क्रांति
इस आर्टिकल पर बहुत भयंकर विवाद होगा 📜📜📜📜
जो आदमी कहता है—“तुम कुछ नहीं हो, मैं ही सब कुछ हूँ; तुम कुछ मत सोचो, बस मेरे पीछे चलो”—वह तुम्हें ईश्वर से नहीं, अपनी दुकान से जोड़ रहा है।
भक्ति वहाँ मर जाती है जहाँ सोचने का हक़ छीन लिया जाए। और श्रद्धा वहाँ नक़ली हो जाती है जहाँ डर बेचकर उम्मीद बेची जाए—“मरने के बाद भी इंश्योरेंस चाहिए, सतलोक चाहिए, आराम चाहिए।” यह आध्यात्म नहीं, आत्मिक आलस्य की मार्केटिंग है।
🔥🔥🔥जो तुम्हें निर्भर बनाता है, वह तुम्हें आज़ाद नहीं कर रहा—वह तुम्हें पालतू बना रहा है। गुरु का काम तुम्हारे भीतर की आग जगाना है, तुम्हारे दिमाग़ पर ताला लगाना नहीं। जो कहे “सच सिर्फ़ मेरे पास है”, समझ लो वह तुम्हें सच से दूर कर रहा है। सच एक आदमी की जागीर नहीं होता।🔥🔥🔥
भंडारे में भीड़ लगना भक्ति का प्रमाण नहीं है—हिंदुस्तान में जहाँ खाना होगा, लोग आएँगे। डर से भरे लोग आएँगे, मन्नतों की थैली लेकर आएँगे। डरा हुआ मन सवाल नहीं पूछता, बस पकड़ ढूँढता है। और जो पकड़ बेचता है, वही गिरोह बनाता है।
गिरोह का पहला नियम होता है: “बाकी सब झूठे हैं, मैं अकेला सच्चा हूँ।”✔️
गिरोह का दूसरा नियम होता है: “पढ़ो मत, पूछो मत, बस मान लो।”✔️
गिरोह का तीसरा नियम होता है: “अगर शक हुआ, तो तुम्हें दोषी ठहरा देंगे।”✔️
वेद, गीता, उपनिषद—ये किताबें तुम्हें जगाने के लिए हैं, सुलाने के लिए नहीं। जिसने कभी पढ़ा ही नहीं, उसे आधा-अधूरा उद्धरण पकड़ा दो—वह मान लेगा। यही सबसे आसान ठगी है। और सबसे मुश्किल काम है किसी को यह समझाना कि उसके साथ ठगी हो चुकी है—क्योंकि तब अहंकार चोट खाता है। लोग अपनी ठगी को बचाने के लिए भी लड़ पड़ते हैं।
कबीर को भगवान बनाना हो या किसी को एकमात्र उद्धारकर्ता—मुद्दा नाम नहीं, तरीका है। तरीका वही है: तुम्हारी जिम्मेदारी छीनो, तुम्हारी सोच बंद करो, तुम्हारे डर को भुनाओ। जो कहे “मैं तुम्हें पार लगाऊँगा, तुम कुछ मत करो”—वह तुम्हें जीवन से पलायन सिखा रहा है। क्रांति बाहर नहीं, पहले भीतर होती है। भीतर की क्रांति बिना सोच के नहीं आती।
भक्ति का मतलब भागना नहीं है।
भक्ति का मतलब डर खरीदना नहीं है।
भक्ति का मतलब सवालों को दफन करना नहीं है।
सच्ची साधना तुम्हें खड़ा करती है—अपने पैरों पर।
झूठी साधना तुम्हें बैठा देती है—किसी और के चरणों में।
जो तुम्हें निर्भर बनाता है, वह तुम्हें कमजोर बनाता है।
और कमजोर लोग ही गिरोहों का ईंधन होते हैं।
आज फैसला तुम्हारे हाथ में है:
या तो तुम सवाल करोगे—या फिर तुम्हारे सवालों को दफ़न करके कोई तुम्हारे नाम पर दुकान चलाएगा।
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वेदों में किसी “व्यक्तिगत भगवान” का प्रचार नहीं है—वेद प्रकृति की शक्तियों, नियमों और चेतना की बात करते हैं। लेकिन जिन्होंने कभी पढ़ा ही नहीं, उनसे अगर कहा जाए कि वेद में यह लिखा है, उपनिषद में वह लिखा है—वे मान लेंगे। क्योंकि जहाँ पढ़ाई नहीं होती, वहाँ भरोसा अफ़वाह पर टिकता है।
अंधे आदमी को तुम सूरज का हज़ार वर्णन कर दो—वह कभी नहीं मानेगा, क्योंकि उसने रोशनी देखी ही नहीं। उल्लू रात का प्राणी है; दिन की चमक उसकी दुनिया का हिस्सा नहीं। इसी तरह जिनकी दुनिया डर, परंपरा और भीड़ से बनी है, उन्हें आज़ादी की रोशनी चुभती है। वे रोशनी को झूठ कहेंगे, क्योंकि अँधेरा उन्हें सुरक्षित लगता है।
यहाँ समस्या ज्ञान की नहीं, साहस की है। पढ़ना साहस माँगता है, सवाल करना साहस माँगता है, अपनी मान्यताओं को कटघरे में खड़ा करना साहस माँगता है। भीड़ में खड़ा होना आसान है; अकेले खड़े होना कठिन। इसलिए लोग किताबें नहीं खोलते—वे “खुलासा” सुनते हैं। वे खोज नहीं करते—वे “घोषणा” मान लेते हैं।
और जो घोषणा करने वाला है, वह तुम्हें तुम्हारे ही डर से बाँध देता है: “मेरे बिना तुम डूब जाओगे।” यह वाक्य ज्ञान नहीं, धमकी है—मीठी भाषा में दी हुई धमकी।
🔥🔥🔥🔥🔥 जो गुरु तुम्हें निर्भर बनाता है, वह तुम्हें बड़ा नहीं कर रहा—वह तुम्हें छोटा रख रहा है। सत्य किसी व्यक्ति की मुहर से सच्चा नहीं होता; सत्य तुम्हारे जागरण से सच्चा होता है।🔥🔥🔥🔥🔥
जिस दिन तुमने किताब खोली, संदर्भ देखे, अलग-अलग दृष्टियों को परखा—उसी दिन से गिरोह की पकड़ ढीली पड़ने लगती है। इसलिए गिरोह कहता है: “पढ़ो मत, सोचो मत, बस मानो।” क्योंकि सोच पैदा होते ही दुकान बंद होने लगती है।
सवाल यह नहीं कि तुम किसका नाम जपते हो। सवाल यह है कि तुम्हारा दिमाग़ जगा है या गिरवी रखा हुआ है।
जागा हुआ दिमाग़ सवाल करता है।
गिरवी रखा हुआ दिमाग़ ताली बजाता है।
और जो तुम्हें ताली बजाने की आदत डाल दे—वह तुम्हें आज़ाद नहीं कर रहा, वह तुम्हें भीड़ का हिस्सा बना रहा है।
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अब बात उस दावे की—कि वेदों में “कबीर” का प्रमाण है।
यह दावा बार-बार दोहराया जाता है ताकि सुनने वाला थककर मान ले। सच यह है कि वेदों में ‘कबीर’ नाम के किसी ऐतिहासिक संत या व्यक्ति का उल्लेख नहीं है। वेदों की भाषा वैदिक संस्कृत है और उनकी संरचना देवताओं, प्रकृति-तत्वों और ब्रह्म-तत्व के सूक्तों पर आधारित है—किसी मध्यकालीन संत की जीवनी पर नहीं।
यहाँ चाल शब्दों की है। संस्कृत में “कबीर/कबीरः/कबीरा” जैसे शब्द विशेषण के रूप में मिल सकते हैं—अर्थ: महान, विराट, प्रचंड। इनका इस्तेमाल अग्नि, इंद्र या ब्रह्म जैसे तत्वों के गुण बताने में होता है। लेकिन विशेषण को व्यक्ति बना देना—और फिर कहना कि “देखो, वेदों में कबीर का नाम है”—यह भाषाई छल है।
विशेषण ≠ व्यक्ति।
गुण ≠ जीवनी।
काव्यात्मक शब्द ≠ ऐतिहासिक प्रमाण।
कबीर का काल ऐतिहासिक रूप से मध्यकाल माना जाता है; वेद उससे हज़ारों साल पुराने ग्रंथ हैं। समय-रेखा ही इस दावे को गिरा देती है। जो लोग कहते हैं कि वेदों में कबीर का प्रमाण है, वे संदर्भ नहीं देते—सूक्त, मंडल, मंत्र संख्या नहीं बताते—क्योंकि संदर्भ देते ही अर्थ-घटिया करने की चाल पकड़ में आ जाती है।
किसी शब्द का मतलब “महान” है—उसे उठा कर “यह तो कबीर साहब हैं”—यह वैसा ही है जैसे “प्रकाश” शब्द पढ़कर कहना कि यह किसी व्यक्ति का नाम है, न कि रोशनी का अर्थ।
🔥🔥🔥🔥🔥जब गुरु ग्रंथों को उद्धरणों के टुकड़ों में काटकर बेचता है, तब वह ज्ञान नहीं देता—वह भ्रम का व्यापार करता है। ज्ञान पूरे संदर्भ से समझा जाता है; ठगी आधे वाक्य से होती है।🔥🔥🔥🔥🔥
जो सच होगा, वह संदर्भ के साथ खड़ा रहेगा।
जो झूठ होगा, वह संदर्भ से भागेगा।
इसलिए सवाल नामों का नहीं है—ईमानदारी का है।
अगर कोई वेदों का हवाला देता है, तो उससे पूरा मंत्र, मंडल, संदर्भ माँगो।
अगर वह संदर्भ देने से बचे—समझ लो दावे में दम नहीं, सिर्फ़ शोर है।
और जो शोर के सहारे चलता है—वह दुकान है, साधना नहीं।
लोगो के मकान बनवाना ओर राशन दान देना
यह तरीका भारत में नया नहीं है लोग अपने राजनीतिक फायदो के लिए भी ऐसा हमेशा से करते आए हैं
अगर कोई व्यक्ति अपाहिज है वह काम नहीं सकता तो उसको थोड़ी मदद दी जा सकती है लेकिन अगर आप रैंडम लोगों को राशन फ्री दे रहे हो तों यह लोगों को अपाहिज करना है फिर चाहे यह काम कोई कोई ट्रस्ट करता हो कोई समाज का धन्ना सेठ करता हो चाहे सरकार करती हो यह हमेशा से देश के लिए दुनिया के लिए गलत है जो आदमी के हाथ पांव सही है वह अपना पेट अपनी मेहनत से भरे फिर चाहे वह कोई बुद्धिस्ट है चाहे कोई हिंदू सन्यासी है चाहे कोई
मौलवी है या किसी चर्च का पादरी है किसी भी धर्म का सन्यासी जो मांग कर खाता है इसके हम शुरुआत से ही विरोध में है
दुनिया में बहुत से लोग हैं जो अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा चुपचाप दान कर देते हैं—कोई 80%, कोई 90%—और किसी को पता भी नहीं चलता। असली दान वही है जो प्रचार के बिना होता है। क्योंकि दान का मूल्य रकम से नहीं, नियत से तय होता है। जिसने अपनी औक़ात के हिसाब से दो रोटी दीं, उसका योगदान उतना ही है जितना उस अमीर का जिसने एक करोड़ दिए—क्योंकि नैतिकता प्रतिशत से नापी जाती है, पैसों की गिनती से नहीं।
बाढ़ में फँसे लोगों की मदद करना अच्छा है—मकान बनवाना, पानी निकलवाना अच्छा है। लेकिन जब हर मदद के साथ कैमरा, यूट्यूबर, न्यूज़ चैनल, पोस्टर, सम्मान समारोह और रोज़ की मार्केटिंग जुड़ जाए—तो समझ लो मदद सेवा नहीं रही, ब्रांडिंग बन गई।
सेवा का स्वभाव मौन होता है।
मार्केटिंग का स्वभाव शोर होता है।
शोर जितना बढ़े, उतना शक पैदा होना चाहिए।
आचार्य रजनीश ओशो का एक सीधा सूत्र यहाँ लागू होता है: जो अच्छा काम कर रहा है, उसे ढोल पीटकर बताने की ज़रूरत नहीं होती—क्योंकि सच्चा कर्म तालियों का मोहताज नहीं होता। जब हर रोटी के साथ कैमरा जुड़ा हो, तो रोटी से ज़्यादा इमेज को खाना खिलाया जा रहा होता है।
और जब दान का हिसाब- किताब मंच से सुनाया जाए—“आज यह सम्मान मिला, आज वह सम्मान मिला”—तो दान नहीं, पीआर कैंपेन चल रहा होता है।
दान को भगवान बनाकर बेचना सबसे चालाक मार्केटिंग है: “हम भगवान हैं, इसलिए हम दया करते हैं।” नहीं—दया इंसानियत है, कोई दैवी ब्रांड नहीं। दया हर उस इंसान की क्षमता है जिसके भीतर संवेदना बची है। अगर दया का सर्टिफिकेट बाँटा जा रहा है, तो समझ लो संवेदना को ट्रेडमार्क किया जा रहा है।
असली सवाल यह नहीं कि मदद हुई या नहीं—
असली सवाल यह है कि मदद किसलिए हुई: पीड़ित के लिए या प्रचार के लिए?
अगर पीड़ित केंद्र में है—तो कैमरा बाहर रहेगा।
अगर कैमरा केंद्र में है—तो पीड़ित पोस्टर बन जाएगा।
यही फ़र्क़ है सेवा और बिज़नेस मॉडल में।
( और अंत में आपको कुछ भविष्यवाणी बताता हूं
इस वाली पोस्ट पर बहुत सारे कमेंट आएंगे आप चेक करना तीन-चार दिन के बाद और उन कमेंट में आप देखना इमेज बहुत सारी आएंगे लोग कमेंट बॉक्स में इमेज अपलोड करेंगे वेदों के कच्चे पक्के सूत्र उठा करके इसमें वह अपने रामपाल की फोटो उठा उठा कर डालेंगे कुछ लोग आकर के मुझे बोलेंगे तू क्या जानता है तुझे क्या पता है वह श्री कृष्ण का बारे में उल्टा सीधा बोलेंगे शिव के बारे में कुछ-कुछ बोलेंगे यह जो इनके पीछे छुपी हुई जमात है वह यह सब कुछ करेंगे मुझसे सवाल करेंगे और कुछ यह भी कहेंगे कि यह फोटो को हटाओ कुछ लोग यह भी कहेंगे कंप्लेंट करो इसकी यह मैं आपको पहले ही बता देता हूं ऐसा क्यों है वैसे इसलिए है कि इस सारे प्रोग्राम के पीछे उनकी जो झूठी ओर डर ओर लालच की श्रद्धा है उसको ठेस पहुंचेगी
डर = कबीर का( क्योंकि एक अच्छे दार्शनिक व्यक्ति को इन्होंने झूठ भगवान बनाकर पेश कर दिया)
लालच = सतलोक जाने का (( इनको मरने के बाद भी इंश्योरेंस चाहिए
और सही मायने में यह पूरी भीड़ इन दो बातों पर अटकि की हुई है
अगर कोई और आकर के उनको इन दो बातों की सांत्वना या गारंटी देता है यह वीडियो उसके पीछे हो लेगी क्योंकि यह भारत में या दुनिया में पहली बार नहीं हो रहा
पहले ही हजारों बार हुआ है और आगे भी होता रहेगा कोई और रामपाल रामपाल नागपाल तंगपाल आ जाएगा ))
कोई नागपाल आएंगे वो नागलोक लेकर जायँगे
लोग चलने के लिए तैयार हो जायेंगे बस आप उनको अमरता,सुख सुविधा कि गारंटी दे देना 🤦♂️🤦♂️
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