प्रेम: भावनाओं का जाल या समझ का रिश्ता?
आज के समय में प्रेम को बहुत गलत तरीके से समझ लिया गया है।
शुरुआत में कहा जाता है
“तुम जैसे कोई नहीं”,
“तुम ही सबसे अच्छे हो।”
लेकिन कुछ समय बाद वही शब्द बन जाते हैं
“तुम जैसे किसी को चाहना भी गलती थी”,
“तुम बहुत बुरे हो।”
यहीं से सवाल पैदा होता है
क्या यह सच में प्रेम था, या सिर्फ भावनाओं का नशा?
भावनाओं पर टिका प्रेम क्यों टूट जाता है?
आज ज़्यादातर रिश्ते भावनाओं की तेजी में शुरू होते हैं,
न कि समझ और धैर्य से।
जब तक सब ठीक चलता है
बातें मीठी लगती हैं
कमियाँ नज़र नहीं आतीं
भविष्य बहुत सुंदर दिखता है
लेकिन जैसे ही ज़िंदगी की सच्चाई सामने आती है
ज़िम्मेदारियाँ
पैसों की चिंता
परिवार का दबाव
सोच का अंतर
तब वही रिश्ता कमजोर पड़ने लगता है।
ब्रेकअप के बाद दर्द इतना क्यों होता है?
क्योंकि लोग इंसान से कम,
अपनी उम्मीदों से ज़्यादा जुड़ जाते हैं।
“हमेशा साथ रहेंगे”
“तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूँ”
जब रिश्ता टूटता है,
तो सिर्फ इंसान नहीं जाता,
पूरा सपना टूट जाता है।
इसीलिए दर्द इतना गहरा होता है।
क्या ज़्यादातर प्रेम ट्रॉमा बन जाते हैं?
सच कड़वा है, लेकिन सच है
बिना समझ के किया गया प्रेम अक्सर दर्द छोड़ जाता है।
जहाँ...
बात कम और शक ज़्यादा हो
समझ कम और अधिकार ज़्यादा हो
सच से ज़्यादा दिखावा हो
वहाँ प्रेम धीरे-धीरे बोझ बन जाता है।
ऐसे रिश्तों में
भावनाओं से झूठ का महल बनाया जाता है,
जो सच्चाई की एक हवा में गिर जाता है।
सच्चा प्रेम कैसा होता है?
सच्चा प्रेम
धीरे-धीरे बढ़ता है
सवाल पूछने की आज़ादी देता है
मतभेद में भी सम्मान बनाए रखता है
और सबसे ज़रूरी
अलग होने पर भी इंसान को तोड़ता नहीं
जहाँ प्रेम होता है,
वहाँ इंसान खुद को खोता नहीं,
बल्कि और समझदार बनता है।
प्रेम गलत नहीं है,
गलत है उसे सिर्फ भावनाओं का खेल समझ लेना।
जब प्रेम में
समझ, धैर्य और सच्चाई नहीं होती,
तो वह
खुशी से ज़्यादा घाव देता है।
इसलिए प्रेम करें
दिल से ज़रूर करें,
लेकिन आँख बंद करके नहीं।
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