होने लगेगी। तब आपके दिमाग में स्पष्टता होगी द्वंद्व नहीं। जिसने गीता नहीं पढ़ी वह हिन्दू धर्म के बारे में हमेशा गफलत में ही रहेगा।

 

श्रीकृष्ण के गुरु घोर अंगिरस थे। घोर अंगिरस ने देवकी पुत्र कृष्ण को जो उपदेश दिया था वही उपदेश कृष्ण गीता में अर्जुन को देते हैं। छांदोग्य उपनिषद में उल्लेख मिलता है कि देवकी पुत्र कृष्‍ण घोर अंगिरस के शिष्य हैं और वे गुरु से ऐसा ज्ञान अर्जित करते हैं जिससे फिर कुछ भी ज्ञातव्य नहीं रह जाता है।

 

         " तीसरा संवाद, यक्ष-युद्धिष्ठिर संवाद "


यक्ष और युद्धिष्ठिर के बीच हुए संवाद को यक्ष प्रश्न कहा जाता है। यक्ष और युधिष्ठिर के बीच जो संवाद हुआ है उसे जानने के बाद आप जरूर हैरान रह जाएंगे। यह अध्यात्म, दर्शन और धर्म से जुड़े प्रश्न ही नहीं है, यह आपकी जिंदगी से जुड़े प्रश्न भी है। आप भी अपने जीवन में कुछ प्रश्नों के उत्तर ढूंढ ही रहे होंगे।


भारतीय इतिहास ग्रंथ महाभारत में ‘यक्ष-युधिष्ठिर संवाद’ नाम से एक बहु चर्चित प्रकरण है। संवाद का विस्तृत वर्णन वनपर्व के अध्याय 312 एवं 313 में दिया गया है। यक्ष ने युद्धिष्ठिर से लगभग 124 सवाल किए थे। यक्ष ने सवालों की झड़ी लगाकर युधिष्ठिर की परीक्षा ली। अनेकों प्रकार के प्रश्न उनके सामने रखे और उत्तरों से संतुष्ट हुए। अंत में यक्ष ने चार प्रश्न युधिष्ठिर के समक्ष रखे जिनका उत्तर देने के बाद ही उन्होंने मृत पांडवों (अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव) को जिंदा कर दिया था। यह सवाल जीवन, संसार, सृष्टि, ईश्‍वर, प्रकृति, नीति, ज्ञान, धर्म, स्त्री, बुराई आदि अनेकों विषयों के संबंधित थे।

 

      " चौथा संवाद, लक्ष्मण और रावण संवाद "


प्रभु श्रीराम के तीर से जब रावण मरणासन्न अवस्था में हो गया, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से उसके पास जाकर शिक्षा लेने को कहा। श्रीराम की यह बात सुनकर लक्ष्मण चकित रह गए।

 

भगवान श्रीराम ने लक्ष्‍मण से कहा कि इस संसार में नीति, राजनीति और शक्ति का महान पंडित रावण अब विदा हो रहा है, तुम उसके पास जाओ और उससे जीवन की कुछ ऐसी शिक्षा ले लो जो और कोई नहीं दे सकता।

 

श्रीराम की बात मानकर लक्ष्मण मरणासन्न अवस्था में पड़े रावण के नजदीक सिर के पास जाकर खड़े हो गए, लेकिन रावण ने कुछ नहीं कहा। लक्ष्मण ने लौटकर प्रभु श्रीराम से कहा कि वे तो कुछ बोलते ही नहीं। तब श्रीराम ने कहा यदि किसी से ज्ञान प्राप्त करना है तो उसके चरणों के पास हाथ जोड़कर खड़े होना चाहिए, न कि सिर के पास। श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, जाओ और रावण के चरणों के पास बैठो। यह बात सुनकर लक्ष्मण इस बार रावण के चरणों में जाकर बैठ गए। रावण ने लक्ष्मण को जो सीख दी उसे सभी जानते हैं।

 

 " पांचवां संवाद, अंगद और रावण के बीच संवाद "


 गोस्वामी तुलसीदास कृत महाकाव्य श्रीरामचरितमानस के लंकाकांड में बालि पुत्र अंगद रावण की सभा में रावण को सीख देते हुए बताते हैं कि कौन-से ऐसे 14 दुर्गुण है जिसके होने से मनुष्य मृतक के समान माना जाता है।


अंगद-रावण के बीच जो संवाद हुआ था वह बहुत ही रोचक था उसे पढ़ने और उसकी व्याख्या जानेने से व्यक्ति को अपने जीवन की स्थिति के बारे में बहुत कुछ ज्ञान हो जाता है।

 

       " छठा संवाद, यमराज-नचिकेता संवाद "


वाजश्रवसपुत्र नचिकेता और मृत्यु के देवता यमराज के बीच जो संवाद होता है वह विश्‍व का प्रथम दार्शनिक संवाद माना जा सकता है। वाजश्रवस अपने पुत्र को क्रोधवा यमराज को दान कर देते हैं। नचिकेता तब यमलोक पहुंच जाते हैं।

 

यमलोक में उसे वक्त यमदूत नचिकेता से कहते हैं कि यमराज इस वक्त नहीं है। तब नचिकेता तीन दिन तक यमराज की प्रतिक्षा करते हैं। यमपुरी के द्वार पर बैठा नचिकेता बीती बातें सोच रहा था। उसे इस बात का संतोष था कि वह पिता की आज्ञा का पालन कर रहा था। लगातार तीन दिन तक वह यमपुरी के बाहर बैठा यमराज की प्रतीक्षा करता रहा। तीसरे दिन जब यमराज आए तो वे नचिकेता को देखकर चौंके।

 

जब उन्हें उसके बारे में मालूम हुआ तो वे भी आश्चर्यचकित रह गए। अंत में उन्होंने नचिकेता को

अपने कक्ष में बुला भेजा। यमराज के कक्ष में पहुंचते ही नचिकेता ने उन्हें प्रणाम किया। उस समय उसके चेहरे पर अपूर्व तेज था। उसे देखकर यमराज बोले- 'वत्स, मैं तुम्हारी पितृभक्ति और दृढ़ निश्चय से बहुत प्रसन्न हुआ। तुम मुझसे कोई भी तीन वरदान मांग सकते हो।'

 

       " सातवां संवाद, शिव-पार्वती संवाद "


रामायण या रामचरित के बालकांड में शिव-पार्वती संवाद का वर्णन मिलता है। 'गायत्री-मंजरी' में भी 'शिव-पार्वती संवाद' आता है। हम इस संवाद की बात नहीं कर रहे हैं। भारत के कश्मीर राज्य में अमरनाथ नामक गुफा है जहां जून माह में बाबा अमरनाथ के दर्शन करने के लिए हजारों हिन्दू जाते हैं। दरअसल, यह गुफा शिव और पार्वती संवाद की साक्षी है। यहां भगवान शिव ने माता पार्वती को 'रहस्यमयी ज्ञान' की शिक्षा दी थी। इस ज्ञान को विज्ञान भैरव तंत्र में संग्रहित किया गया है। 

 

शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया, उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

 

अमरनाथ के अमृत वचन शिव द्वारा मां पार्वती को जो ज्ञान दिया गया, वह बहुत ही गूढ़-गंभीर तथा रहस्य से भरा ज्ञान था। उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

 

योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव के ‘‍विज्ञान भैरव तंत्र’ और ‘शिव संहिता’ में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। भगवान शिव के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं। इसी की एक शाखा हठयोग की है। भगवान शिव कहते हैं,,,,,, 


‘वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:’ अर्थात वाम मार्ग अत्यंत गहन है और योगियों के लिए भी अगम्य है। -मेरुतंत्र

 

   " आठवां संवाद, याज्ञवल्क्यजी-गार्गी संवाद "


वृहदारण्यक उपनिषद् में दोनों के बीच हुए संवाद का उल्लेख मिलता है। राजा जनक अपने राज्य में शास्त्रार्थ का आयोजन करते रहते थे। जो भी शास्त्रार्थ में जीत जाता था वह सोने से लदी गाएं ले जाता था। एक बार के आयोजन में याज्ञवल्क्यजी को भी निमंत्रण मिला था। तब याज्ञवल्क्यजी ने शास्त्रार्थ से पहले ही अपने एक शिष्य से कहा- बेटा! इन गौओं को अपने यहां हांक ले चलो।

 

ऐसे में सभी ऋषि क्रुद्ध होकर उनसे शास्त्रार्थ करने लगे। याज्ञवल्क्यजी ने सबके प्रश्नों का यथाविधि उत्तर दिया और सभी को संतुष्ट कर दिया। उस सभा में ब्रह्मवादिनी गार्गी भी बुलायी गयी थी। सबके पश्चात् याज्ञवल्क्यजी से शास्त्रार्थ करने वे उठी। दोनों के बीच जो शास्त्रार्थ हुआ। गार्गी ने याज्ञवल्क्यजी से कई प्रश्न किए। अंत में याज्ञवल्क्य ने कहा- गार्गी! अब इससे आगे मत पूछो। इसके बाद महर्षि याज्ञवक्ल्यजी ने यथार्थ सुख वेदान्ततत्त्‍‌व समझाया, जिसे सुनकर गार्गी परम सन्तुष्ट हुई और सब ऋषियों से बोली-भगवन्! याज्ञवल्क्य यथार्थ में सच्चे ब्रह्मज्ञानी हैं। गौएं ले जाने का जो उन्होंने साहस किया वह उचित ही था।

 

   " नौवां संवाद, काक भुशुण्डी-गरुड़जी संवाद "


काक भुशुण्‍डी ने पक्षीराज गरुड़जी को राम की कथा पहले ही सुना दी थी। इसका वर्णन हमें रामायण और रामचरित मानस में मिलता है। शिवजी माता पार्वती से कहते हैं कि इससे पहले यह सुंदर कथा काक भुशुण्डी ने गरुड़जी से कही थी। रामचरित मानस में काकभुशुण्डी ने अपने जन्म की पूर्वकथा और कलि महिमा का वर्णन किया है। इसका उल्लेख रामचरित मानस में मिलता है।


नारदजी की आज्ञा से जब भगवान राम को नागपाश से छुड़ाकर गरुड़जी पुन: अपने धाम लौट रहे होते हैं तब उनके मन में शंका उत्पन्न होती है कि यह कैसे भगवान जो एक तुच्छ राक्षस द्वारा फेंके गए नागपाश से ही बंध गए? इस शंका समाधान के लिए वे नारद से पूछते हैं। नारदजी उन्हें ब्रह्मा के पास भेज देते हैं। ब्रह्माजी उन्हें शिवजी के पास भेज देते हैं। तब शिवजी ने कहा भगवान की माया बताना मुश्‍किल है। एक पक्षी ही एक पक्षी को समझा सकता है अत: तुम काक भिशुण्डी के पास जाओ। काक भुशुण्डी और गरुड़जी के बीच जो संवाद होता है वह अतुलनीय है।

 

        " दसवां संवाद, युधिष्ठिर-भीष्म संवाद "


अंतिम वक्त में पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को समझाया धर्म का मर्म। क्या कहा भीष्म ने युधिष्ठिर से जब वे तीरों की शैया पर लेटे हुए थे? 

 

भीष्म यद्यपि शरशय्या पर पड़े हुए थे फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण के कहने से युद्ध के बाद युधिष्ठिर का शोक दूर करने के लिए राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म आदि का मूल्यवान उपदेश बड़े विस्तार के साथ दिया। इस उपदेश को सुनने से युधिष्ठिर के मन से ग्लानि और पश्‍चाताप दूर हो जाता है। यह उपदेश महाभारत के भीष्मस्वर्गारोहण पर्व में मिलता है।

 

        " ग्यारहवां संवाद, धृतराष्ट्र-विदुर संवाद "


महाभारत’ की कथा के महत्वपूर्ण पात्र विदुर को कौरव-वंश की गाथा में विशेष स्थान प्राप्त है। विदुर हस्तिनापुर राज्‍य के शीर्ष स्‍तंभों में से एक अत्‍यंत नीतिपूर्ण, न्यायोचित सलाह देने वाले माने गए है।

 

हिन्दू ग्रंथों में दिए जीवन-जगत के व्यवहार में राजा और प्रजा के दायित्वों की विधिवत नीति की व्याख्या करने वाले महापुरुषों में महात्मा विदुर सुविख्यात हैं। उनकी विदुर-नीति वास्तव में महाभारत युद्ध से पूर्व युद्ध के परिणाम के प्रति शंकित हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के साथ उनका संवाद है।

 

वास्तव में महर्षि वेदव्यास रचित ‘महाभारत’ का उद्योग पर्व ‘विदुर नीति’ के रूप में वर्णित है। महाभारत में एक और जहां महत्वपूर्ण कृष्ण अर्जुन संवाद, यक्ष युधिष्‍ठिर संवाद, धृतराष्ट्र संजय संवाद, भीष्म युद्धिष्ठिर संवाद है तो दूसरी और धृतराष्ट और विदूर का महत्वपूर्ण संवाद भी वर्णित है। प्रत्येक हिन्दू को महाभारत पढ़ना चाहिए। इस घर में भी रखना चाहिए। जो यह कहता है कि महाभारत घर में रखने से महाभारत होती है वह मूर्ख, अज्ञानी या धूर्त व्यक्ति हिन्दुओं को अपने धर्म से दूर रखना चाहता होगा।

 

" बारहवां संवाद, आदि शंकराचार्य-मंडन मिश्र संवाद "


 आदि शंकराचार्य देशभर के साधु-संतों और विद्वानों से शास्त्रार्थ करते करते अंत में प्रसिद्ध विद्वान मंडन मिश्र के गांव पहुंचे थे। यहां उन्होंने 42 दिनों तक लगातार हुए शास्त्रार्थ किया जिसकी निर्णायक थीं मंडन मिश्र की पत्नी भारती। 


आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच जो संवाद हुआ उस संवाद की बहुत चर्चा होती है। हालांकि आदि शंकराचार्य ने मंडन को पराजित कर तो दिया, पर उनकी पत्नी के एक सवाल का जवाब नहीं दे पाए और अपनी हार मान ली।


हालांकि उपरोक्त के अलावा भी और भी हैं लेकिन यहां कुछ प्रमुख ही प्रस्तुत किए गए हैं।



Raj sir Words




दोस्तों...सब्र इंसान के लिए सबसे ज़रूरी होता है,क्योंकि सब्र ही वो ताक़त है जो इंसान को टूटने से बचाती है हर कोई दर्द सह सकता है,लेकिन बिना शिकायत उसे जीना ये सिर्फ़ सब्र सिखाता है,सब्र मतलब चुप रहना नहीं,सब्र मतलब हालात को समझकर ख़ुद को संभालना है. याद रहे संघर्ष में आप अनाथ हो काफ़िला तो सफ़लता के बाद उमड़ता है...नाराज़ होना और रुठना रिश्तों में बहुत अहम है मगर हमारे बिना किसी की जिंदगी ठहर जाएगी ये सोचना वहम है. तुम बस अपने चरित्र और कर्म पवित्र रखना साथ देने की जिम्मेदारी उस खुदा का है. मेहनत का फल, समस्याओं का हल और आने वाला कल सब ईश्वर के हाथ में है...but कुछ आपके हाथ में भी है वो है Believe your strength & Believe in yourself...you can get anything on base of your will & talent...नियत से भगवान खुश होते हैं,और दिखावे से इंसान यह आप पर निर्भर है कि आप किसे प्रसन्न करना चाहते हैं.परिवार आवश्यक है, मित्रता आवश्यक है, संबंध भी आवश्यक है लेकिन जीवन की हर कठिन परिस्थिति यह दर्शाती है कि अकेले रहने की कला का आना भी बहुत आवश्यक है। रिश्ते सब ज़रूरी हैं पर मुश्किल घड़ी सिखाती है कि अकेले रहने का हुनर लाज़मी है। खुद की सोहबत में जीना ही सबसे बड़ी और सच्ची ताक़त है...सबका सबके बिना काम चल जाता हैं,आप भ्रम में हैं कि आप किसी के ख़ास हैं...सब कुछ सीख लेना ही समझदारी नहीं है, बहुत कुछ नजरंदाज़ करना भी समझदारी है.जब जेब खाली हो बैंक अकाउंट माइनस में हो, और नौकरी न हो तब जो साथ खड़ा हो वो सगा हैं...शब्द और व्यवहार ही मनुष्य की असली पहचान है. चेहरा और हैसियत का क्या है आज है कल नहीं है.याद रहे जिंदगी के मेहंगे सबक सस्ते लोग ही सिखाते है...शब्दों में दयालुता विश्वास उत्पन्न करती है, विचारों में दयालुता प्रगाढ़ता उत्पन्न करती है, बांटने में दयालुता प्रेम उत्पन्न करती है. अंत ही आरंभ है, वासना ही मोह है, इच्छा ही लालच है, समझ ही ज्ञान है, अपेक्षाएँ ही दुःख हैं और एकांत ही सुख है दोस्तों...Raj Sir


मेरे किस्से का हर किरदार गद्दार निकला...


दोस्त जिस्म पर हक मिल जाते है रीति रिवाजों से,मगर ये रूह जिसकी दीवानी है मोहब्बत उसे कहते है...परवरिश पर दाग़ ना लगे इसलिए शांत हो गए,वर्ना तुम्हें एहसास करवाते कि बरबादी होती कैसी है दोस्त...हम तो बिखर जाने के ख्याल से भी डरते थे, पर तुमने बहुत बुरे तरह से मुझे तोड़ दिया दोस्त... बदुआ देना मेरे बस की बात नही दोस्त,पर हा ऐ जरूर कहूंगा हर हसीन हसीना बेवफा होती...जिसपर आपना अधिकार ही ना हो, उसका मोह करना मानसिक पीड़ा को न्योता देना है दोस्त...किसी के पास बहुत कुछ है खुदा का दिया,किसी के पास सिवाए खुदा के कुछ भी नहीं दोस्त...सब कुछ नहीं मिलता इस जिंदगी में, कुछ चीजें मुस्कुराते हुए छोड़ देनी चाहिए दोस्त...रफ़्ता-रफ़्ता ही सीखी हैं दुनियादारी मैंने,वरना हम भी कसम खाने वालों को सच मानते थे दोस्त...बेवजह दिवार पर इल्ज़ाम है बंटवारे का,वर्ना कई लोग एक कमरे में भी अलग रहते है दोस्त...यूं ही नहीं त्यागा मैंने दुनिया का मोह,मेरे किस्से का हर किरदार गद्दार निकला है दोस्त...उस हर एक व्यक्ति का शुक्रिया जिसने मुझे, ये एहसास कराया की कोई किसी का नहीं होता दोस्त...क्या हुआ जो तुम मुझसे दूर हो दोस्त,मेरे ज़हन और जिगर में तो तुम हर पल हो...मैंने रातों को जागकर देखा है,सुबह होने में कई साल लगते हैं दोस्त...कितने श्रेष्ठ होते है वो लोग जो स्वयं को,संपूर्ण समर्पित कर देते है किसी के प्रेम के प्रति दोस्त...सब priority का खेल है दोस्त,कोई सोफे में बैठकर reply नहीं दे पता तो कोई चलती बाइक पे reply देता है...मोहब्बत उस बला का नाम है जिसके शुरुआत में, मन मे तितलियां उड़ती है और अंत अरमानो की धज्जियां दोस्त...मोहब्बत सिर्फ मोहब्बत चाहती है,किसी की मेहरबानी या हमदर्दी नहीं दोस्त...कुछ लोग शकुनी की तरह होते हैं,हंसते हमारे साथ हैं पर खेलते हमारे खिलाफ है दोस्त...इश्क वो भी करते हैं,जिनकी मुलाकाते नही होती दोस्त...हमारा वक्त कैसा भी रहे रक्त में हमेशा वफादारी रहेगी दोस्त...घावों के ठीक हो जाने से हादसे नहीं भूले जाते दोस्त...लगाव बर्बाद कर देता है अकेले रहना ही बेहतर है दोस्त...हीरा परखने वाले से ज़्यादा पीड़ा परखने वाला बहुत महत्वपुर्ण होता है दोस्त...हवस और धन की चाह ना हो तो प्रेम आज भी अत्यंत सरल है दोस्त...प्रेम को समझने के लिए हृदय चाहिए,निभाने के लिए धेर्य और पाने के लिए सौभाग्य दोस्त...प्रेम में धैर्य इतना हो कि तुम बिन ये उम्र गुजार दूं दोस्त,और व्याकुलता इतनी कि तुम बिन एक पल भी न गुजरे...राज


तुम्हारी यादें

सुबह आँख खुलती है

तो सबसे पहले बदन थकान माँगता है,

नींद पूरी होती है

पर आराम नहीं उतरता।

छाती भारी रहती है,

जैसे रात भर

किसी ने भीतर

तुम्हारा नाम रख छोड़ा हो।

कंधे झुके रहते हैं,

किसी बोझ से नहीं,

किसी कमी से।

हाथ खाली हैं

पर हथेलियाँ

कुछ पकड़े रहने की

आदत नहीं छोड़तीं।

रीढ़ में एक खिंचाव रहता है,

हर क़दम पर

थोड़ा-सा दर्द खिसकता है,

जैसे चलना नहीं,

अपने आप को

ढो रहा हूँ।

पेट भूख नहीं बताता,

वो बस जलन देता है

ऐसी जलन

जो खाने से नहीं बुझती।

हर कौर

सीधा गले से नहीं उतरता,

कुछ हिस्सा

सीने में अटक जाता है।

साँसें पूरी आती हैं,

पर सही जगह नहीं पहुँचतीं।

फेफड़े काम करते हैं,

मगर दिल को

हवा नहीं मिलती।

रात को लेटता हूँ

तो बदन

आराम की स्थिति में होता है,

पर भीतर

कुछ लगातार जागता रहता है

जाँघों में जकड़न,

पैरों में झनझनाहट,

और आँखों के पीछे

एक जलता हुआ खालीपन।

तुम्हारी याद

अब सोच नहीं रही।

वो नसों में दौड़ती है,

हड्डियों से टकराती है,

और हर सुबह

मुझे पूरे शरीर के साथ

तुम्हारे बिना

उठने पर मजबूर करती है।


             

स्त्री के लिए प्यार कोई एक क्षण नहीं होता...

स्त्री के लिए प्यार कोई एक क्षण नहीं होता, बल्कि एक लगातार चलने वाली मानसिक प्रक्रिया होती है। उसके भीतर प्यार तब जन्म लेता है जब वह यह महसूस करती है कि उसे केवल देखा नहीं जा रहा, बल्कि समझा जा रहा है। स्त्री का मन बहुत बार अपने अतीत, अनुभवों, सामाजिक सीख और भावनात्मक स्मृतियों के साथ वर्तमान में जी रहा होता है। इसलिए जब वह किसी पुरुष के करीब आती है, तो वह केवल उस व्यक्ति के सामने नहीं होती, बल्कि अपने पूरे जीवन के अनुभवों के साथ खड़ी होती है।


मान लीजिए एक स्त्री है जिसने जीवन में कभी अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं किया। जब वह किसी पुरुष से मिलती है जो उसे बिना टोके बोलने देता है, उसकी बातों को हल्के में नहीं लेता, तब उसके भीतर एक आंतरिक दरवाज़ा खुलता है। यह दरवाज़ा शारीरिक नहीं, मानसिक होता है। यहीं से उसका आकर्षण शुरू होता है।

स्त्री के लिए आकर्षण अक्सर शरीर से नहीं, सुरक्षा के भाव से शुरू होता है।


मनोवैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो स्त्री का मस्तिष्क तभी शारीरिक निकटता के लिए तैयार होता है जब वह “खतरे की अवस्था” से बाहर आती है। यदि उसके मन में डर हो अस्वीकार का, आहत होने का, या उपयोग किए जाने का तो उसका शरीर चाहकर भी सहज प्रतिक्रिया नहीं दे पाता। यही कारण है कि कई बार स्त्री बाहर से शांत दिखती है, पर भीतर से बंद रहती है।


संभोग से पहले स्त्री के भीतर एक मौन संवाद चलता है। वह स्वयं से पूछती है

“क्या मैं यहाँ सुरक्षित हूँ?”

“क्या मेरी सीमाओं का सम्मान होगा?”

“क्या इसके बाद भी मुझे वही अपनापन मिलेगा?”


यदि इन प्रश्नों के उत्तर अनिश्चित हों, तो उसका मन पीछे हट जाता है। और जब मन पीछे हटता है, तो शरीर भी पीछे हटता है। यह कोई नखरा नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक आत्म-सुरक्षा है।


एक उदाहरण लें। एक स्त्री और पुरुष एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। पुरुष शारीरिक निकटता चाहता है, पर स्त्री अभी पूरी तरह सहज नहीं है। यदि पुरुष इस असहजता को पढ़ लेता है, रुक जाता है, और कहता है “तुम जब चाहो, तभी” तो उस एक वाक्य से स्त्री के भीतर गहरा विश्वास जन्म ले सकता है। अगली बार वही स्त्री स्वयं आगे बढ़ सकती है, क्योंकि उसके मन में यह दर्ज हो चुका है कि यहाँ दबाव नहीं है।


यहीं पर स्त्री और पुरुष के मनोविज्ञान में अंतर दिखता है। पुरुष अक्सर इच्छा को सीधे अनुभव करता है, जबकि स्त्री इच्छा तक पहुँचने से पहले कई मानसिक परतों को पार करती है। उसके लिए संभोग एक भावनात्मक पुष्टि भी होता है कि वह केवल चाही जा रही है, बल्कि स्वीकार की जा रही है।


संभोग के दौरान स्त्री का अनुभव तब गहरा होता है जब वह स्वयं को “प्रदर्शन” में नहीं, बल्कि “अनुभव” में महसूस करती है। यदि उसे यह चिंता हो कि वह कैसी दिख रही है, क्या वह पर्याप्त है, या सामने वाला संतुष्ट है या नहीं—तो उसका मन वर्तमान से कट जाता है। लेकिन जब उसे यह भरोसा होता है कि उसे जज नहीं किया जा रहा, तब वह अपने शरीर में पूरी तरह उपस्थित हो पाती है।


कई स्त्रियों के लिए संभोग के समय भावनाएँ अचानक उभर आती हैं कभी आँसू, कभी अत्यधिक लगाव। यह इसलिए होता है क्योंकि स्त्री का मन और शरीर अलग-अलग नहीं चलते। जब वह किसी को अपने शरीर के करीब आने देती है, तो वह अनजाने में अपने भावनात्मक संसार के द्वार भी खोल देती है।


संभोग के बाद का समय स्त्री के लिए अत्यंत संवेदनशील होता है। उस समय यदि पुरुष दूरी बना ले, मोबाइल में खो जाए, या भावनात्मक रूप से अनुपस्थित हो जाए, तो स्त्री के मन में खालीपन या पश्चाताप पैदा हो सकता है। इसके विपरीत, यदि पुरुष पास रहे, बात करे, उसका हाथ थामे, तो स्त्री का मन उस अनुभव को सुरक्षित और प्रेमपूर्ण स्मृति के रूप में सहेज लेता है।


मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो स्त्री के लिए संभोग केवल शारीरिक संतुष्टि नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव की पुष्टि है। इसलिए जब यह प्रेम, संवाद और सम्मान के साथ होता है, तो वह स्त्री के आत्मविश्वास, सुरक्षा और प्रेम की भावना को और गहरा करता है।


स्त्री के लिए प्यार और संभोग तब सार्थक बनते हैं जब वह स्वयं को खोकर नहीं, बल्कि और अधिक स्वयं बनकर उस संबंध में उपस्थित हो सके।


Thursday, January 15, 2026

सुख 7नहीं 8 होते हैं...

 सुख 7नहीं 8 होते हैं ......


1. पहला सुख निरोगी काया


अर्थात हमारे शरीर में किसी भी प्रकार का कोई भी रोग नहीं होना चाहिए कोई बीमारी नहीं होनी चाहिए कोई कष्ट नहीं होना चाहिए किसी भी प्रकार की पीड़ा से मुक्त शरीर ही पहला सुख है।


2. दूसरा सुख घर में माया


अर्थात जीवन जीने के लिए, दान पुण्य करने के लिए, और आनंद से जीवन व्यतीत करने के लिए हमारे घर में पर्याप्त माया हो।माया अर्थात धन होना चाहिए।


3. तीसरा सुख पुत्र आज्ञाकारी


यदि किसी के पास अपार धन-दौलत हो रूप हो गुण हो ऐश्वर्या हो इज्जत हो लेकिन यदि उसका पुत्र उसकी ही आज्ञा नहीं मानता है तो वे तमाम सुख सुविधाएं उसके लिए नर्क के समान है पुत्र का आज्ञाकारी होना अति आवश्यक है।


4. चौथा सुख सुलक्षणा नारी


सभी प्रकार के सुख सुविधाएं होते हुए रूप सौंदर्य होते हुए विभिन्न प्रकार के विलासिता के साधन होते हुए भी यदि पत्नी अच्छे लक्षणों वाली नहीं है तो जीवन में सुख नहीं हो सकता इसलिए एक पत्नी का सुलक्षणा होना अति आवश्यक है।


5. पांचवा सुख राज में पाया


अर्थात यदि घर में मुख्य पुरुष के सरकारी नौकरी हो या वह राज्य कार्यों से जुड़ा हुआ हो राज्य से उसको आमदनी प्राप्त होती हो और राजकाज आसानी से हो जाते हो।


6. छठा सुख पड़ोसी "भाया"


अर्थात हमारे पड़ोस में रहने वाले लोग इस प्रकार के होने चाहिए कि हमारे विचार उनसे मिलते हो और उनके विचार हमसे मिलते हैं वह हमारे साथ हमेशा अच्छा सोचते हो और हमारे सुख-दुख में सहयोगी होने चाहिए अन्यथा यदि सभी प्रकार की सुख सुविधाएं होने के बावजूद भी यदि पड़ोसी कुटिल है और हमारी हानि करने वाला है तो वह भी एक प्रकार का दुख है इसलिए पड़ोसी का अच्छा होना सुख माना गया है।


7. सातवा सुख मात पिता का साया


जिस व्यक्ति के माता और पिता जीवित होते हैं वह व्यक्ति सभी सुखों को पा लेता है माता पिता की सेवा करने का अवसर प्राप्त होता है और माता-पिता का आशीर्वाद हमेशा बना रहता है तो माता-पिता का जीवित रहना भी एक प्रकार का सुख है।


8. आठवां सुख पुत्री का साया🌿


वैसे तो सुख सात ही प्रकार के माने गए हैं किंतु घर में पुत्री का होना आठवां सुख माना गया है इसलिए घर में 🌿यदि पुत्री हो और उपरोक्त सभी सुख उपलब्ध हो तो ये आठों सुख माने गए हैं।

आयुर्वेदिक ज्ञान

 🌿 अश्वगंधा

कमजोरी, तनाव व अनिद्रा में लाभ

ताकत व इम्युनिटी बढ़ाता है

🌿 गिलोय

बुखार, डेंगू, मलेरिया में लाभ

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है

🌿 तुलसी

सर्दी-खांसी, बुखार में लाभ

सांस रोग व इम्युनिटी के लिए अच्छी

🌿 एलोवेरा

पेट, त्वचा व कब्ज में लाभ

घाव भरने व बालों के लिए उपयोगी

🌿 नीम

खून साफ करता है

त्वचा रोग, दांत व संक्रमण में लाभ

🌿 आंवला

आंखों व बालों के लिए उत्तम

पाचन व इम्युनिटी बढ़ाता है

🌿 ब्राह्मी

याददाश्त तेज करता है

मानसिक तनाव व नींद में लाभ

🌿 शतावरी

महिलाओं के लिए लाभकारी

कमजोरी व पाचन में सुधार

🌿 मुलेठी

गले की खराश व खांसी में लाभ

पेट के अल्सर में उपयोगी

🌿 अर्जुन

हृदय रोग में लाभकारी

ब्लड प्रेशर संतुलन में मदद

🌿 हरड़

कब्ज व पेट साफ करने में सहायक

पाचन शक्ति बढ़ाता है

🌿 पुनर्नवा

सूजन व किडनी रोग में लाभ

पेशाब संबंधी रोगों में उपयोगी

🌿 कालमेघ

लीवर व बुखार में लाभ

खून साफ करने में सहायक

🌿 गुडमार

शुगर (डायबिटीज) नियंत्रित करता है

🌿 सहजन (मोरिंगा)

कमजोरी, एनीमिया में लाभ

हड्डियों व इम्युनिटी के लिए अच्छा

🌿 बेहड़ा

खांसी, कब्ज व आंखों के लिए लाभ

त्रिफला का प्रमुख घटक

🌿 वराहकंद

कमजोरी व यौन शक्ति में लाभ

🌿 भृंगराज

बालों का झड़ना रोकता है

लीवर व त्वचा के लिए लाभकारी

🌿 नागरमोथा

दस्त, गैस व पाचन में लाभ

🌿 चिरायता

बुखार व खून की गंदगी में लाभ

🌿 कुटज

दस्त, पेचिश में अत्यंत लाभकारी

🌿 शंखपुष्पी

दिमाग तेज करता है

तनाव व अनिद्रा में लाभ

🌿 लोध

महिलाओं के रोगों में उपयोगी

रक्तस्राव रोकने में सहायक

🌿 पिप्पली

दमा, खांसी व पाचन में लाभ

🌿 कपिकच्छु

वीर्य वृद्धि व कमजोरी में लाभ

🌿 यष्टिमधु

गला, पेट व अल्सर में लाभ

🌿 विदंग

पेट के कीड़े नष्ट करता है

⚠️ महत्वपूर्ण सूचना:

इन जड़ी-बूटियों का सेवन डॉक्टर या आयुर्वेद विशेषज्ञ की सलाह से ही करें, विशेषकर यदि कोई बीमारी या दवा चल रही हो।


Wednesday, January 14, 2026

औरतें

औरतें सिर्फ शक्ल और ज़िस्म

से ही खूबसूरत नहीं होतीं,

बल्कि वो इसलिए भी खूबसूरत होती हैं,

क्योंकि प्यार में ठुकराने के बाद भी,

किसी मर्द पर तेज़ाब नहीं फेंकती ! 

उनकी वज़ह से कोई पुरुष 

दहेज़ में प्रताड़ित हो कर फांसी नहीं लगाता !


वो इसलिए भी खूबरसूरत होती हैं,

क्योंकि उनकी वजह से लड़कों को 

रास्ता नही बदलना पड़ता,

वो राह चलते लड़को पर 

अभद्र टिप्पड़ियां नही करती!


वो इसलिए भी खूबसूरत होती हैं,

क्योंकि देर से घर आने वाले

पति पर शक नही करती,

बल्कि फ़िक्र करती है! 

वो छोटी छोटी बातों पर 

नाराज़ नही होती, 

सामान नही पटकती, 

हाथ नही उठाती,

बल्कि पार्टनर को समझाने की,

भरपूर कोशिश करती हैं !


वो तकलीफ़ सह कर भी 

रिश्ते इसलिए निभा जाती हैं,

क्योंकि वो अपने माँ बाप का 

दिल नही तोड़ना चाहती ! 


वो हालात से समझौता 

इसलिए भी कर जाती हैं, 

क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के 

उज्ज्वल भविष्य की फ़िक्र होती है ! 


वो रिश्तों में जीना चाहती हैं ! 

रिश्ते निभाना चाहती हैं ! 

रिश्तों को अपनाना चाहती हैं!

दिलों को जीतना चाहती हैं ! 

प्यार पाना चाहती हैं ! 

प्यार देना चाहती हैं !


हमसफ़र, हमकदम बनाना चाहती हैं।

इसलिए औरतें

सिर्फ शक्ल और ज़िस्म

से ही खूबसूरत नहीं होती ,

वो एक सुंदर मन होती हैं,

जिसे देखने के लिए चाहिए

समाज ने हमेशा एक झूठ सिखाया है —

👉 अच्छी स्त्री वही है जो चुप रहे

👉 पवित्र वही है जो सवाल न करे

👉 सम्मान वही है जो आज्ञाकारी हो

और जो भी स्त्री सोचने लगी, बोलने लगी, जीने लगी —

उसे समाज ने तुरंत नाम दे दिया: ❌ पागल

❌ चरित्रहीन

❌ विद्रोही

❌ बदचलन

❌ अस्वीकार्य

इतिहास गवाह है।

मीरा को ज़हर दिया गया — क्योंकि उसने पति नहीं, प्रेम चुना।

अक्का महादेवी को नग्न कहा गया — क्योंकि उसने ईश्वर को पति माना।

ललद्यद (लल्लेश्वरी) को पागल कहा गया — क्योंकि उसने कर्मकांड त्याग दिए।

आज वही मीरा “संत” है।

लेकिन अपने समय में? — अपराधी।

अमृता प्रीतम ने जब प्रेम को विवाह से ऊपर रखा —

तो समाज असहज हो गया।

क्योंकि स्त्री अगर प्रेम चुन ले,

तो पुरुष की सत्ता हिलने लगती है।

स्मिता पाटिल ने जब अभिनय नहीं, सत्य जिया —

तो वह सुंदर नहीं, “भारी” कहलाने लगी।

नीना गुप्ता ने जब कहा —

“मैं अकेली माँ हूँ और मुझे शर्म नहीं”

तो समाज को पहली बार अपनी गंदगी दिखाई दी।

सीमा आनंद आज वही कर रही हैं

जो मीरा, अमृता, अक्का ने अपने समय में किया था —

👉 शरीर पर बोलना

👉 इच्छा पर बोलना

👉 रिश्तों के पाखंड को तोड़ना

और समाज वही कर रहा है

जो उसने हमेशा किया है —

👉 चरित्र हत्या

👉 ट्रोलिंग

👉 गाली

👉 बहिष्कार

क्योंकि समाज को जागी हुई स्त्री नहीं चाहिए,

उसे केवल उपयोगी स्त्री चाहिए।

और फिर आता है वह नाम

जिसने इस पूरे ढोंग को नंगा कर दिया —

आचार्य रजनीश ओशो

ओशो ने साफ कहा था:

“स्त्री को पवित्र नहीं, स्वतंत्र बनाओ।

पवित्रता गुलामी का दूसरा नाम है।”

ओशो की वजह से ही

मा आनंद शीला जैसी स्त्री खड़ी हुई —

जो सत्ता से नहीं डरी

जो पुरुष से नहीं डरी

जो समाज से नहीं डरी

और समाज ने उसे “खलनायिका” बना दिया।

क्यों?

क्योंकि जब स्त्री को शक्ति मिलती है

तो पुरुषों का धर्म, राजनीति और नैतिकता —

तीनों हिल जाते हैं।

आज समाज जिन स्त्रियों को गाली देता है —

कल वही आइकन बनती हैं।

आज जिन्हें “अश्लील” कहा जाता है —

कल उन्हें “क्रांतिकारी” कहा जाता है।

आज जिन्हें “स्वीकार्य नहीं” कहा जाता है —

कल उन्हीं पर किताबें लिखी जाती हैं।

यह समाज की सबसे बड़ी पाखंडी चाल है।

ओशो ने चेतावनी दी थी:

“समाज कभी भी सच बोलने वाले को जीवित रहते स्वीकार नहीं करता।

वह या तो उसे मार देता है

या पागल घोषित कर देता है।”

खासकर जब सच स्त्री की आवाज़ से निकले।

इसलिए अगर आज कोई स्त्री

👉 सवाल पूछ रही है

👉 देह को स्वीकार कर रही है

👉 प्रेम को अपराध नहीं मान रही

👉 अकेले जीने का साहस रखती है

तो समझ लीजिए —

वह गलत नहीं है।

समाज गलत है।

मीरा, अमृता, स्मिता, नीना, सीमा आनंद, अक्का महादेवी, ललद्यद,

और मा आनंद शीला —

ये नाम नहीं हैं।

ये समाज के मुँह पर पड़े थप्पड़ हैं।


Tuesday, January 13, 2026

आत्मविश्वास

आत्मविश्वास


यदि स्वामी विवेकानंद के सम्पूर्ण विचार-दर्शन को एक शब्द में समेटा जाए,

तो वह शब्द होगा— आत्मविश्वास।

उनके लिए आत्मविश्वास कोई मनोवैज्ञानिक तकनीक नहीं था,

बल्कि मानव अस्तित्व की मूल शर्त था।


विवेकानंद मानते थे कि

मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या गरीबी, अशिक्षा या संसाधनों की कमी नहीं है—

सबसे बड़ी समस्या है स्वयं पर अविश्वास।


आत्महीनता : सबसे बड़ा पाप


स्वामी विवेकानंद ने स्पष्ट शब्दों में कहा—

“आत्मा पर अविश्वास ही सबसे बड़ा पाप है।”


यह कथन साधारण नहीं,

बल्कि पूरे भारतीय समाज के लिए एक कठोर निदान था।

विवेकानंद ने देखा कि भारत की पराजय

बाहरी आक्रमणों से पहले

भीतर की हार से शुरू हुई।


जब समाज यह मान लेता है कि—


हम कमजोर हैं


हम पिछड़े हैं


हम कुछ नहीं कर सकते


तब पराजय निश्चित हो जाती है।


आत्मविश्वास बनाम अहंकार


विवेकानंद का आत्मविश्वास

अहंकार से बिल्कुल अलग था।

अहंकार दूसरों को छोटा दिखाकर बड़ा बनता है,

जबकि आत्मविश्वास

अपने भीतर की शक्ति को पहचानने से आता है।


उन्होंने कहा—


> “तुम शक्तिशाली हो, तुम पवित्र हो, तुम दिव्य हो।”


यह वाक्य

किसी संत का उपदेश नहीं,

बल्कि एक क्रांतिकारी घोषणा थी।


विवेकानंद चाहते थे कि

हर युवा अपने भीतर यह विश्वास पैदा करे कि—

मैं परिस्थिति का दास नहीं, निर्माता हूँ।


गुलामी पहले मन में जन्म लेती है


भारत की ऐतिहासिक पराजयों को

विवेकानंद केवल सैन्य या राजनीतिक दृष्टि से नहीं देखते थे।

उनके अनुसार गुलामी

सबसे पहले मानसिक स्तर पर आती है।


जब व्यक्ति यह सोच ले कि—

“मैं कुछ नहीं बदल सकता,”

उसी क्षण वह हार जाता है।


आज भी यह मानसिकता

नए रूप में मौजूद है—

कभी बेरोजगारी के नाम पर,

कभी व्यवस्था के नाम पर,

और कभी भाग्य के नाम पर।


युवा और आत्मविश्वास का संकट


आज का युवा

तकनीकी रूप से पहले से अधिक सक्षम है,

पर मानसिक रूप से पहले से अधिक भ्रमित।


तुलना ने आत्मविश्वास छीना है


असफलता का डर निर्णय क्षमता तोड़ता है


त्वरित सफलता की चाह धैर्य खत्म करती है


विवेकानंद इसके विपरीत

युवाओं को साहसिक असफलता के लिए तैयार करते थे।


वे कहते थे—


> “एक विचार लो।

उसी विचार को अपना जीवन बना लो।”


यह कथन

एकाग्रता और आत्मविश्वास का सूत्र है।


आत्मविश्वास का निर्माण कैसे हो?


विवेकानंद के अनुसार आत्मविश्वास

बाहरी प्रशंसा से नहीं,

बल्कि अनुशासन, कर्म और चरित्र से बनता है।


1. स्व-अनुशासन – जो स्वयं पर शासन कर सकता है, वही दुनिया को बदल सकता है


2. निरंतर कर्म – कर्म से भागने वाला कभी आत्मविश्वासी नहीं हो सकता


3. सेवा भाव – दूसरों के लिए काम करने से भीतर की शक्ति जागती है


4. साहसिक सत्य – सच बोलने का साहस आत्मबल को जन्म देता है


राष्ट्र निर्माण आत्मविश्वास से शुरू होता है


विवेकानंद के लिए

राष्ट्र निर्माण का अर्थ

सिर्फ सड़क, इमारत या संस्थान नहीं था।

वे कहते थे—

पहले मनुष्य बनाओ, फिर समाज अपने आप बनेगा।


जब युवा आत्मविश्वासी होता है—


वह भीड़ नहीं बनता, नेतृत्व करता है


वह शिकायत नहीं करता, समाधान खोजता है


वह अवसर का इंतज़ार नहीं करता, अवसर बनाता है


इस अध्याय का सार


यह अध्याय हमें यह सिखाता है कि—


आत्मविश्वास कोई विलास नहीं, आवश्यकता है


राष्ट्र की शक्ति व्यक्ति के मन से शुरू होती है


और विवेकानंद का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है


भारत की जाग्रत आत्मा

उसी दिन पूर्ण रूप से जागेगी

जिस दिन भारत का युवा

अपने भीतर यह कह सके—

“मैं कमजोर नहीं हूँ,

मैं संभावनाओं से भरा हूँ।”



माताओं में असीम सामर्थ्य होती है

 माताओं में असीम सामर्थ्य होती है। वे वह सब कर सकती हैं, जिसकी कल्पना भी कठिन होती है। फिर भी अक्सर पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों में उनकी बातों को अनसुना कर दिया जाता है। धीरे-धीरे उनके मन में पीड़ा इकट्ठा होने लगती है। मन भारी हो जाता है, पर उसी भारी मन को लेकर वे निरंतर परिवार की सेवा करती रहती हैं।

इस प्रक्रिया में उनका जीवन मानो एक सीमित दायरे में सिमटता चला जाता है जैसे कोई जीव स्वयं को बुनते हुए अंततः उसी में बँध जाता है।


इसलिए आवश्यक है कि वे उस दायरे से बाहर निकलें। केवल दायित्वों तक सीमित न रहें, बल्कि अपने लिए भी समय निकालें। दिनभर के सारे काम निपटाने के बाद यदि वे प्रतिदिन थोड़ा सा समय आत्मचिंतन, मौन, या किसी सकारात्मक उद्देश्य को दें, तो धीरे-धीरे उनके भीतर की बंद खिड़कियाँ खुलने लगती हैं। भीतर प्रकाश प्रवेश करता है, और जीवन में फिर से प्रसन्नता का संचार होने लगता है।


जब एक माँ का मन आनंदित होता है, तो उसका प्रभाव केवल उसी तक सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है। क्योंकि जब प्रसन्न मन से वह भोजन बनाती है, बोलती है, या कोई भी कार्य करती है, तो वही भाव परिवार के प्रत्येक सदस्य तक पहुँचता है। यह अनुभवजन्य सत्य है कि जो व्यक्ति जिस मानसिक अवस्था में कुछ देता है, वही अवस्था प्राप्त करने वाले तक भी पहुँचती है।


इसलिए आगे बढ़ने से डरना नहीं चाहिए। डर आखिर किस बात का? यह सोचकर रुक जाना कि “मैं ठीक से बोल नहीं पाऊँगी”, “मुझे ज्ञान नहीं है”, या “लोग क्या कहेंगे” ये सब मन की रुकावटें हैं।

जब कोई भी व्यक्ति अपने अनुभव और सच्चे भाव से बोलता है, तो वह किसी तय सीमा में नहीं बँधा रहता। ज्ञान की औपचारिकता से बाहर निकलकर जब बात आती है, तब वह अधिक सजीव और प्रभावशाली होती है।


एक छोटी-सी कहानी है किसी बड़े निर्माण कार्य में अनेक शक्तिशाली लोग लगे होते हैं, पर वहीं एक छोटा जीव भी अपनी सीमित क्षमता से उसमें योगदान देता है। इतिहास में अक्सर बड़े नाम खो जाते हैं, लेकिन उस छोटे जीव की निष्ठा और प्रयास लोगों की स्मृति में जीवित रह जाते हैं। क्योंकि मूल्य आकार में नहीं, भाव में होता है।


जीवन में रोग, शोक और कठिनाइयाँ आना स्वाभाविक है। कई बार हम उन्हीं पर पूरा ध्यान केंद्रित कर देते हैं। लेकिन जब हम स्वयं को किसी सकारात्मक और उद्देश्यपूर्ण कार्य में लगाए रखते हैं, तो अनेक समस्याएँ अपने आप कमजोर पड़ने लगती हैं।

दुख भी ध्यान चाहता है। जब हम लगातार उसी को देखते रहते हैं, तो वह और मजबूत होता है। लेकिन जब हम जीवन के अर्थ, सेवा, या व्यापक दृष्टि की ओर बढ़ते हैं, तो वही दुख स्वयं पीछे हटने लगता है जैसे वह कह रहा हो कि “यहाँ अब मेरा स्थान नहीं रहा।”


जीवन को प्रेम से जीने में शर्तें नहीं होनी चाहिए। जब हम यह कहना सीख लेते हैं कि “मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस सब ठीक रहे”, तो उसी क्षण से हमारा अपना ठीक रहना शुरू हो जाता है।

मन में कौन-सा विचार, कौन-सी भावना रहेगी यह हमारा अधिकार है। जैसे कोई व्यक्ति यह तय करता है कि किसी विषैले अनुभव को हाथ में लेकर क्या करना है, वैसे ही हम भी तय करते हैं कि किसे अपने मन में स्थान देना है और किसे नहीं।


कभी-कभी किसी के व्यवहार से मन आहत हो जाता है। उस क्षण यह समझ आ जाए कि यदि हमारा मन भीतर से पूर्ण होता, तो बाहरी व्यवहार हमें इतना विचलित नहीं कर पाता तो वहीं से सुधार की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

जैसे ही हम भीतर की कमी को पहचानकर उसे भरने का प्रयास करते हैं, मन कुछ ही समय में पुनः संतुलित हो जाता है।


अक्सर लोग सोचते हैं कि किसी सामूहिक आयोजन का उद्देश्य केवल भाषण या औपचारिकता है। पर वास्तव में उसका उद्देश्य यह समझना है कि हम अपने जीवन को किस चेतना के साथ जी रहे हैं। प्रेरणास्रोतों की चर्चा आवश्यक है, क्योंकि उनसे हमें दिशा मिलती है।

लेकिन अंततः हर कार्य का केंद्र वही होना चाहिए, जिसके लिए वह किया जा रहा है न कि केवल आयोजन स्वयं।


सामूहिक मिलन, संस्कार और सामाजिक कार्यक्रम लोगों को जोड़ने के लिए होते हैं। लेकिन प्रेम के लिए किसी मंच या विधि की आवश्यकता नहीं होती। प्रेम तो तब है जब हम अपने जीवन के हर छोटे-बड़े कार्य में उस भावना को साथ रखें।

खाते समय, चलते समय, काम करते समय यदि कोई भाव लगातार हमारे साथ बना रहे, तो वही सच्चा जुड़ाव है। ऐसा जुड़ाव कभी टूटता नहीं।


कभी-कभी बड़ी घटनाओं में यह देखने को मिलता है कि लोग असामान्य रूप से सुरक्षित रह जाते हैं। जब उस समय वे किसी भय में नहीं, बल्कि एकाग्रता, प्रार्थना, स्मरण या सकारात्मक चिंतन में लीन होते हैं, तो उनका मन भय से मुक्त रहता है। भय से मुक्त मन कई बार असंभव परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रखता है।


लेकिन यह मान लेना कि केवल संकट के समय किसी उच्च शक्ति को याद करने से सब ठीक हो जाएगा यह एक प्रकार की शर्त है। जीवन का वास्तविक सिद्धांत यह है कि निरंतर, सहज और बिना अपेक्षा के उस सकारात्मक चेतना से जुड़े रहा जाए।

यही जीवन जीने की कला है। इसी तरह जीवन में स्थिरता आती है।


जब हम आनंदित मन से, प्रेमपूर्वक जो भी कार्य करते हैं, उसका प्रभाव हमारे आसपास के लोगों पर भी पड़ता है। परिवार, वातावरण और संबंध सब धीरे-धीरे उसी आनंद से भरने लगते हैं।


और अंततः, जो भी हम करें, उसमें हमारे और हमारे जीवन-दर्शन के बीच एक प्रेम-कथा होनी चाहिए।

उस प्रेम को केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने जीवन के माध्यम से प्रकट करना ही उसकी सच्ची अभिव्यक्ति है।