Thursday, February 12, 2026

स्त्री और पुरुष

 "स्त्री और पुरुष: गुणों से नहीं, परतों से समझना"


आज का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि हम स्त्री और पुरुष को उनके गुणों से परिभाषित करना चाहते हैं।

यदि स्त्री साहसी है तो क्या वह "पुरुषवत" हो गई?

यदि पुरुष कोमल है तो क्या वह "स्त्रीवत" हो गया?


यहीं से उलझन शुरू होती है।


1. जैविक स्तर: शरीर का सत्य


सबसे पहले, स्त्री और पुरुष का एक स्पष्ट जैविक आयाम है

शारीरिक संरचना, प्रजनन तंत्र, हार्मोनल संरचना, जैविक प्रक्रियाएँ।


यह भिन्नता वास्तविक है और इसे नकारा नहीं जा सकता।

परंतु जैविक भिन्नता = व्यक्तित्व का निर्धारण

यह समीकरण अधूरा है।


साहस, नेतृत्व, तर्क, संवेदनशीलता ये गुण हार्मोन से प्रभावित हो सकते हैं, पर केवल उन्हीं से निर्धारित नहीं होते।


2. गुण लिंग के नहीं, चेतना के हैं


साहस 


दृढ़ता 


करुणा 


सहानुभूति 


तर्कशीलता 


पोषणशीलता 


ये सभी गुण मानव-गुण हैं, लिंग-गुण नहीं।


एक स्त्री साहसी हो सकती है.....क्योंकि वह मनुष्य है।

एक पुरुष संवेदनशील हो सकता है....क्योंकि वह मनुष्य है।


यह कहना कि "साहस पुरुष का गुण है" सामाजिक निर्माण है, जैविक सत्य नहीं।


3. ऊर्जा बनाम पहचान


भारतीय और पूर्वी दर्शन में स्त्री और पुरुष को केवल शरीर नहीं, बल्कि ऊर्जा के प्रतीक के रूप में भी देखा गया है।


पुरुष ऊर्जा = दिशा, विस्तार, बाह्य अभिव्यक्ति


स्त्री ऊर्जा = ग्रहणशीलता, सृजन, अंतर्मुखी गहराई


परंतु ध्यान दें....

हर व्यक्ति में दोनों ऊर्जा मौजूद हैं।


स्त्री होना = स्त्री ऊर्जा की अधिकता

पुरुष होना = पुरुष ऊर्जा की अधिकता


परंतु पूर्णता तब है जब दोनों संतुलित हों।


अर्धनारीश्वर का प्रतीक यही बताता है....

पूर्ण मनुष्य वह है जिसमें दोनों तत्व समरस हों।


4.पहचान का भ्रम


आज का युग दो अतियों में फँस गया है:


1. पारंपरिक सोच:

"स्त्री कोमल होनी चाहिए, पुरुष कठोर।"


2. प्रतिक्रियात्मक सोच:

"कोई भेद है ही नहीं।"


सत्य इन दोनों के बीच है।


भेद है पर भेद गुणों का नहीं, संरचना और अनुभव का है।

समानता है पर समानता व्यक्तित्व की संभावनाओं में है।


5. तो फिर स्त्री और पुरुष कैसे तय होंगे?


जैविक स्तर पर....शरीर से।


सामाजिक स्तर पर.....भूमिका और संदर्भ से।


मनोवैज्ञानिक स्तर पर.... व्यक्तित्व के अद्वितीय मिश्रण से।


अस्तित्व के स्तर पर.... केवल "मनुष्य" से।


अर्थात....

स्त्री होना = स्त्री होना

पुरुष होना = पुरुष होना


पर साहसी, करुणामय, बुद्धिमान, दृढ़ होना ये मानव होना है।


6. संतुलन का सूत्र


यदि हम संतुलन बनाना चाहें तो हमें यह स्वीकार करना होगा:


स्त्री साहसी हो सकती है, और यह उसकी स्त्रैणता के विरुद्ध नहीं।


पुरुष संवेदनशील हो सकता है, और यह उसकी पुरुषत्व के विरुद्ध नहीं।


कठोरता और कोमलता का संतुलन ही परिपक्वता है।


पहचान जैविक हो सकती है, पर व्यक्तित्व स्वतंत्र होता है।


शायद असली प्रश्न यह नहीं कि "स्त्री और पुरुष कैसे तय होंगे?"


असली प्रश्न यह है:

क्या हम मनुष्य को गुणों के बंधन से मुक्त कर सकते हैं?


जब स्त्री साहसी होती है, तो वह पुरुष नहीं बनती वह एक सशक्त स्त्री होती है।

जब पुरुष रोता है, तो वह स्त्री नहीं बनता वह एक संवेदनशील पुरुष होता है।


संतुलन का अर्थ भेद मिटाना नहीं, बल्कि भेद को सम्मान देते हुए संभावनाओं को मुक्त करना है।

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