औरतें सिर्फ शक्ल और ज़िस्म
से ही खूबसूरत नहीं होतीं,
बल्कि वो इसलिए भी खूबसूरत होती हैं,
क्योंकि प्यार में ठुकराने के बाद भी,
किसी मर्द पर तेज़ाब नहीं फेंकती !
उनकी वज़ह से कोई पुरुष
दहेज़ में प्रताड़ित हो कर फांसी नहीं लगाता !
वो इसलिए भी खूबरसूरत होती हैं,
क्योंकि उनकी वजह से लड़कों को
रास्ता नही बदलना पड़ता,
वो राह चलते लड़को पर
अभद्र टिप्पड़ियां नही करती!
वो इसलिए भी खूबसूरत होती हैं,
क्योंकि देर से घर आने वाले
पति पर शक नही करती,
बल्कि फ़िक्र करती है!
वो छोटी छोटी बातों पर
नाराज़ नही होती,
सामान नही पटकती,
हाथ नही उठाती,
बल्कि पार्टनर को समझाने की,
भरपूर कोशिश करती हैं !
वो तकलीफ़ सह कर भी
रिश्ते इसलिए निभा जाती हैं,
क्योंकि वो अपने माँ बाप का
दिल नही तोड़ना चाहती !
वो हालात से समझौता
इसलिए भी कर जाती हैं,
क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के
उज्ज्वल भविष्य की फ़िक्र होती है !
वो रिश्तों में जीना चाहती हैं !
रिश्ते निभाना चाहती हैं !
रिश्तों को अपनाना चाहती हैं!
दिलों को जीतना चाहती हैं !
प्यार पाना चाहती हैं !
प्यार देना चाहती हैं !
हमसफ़र, हमकदम बनाना चाहती हैं।
इसलिए औरतें
सिर्फ शक्ल और ज़िस्म
से ही खूबसूरत नहीं होती ,
वो एक सुंदर मन होती हैं,
जिसे देखने के लिए चाहिए
समाज ने हमेशा एक झूठ सिखाया है —
👉 अच्छी स्त्री वही है जो चुप रहे
👉 पवित्र वही है जो सवाल न करे
👉 सम्मान वही है जो आज्ञाकारी हो
और जो भी स्त्री सोचने लगी, बोलने लगी, जीने लगी —
उसे समाज ने तुरंत नाम दे दिया: ❌ पागल
❌ चरित्रहीन
❌ विद्रोही
❌ बदचलन
❌ अस्वीकार्य
इतिहास गवाह है।
मीरा को ज़हर दिया गया — क्योंकि उसने पति नहीं, प्रेम चुना।
अक्का महादेवी को नग्न कहा गया — क्योंकि उसने ईश्वर को पति माना।
ललद्यद (लल्लेश्वरी) को पागल कहा गया — क्योंकि उसने कर्मकांड त्याग दिए।
आज वही मीरा “संत” है।
लेकिन अपने समय में? — अपराधी।
अमृता प्रीतम ने जब प्रेम को विवाह से ऊपर रखा —
तो समाज असहज हो गया।
क्योंकि स्त्री अगर प्रेम चुन ले,
तो पुरुष की सत्ता हिलने लगती है।
स्मिता पाटिल ने जब अभिनय नहीं, सत्य जिया —
तो वह सुंदर नहीं, “भारी” कहलाने लगी।
नीना गुप्ता ने जब कहा —
“मैं अकेली माँ हूँ और मुझे शर्म नहीं”
तो समाज को पहली बार अपनी गंदगी दिखाई दी।
सीमा आनंद आज वही कर रही हैं
जो मीरा, अमृता, अक्का ने अपने समय में किया था —
👉 शरीर पर बोलना
👉 इच्छा पर बोलना
👉 रिश्तों के पाखंड को तोड़ना
और समाज वही कर रहा है
जो उसने हमेशा किया है —
👉 चरित्र हत्या
👉 ट्रोलिंग
👉 गाली
👉 बहिष्कार
क्योंकि समाज को जागी हुई स्त्री नहीं चाहिए,
उसे केवल उपयोगी स्त्री चाहिए।
और फिर आता है वह नाम
जिसने इस पूरे ढोंग को नंगा कर दिया —
आचार्य रजनीश ओशो
ओशो ने साफ कहा था:
“स्त्री को पवित्र नहीं, स्वतंत्र बनाओ।
पवित्रता गुलामी का दूसरा नाम है।”
ओशो की वजह से ही
मा आनंद शीला जैसी स्त्री खड़ी हुई —
जो सत्ता से नहीं डरी
जो पुरुष से नहीं डरी
जो समाज से नहीं डरी
और समाज ने उसे “खलनायिका” बना दिया।
क्यों?
क्योंकि जब स्त्री को शक्ति मिलती है
तो पुरुषों का धर्म, राजनीति और नैतिकता —
तीनों हिल जाते हैं।
आज समाज जिन स्त्रियों को गाली देता है —
कल वही आइकन बनती हैं।
आज जिन्हें “अश्लील” कहा जाता है —
कल उन्हें “क्रांतिकारी” कहा जाता है।
आज जिन्हें “स्वीकार्य नहीं” कहा जाता है —
कल उन्हीं पर किताबें लिखी जाती हैं।
यह समाज की सबसे बड़ी पाखंडी चाल है।
ओशो ने चेतावनी दी थी:
“समाज कभी भी सच बोलने वाले को जीवित रहते स्वीकार नहीं करता।
वह या तो उसे मार देता है
या पागल घोषित कर देता है।”
खासकर जब सच स्त्री की आवाज़ से निकले।
इसलिए अगर आज कोई स्त्री
👉 सवाल पूछ रही है
👉 देह को स्वीकार कर रही है
👉 प्रेम को अपराध नहीं मान रही
👉 अकेले जीने का साहस रखती है
तो समझ लीजिए —
वह गलत नहीं है।
समाज गलत है।
मीरा, अमृता, स्मिता, नीना, सीमा आनंद, अक्का महादेवी, ललद्यद,
और मा आनंद शीला —
ये नाम नहीं हैं।
ये समाज के मुँह पर पड़े थप्पड़ हैं।
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