Thursday, January 8, 2026

मेहनत से आगे की समझ...

खुद को प्रसिद्ध करने की कला: मेहनत से आगे की समझ


दुनिया में लाखों लोग दिन-रात मेहनत करते हैं।

कोई लिखता है, कोई गाता है, कोई पढ़ाता है, कोई व्यापार करता है।

फिर भी एक अजीब सच्चाई सामने आती है


कुछ लोग कम मेहनत में प्रसिद्ध हो जाते हैं,

और कुछ लोग जीवन भर मेहनत करके भी गुमनाम रह जाते हैं।


यह अन्याय नहीं है, यह कला और समझ का अंतर है।


केवल मेहनत क्यों पर्याप्त नहीं होती?


मेहनत तब तक अधूरी है जब तक उसमें यह सवाल न जुड़ा हो

“मैं किसके लिए कर रहा हूँ, और उन्हें अभी क्या चाहिए?”


उदाहरण 1: मेहनती लेखक बनाम समझदार लेखक


एक लेखक रोज़ 5 घंटे गहरी साहित्यिक रचनाएँ लिखता है

कठिन शब्द, जटिल विचार, भारी भाषा


दूसरा लेखक रोज़ 30 मिनट लिखता है

सरल भाषा, आज की समस्या, लोगों की भावना


परिणाम

पहला लेखक विद्वानों में सराहा जाता है,

दूसरा लेखक आम लोगों में प्रसिद्ध हो जाता है।


 कारण?

दूसरा लेखक लोगों की ज़रूरत लिखता है,

पहला लेखक अपनी विद्वता दिखाता है।


प्रसिद्धि = समस्या का समाधान + सही समय


लोग आपको तब सुनते हैं जब


वे उलझन में हों


दर्द में हों


डर में हों


या आशा ढूँढ रहे हों


उदाहरण 2: साधारण वीडियो, असाधारण प्रसिद्धि


एक व्यक्ति कैमरे के सामने बैठकर कहता है:


“अगर आज तुम्हें कोई समझ नहीं पा रहा,

तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम गलत हो।”


तकनीकी रूप से कुछ भी खास नहीं।

पर वीडियो लाखों लोग देख लेते हैं।


क्यों?


क्योंकि उसने वही कहा जो उस समय लोगों के दिल में चल रहा था।


शौंदर्य साधना का रहस्य


यहाँ शौंदर्य का मतलब केवल बाहरी सुंदरता नहीं है, बल्कि


भाषा की सुंदरता


विचार की स्पष्टता


प्रस्तुति की सादगी


और भावनाओं की सच्चाई


उदाहरण 3: दो शिक्षक


शिक्षक A:


बहुत ज्ञानी


लेकिन कठिन भाषा


छात्रों से दूरी


शिक्षक B:


सामान्य ज्ञान


लेकिन उदाहरण जीवन से


छात्रों की भाषा में बात


प्रसिद्ध शिक्षक कौन?

शिक्षक B


 क्योंकि उसने ज्ञान के साथ अनुभव बाँटा।


संवेदना को समझना: प्रसिद्धि की असली चाबी


लोग यह नहीं पूछते कि आप कितने महान हैं।

वे यह देखते हैं


“क्या यह व्यक्ति मुझे समझता है?”


उदाहरण 4: दो समाजसेवी


एक भाषण देता है

“गरीबी खत्म होनी चाहिए!”


दूसरा कहता है

“मुझे पता है, महीने के आख़िरी 5 दिन कैसे लगते हैं।”


दूसरा अधिक प्रभावी क्यों?

क्योंकि उसने अनुभव की भाषा बोली।


फालतू मुद्दों से दूरी, अपने लक्ष्य पर ध्यान


जो व्यक्ति हर बहस में कूदता है,

हर ट्रेंड पर राय देता है,

वह खुद को बिखेर देता है।


प्रसिद्ध व्यक्ति जानता है


मुझे क्या बोलना है


और क्या छोड़ देना है


उदाहरण 5: शांत व्यक्ति की पहचान


जो हर बात पर प्रतिक्रिया नहीं देता,

लोग उसकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करते हैं।


 कम बोलना + सही बोलना = प्रभाव


खुद की जागरूकता: मैं क्या कर रहा हूँ?


प्रसिद्ध होने वाला व्यक्ति


अंधाधुंध मेहनत नहीं करता


वह देखता है:


मैं क्यों कर रहा हूँ?


इसका परिणाम क्या होगा?


क्या यह मेरे लक्ष्य से जुड़ा है?


उदाहरण 6: दौड़ने वाला और दिशा जानने वाला


एक व्यक्ति तेज़ दौड़ रहा है


दूसरा धीरे चल रहा है लेकिन दिशा सही है


अंत में कौन पहुँचेगा?

 दूसरा


प्रसिद्धि का सूत्र


प्रसिद्धि का अर्थ शोर नहीं,

प्रसिद्धि का अर्थ सही जगह पर सही स्वर है।


 मेहनत ज़रूरी है

धैर्य ज़रूरी है

लेकिन साथ में चाहिए...


लोगों की जरूरत की समझ


समय की पहचान


संवेदना की गहराई


और स्वयं की स्पष्टता


जो व्यक्ति लोगों की भाषा में

उनके दर्द का समाधान बन जाता है,

वही बिना चिल्लाए प्रसिद्ध हो जाता है।

कौनसा ड्राई फ्रूट्स खाए

बहुत जरूरी है ये जानना किस बीमारी में कौनसा ड्राई फ्रूट्स खाए जरूरत के अनुसार कैसे और कब खाए ड्राई फ्रूट्स प्राकृतिक जीवन देखे उपयोग करने का तरीका सम्पूर्ण विवरण:-


1.बादाम:-


दिमाग़ की कमजोरी

याददाश्त कम होना

शारीरिक दुर्बलता

बच्चों में मानसिक विकास

कैसे सेवन करें

रात में 5–6 बादाम पानी में भिगो दें

सुबह छिलका उतारकर अच्छी तरह चबाएँ

चाहें तो 1 चम्मच शहद के साथ लें


क्यों लाभकारी

बादाम में विटामिन E, ओमेगा-3 और प्रोटीन होते हैं, जो मस्तिष्क व नसों को मज़बूत करते हैं।


2️⃣ काजू:-

किस बीमारी में लाभकारी

अत्यधिक कमजोरी

कम वजन

थकान

कैसे सेवन करें

3–4 काजू सुबह नाश्ते के साथ

या हल्का भूनकर

❌ कब न लें

मोटापा, शुगर और उच्च कोलेस्ट्रॉल में अधिक सेवन न करें।


3️⃣ अखरोट:-

किस बीमारी में लाभकारी

हृदय रोग

तनाव, चिंता

ब्रेन हेल्थ

कैसे सेवन करें

1–2 अखरोट सुबह खाली पेट

क्यों

अखरोट में ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है, जो दिल और दिमाग दोनों के लिए श्रेष्ठ है।


4️⃣ पिस्ता:-

किस बीमारी में लाभकारी

कमजोरी

आँखों की थकान

रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना

कैसे सेवन करें

6–8 पिस्ता दिन में कभी भी

बेहतर है भिगोकर या हल्का भूनकर


5️⃣ किशमिश:-

किस बीमारी में लाभकारी

कब्ज

खून की कमी

पेट की कमजोरी

कैसे सेवन करें

10–15 किशमिश रात को भिगोकर

सुबह पानी सहित सेवन करें


6️⃣ काली किशमिश:-

किस बीमारी में लाभकारी


एनीमिया


चक्कर आना


महिलाओं में कमजोरी


कैसे सेवन करें


8–10 काली किशमिश भिगोकर सुबह


7️⃣ खजूर:-

किस बीमारी में लाभकारी


अत्यधिक कमजोरी


कम रक्तचाप


प्रसव के बाद कमजोरी


कैसे सेवन करें


1–2 खजूर गुनगुने दूध के साथ


❌ मधुमेह में न लें


8️⃣ अंजीर:-

किस बीमारी में लाभकारी


पुरानी कब्ज


बवासीर


पेट की सूजन


कैसे सेवन करें


2 अंजीर रात को भिगोकर


सुबह खाली पेट


9️⃣ सूखी खुबानी:-

किस बीमारी में लाभकारी


खून की कमी


त्वचा रोग


कमजोरी


कैसे सेवन करें


2–3 खुबानी भिगोकर सुबह


🔟 मूंगफली:-

किस बीमारी में लाभकारी


कमजोरी


सर्दी में ऊर्जा


कैसे सेवन करें


भुनी हुई 1 मुट्ठी


❌ एसिडिटी व एलर्जी में न लें


1️⃣1️⃣ सूखा नारियल:-

किस बीमारी में लाभकारी


शरीर में रूखापन


कमजोरी


कैसे सेवन करें


1–2 छोटे टुकड़े दिन में


1️⃣2️⃣ मखाना:-

किस बीमारी में लाभकारी


मधुमेह


हृदय रोग


गर्भावस्था में कमजोरी


कैसे सेवन करें


घी में हल्का भूनकर 1 कटोरी


1️⃣3️⃣ हेज़लनट:-

किस बीमारी में लाभकारी


हृदय व नसों की कमजोरी


कैसे सेवन करें


3–4 दाने सुबह


1️⃣4️⃣ ब्राज़ील नट:-

किस बीमारी में लाभकारी


थायरॉयड


कैसे सेवन करें


सप्ताह में 2–3 बार केवल 1 दाना


1️⃣5️⃣ मैकाडेमिया नट:-

किस बीमारी में लाभकारी


हृदय स्वास्थ्य


कैसे सेवन करें


2–3 दाने

❌ अधिक मात्रा से वजन बढ़ता है


1️⃣6️⃣ पाइन नट:-

किस बीमारी में लाभकारी


कमजोरी


यौन दुर्बलता


कैसे सेवन करें


1 चम्मच सुबह


1️⃣7️⃣ सूखी क्रैनबेरी:-

किस बीमारी में लाभकारी


मूत्र संक्रमण (UTI)


कैसे सेवन करें


1 छोटा चम्मच


1️⃣8️⃣ सूखी ब्लूबेरी:-

किस बीमारी में लाभकारी


आँखों की कमजोरी


एंटीऑक्सीडेंट की कमी


कैसे सेवन करें


1 चम्मच दिन में


1️⃣9️⃣ प्रून्स (सूखा आलूबुखारा):-

किस बीमारी में लाभकारी


गंभीर कब्ज


कैसे सेवन करें


2–3 भिगोकर सुबह


2️⃣0️⃣ अंजीर स्लाइस:-

किस बीमारी में लाभकारी


कब्ज


हड्डियों की कमजोरी


कैसे सेवन करें


2–3 स्लाइस भिगोकर

Wednesday, January 7, 2026

कौनसा तेल है लाभकारी

किस शारीरिक व्याधि में कौनसा तेल है लाभकारी,कैसे और किस तेल का सेवन है स्वास्थ्यवर्धक,देखे डिटेल...


❤️ हृदय रोग (Heart Disease)

लाभकारी तेल:जैतून तेल,सरसों तेल,अलसी का तेल 

सेवन विधि:

भोजन बनाने में 1–2 चम्मच प्रतिदिन

सलाद या सब्ज़ी में कच्चा उपयोग अधिक लाभकारी


🍬 मधुमेह (डायबिटीज)

लाभकारी तेल:नारियल तेल, मूंगफली तेल,सरसों का तेल

सेवन विधि:

तले भोजन से बचें

हल्की आँच पर बना भोजन, दिन में 1–2 चम्मच


🦴 जोड़ों का दर्द / गठिया

लाभकारी तेल:तिल का तेल,सरसों का तेल,अरंडी का तेल

सेवन/उपयोग:

बाहरी मालिश प्रतिदिन

अरंडी तेल ½ चम्मच गुनगुने दूध के साथ (सप्ताह में 2–3 बार)


🧠 तनाव व अनिद्रा

लाभकारी तेल:नारियल तेल,बादाम तेल 

उपयोग:

सिर की मालिश रात में

बादाम तेल 1 चम्मच गुनगुने दूध के साथ


🔥 पाचन समस्या व कब्ज

लाभकारी तेल:अरंडी तेल,जैतून का तेल

सेवन विधि:

अरंडी तेल ½–1 चम्मच रात को (डॉक्टर की सलाह से)

जैतून तेल सलाद या भोजन में


🧴 त्वचा रोग

लाभकारी तेल:नीम का तेल,नारियल तेल 

उपयोग:

प्रभावित स्थान पर दिन में 1–2 बार

नीम तेल को नारियल तेल में मिलाकर लगाएँ


🩸 उच्च रक्तचाप

लाभकारी तेल:जैतून तेल,अलसी तेल 

सेवन विधि:

1–2 चम्मच प्रतिदिन

नमक कम रखें, तेल सीमित मात्रा में लें


🧠 स्मरण शक्ति व मस्तिष्क कमजोरी

लाभकारी तेल:अखरोट का तेल,ब्राह्मी तेल

उपयोग विधि:

अखरोट तेल 1 चम्मच सुबह खाली पेट

ब्राह्मी तेल से रात में सिर की मालिश


👁️ आँखों की कमजोरी

लाभकारी तेल:बादाम तेल,अरंडी का तेल

सेवन/उपयोग:

बादाम तेल 1 चम्मच दूध के साथ

अरंडी तेल की 1 बूँद आँखों के चारों ओर (आँख के अंदर नहीं)


🩺 यकृत (लिवर) रोग

लाभकारी तेल:जैतून का तेल,अलसी तेल 

सेवन विधि:

भोजन में 1–2 चम्मच

तले भोजन से परहेज़


🤧 सर्दी-खाँसी व जुकाम

लाभकारी तेल:सरसों का तेल,नीलगिरी का तेल

उपयोग:

सरसों तेल में लहसुन डालकर छाती पर मालिश

नीलगिरी तेल की भाप


🦷 दाँत व मसूड़ों की समस्या

लाभकारी तेल:लांग का तेल,तिल का तेल 

उपयोग:

लौंग तेल की 1 बूँद दर्द वाले दाँत पर

तिल तेल से ऑयल पुलिंग (कुल्ला)


👩‍🦰 बाल झड़ना व रूसी

लाभकारी तेल:

नारियल का तेल

अरंडी का तेल

आँवला तेल

उपयोग:सप्ताह में 2–3 बार सिर की मालिश

नारियल + अरंडी तेल मिलाकर अधिक लाभ


🩸 एनीमिया (खून की कमी)

लाभकारी तेल:

तिल का तेल

मूंगफली का तेल

सेवन विधि:

भोजन में सीमित मात्रा

आयरन युक्त आहार के साथ लें


अधिक मात्रा में सेवन हानिकारक हो सकता है

Sunday, January 4, 2026

प्रेम की भावना और समझ...

 प्रेम: भावनाओं का जाल या समझ का रिश्ता?


आज के समय में प्रेम को बहुत गलत तरीके से समझ लिया गया है।

शुरुआत में कहा जाता है

“तुम जैसे कोई नहीं”,

“तुम ही सबसे अच्छे हो।”


लेकिन कुछ समय बाद वही शब्द बन जाते हैं

“तुम जैसे किसी को चाहना भी गलती थी”,

“तुम बहुत बुरे हो।”


यहीं से सवाल पैदा होता है

क्या यह सच में प्रेम था, या सिर्फ भावनाओं का नशा?


भावनाओं पर टिका प्रेम क्यों टूट जाता है?


आज ज़्यादातर रिश्ते भावनाओं की तेजी में शुरू होते हैं,

न कि समझ और धैर्य से।


जब तक सब ठीक चलता है


बातें मीठी लगती हैं


कमियाँ नज़र नहीं आतीं


भविष्य बहुत सुंदर दिखता है


लेकिन जैसे ही ज़िंदगी की सच्चाई सामने आती है


ज़िम्मेदारियाँ


पैसों की चिंता


परिवार का दबाव


सोच का अंतर


तब वही रिश्ता कमजोर पड़ने लगता है।


ब्रेकअप के बाद दर्द इतना क्यों होता है?


क्योंकि लोग इंसान से कम,

अपनी उम्मीदों से ज़्यादा जुड़ जाते हैं।


“हमेशा साथ रहेंगे”


“तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूँ”


जब रिश्ता टूटता है,

तो सिर्फ इंसान नहीं जाता,

पूरा सपना टूट जाता है।


इसीलिए दर्द इतना गहरा होता है।


क्या ज़्यादातर प्रेम ट्रॉमा बन जाते हैं?


सच कड़वा है, लेकिन सच है

बिना समझ के किया गया प्रेम अक्सर दर्द छोड़ जाता है।


जहाँ...


बात कम और शक ज़्यादा हो


समझ कम और अधिकार ज़्यादा हो


सच से ज़्यादा दिखावा हो


वहाँ प्रेम धीरे-धीरे बोझ बन जाता है।


ऐसे रिश्तों में

भावनाओं से झूठ का महल बनाया जाता है,

जो सच्चाई की एक हवा में गिर जाता है।


सच्चा प्रेम कैसा होता है?


सच्चा प्रेम


धीरे-धीरे बढ़ता है


सवाल पूछने की आज़ादी देता है


मतभेद में भी सम्मान बनाए रखता है


और सबसे ज़रूरी

अलग होने पर भी इंसान को तोड़ता नहीं


जहाँ प्रेम होता है,

वहाँ इंसान खुद को खोता नहीं,

बल्कि और समझदार बनता है।


प्रेम गलत नहीं है,

गलत है उसे सिर्फ भावनाओं का खेल समझ लेना।


जब प्रेम में

समझ, धैर्य और सच्चाई नहीं होती,

तो वह

खुशी से ज़्यादा घाव देता है।


इसलिए प्रेम करें

दिल से ज़रूर करें,

लेकिन आँख बंद करके नहीं।


Wednesday, December 31, 2025

Happy new year 2026





Friends change your desire & direction into decision because action is more important than efforts...


The first step to success is action since action leads to mistakes,mistakes lead to lessons,lessons lead to experience,and experience leads to success.


Life is never perfect. Everyone has their own shortcomings, their own challenges, their own problems—and their own way of life. So don't compare yourself to others, living well as you are is enough.


लोगों से प्रेम करना, उनकी सेवा करना, उन्हें सशक्त बनाना और उन्हें प्रोत्साहित करने का नाम ही जीवन है। जीवन में आनन्द को कर्तव्य बनाने की अपेक्षा कर्तव्य को आनन्द बनाना अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। यह बिल्कुल सत्य है कि साझा की गई प्रसन्नता दुगनी हो जाती है एवं साझा किया गया दुख आधा हो जाता है...


स्त्री और पुरुष दोनों ही मनुष्य हैं,दोनों की भावनाएँ हैं दोनों की सीमाएँ हैं। जो रिश्ता समझ, संवाद और सम्मान पर टिकता है, वही रिश्ता जीवन को सहज, सुरक्षित और सार्थक बनाता है...पर इन दोनों बिच एक सक का दायरा होता है जो इनको एक दूसरे हद से ज़्यदा प्यार और बाते करने से रोकता...स्त्री के प्रति किया गया उम्मीद पुरुष का दिलसा होता है...और जब ये रुट टूट जाता है तब पुरुष पागपन का शिकार हो जाता है और स्त्री अनकही जिंदिगी जीने की शुरुआत कर देती है...


In the last, I want revise my own written quotation... Friends...Our mind made computer...Computer did not make our mind becouse a computer has limit of storage but our mind has no limitation of data so accelerat your mind as per your acceleration...mind on this point... Update mind is superior to prepared mind... Program your planing and work on your planing...Your wishes & desires will be in your foots...


शुक्रिया मेरे यारों तहे दिल से इस गुजरते हुए साल के तरफ से...


शुक्रिया उन लोगों का जिन्होंने मुझे नफरत दी,

क्योंकि उनकी वजह से मैंने खुद को और मजबूत किया...


शुक्रिया उन लोगों का जिन्होंने मुझसे प्यार किया,

क्योंकि उनके प्यार ने मेरे दिल को विशाल बना दिया...


शुक्रिया उन लोगों का जो मेरे लिए परेशान हुए और मुझे,एहसास दिलाया कि मेरी कदर की जाती है...


शुक्रिया उन लोगों का जिन्होंने मुझे छोड़ दिया, क्योंकि

उन्होंने मुझे यह सिखाया कि हर चीज़ अधूरी नहीं होती.


शुक्रिया उन लोगों का जो मेरी जिंदगी का हिस्सा बने,

और मुझे वो ताकत दी, जो कभी मैंने सोचा भी नहीं था...


शुक्रिया सबसे ज्यादा उस वक्त का,जब मैंने मुश्किलों का सामना किया और कुछ नया सीखा...


Wish you all My FB friens & Family members very very Happy new Year...

स्त्री और पुरुष का रिश्ता...

मानव संबंधों में सबसे बड़ी गलतफहमी यह होती है कि हम सामने वाले को बदलने की कोशिश करने लगते हैं, बजाय उसे समझने के। खासकर स्त्री–पुरुष संबंधों में यह टकराव अक्सर देखने को मिलता है।


कोई भी महिला अपने घमंड, अकड़, दबाव या ज़बरदस्ती से किसी पुरुष को लंबे समय तक बाँध नहीं सकती। ऐसा इसलिए नहीं कि वह कमजोर है, बल्कि इसलिए कि मानव मन स्वभाव से नियंत्रण का विरोध करता है।

जहाँ दबाव होता है, वहाँ अपनापन नहीं टिकता।


दबाव से व्यवहार नहीं, केवल प्रतिक्रिया पैदा होती है


व्यवहार परिवर्तन सहमति से होता है, मजबूरी से नहीं।


जब किसी व्यक्ति पर लगातार आदेश, ताना, तुलना या भावनात्मक दबाव डाला जाता है, तो वह या तो:


भीतर से टूट जाता है


या बाहर से चुप होकर भीतर विद्रोही बन जाता है


दोनों ही स्थितियाँ रिश्ते को खोखला कर देती हैं।


प्रकृति का उदाहरण : पेड़ और रस्सी


प्रकृति हमें बहुत सरल भाषा में गहरे सत्य सिखाती है।


यदि किसी पेड़ को सीधा करना हो और आप उसे रस्सी से ज़ोर से बाँध दें

तो या तो:

पेड़ टूट जाएगा


या रस्सी हटते ही पहले से अधिक टेढ़ा हो जाएगा


लेकिन यदि आप उसे समय, सहारा और सही दिशा दें तो वही पेड़ बिना टूटे, स्वाभाविक रूप से सीधा बढ़ता है।


मानव मन भी ठीक ऐसा ही है।


पुरुष मन की सामाजिक संरचना


पुरुषों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी कठोर, भावनाओं को दबाने वाला, और मज़बूत दिखने वाला बनना सिखाया गया है।

उन्हें सिखाया गया:


रोना कमजोरी है


डर दिखाना गलत है


झुकना हार है


इसलिए कई पुरुष अपनी भावनाएँ ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते।

यह कमी नहीं, बल्कि सिखाया गया व्यवहार है।


समझ और सम्मान मिलने पर बदलाव संभव है


जब किसी पुरुष को:


समझदारी से प्यार मिले


बिना अपमान के संवाद मिले


और बिना डर के अपनी बात कहने की जगह मिले


तो उसका व्यवहार बदल सकता है।

वह अधिक संवेदनशील, ज़िम्मेदार और सहयोगी बन सकता है।


क्योंकि तब वह रिश्ते में सुरक्षित महसूस करता है, न कि नियंत्रित।


दबाव क्यों असंभव है?


जो महिला पुरुष को दबाकर अपने अनुसार ढालना चाहती है, वहाँ समस्या केवल रिश्ते की नहीं होती, बल्कि सामाजिक यथार्थ की भी होती है।


भले ही पुरुष में कुछ कमियाँ हों,

लेकिन समाज उसे ताकत, स्वतंत्रता और विकल्प देता है।


इसलिए:-

दबाया गया पुरुष अक्सर दूरी बना लेता है


या बाहर से झुककर भीतर से कट जाता है

दोनों ही स्थितियों में रिश्ता जीवित नहीं रहता।


जीवन जीना है तो…


जीवन चलाने के लिए:


शक्ति नहीं, संतुलन चाहिए


अधिकार नहीं, सम्मान चाहिए


नियंत्रण नहीं, सहयोग चाहिए


रिश्ते प्रतियोगिता नहीं होते, जहाँ किसी एक को जीतना हो।

वे साझेदारी होते हैं, जहाँ दोनों का बढ़ना ज़रूरी होता है।


कोई भी इंसान दबाव में बदलता नहीं, केवल टूटता है


प्रेम का अर्थ नियंत्रण नहीं, स्वीकार है


समझ से मिला सम्मान व्यक्ति को बेहतर बनाता है डर से पैदा हुआ साथ कभी स्थायी नहीं होता


स्त्री और पुरुष

दोनों ही मनुष्य हैं,

दोनों की भावनाएँ हैं,

दोनों की सीमाएँ हैं।


जो रिश्ता समझ, संवाद और सम्मान पर टिकता है, वही रिश्ता जीवन को सहज, सुरक्षित और सार्थक बनाता है।


स्त्री और पुरुष के प्रेम का सबसे सुंदर स्वरूप है,

स्त्री के सपनों के लिए संघर्ष करता हुआ पुरुष और,

पुरुष के बुरे वक्त में साथ खड़ी रहती स्त्री.. 


Tuesday, December 30, 2025

प्रेम के लक्षण

 प्रेम के लक्षण...


*तुम महसूस कर सकते हो कि तुम प्रेम में हो 

लेकिन लक्षण बताते हैं कि तुम प्रेम में नहीं हो..

प्रेम में होने के लक्षण क्या....? 

तीन लक्षण हैं-*


पहला लक्षण है 

#परिपूर्ण_संतोष_____

 जिसमें कुछ और की जरूरत नहीं रहती 

परमात्मा तक की जरूरत नहीं रहती,

क्योंकी तुम जीसे प्रेम करते हो 

तुम्हारे लिये वो ईश्वर हो जाता है,,

तुम उसके ही खयालों में मदमस्त रहते हो...!!!


दूसरा लक्षण है कि

#इसमें_भविष्य_नहीं_है____

प्रेम का यह एक क्षण शास्वत के समान है,,

 इसमें दूसरा क्षण नहीं, 

भविष्य नहीं ,कोई कल नहीं है....

प्रेम वर्तमान में घटित हो रहा है....!!!!!


और तीसरा लक्षण है-कि

#प्रेम_में_तुम_समाप्त_हो_जाते_हो____

तुम अब तुम नहीं रहते हो और 

अगर तुम अब भी तुम हो, 

तुम्हें जीने के लिये दुसरों का साथ चाहिए,,

तुम दुसरों के लिये प्रेम को इंतजार कराने लगाते हो,,

तुम्हें प्रेम से ज्यादा महत्व दुसरों को देना लगता है,,

 तो सच मानिये तुमने प्रेम के मंदिर में 

प्रवेश नहीं किया है,,,

तुम प्रेम होने का दिखावा कर रहे हो--

तुम प्रेम का खेल खेल रहे हो--

तुम यह सब करते हो तो यह सच है

तुम ईश्वर को धोखा दे रहे हो-----!!!!!


प्रेम तब परखा जाता है जब कठिनाइयाँ आती हैं, जब अंतर उभरते हैं, जब दूरियाँ बढ़ती हैं, जब थकावट सवार होती है, और जब कमियाँ स्पष्ट होती हैं। प्रेम तब सिद्ध होता है जब इन सभी के बावजूद, आप फिर भी उसी व्यक्ति को चुनते हैं—बार-बार।


प्रेम सिर्फ उन सुंदर क्षणों में नहीं होता, जब सब कुछ सुहावना होता है, जब हम मुस्करा रहे होते हैं, और जब जीवन सहज और सही चल रहा होता है। क्योंकि जब आप सफल होते हैं, आकर्षक होते हैं, और समृद्ध होते हैं, तो कोई भी आपका साथ दे सकता है।


लेकिन हर कोई आपके कमजोर होने पर, आपके दुखी होने पर, और आपके चिड़चिड़े पलों में आपका साथ नहीं देता।


हर कोई, जब आप झगड़े के बाद सुलह करने के लिए दौड़ते हैं, सिर्फ इसलिए नहीं कि वे आपको खोने से डरते हैं, ऐसा नहीं करते।


हर कोई, भले ही आप दोषी हों, सिर्फ रिश्ते की कोमलता को बनाए रखने के लिए, आपको सांत्वना देने के लिए सामने नहीं आता।


हर कोई, जब आपकी सारी कमियाँ सामने आ जाती हैं, तब भी आपको चुनने की ज़िद नहीं करता—जब तक कि वे आपको पूरी तरह से दिल से नहीं चाहते।


सच्चा प्रेम वह है जो हर रोज़ की वास्तविकताओं के बीच, बिना किसी दिखावे के, आपको वैसे ही अपनाता है जैसे आप हैं।


प्रेम की असली परीक्षा तब होती है जब सब कुछ बिखरने लगता है, फिर भी आप एक-दूसरे को पकड़कर रखते हैं।


जब, हर कठिनाई के बावजूद, आप एक साथ खड़े रहते हैं—तब आपको सच्चे प्रेम का अर्थ वास्तव में समझ में आता है।


वेदों में वर्णित स्त्री के तीन स्वरूप

वेदों में वर्णित स्त्री के तीन स्वरूप


वेदों तथा शास्त्रों में स्त्री के तीन स्वरूप दर्शाएँ गए है ये है:- कन्या, वधू या पत्नी तथा देवी या माता ।


कन्या के रूप में स्त्री


कन्या का धात्वर्थ है प्रकाशमान, प्रख्यात तथा जाज्वल्यमान । स्त्री को बाल्यावस्था में इस नाम से पुकारने का अभिप्राय यही है कि उसे उन सब गुणों को प्राप्त करना चाहिए जो उसे प्रत्येक कार्यक्षेत्र में या समाज में आभायुक्त बनाएं । शारीरिक दृष्टि से उसे अपने शरीरी को बलिष्ठ और स्वस्थ बनाना चाहिए जिससे उसका शारीरिक बल और सौन्दर्भ प्रस्फुटित हो । साथ ही उसके अंग-प्रत्यंग न केवल सुडौल एवं स्वस्थ हों अपितु वह सुशिक्षित भी होनी चाहिए जिससे कि उसका ज्ञान और बुद्धिचातुर्य उसे मानसिक रुप से प्रकाशमान और आकर्षक बनाएं ।


विविध शिल्प और कलाकौशल में भी वह पारंगत होनी चाहिए जिससे कि उसकी सृजनात्मक शक्ति विकसित हो जाये । शारीरिक सौष्ठव और अध्यात्मिक गुणों से सम्पन्न होने पर उसका सांसारिक जीवन पूर्ण होता है । इन सबके अतिरिक्त उसे आत्म संयम, सादगी, पवित्रता, त्याग और तपस्या का जीवन यापन करना होता है । इस प्रकार उच्च, पवित्र नैतिक गुणों के आत्मसात करने पर ही वह अपने श्रेष्ठ आचरण और चरित्र का प्रकाश फैला सकती है । वेद उसी लड़की को कन्या की संज्ञा देता है जो शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक दृष्टि से पूर्ण विकसित होती है और तभी अपने लिए पति को चुनने के लिए उसे वेद अधिकृत करते है । 


यह एक विडम्बना है कि स्त्री के पूर्ण विकास और शिक्षा के लिए वेद के इस सुस्पष्ट आदेश के होते हुए वह शिक्षा तथा ज्ञान प्राप्ति से वंचित रखी गई और स्वभावतः उसे सामाजिक प्रतिष्ठा से भी वंचित किया गया । कारण राजनीति व सामाजिक हो सकते हैं। इसलिए स्त्री शुद्रो नाधीयाताम जी वाक्य घड़े गए है । शायद यह कदम बाह्य आक्रमणों के बाद देश में व्याप्त विदेशी संस्कृति से सीधे संपर्क और उसके दुष्प्रभाव से स्त्रियों को दूर रखने की आवश्यकता का धोतक हो । 


उनका तर्क था कि इस भांति अपनी स्त्रियों को विदेशी प्रभाव से मुक्त रखकर वे अपनी संतति को विदेश संस्कृति के दुष्प्रभाव से बचा सकेंगे । यह तर्क सारहीन न था । जबसे यूरोपियन ढंग पर शिक्षा दी गई है , तब से वर्तमान पीढ़ी, जिसमें लड़कियां भी सम्मिलित हैं, पाश्चात्याभिमुखा एवं अभारतीय हो गयी है ।


वधू के रूप में नारी


जैसा कि ऊपर कहा गया है, कन्या को अपने जीवन साथी को चुनने का जन्मसिद्ध अधिकार है और यह अधिकार वेद प्रतिपादित है, यही कारण था कि प्राचीन काल में स्वयंवर, स्त्री के नाम से संबोधित होते थे पुरुष के नाम से नहीं, यथा सीता स्वयंवर, द्रौपदी स्वयंवर आदि । यह बात ध्यान देने योग्य है की स्त्री का यह जन्मसिद्ध अधिकार पश्चिम के उन वर्गों में भी जो आर्य वंश के कहे जाते हैं, आज भी मूल रूप में पाया जाता है।


वहां विवाह का प्रस्ताव पुरुष की ओर से आना अनिवार्य है जबकि लड़की का यह अधिकार होता है कि वह उसे स्वीकार करें या ना करे । यद्यपि स्त्री अपने जीवन साथी को चुनने के अधिकार का उपयोग करती थी तथापि माता-पिता के परिपक्व और बुद्धिसंगत अनुभव द्वारा उसका सैदव मार्गदर्शन होता था । पुत्री को मनोनीत पति के हवाले कर देने की प्रथा आज भी पाश्चात्य देशों में प्रचलित है । यह प्रथा या रिवाज वेद से ग्रहण किया गया है । (ऋग्वेद (1-124-3) का कथन है :-


                          " एषा दिव: दुहितायै"


जिस प्रकार सूर्य प्रात:काल अपनी पुत्री उषा को विविध चमकदार रंगों से विभूषित करके संसार को अर्पण करता है उसी प्रकार पुत्री विवाह के समय माता-पिता द्वारा वस्त्राभूषण से अलकृत करके, वर को अर्पित की जाती है ।


स्त्री पत्नी के रूप में


प्राचीनकाल में भारत में विवाह दो व्यक्तियों के मध्य कतिपय आर्थिक सिद्धांतों पर अवलम्बित सौदा न था । यह पवित्र बंधन है जो स्त्री पुरुष को स्थाई बंधन में बांधता है । यह भिन्न रूप के दो जलों के सम्मिश्रण के समान है । यह दो ह्रदयों का मिलन है । विवाह के समय दोनों निम्न लिखित मंत्रो का उच्चारण करते है :-


              यत् एतद् ह्रदयं तव, तदस्तु ह्रदयं मम ।

              यदिदं ह्रदयं मम, तदस्तु ह्रदयं तव ।।


वर अपनी को पति कहता है और वधू अपने को पत्नी कहती है। इससे गृहस्थ में दोनों के कार्य विभाजन का बोध होता है।

विवाह शब्द का अर्थ है, श्रेष्ठम क्षमताओं के साथ निर्वाह करना । यह शब्द एक बड़े सामाजिक सिद्धांत का भी धोतक है । इसका अभिप्राय: यह है कि उद्देश्य विशेष की पूर्ति के लिए कोई अपने को विवाह-बंधन में बांधता है। यह उद्देश्य न केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक लाभ से सम्बद्ध हैं, अपितु यह समाज देश और मानव जाती के प्रति कर्तव्यों के बोध से सन्निहित होता है ।


वेदों की शिक्षा के अनुसार विवाह-प्रथा की स्थापना मात्र रीति-रिवाज व आत्म-समृद्धि के लिए नहीं वरन सामाजिक दायित्वों की पूर्ति के लिए हुई है, जिसमें स्त्री को समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका से गुरुतर होती है । घर वह इकाई है जिससे सामाजिक व्यवस्था प्रसारित होती है । गृहस्थ की सुव्यवस्था स्त्री के हाथ में थी । वह घर के शासन करती थी इसलिए वह गृह स्वामिनी कहलाती थी । महाभारत के निम्नलिखित शलोकों में इस नियम तथा घर में स्त्री के पद का बड़ी सुन्दरता से वर्णन किया है ।


                        न गृहं गृहमित्याहु:।

                                       गृहिणी गृहमुच्यते ।।


स्त्री के बिना पुरुष आधा होता है । उसका दूसरा आधा भाग स्त्री होती है। इसलिए वह अर्द्धांगिनी कहलाती है ।


स्त्री माता के रूप में


विविध धर्म शास्त्रों में असंख्य आख्यान और उपदेश पाए जाते है जो इस धारणा की पुष्टि करते है कि स्त्री पूरक, प्रेरक शक्ति, एवं समृधि की निर्माता है, अत: न तो परिवार में और न समाज में उसकी अवहेलना होनी चाहिए ।


प्राचीन भारत में वेदों की आज्ञानुसार, माता-पिता की कामवासना की तृप्ति के फलस्वरूप संतान पैदा नहीं की जाती थी । बच्चा सदा मनचाहा होता था । पौधा भूमि और बीज की उपज होता है । अच्छी फसल के लिए अच्छी भूमि और अच्छा बीज आवश्यक होता है । वेद में माता की तुलना भूमि से और पिता की तुलना बीज से की गई है । स्वस्थ बुद्धिमान और धर्मात्मा संतान की प्राप्ति के लिए माता और पिता दोनों का योग्य होना आवश्यक है । दोनों को ही, विशेषत: माता को सुसन्तति प्राप्ति की आशा-पूर्ति के लिए पवित्र जीवन यापन की सलाह दी गई है । मनुस्मृति में मनु महाराज कहते है कि :-


             स्वां प्रसूतिम् चरित्रं च कुलं आत्मानमेव च ।

             स्वयं च धर्म प्रयत्नेन जाया रक्षन् हि रक्षति ।।

             पतिर्भार्यां: संप्रविश्य, गर्भों भूत्वेह जायते ।

             जायायास्तद्वि जायात्वं यदस्यां जायते पुन: ।


मनु महाराज कहते है कि पुरुष पत्नी के माध्यम से अपना ही पुनर्निर्माण करता है कि बालक अपने माता पिता के लिए दर्पण का कार्य करते है। उसी के माध्यम से वे जान सकते हैं कि वे किस तरह कार्य करता है । उसी के माध्यम से वे जान सकते है की वे किस प्रकार के व्यक्ति हैं । इस प्रकार स्त्री अपने पति को एवं स्वयं को पहचानने में सहायता प्रदान करती है । 


इसलिए हमारे प्राचीन प्रजनन शास्त्रियों ने स्त्री के आचार-विचार, व्यवहार, पवित्रता एवं शील पर अधिक बल दिया है । इसी सिद्धांत में आस्था रखने के कारण अर्जुन ने महाभारत में उल्ल्लिखित महायुद्ध के दुष्परिणामों के विषय में अपनी चिंता से श्रीकृष्ण को अवगत किया था । उस महान युद्ध में पुरुषों के बहु संख्या में मारे जाने से नियंत्रक तत्वों का लोप हो जायेगा और प्राय: सभी सामाजिक व्यवस्था तत्वों का लोप हो जायेगा और प्राय: सभी सामाजिक व्यवस्था, पारिवारिक मान्यताएं एवं परम्पराएँ छिन्न-भिन्न हो जाएँगी ।


इससे स्त्रियों के भ्रष्ट, और दुराचारिणी होने की आशंका रहेगी, वंश परम्परागत दूषित हो जाएगी । बाद में ऐसे उच्च सामाजिक ढांचे, राष्ट्रीय चरित्र और संस्कृति को नष्ट कर देंगे । अर्जुन की दृष्टि में इस प्रकार के महान युद्धों से सामाजिक अराजकता उत्पन्न होती है और ये अक्षम्य पाप होते है । दुसरे शब्दों में अर्जुन नारी को वंशानुगत विशेषताओं और एकता का आधार तथा राष्ट्र के सामाजिक ढांचे को बनाये रखने वाली समझते थे । इन्ही कारणों से हमारे शास्त्रों में नारी की देवी के रूप में आराधना की गई है ।

मैं खुश हूं

  मैं खुश हूं...


एक महिला की आदत थी कि वह हर रोज सोने से पहले, अपनी दिन भर की खुशियों को एक काग़ज़ पर, लिख लिया करती थी... एक रात उन्होंने लिखा :


मैं खुश हूं, कि मेरा पति पूरी रात, ज़ोरदार खर्राटे लेता है, क्योंकि वह ज़िंदा है और मेरे पास है. ये ईश्वर का, शुक्र है...


मैं खुश हूं, कि मेरा बेटा सुबह सबेरे इस बात पर झगड़ा करता है, कि रात भर मच्छर- खटमल सोने नहीं देते. यानी वह रात घर पर गुजारता है, आवारागर्दी नहीं करता. ईश्वर का शुक्र है..


मैं खुश हूं, कि हर महीना बिजली, गैस, पेट्रोल, पानी वगैरह का, अच्छा खासा टैक्स देना पड़ता है. यानी ये सब चीजें मेरे पास, मेरे इस्तेमाल में हैं. अगर यह ना होती तो ज़िन्दगी कितनी मुश्किल होती ? ईश्वर का शुक्र है...


मैं खुश हूं, कि दिन ख़त्म होने तक, मेरा थकान से बुरा हाल हो जाता है. यानी मेरे अंदर दिन भर सख़्त काम करने की ताक़त और हिम्मत, सिर्फ ईश्वर की मेहर से है...


मैं खुश हूं, कि हर रोज अपने घर का झाड़ू पोछा करना पड़ता है, और दरवाज़े-खिड़कियों को साफ करना पड़ता है. शुक्र है, मेरे पास घर तो है. जिनके पास छत नहीं, उनका क्या हाल होता होगा ? ईश्वर का, शुक्र है...


मैं खुश हूं, कि कभी कभार, थोड़ी बीमार हो जाती हूँ. यानी मैं ज़्यादातर सेहतमंद ही रहती हूं. ईश्वर का शुक्र है..


मैं खुश हूं, कि हर साल त्यौहारों पर तोहफ़े देने में पर्स ख़ाली हो जाता है. यानी मेरे पास चाहने वाले, मेरे अज़ीज़, रिश्तेदार, दोस्त, अपने हैं, जिन्हें तोहफ़ा दे सकूं. अगर ये ना हों, तो ज़िन्दगी कितनी बेरौनक हो..? ईश्वर का शुक्र है...


मैं खुश हूं, कि हर रोज अलार्म की आवाज़ पर, उठ जाती हूँ. यानी मुझे हर रोज़, एक नई सुबह देखना नसीब होती है. ये भी, ईश्वर का ही करम है..


जीने के इस फॉर्मूले पर अमल करते हुए, अपनी और अपने लोगों की ज़िंदगी, सुकून की बनानी चाहिए. छोटी या बड़ी परेशानियों में भी, खुशियों की तलाश करिए, हर हाल में, उस ईश्वर का शुक्रिया कर, जिंदगी खुशगवार बनाएं..!!!

श्रीचक्र में नौ व्यूह होते हैं

श्रीचक्र में नौ व्यूह होते हैं, इसमें से प्रत्येक व्यूह का आदि-अंत जीव और शिव से होता है। जो मानव शरीर के मूल बंधनों का द्योतक है।


यह सभी 9 व्यूह इस प्रकार के होते हैं-


1 ) काल व्यूह आत्मा का विस्तरण अनंत है जिसका कोई अंत नहीं है जहां समय अमर्यादित है लेकिन माया के पाश में काल व्यूह की रचना जीव को विस्मृत करके बार बार जन्म मरण के चक्र में डाल देता है।


2 ) कुल व्यूह आत्मा की कोई न जाति होती है न कुल। आत्मा को सिद्धो की भाषा में नामकुल कहा जाता है। यहाँ जीव भाव में व्यूह रचना कर अपनी कुल की मर्यादा में बांध दिया जाता है। जैसे हिन्दू मुस्लिम ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र।


3 ) नाम व्यूह नाम का बंधन ....जन्म से पहले न कोई तुम्हारा नाम था नहीं पहचान ....तब तुम कौन थे? क्या नाम था तुम्हारा ....जब पहली बार शरीर धारण किया था ...तुम कौन थे ....यह विस्मृति कराने हेतु बार बार नामकरण करके शक्तियां छिनी जाती है।


4) ज्ञान व्यूह कुछ ज्ञान प्राप्त क्या कर लिया ....कोई पंडित कोई महाराज कोई योगी कोई तपस्वी बन गया ....पर मूल ज्ञान न पा सका... वेद पढ़ा पुराण पढ़े ...विज्ञानं पढ़ा ...कुछ पूर्व जन्म की स्मृति से .....तो कभी देवताओ की कृपा से कुछ ज्ञान मिल गया उसके अहंकार में फस गया।


5 ) चित व्यूह इस व्यूह रचना में ब्रह्मा विष्णु महेश भी फंस चुके है ....चित के व्यूह से ब्रह्म से जड़ माया की उत्पत्ति हुई ..... इस विचार करने वाले प्रोग्राम से ही कल्पना को हकीकत मान कर .....जीव काल सृष्टि में फंस चुका है ...इस व्यूह से ही सूक्ष्म और कारण जगत निर्मित हुआ।


6 ) नाद व्यूह यह व्यूह रचना .....भाषा प्रयोजन का बंधन है और इसी मान्यता से शक्तियों का आविर्भाव होता रहता है जो अलग अलग भाषा के बंधन में फंस जाता है। जिसके कारण मनुष्य को यह लगता है कि मैं अभी जी रहा हूं।


7 ) बिन्दु व्यूह यह रचना समाज से जुडी है जो समाज अस्तित्व रखता है। और तुम उनके अंश हो यह समझ बिन्दु व्यूह में फंसाती है।


8 ) आत्म व्यूह आत्मा का व्यूह ...आत्मसाक्षात्कार नहीं ....किन्तु खुद को आत्मा मान कर चलना साक्षी व्यूह में फसना कहते है जहा जीव.... आत्म कक्षा में जा कर फस जाता है और वो परमात्मा नहीं बन पाता है।


9 ) जीव व्यूह यह अंतिम व्यूह रचना है जब तक चेतना और चैतन्य की जाग्रति सुषुप्ति में होती रहेगी .....तब तक तुम कभी ब्रह्मा से लेके कीट तक की योनि में ....जीव भाव से ही प्रकट होते रहोगे .....इच्छाओ के गुलाम बने रहोगे।


इस 9 व्यूह रचना में से जो बाहर लाती है ....वो श्री चक्र साधना है ...बिना यह चक्रव्यूह को पार करे कोई भी जीव मुक्त नहीं हो पाता।

और नही अपने मूल लक्ष्य .... यानि लक्ष्मी की प्राप्ति कर पायेगा

.. आरम्भ शिव फिर अंत जीव.. आरम्भ जीव है तो अंत शिव.. इस क्रिया को ही श्री विद्या योग कहते है. इसी 9 व्यूह की रचना में से बाहर आ गये तो, हम शिव बन जायेगे

क्यूंकि कुंडलिनी ने खुद का अस्तित्व बचाने के लिए - जीव को माया में कैद करने के लिए - यह 9 आवरण का प्रयोग किया कि - जीव को शिव होने का भाव जाग्रत न हो !


सृष्टि के सुरुचिपूर्ण संचालन के लिए यह माया आवश्यक है. लेकिन करो़ड़ों में एक जीव जो श्रीविद्य़ा का आश्रय लेता है, वह जन्म मृत्यु के इस बंधन को तोड़कर मोक्ष प्राप्त करता है।

बीमारी में कौनसा ड्राई फ्रूट्स खाए

बहुत जरूरी है ये जानना किस बीमारी में कौनसा ड्राई फ्रूट्स खाए #जरूरत अनुसार कैसे और कब खाए ड्राई फ्रूट्स #प्राकृतिक जीवन देखे उपयोग करने का तरीका सम्पूर्ण विवरण:


1.बादाम


दिमाग़ की कमजोरी

याददाश्त कम होना

शारीरिक दुर्बलता

बच्चों में मानसिक विकास

कैसे सेवन करें

रात में 5–6 बादाम पानी में भिगो दें

सुबह छिलका उतारकर अच्छी तरह चबाएँ

चाहें तो 1 चम्मच शहद के साथ लें


क्यों लाभकारी

बादाम में विटामिन E, ओमेगा-3 और प्रोटीन होते हैं, जो मस्तिष्क व नसों को मज़बूत करते हैं।


2️⃣ काजू

किस बीमारी में लाभकारी

अत्यधिक कमजोरी

कम वजन

थकान

कैसे सेवन करें

3–4 काजू सुबह नाश्ते के साथ

या हल्का भूनकर

❌ कब न लें

मोटापा, शुगर और उच्च कोलेस्ट्रॉल में अधिक सेवन न करें।


3️⃣ अखरोट

किस बीमारी में लाभकारी

हृदय रोग

तनाव, चिंता

ब्रेन हेल्थ

कैसे सेवन करें

1–2 अखरोट सुबह खाली पेट

क्यों

अखरोट में ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है, जो दिल और दिमाग दोनों के लिए श्रेष्ठ है।


4️⃣ पिस्ता

किस बीमारी में लाभकारी

कमजोरी

आँखों की थकान

रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना

कैसे सेवन करें

6–8 पिस्ता दिन में कभी भी

बेहतर है भिगोकर या हल्का भूनकर


5️⃣ किशमिश

किस बीमारी में लाभकारी

कब्ज

खून की कमी

पेट की कमजोरी

कैसे सेवन करें

10–15 किशमिश रात को भिगोकर

सुबह पानी सहित सेवन करें


6️⃣ काली किशमिश

किस बीमारी में लाभकारी


एनीमिया


चक्कर आना


महिलाओं में कमजोरी


कैसे सेवन करें


8–10 काली किशमिश भिगोकर सुबह


7️⃣ खजूर

किस बीमारी में लाभकारी


अत्यधिक कमजोरी


कम रक्तचाप


प्रसव के बाद कमजोरी


कैसे सेवन करें


1–2 खजूर गुनगुने दूध के साथ


❌ मधुमेह में न लें


8️⃣ अंजीर

किस बीमारी में लाभकारी


पुरानी कब्ज


बवासीर


पेट की सूजन


कैसे सेवन करें


2 अंजीर रात को भिगोकर


सुबह खाली पेट


9️⃣ सूखी खुबानी

किस बीमारी में लाभकारी


खून की कमी


त्वचा रोग


कमजोरी


कैसे सेवन करें


2–3 खुबानी भिगोकर सुबह


🔟 मूंगफली

किस बीमारी में लाभकारी


कमजोरी


सर्दी में ऊर्जा


कैसे सेवन करें


भुनी हुई 1 मुट्ठी


❌ एसिडिटी व एलर्जी में न लें


1️⃣1️⃣ सूखा नारियल

किस बीमारी में लाभकारी


शरीर में रूखापन


कमजोरी


कैसे सेवन करें


1–2 छोटे टुकड़े दिन में


1️⃣2️⃣ मखाना

किस बीमारी में लाभकारी


मधुमेह


हृदय रोग


गर्भावस्था में कमजोरी


कैसे सेवन करें


घी में हल्का भूनकर 1 कटोरी


1️⃣3️⃣ हेज़लनट

किस बीमारी में लाभकारी


हृदय व नसों की कमजोरी


कैसे सेवन करें


3–4 दाने सुबह


1️⃣4️⃣ ब्राज़ील नट

किस बीमारी में लाभकारी


थायरॉयड


कैसे सेवन करें


सप्ताह में 2–3 बार केवल 1 दाना


1️⃣5️⃣ मैकाडेमिया नट

किस बीमारी में लाभकारी


हृदय स्वास्थ्य


कैसे सेवन करें


2–3 दाने

❌ अधिक मात्रा से वजन बढ़ता है


1️⃣6️⃣ पाइन नट

किस बीमारी में लाभकारी


कमजोरी


यौन दुर्बलता


कैसे सेवन करें


1 चम्मच सुबह


1️⃣7️⃣ सूखी क्रैनबेरी

किस बीमारी में लाभकारी


मूत्र संक्रमण (UTI)


कैसे सेवन करें


1 छोटा चम्मच


1️⃣8️⃣ सूखी ब्लूबेरी

किस बीमारी में लाभकारी


आँखों की कमजोरी


एंटीऑक्सीडेंट की कमी


कैसे सेवन करें


1 चम्मच दिन में


1️⃣9️⃣ प्रून्स (सूखा आलूबुखारा)

किस बीमारी में लाभकारी


गंभीर कब्ज


कैसे सेवन करें


2–3 भिगोकर सुबह


2️⃣0️⃣ अंजीर स्लाइस

किस बीमारी में लाभकारी


कब्ज


हड्डियों की कमजोरी


कैसे सेवन करें


2–3 स्लाइस भिगोकर

अति सुन्दर वाक्य...

हा! आज शिक्षा मार्ग भी संकीर्ण होकर विष्ट है,

कुलपति सहित उन गुरुकुलों का ध्यान ही अवशिष्ट है।


बिकने लगी विद्या यहाँ अब, शक्ति हो तो क्रय करो,

यदि शुल्क आदि न दे सको तो मूर्ख रह कर ही मरो!


ऐसी असुविधा में कहो वे दीन कैसे पढ़ सकें?

इस ओर वे लाखों अकिंचन किस तरह से बढ़ सकें?


अधपेट रह कर काटते हैं मास के दिन तीस वे,

पावें कहाँ से पुस्तकें, लावें कहाँ से फ़ीस वे॥


वह आधुनिक शिक्षा किसी विध प्राप्त भी कुछ कर सको—

तो लाभ क्या, बस क्लर्क बन कर पेट अपना भर सको!


लिखते रहो जो सिर झुका सुन अफसरों की गालियाँ!

तो दे सकेंगी रात को दो रोटियाँ घरवालियाँ॥


अब नौकरी ही के लिए विद्या पढ़ी जाती यहाँ,

बी० ए० न हों हम तो भला डिप्टीगरी रखी कहाँ?


किस स्वर्ग का सोपान है तू हाय री, डिप्टीगरी!

सीमा समुन्नति की हमारी, चित्त में तू ही भरी!!


शिक्षार्थ क्षात्र विदेश भी जाते अवश्य कभी-कभी,

पर वकृता ही झाड़ते हैं लौट कर प्राय: सभी!


है काम कितनों का यही पहले यहाँ मिस्टर बने,

इंगलैंड जाकर फिर वहाँ वाग्वीर बारिस्टर बने॥


वे वीर हाय! स्वदेश का करते यही उपकार हैं—

दो भाइयों के युद्ध में होते वही आधार हैं!


उनके भरोसे पर यहाँ अभियोग चलते हैं बड़े,

हारे कि जीते आप, उनके किंतु पौ-बारह पड़े!


जाकर विदेश अनेक अब तक युवक अपने आ चुके,

पर देश के वाणिज्य-हित की ओर कितने हैं झुके?


हैं कारखाने कौन-से उनके प्रयत्नों से चले?

क्या-क्या सु-फल निज देश में उनसे अभी तक हैं फले?


अमरीकनों के पात्र जूँठे साफ कर पंडित हुए,

सच्चे स्वदेशी मान से फिर भी नहीं मंडित हुए!


दृष्टांत बनते हैं कि वे इस कहावत के लिए—

बारह बरस दिल्ली रहे पर भाड़ ही झोंका किए!”


दासत्व के परिणाम वाली आज है शिक्षा यहाँ,

हैं मुख्य दो ही जीविकाएँ—भृत्यता, भिक्षा यहाँ!


या तो कहीं बन कर मुहर्रिर पेट का पालन करो,

या मिल सके तो भीख माँगो, अन्यथा भूखों मरो!


बिगड़े हमारे अब सभी स्वाधीन वे व्यवसाय हैं,

भिक्षा तथा बस भृत्यता ही आज शेष उपाय हैं।


पर हाय! दुर्लभ हो रही है प्राप्ति इनकी भी यहाँ,

यह कौन जाने इस पतन का अंत अब होगा कहाँ!


वह सांप्रतिक शिक्षा हमारे सर्वथा प्रतिकूल है,

हममें, हमारे देश के प्रति, द्वेष-मति की मूल है।


हममें विदेशी-भाव भर के वह भुलाती है हमें,

सब स्वास्थ्य का संहार करके वह रुलाती है हमें!!


होती नहीं उससे हमें निज धर्म में अनुरक्ति है,

होने न देती पूर्वजों पर वह हमारी भक्ति है।


उसमें विदेशी मान का ही मोह-पूर्ण महत्व है,

फल अंत में उसका वही दासत्व है, दासत्व है!


हम मूर्ख और असभ्य थे, उससे विदित होता यही,

इस मर्म को कि हम जगद्गुरु थे, छिपाती है वही।


फ्री थाट ही वह वेद के बदले रटाती है हमें,

देखो, हटा कर असलियत से वह घटाती है हमें॥


क्या लाभ है उन हिस्ट्रियों को कंठ करने से भला—

रटते हुए जिनको हमारा बैठ जाता है गला?


हा! स्वेद बन कर व्यर्थ ही बहता हमारा रक्त है,

सन्-संवतों के फेर में बरबाद होता वक्त है!


दुर्भाग्य से अब एक तो वह ब्रह्मचर्याश्रम नहीं,

तिस पर परिश्रम व्यर्थ यह पड़ता हमें कुछ कम नहीं!


फिर शीघ्र ही चश्मा हमारे चक्षु चाहें क्यों नहीं?

हम रुग्ण होकर आमरण दुख से कराहें क्यों नहीं?


है व्यर्थ वह शिक्षा कि जिससे देश की उन्नति न हो,

जापान के विद्यार्थियों की सूक्ति है कैसी अहो!


साहब! हमें यूरोपियन हिस्ट्री न अब दिखलाइए,

बेलन की रचना हमें करके कृपा सिखलाइए॥


करके सु-शिक्षा की उपेक्षा यों पतित हम हो रहे,

हो प्राप्त पशुता को स्वयं मनुजत्व अपना खो रहे।


आहार, निद्रा आदि में नर और पशु क्या सम नहीं?

है ज्ञान का बस भेद सो भूले उसे क्या हम नहीं?


धर्मोपदेशक विश्व में जाते जहाँ से थे सदा,

शिक्षार्थ आते थे जहाँ संसार के जन सर्वदा।


अज्ञान के अनुचर वहाँ अब फिर रहे फूले हुए,

हम आज अपने आपको भी हैं स्वयं भूले हुए॥


अपमान हाय! सरस्वती का कर रहे हम लोग हैं,

पर साथ ही इस धृष्टता का पा रहे फल-भोग हैं!


निज देवता के कोप में कल्याण किसका है भला,

हम मोह-मुग्ध फँसा रहे हैं आप ही अपना गला॥



Monday, December 29, 2025

कुछ अन कही बाते...

 🌑 जीवन में कई बार एक ऐसा पड़ाव आता है जब भावनाएं मानो जम सी जाती हैं। हम उस मोड़ पर खड़े होते हैं जहाँ किसी का साथ होना या न होना, किसी का प्यार या किसी की नफरत सब बेमानी लगने लगता है। 

दिल इतना थक जाता है कि वह शिकायत करना भी छोड़ देता है। अक्सर हम इसे अपनी हार मान लेते हैं, लेकिन सच तो यह है कि यही वह समय है जब रूह आपसे अपना हक माँग रही होती है।

🌑 अक्सर इस मोड़ पर हम एक बड़ी गलती कर बैठते हैं। दूसरों की बेरुखी या उनकी खामोशी को अपनी किस्मत मान लेते हैं।खुद को एक शिकार की तरह देखने लगते हैं, जैसे हमारे दुखों का रिमोट कंट्रोल किसी और के हाथ में हो।खुद को उस अंधेरे कमरे में बंद कर लेते हैं जहाँ सिर्फ पछतावा और दर्द होता है।दूसरों को सजा देने की चाह में, अनजाने में खुद को ही लहूलुहान करते रहते हैं।

हमारी जिंदगी को संवारने की जिम्मेदारी हमारी थी, उसे किसी और की गलतियों की भेंट क्यों चढ़ा रहे हैं?

हम किसी के व्यवहार का शिकार होने के लिए पैदा नहीं हुए हैं। यह जिंदगी किसी की मोहताज नहीं है। अगर आज किसी की उपस्थिति खुशी नहीं दे रही, तो उसकी अनुपस्थिति को दर्द भी मत बनने दीजिए।

सोचिये क्या वाकई जिंदगी इतनी सस्ती है कि कोई आएगा, दो शब्द कड़वे बोलेगा, और हमारी पूरी हस्ती बिखर जाएगी? 

क्या हम इतने कमजोर हैं कि किसी की अनुपस्थिति हमारा वजूद ही मिटा दे? 

🌑 हकीकत तो ये है कि लोग हमको उतना ही दुख देते हैं, जितनी हम उन्हें इजाजत देते हैं। जिस दिन हमने अपनी तकलीफों का जिम्मा दूसरों पर डालना बंद कर दिया, उसी दिन हम आजाद हो जाएंगे।

​अक्सर दूसरों को सबक सिखाने के चक्कर में हम खुद की जिंदगी का इम्तिहान फेल कर देते हैं। हम चाहते हैं कि उन्हें हमारी कमी महसूस हो, वो तड़पें, वो पछताएं... और इस चाहत में हम खुद तड़पना शुरू कर देते हैं। 

यह कैसी समझदारी है कि घर पड़ोसी का जले और धुआँ हमारे फेफड़ों में हो?

जिंदगी बराबर जीने के लिए मिली है, घिसटते हुए गुजारने के लिए नहीं। खुद को किसी की यादों का या किसी की बेरुखी का शिकार मत बनाइए। 

आप एक जलता हुआ दीया हैं, कोई बुझी हुई राख नहीं कि कोई भी आकर पैरों से कुचल जाए। 

आज, इसी वक्त, यह तय कीजिए कि आपकी मुस्कुराहट पर सिर्फ आपका हक है। किसी और की दी हुई चोट को अपना गहना मत बनाइए।

🌑 छोटा मुँह बड़ी बात कह रहा हूँ पर ​उठिए, और खुद को उस दलदल से बाहर निकालिए, क्योंकि जब आप खुद के लिए खड़े होते हैं, तभी कायनात आपके लिए रास्ता बनाना शुरू करती है। दूसरों के लिए रोना बंद कीजिए और उस इंसान को हंसाइए जो बचपन से आपके अंदर कहीं खो गया है।

अगर आज अपनी खुशियों के लिए खुद लड़ नहीं सकते, तो कल हमारी बर्बादी पर अफसोस करने का हक भी हम खो देंगे। 

इसलिए खुद को दूसरों के लिए तकलीफ देना प्लिज़ बंद कीजिए। आईने में दिखने वाले उस इंसान से माफी मांगिए जिसे आपने दूसरों की खातिर सबसे ज्यादा नजरअंदाज किया है। अपनी मुस्कुराहट की कमान वापस अपने हाथ में लीजिए। जब दुनिया का शोर फीका पड़ने लगे, तो अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनिए वही आपकी सबसे सच्ची साथी है।

अपनी कहानी का नायक/नायिका बनिए, किसी की कहानी का एक दुखी हिस्सा मात्र नहीं। 

जीना सीखिए, सिर्फ दूसरों के लिए नहीं, बल्कि उस स्वयं के लिए जो आपकी राह देख रहा है।