क्रांति...
जड़ों पर कब काम करोगे तुम?
कब तक पत्तों और शाखाओं को पानी देते रहोगे?
कब तक सजावट को समाधान समझते रहोगे?
🤦♂️🤦♂️🤦♂️🤦♂️🤦♂️🤦♂️🤦♂️
“जब घर की नींव सड़ चुकी हो,
तो दीवारों पर पेंट करना पागलपन है।”
तुम वही कर रहे हो।
हर रोज़ नई समस्या,
हर रोज़ नया टेंपरेरी इलाज।
और फिर आश्चर्य—
कि रोग खत्म क्यों नहीं होता।
संस्कृति के नाम पर लाश ढोते लोग
पुरानी पीढ़ी जो जी नहीं पाई,
जो डरी रही,
जो कुंठित रही,
जो विद्रोह नहीं कर सकी—
उसी अधूरे जीवन को
नई पीढ़ी पर थोप देना
कोई महानता नहीं है।
यह सबसे बड़ा अपराध है।
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“मृत अतीत को ढोना
आध्यात्मिकता नहीं,
आत्महत्या है।”
तुम्हारी संस्कृति जीवित नहीं है।
वह एक संग्रहालय है—
जहाँ लाशें सजी हैं
और तुम उन्हें देवता कह रहे हो।
तुम्हारी जड़ों में घुन लग चुका है
सुनो,
समस्या बाहर नहीं है।
समस्या राजनीति में नहीं है।
समस्या सिस्टम में भी नहीं है।
समस्या तुम्हारी चेतना की जड़ों में है।
तुम्हारी शिक्षा ने सिखाया—
सवाल मत पूछो
आज्ञाकारी बनो
भीड़ से अलग मत सोचो
परंपरा पर शक मत करो
और फिर तुम चाहते हो
कि क्रांति पैदा हो?
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“गुलामों की फैक्ट्री से
स्वतंत्र मनुष्य नहीं निकलते।”
एक समस्या सुलझाते हो, दस खड़ी हो जाती हैं
क्योंकि तुम
समस्या की जड़ पर नहीं,
उसके लक्षण पर काम करते हो।
हिंसा बढ़ी → कानून बढ़ा दिया
मानसिक रोग बढ़े → पूजा बढ़ा दी
भ्रष्टाचार बढ़ा → भाषण बढ़ा दिए
लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा—
हम इंसान को बीमार ही क्यों बना रहे हैं?
यह वैसा ही है जैसे
ज़हर देते जाओ
और वैद्य बदलते रहो।
टेंपरेरी समाधान: सबसे बड़ा धोखा
इस दुनिया की सबसे बड़ी समस्या यही है—
लोग सिर्फ और सिर्फ
टेंपरेरी समाधान खोजते हैं।
क्यों?
क्योंकि
परमानेंट समाधान के लिए
हिम्मत चाहिए।
पुराने को छोड़ने का साहस चाहिए।
🔥🔥🔥🔥
“पुराना तुम्हें सुरक्षित लगता है
क्योंकि वह जाना-पहचाना है,
न कि इसलिए कि वह सत्य है।”
परमानेंट समाधान कब आएगा?
परमानेंट समाधान तब आएगा
जब नई शिक्षा का उदय होगा।
ऐसी शिक्षा—
जो आज्ञाकारिता नहीं, जागरूकता सिखाए
जो रटंत नहीं, अनुभव दे
जो डर नहीं, बोध दे
जो चरित्र नहीं, चेतना पैदा करे
और हाँ—
नई शिक्षा तब तक नहीं आ सकती
जब तक पुरानी शिक्षा को छोड़ा न जाए।
सच सुनो—
पुरानी शिक्षा तुम्हें इंसान नहीं बनाती,
वह तुम्हें अनुयायी बनाती है।
परिवर्तन संसार का नियम है
जो बदलता नहीं,
वह सड़ता है।
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“जीवन परिवर्तन है,
जो परिवर्तन से डरता है
वह जीवन से डरता है।”
इसलिए
संस्कृति को बचाने की ज़िद छोड़ो।
चेतना को बचाओ।
अगर संस्कृति चेतना के खिलाफ है—
तो उसे जलना ही होगा।
यह आग नफ़रत की नहीं है,
यह आग जागरण की है 🔥
आख़िरी सवाल (यही निर्णायक है):
तुम
मरे हुए अतीत के रक्षक बनना चाहते हो
या
जन्म लेते भविष्य के द्वार?
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