मानव संबंधों में सबसे बड़ी गलतफहमी यह होती है कि हम सामने वाले को बदलने की कोशिश करने लगते हैं, बजाय उसे समझने के। खासकर स्त्री–पुरुष संबंधों में यह टकराव अक्सर देखने को मिलता है।
कोई भी महिला अपने घमंड, अकड़, दबाव या ज़बरदस्ती से किसी पुरुष को लंबे समय तक बाँध नहीं सकती। ऐसा इसलिए नहीं कि वह कमजोर है, बल्कि इसलिए कि मानव मन स्वभाव से नियंत्रण का विरोध करता है।
जहाँ दबाव होता है, वहाँ अपनापन नहीं टिकता।
दबाव से व्यवहार नहीं, केवल प्रतिक्रिया पैदा होती है
व्यवहार परिवर्तन सहमति से होता है, मजबूरी से नहीं।
जब किसी व्यक्ति पर लगातार आदेश, ताना, तुलना या भावनात्मक दबाव डाला जाता है, तो वह या तो:
भीतर से टूट जाता है
या बाहर से चुप होकर भीतर विद्रोही बन जाता है
दोनों ही स्थितियाँ रिश्ते को खोखला कर देती हैं।
प्रकृति का उदाहरण : पेड़ और रस्सी
प्रकृति हमें बहुत सरल भाषा में गहरे सत्य सिखाती है।
यदि किसी पेड़ को सीधा करना हो और आप उसे रस्सी से ज़ोर से बाँध दें
तो या तो:
पेड़ टूट जाएगा
या रस्सी हटते ही पहले से अधिक टेढ़ा हो जाएगा
लेकिन यदि आप उसे समय, सहारा और सही दिशा दें तो वही पेड़ बिना टूटे, स्वाभाविक रूप से सीधा बढ़ता है।
मानव मन भी ठीक ऐसा ही है।
पुरुष मन की सामाजिक संरचना
पुरुषों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी कठोर, भावनाओं को दबाने वाला, और मज़बूत दिखने वाला बनना सिखाया गया है।
उन्हें सिखाया गया:
रोना कमजोरी है
डर दिखाना गलत है
झुकना हार है
इसलिए कई पुरुष अपनी भावनाएँ ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते।
यह कमी नहीं, बल्कि सिखाया गया व्यवहार है।
समझ और सम्मान मिलने पर बदलाव संभव है
जब किसी पुरुष को:
समझदारी से प्यार मिले
बिना अपमान के संवाद मिले
और बिना डर के अपनी बात कहने की जगह मिले
तो उसका व्यवहार बदल सकता है।
वह अधिक संवेदनशील, ज़िम्मेदार और सहयोगी बन सकता है।
क्योंकि तब वह रिश्ते में सुरक्षित महसूस करता है, न कि नियंत्रित।
दबाव क्यों असंभव है?
जो महिला पुरुष को दबाकर अपने अनुसार ढालना चाहती है, वहाँ समस्या केवल रिश्ते की नहीं होती, बल्कि सामाजिक यथार्थ की भी होती है।
भले ही पुरुष में कुछ कमियाँ हों,
लेकिन समाज उसे ताकत, स्वतंत्रता और विकल्प देता है।
इसलिए:-
दबाया गया पुरुष अक्सर दूरी बना लेता है
या बाहर से झुककर भीतर से कट जाता है
दोनों ही स्थितियों में रिश्ता जीवित नहीं रहता।
जीवन जीना है तो…
जीवन चलाने के लिए:
शक्ति नहीं, संतुलन चाहिए
अधिकार नहीं, सम्मान चाहिए
नियंत्रण नहीं, सहयोग चाहिए
रिश्ते प्रतियोगिता नहीं होते, जहाँ किसी एक को जीतना हो।
वे साझेदारी होते हैं, जहाँ दोनों का बढ़ना ज़रूरी होता है।
कोई भी इंसान दबाव में बदलता नहीं, केवल टूटता है
प्रेम का अर्थ नियंत्रण नहीं, स्वीकार है
समझ से मिला सम्मान व्यक्ति को बेहतर बनाता है डर से पैदा हुआ साथ कभी स्थायी नहीं होता
स्त्री और पुरुष
दोनों ही मनुष्य हैं,
दोनों की भावनाएँ हैं,
दोनों की सीमाएँ हैं।
जो रिश्ता समझ, संवाद और सम्मान पर टिकता है, वही रिश्ता जीवन को सहज, सुरक्षित और सार्थक बनाता है।
स्त्री और पुरुष के प्रेम का सबसे सुंदर स्वरूप है,
स्त्री के सपनों के लिए संघर्ष करता हुआ पुरुष और,
पुरुष के बुरे वक्त में साथ खड़ी रहती स्त्री..
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