संभोग को ध्यान कैसे बनाया जाए? क्या उसके लिए संभोग में किसी विशेष आसन का अभ्यास जरूरी है?
आसन अप्रासंगिक हैं, आसन बहुत अर्थपूर्ण नहीं हैं। असली चीज दृष्टि है, रुझान है। शरीर की स्थिति नहीं, मन की स्थिति असली बात है। लेकिन अगर मन बदल जाए तो संभव है कि उसके साथ आसन भी बदल जाएं। क्योंकि वे एक—दूसरे से जुड़े है। लेकिन वे बुनियादी नहीं हैं।
उदाहरण के लिए, पुरुष सदा स्त्री के ऊपर होता है। इसमें पुरुष का अहंकार छिपा है, पुरुष हमेशा समझता है कि मैं श्रेष्ठ हूं, बड़ा हूं। वह स्त्री के नीचे कैसे हो सकता है? लेकिन सारी पृथ्वी पर आदिम समाजों में स्त्री पुरुष के ऊपर होती है। इसलिए अफ्रीका में लोग उस आसन को मिशनरी आसन कहने लगे जिसमें पुरुष ऊपर होता है। जब पहली बार ईसाई मिशनरी अफ्रीका गए तो आदिवासी उनके संभोग के ढंग को देखकर हैरान रह गए। उन्हें समझ में नहीं आया कि वे क्या कर रहे हैं। उन्होंने सोचा कि इसमें स्त्री तो मर जाएगी। अफ्रीका में इस आसन को मिशनरी आसन कहते हैं। अफ्रीका के आदिवासी कहते हैं कि यह हिंसापूर्ण है कि पुरुष स्त्री के ऊपर रहे। स्त्री कमनीय है, कोमल है, इसलिए उसे पुरुष के ऊपर होना चाहिए। लेकिन पुरुष के लिए अपने को स्त्री के नीचे रखना बहुत कठिन है।
अगर तुम्हारा मन बदल जाए तो बहुत चीजें बदल जाएंगी। अच्छा तो यही है कि स्त्री ऊपर रहे। इसके पक्ष में कई बातें हैं। स्त्री निष्क्रिय है, इसलिए अगर वह ऊपर रहेगी तो बहुत हिंसा नहीं करेगी, वह विश्राम में होगी। और अगर पुरुष नीचे होगा तो वह भी बहुत उपद्रव नहीं कर सकेगा। उसे भी विश्रामपूर्ण होना पड़ेगा। यह अच्छा रहेगा। ऊपर होकर वह बहुत हिंसात्मक होगा ही, वह बहुत कुछ करेगा। और स्त्री को तो कुछ करने की जरूरत नहीं है। तंत्र में तुम्हें विश्रामपूर्ण होना चाहिए, इसलिए स्त्री का ऊपर रहना ठीक है। वह पुरुष से अधिक विश्रामपूर्ण रह सकती है। स्त्री का चित्त निष्क्रिय है, इसलिए उसे विश्राम सहज होता है।
तो आसन बदलेंगे, लेकिन आसनों की बहुत चिंता मत करो। बस अपने मन को बदलो। जीवन—शक्ति के प्रति समर्पण करो, उसके साथ बहो। अगर तुम सचमुच समर्पित हो तो तुम्हारा शरीर उस समय के लिए जरूरी आसन को, सम्यक आसन को खुद ही ग्रहण कर लेगा। अगर प्रेमी—प्रेमिका गहन रूप से समर्पित हैं तो उनके शरीर आप ही उचित आसन ग्रहण कर लेंगे।
स्थिति रोज—रोज बदल जाती है, इसलिए पहले से कोई आसन तय कर लेने की जरूरत नहीं है। यही तो अड़चन है कि तुम पहले से सब तय कर लेना चाहते हो। जब भी तुम ऐसा करते हो, यह मन का ही धंधा है। तब तुम समर्पण नहीं करते हो। समर्पण में तो चीजें अपने आप घटित होती हैं, रूप लेती हैं। जब प्रेमी—प्रेमिका दोनों समर्पण करते हैं तो एक अदभुत लयबद्धता निर्मित होती है। तब वे अनेक आसन ग्रहण करेंगे, या एक भी नहीं, महज विश्राम में होंगे। वह जीवन—शक्ति पर निर्भर है, पहले से लिए गए मानसिक निर्णय पर नहीं। पहले से कुछ भी निर्णय लेने की जरूरत नहीं है।
निर्णय ही समस्या है। संभोग के लिए भी तुम्हें निर्णय करना पड़ता है। ऐसी किताबें हैं जो सिखाती हैं कि संभोग कैसे किया जाए। इससे पता चलता है कि हमने कैसा मन निर्मित किया है। संभोग के लिए भी तुम्हें किताबों से पूछना पड़ता है। तब वह मानसिक कृत्य हो जाता है, तब तुम्हें हर बात का विचार करना पड़ता है। पहले तुम मन में रिहर्सल करते हो और तब संभोग में उतरते हो। तब तुम्हारा कृत्य नाटक हो जाता है, नकली हो जाता है। उसे सच्चा संभोग नहीं कह सकते, वह अभिनय हो गया। वह प्रामाणिक नहीं रहा।
समर्पण करो और महाशक्ति के साथ बही। भय क्या है? डर क्यों है? अगर तुम अपने प्रेमी के साथ भी निर्भय नहीं हो सकते तो किसके साथ होओगे? और एक बार तुम्हें प्रतीति हो जाए कि जीवन—शक्ति स्वयं ही सहायता करती है और स्वयं ही सम्यक मार्ग पकड़ लेती है तो उससे तुम्हें अपने पूरे जीवन के प्रति बहुत बुनियादी दृष्टि उपलब्ध हो जाएगी। तब तुम अपना समस्त जीवन परमात्मा के हाथ में छोड़ दे सकते हो, वही तुम्हारा प्रियतम है। तब तुम अपना सारा जीवन परमात्मा को सौंप देते हो। तब तुम न सोच—विचार करते हो, न योजना बनाते हो और न भविष्य को अपनी मर्जी के अनुसार चलाने की चेष्टा करते हो। तब तुम परमात्मा की मर्जी से, समग्र की मर्जी से भविष्य में गति करते हो।
लेकिन काम—कृत्य को ध्यान कैसे बनाया जाए? समर्पण करने से ही संभोग ध्यान बन जाता है। उस पर सोच—विचार मत करो, उसे बस होने दो। और विश्राम में उतर जाओ, आगे —आगे मत चलो। मन की यह एक बुनियादी समस्या है कि वह सदा आगे —आगे चलता है, वह सदा फल की खोज करता रहता है। और फल भविष्य में है। इसलिए तुम कभी कर्म में नहीं होते, तुम सदा फल की खोज करते भविष्य में होते हो। यह फल की खोज ही उपद्रव है, वह सब कुछ खराब कर देती है। बस कर्म में समग्रता से होओ। भविष्य क्या है? वह अपने आप ही आएगा, तुम्हें उसकी चिंता नहीं लेनी है। और तुम्हारी चिंताएं भविष्य को नहीं ला सकती हैं। वह आ ही रहा है, वह आया ही हुआ है। तुम उसे भूल जाओ और यहं। और अभी, वर्तमान में होओ।
यहां और अभी होने के लिए काम—कृत्य एक गहन अंतर्दृष्टि बन सकता है। मेरे देखे अब यही एक कृत्य बचा है जिसमें तुम यहां और अभी हो सकते हो। अपने आफिस में तुम यहां और अभी नहीं हो सकते हो। जब तुम कालेज में पढ़ रहे हो, वहां भी यहां और अभी नहीं हो सकते। इस आधुनिक संसार में कहीं भी यहां और अभी होना कठिन है। केवल प्रेम में यहां और अभी हुआ जा सकता है।
लेकिन तुम ऐसे हो कि प्रेम में भी वर्तमान क्षण में नहीं होते, तुम वहां भी फल की सोच रहे हो। और अनेक आधुनिक पुस्तकों ने नई कठिनाइयां पैदा कर दी हैं। तुम काम— भोग पर एक पुस्तक पढ़ते हो और तब तुम डरने लगते हो कि मैं सही ढंग से संभोग कर रहा हूं या गलत ढंग से। तुम कामासनों पर एक पुस्तक पढ़ते हो और तब तुम भयभीत हो जाते हो कि मेरा आसन सही है या गलत। मनोवैज्ञानिकों ने तुम्हारे मन में नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं। अब वे कहते हैं कि पति को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसकी पत्नी को आर्गाज्म प्राप्त हो रहा है या नहीं।
तो अब पति इसी चिंता में फंसा है। और इस चिंता से कुछ हासिल होने वाला नहीं है, वरन वह बाधा ही बनने वाली है। और पत्नी चिंतित है कि पति पूर्ण विश्राम को उपलब्ध हो रहा है या नहीं। उसे दिखाना होगा कि मैं बहुत आनंदित हो रही हूं। फिर सब कुछ झूठा हो जाता है। दोनों फल के लिए चिंतित हैं। और इसी चिंता में फल कभी हाथ नहीं आएगा।
सब भूल जाओ और क्षण में बहो। अपने शरीर को अभिव्यक्ति का मौका दो। तुम्हारा शरीर सब जानता है, उसका अपना विवेक है। तुम्हारा शरीर काम—कोशिकाओं से बना है, उसका अपना बिल्ट—इन प्रोग्राम है। उसे तुमसे कुछ पूछने की जरूरत नहीं है। सब शरीर पर छोड़ दो और शरीर अपने आप ही गति करेगा। यह प्रकृति के हाथों में अपने को छोड़ना, यह समर्पण ही ध्यान बन जाएगा।
और अगर तुम्हें सेक्स में यह अनुभव हो जाए तो तुम्हें राज हाथ लग गया कि जहां भी तुम समर्पण करोगे वहीं तुम्हें यह अनुभव होगा। तब तुम गुरु को समर्पित हो सकते हो, यह प्रेम—संबंध है। गुरु के प्रति समर्पण करते हुए जब तुम उसके चरणों पर अपना सिर रखोगे, तुम्हारा सिर शून्य हो जाएगा, तुम ध्यान में चले जाओगे। और फिर गुरु की भी जरूरत नहीं रहेगी। तब बाहर जाओ और आकाश को समर्पित हो जाओ। और तब तुम जान गए कि समर्पण कैसे किया जाए—और यही असली बात है। तब तुम जाकर एक वृक्ष के प्रति समर्पण कर सकते हो।
लेकिन यह बात मूढ़तापूर्ण मालूम देगी, अगर तुम्हें समर्पण करना नहीं आता है। हम देखते हैं, एक ग्रामीण, एक आदिवासी नदी जाता है और नदी के प्रति झुक जाता है। वह नदी को माता कहकर पुकारता है। वह उगते हुए सूरज के प्रति झुक जाता है और उसे देवता कहकर पुकारता है। या वह किसी झाडू के पास उसकी जड़— पर अपना सिर रख देता है और झुक जाता है। हमें यह अंधविश्वास जैसा मालूम पड़ता है। तुम कहते हो, यह क्या मूढ़ता कर रहा है! वृक्ष क्या करेगा? नदी क्या करेगी? वे कोई देवी—देवता नहीं हैं। सूरज कोई देवता नहीं है।
लेकिन अगर तुम समर्पण करो तो कोई भी चीज परमात्मा है। समर्पण करने वाला चित्त ही भगवत्ता का निर्माण करता है। पत्नी को समर्पण करो और वह दिव्य हो जाती है। पति को समर्पण करो और वह भगवान हो जाता है। भगवत्ता समर्पण के द्वारा प्रकट होती है। पत्थर को समर्पण करो और पत्थर पत्थर नहीं रह जाता, पत्थर ग्रतइr बन जाता है, जीवित व्यक्ति हो जाता है।
इसलिए सिर्फ जानो कि समर्पण कैसे किया जाता है। और जब मैं कहता हूं कि समर्पण कैसे किया जाता है तो उसका यह मतलब नहीं है कि उसकी कोई विधि है, मेरा मतलब है कि प्रेम में समर्पण की सहज संभावना है। प्रेम में समर्पण करो और वहां उसका अनुभव लो। और फिर उसको अपने पूरे जीवन पर फैल जाने दो।
सम्भोग_स्त्री_और_चरम_तृप्ति_का_अहसास...
सेक्स व्यसकों के बीच बहुत ही रूचि वाला विषय है। यह न केवल उनको शरीरिक संतुष्टि देता है बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ के लिए भी काफी लाभ प्रदान करता है। इसका सबसे बड़ा कारण यौन उत्तेजना होता है। जिसे क्लाइमेक्स भी कहा जाता है। लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी होते है जिनको यह पता नही होता कि सेक्स कैसे होता है या सम्भोेग कैसे होता है
सेक्स शुरू करने से यह जान लेना जरुरी होता है की सैक्स कैसे होता है। हालाँकि, सैक्स कैसे होता है या कैसे करते है इसके लिए कोई निश्चित नियम या तरीका नहीं होता है, लेकिन एक बेहतर और सुरक्षित यौन संबंध स्थापित करने के लिए सैक्स कैसे होता है और इसके लिए किस तरह के सुरक्षा मानकों का पालना करना चाहिए, यह सभी बातों से अवगत होना महत्वपूर्ण है।
इस लेख में उन सभी बातों पर विस्तार से बताया जाएगा, सेक्स शुरू करने से पहलें आपको पहलें सबसे पहलें दोनों पार्टनर की आम सहमती और साथ ही सेक्स को लेकर उत्साह होना जरुरी है। सेक्स करने के लिए एक दुसरे के ऊपर कोई दबाव नहीं होना चाहिए, अगर आप सेक्स का पूरा आनंद लेना चाहते है तो एक दूसरे की रजामंदी और विचार जान लेना बहुत जरुरी है। इस तरह से एक दूसरे के मन में कोई संकोच नहीं नहीं होता है और जब आप सेक्स करना शुरु करते हो कोई भ्रम की स्थिति नहीं होती है।
फोरप्ले एक ऐसा शब्द है जिससे हर कोई वाकिफ होता है। यह एक ऐसी क्रिया है जो सेक्स करने से पहलें की जाती है। इस क्रिया में दोनों पार्टनर एक दूसरे को उत्तेजित करने के लिए तैयार करते हैं। इस क्रिया के दौरान पुरुष साथी अपने महिला साथी को किस करता है, प्यार से अपनी बाहों में भरता है, महिला के संवेदनशील अंगो को जीभ से स्पर्श करता है, जिससे महिला साथी उत्तेजना के चरम भाव पर पहुँच जाती है, जो सेक्स शुरू करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है।
फोरप्ले करने से महिला को सेक्स करने के दौरान होने वाले दर्द से भी राहत मिलती है, इस प्रक्रिया के दौरान महिला के योनी में प्राकृतिक सेक्स लुब्रिकेंट बनना शुरू हो जाता है। इससे अनुमान लग जाता है कि महिला सेक्स के लिए तैयार हो चुकी है। इसके अलावा सेक्स शुरू करने से पहलें कंडोम का इस्तेमाल करना ना भूलें, यह आपको किसी भी तरह के यौन रोग से सुरक्षा प्रदान करती है। कई लोग उत्तेजना में आकर कंडोम लगाना भूल जाते है और जिसके परिणामस्वरूप महिला साथी को अनचाहा गर्भ धारण करना पड़ सकता है।
लोगों यौन उत्तेजना का पहला अनुभव मस्तिष्क में होता है। इसके बाद सभी तंत्रिकाओं (नर्व्स) में खून तेजी से दौड़ने लगता है। इस कारण संभोगरत स्त्री का चेहरा तमतमा उठता है। कान, नाक, आंख, स्तन, भगोष्ठ व योनि की आंतरिक दीवारें फूल जाती हैं। भगांकुर का मुंड भीतर की ओर धंस जाता है और ह़दय की धड़कने बढ़ जाती हैं। योनि द्वार के अगल-बगल स्थित बारथोलिन ग्रंथियों से तरल पदार्थ निकल कर योनि पथ को चिकना बना देता है, जिससे पुरुष लिंग का गहराई तक प्रवेश आसान हो जाता है। डाक्टर के अनुसार, जब तक पुरुष का लिंग स्त्री योनि की गहराई तक प्रवेश नहीं करता, तब तक स्त्री को पूर्ण आनंद नहीं मिलता है।
उत्तेजना के कारण स्त्री के गर्भाशय ग्रीवा से कफ जैसा दूधिया गाढ़ा स्राव निकल आता है। गर्भाशय ग्रीवा के स्राव के कारण गर्भाशय मुख चिकना हो जाता है, जिससे पुरुष वीर्य और उसमें मौजूद शुक्राणु आसानी से तैरते हुए उसमें चले जाते हैं।
"संभोग : जब सिर्फ़ शरीर नहीं, पूरा इंसान शामिल होता है"
क्या संभोग की कोई उम्र होती है?
लोग अक्सर पूछते हैं “क्या इस उम्र में भी…?”
असल बात ये है कि
उम्र शरीर की होती है,
संभोग की नहीं।
संभोग कोई हरकत नहीं, कोई एक्सरसाइज़ नहीं, कोई ज़िम्मेदारी नहीं।
वह तो तब होता है
जब इंसान भीतर से जागा हुआ हो।
जहाँ आदमी या औरत
खुद को, सामने वाले को
और उस पल को सच में महसूस कर रहा हो वहीं संभोग है।
और जहाँ ये महसूस करना नहीं है,
वहाँ चाहे शरीर मिलें,
असल में कुछ भी नहीं मिलता।
"जब संभोग भी “काम” बन जाता है"
आज की ज़िंदगी में
सब कुछ जल्दी-जल्दी हो रहा है।
काम, रिश्ते, खाना, और अब संभोग भी।
शुरू करो,
खत्म करो,
अगले काम पर चलो।
छूना तो है,
पर महसूस नहीं करना।
पास तो हैं,
पर जुड़े नहीं हैं।
ऐसे में संभोग
कुछ मिनटों का थकाने वाला काम बन जाता है।
और फिर लोग कहते हैं “अब मज़ा नहीं रहा।”
मज़ा इसलिए नहीं रहता
क्योंकि वहाँ इंसान मौजूद ही नहीं होता,
सिर्फ़ शरीर होता है।
"जुड़ाव और इस्तेमाल में फर्क"
जहाँ जुड़ाव होता है, वहाँ अपने आप इज़्ज़त आ जाती है।
और जहाँ सिर्फ़ इस्तेमाल होता है, वहाँ अंदर से खालीपन बढ़ता जाता है।
आज बहुत लोग
संभोग में सामने वाले को
एक ज़रूरत पूरी करने की चीज़ बना लेते हैं।
ये शरीर की कमी नहीं है,
ये देखने की कमी है।
अगर आप सामने वाले की साँस नहीं सुन पा रहे,
उसकी चुप्पी नहीं समझ पा रहे,
उसकी हल्की-सी हरकत भी महसूस नहीं कर पा रहे
तो वहाँ संभोग नहीं,
बस शरीर की टक्कर है।
"भीतर की ऊर्जा कैसे बदलती है अनुभव"
हर इंसान के भीतर
एक गहरी ताक़त होती है।
जब वही ताक़त
बिना सोचे-समझे निकल जाती है,
तो थोड़ी देर का सुख देती है
और फिर खालीपन।
लेकिन जब वही ताक़त
ध्यान से, महसूस करते हुए बहती है,
तो अनुभव बदल जाता है।
तब
साँसें हड़बड़ी में नहीं चलतीं,
शरीर दौड़ता नहीं,
मन भागता नहीं।
तब संभोग का मतलब होता है खत्म करना नहीं,
डूब जाना।
"प्रकृति हमें क्या सिखाती है"
प्रकृति कभी जल्दी में नहीं रहती।
फूल खिलने में समय लेता है,
नदी बहते-बहते समुद्र तक पहुँचती है।
भँवरा फूल को
ज़बरदस्ती नहीं छूता,
वह उसमें खो जाता है।
प्रकृति साफ़ कहती है जो जीवन देता है,
वह हड़बड़ी में नहीं होता।
संभोग भी जीवन देता है
इसलिए उसमें ठहराव ज़रूरी है।
"असली बात : भीतर जागना"
संभोग में
आँखें बंद करना कोई बड़ी बात नहीं।
बड़ी बात है भीतर खुले रहना।
शरीर को तेज़ करना आसान है,
उसे सुनना मुश्किल।
जहाँ इंसान पूरी तरह मौजूद होता है,
वहाँ न शर्म रहती है,
न अपराध-बोध,
न खालीपन।
वहाँ बस अनुभव होता है
पूरा, सच्चा, शांत।
"आज क्या खोता जा रहा है"
आज की दिखावटी दुनिया में
सब कुछ दिखाने का हो गया है।
संभोग भी।
कैसा दिख रहा है,
कैसा लग रहा है,
कितना देर चला
पर अंदर क्या हुआ,
इसकी किसी को फ़िक्र नहीं।
शरीर को तो सुख मिल जाता है,
पर मन और दिल अधूरे रह जाते हैं।
"लौटने की बात"
समाधान
न उम्र बदलने में है,
न तकनीक सीखने में,
न नई जानकारी में।
समाधान है याद करने में।
याद करने में कि
संभोग कोई क्रिया नहीं,
एक अवस्था है।
जब दो शरीर नहीं,
दो इंसान पूरे होकर मिलते हैं
तभी संभोग सच में होता है।
और जब उसमें पूरी उपस्थिति होती है,
तो शरीर बोझ नहीं लगता,
वह चुप्पी और सुकून का घर बन जाता है।
परिचय : बिना सन्तुष्टी के संभोग करते हुए अगर वीर्य स्खलन हो जाये तो उसे शीघ्रपतन कहा जाता है।
कारण : अश्लील वातावरण में रहना, मस्तिष्क की कमजोरी और हर समय सहवास की कल्पना मे खोये रहना यह शीघ्रपतन का कारण बनती है। ज्यादा गर्म मिर्च मसालों व अम्ल रसों से खाद्य-पदार्थो का सेवन करने, शराब पीने, चाय-कांफी का ज्यादा पीना और अश्लील फिल्म देखने वाले, अश्लील पुस्तकें पढ़ने वाले शीघ्रपतन से पीडित रहते हैं।
लक्षण : वीर्य का पतलापन, सहवास के समय स्तंभन (सहवास) शक्ति का अभाव अथवा शीघ्रपतन हो जाना वीर्य का जल्दी निकल जाना।
भोजन तथा परहेज :
दिन में खाने के साथ दूध लें, मौसमी फल, बादाम, प्याज और लहसुन का प्रयोग करें।
दवा के साथ गुड़, मिर्च, तेल, खटाई, मैथुन, और कब्ज पैदा करने वाली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिएं पत्नी के साथ सहवास के साथ करते समय यह ध्यान रखें कि वाद-विवाद की उलझनों से दूर रहें।
विभिन्न औषधियों से उपचार-
1. छोटी माई : छोटी माई का चूर्ण 2 से 4 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम खाने से शीघ्रपतन की शिकायत दूर हो जाती है।
2. बरगद : बरगद के दूध की 20 से 30 बूंदे बतासे या चीनी पर डालकर रोज सवेरे खाने से शीघ्रपतन की शिकायत दूर होती है।
3 ग्राम बरगद के पेड़ की कोपलें, 3 ग्राम गूलर के पेड़ की छाल और 6 ग्राम मिश्री सिल पर पीसकर लुगदी बना लें, इसे खाकर ऊपर से 250 मिलीलीटर दूध पीयें, इसे 40 दिन तक खाने से लाभ मिलता है।
बरगद के कच्चे फलों को छाया में सुखाकर पीसकर रख लें। 10 ग्राम को खुराक के रूप में सुबह-शाम गाय के दूध के साथ लेने से स्वप्नदोष और शीघ्रपतन मिट जाता है।
सूर्योदय से पहले बरगद के पत्ते तोड़कर टपकने वाले दूध को एक बताशे में 3-4 बूंद टपकाकर खा लें। एक बार में ऐसा प्रयोग 2-3 बताशे खाकर पूरा करें। हर हफ्ते 2-2 बूंद की मात्रा बढ़ाते हुए 5-6 हफ्ते तक प्रयोग जारी रखें। इसके नियमित सेवन से शीध्रपतन (वीर्य का जल्दी निकल जाना), बलवीर्य वृद्धि के लिए, वीर्य का पतलापन, स्वप्नदोष, प्रमेह (वीर्य दोष) और खूनी बवासीर आदि सभी रोग ठीक हो जाता है।
3. गिलोय : गिलोय का चूर्ण और वंशलोचन को बराबर मिला-पीसकर 2 ग्राम के रूप में खाने से शीघ्रपतन नहीं होता है।
4. कुलिंजन : लगभग डेढ़ ग्राम कुलिंजन का चूर्ण 10 ग्राम शहद में मिलाकर चाटें, ऊपर से गाय के दूध में शहद मिलाकर पी लें इससे शीघ्रपतन नहीं होता है।
5. पीपल : पीपल के पेड़ का फल, जड़, छाल और कोंपल को पीसकर दूध में अच्छी तरह उबाल कर गर्म-गर्म शहद और चीनी मिला कर सुबह-शाम खाने से लाभ होता है।
6. सिरस : सिरस के फूलों का रस 10 मिलीलीटर या 20 मिलीलीटर सुबह-शाम मिश्री मिले दूध के साथ लेने से वीर्य स्तंभन होता है।
7. बबूल : बबूल की फली का चूर्ण 3 से 6 ग्राम सुबह-शाम चीनी मिलाकर खाने से शीघ्रपतन में लाभ होता है।
8. पिण्ड खजूर : पिण्ड खजूर के 5 फल रोज खायें और ऊपर से मिश्री मिला दूध कम से कम 250 मिलीलीटर रोज पियें तो इससे वीर्य गाढ़ा हो जाता है।
9. कतीरा गोंद : कतीरा गोंद 1 से 2 चम्मच चूर्ण रात में सोते समय पानी में भिगो दें। सवेरे मिश्री या शक्कर को मिलाकर शर्बत की तरह रोज घोंटकर खाने से वीर्य की मात्रा, गढ़ापान और स्तम्भन शक्ति की वृद्धि होती है।
10. असगन्ध नागौरी : असगन्ध नागौरी का चूर्ण 1 चम्मच और 3 कालीमिर्च के चूर्ण को मिलाकर रोज रात को सोते समय खाने से शीघ्रपतन और वीर्य सम्बन्धी सारे रोग दूर होते हैं।
11. उड़द : अंकुरित उड़द की दाल में मिश्री या शक्कर को डालकर कम से कम 58 ग्राम की मात्रा में रोज खाने से शीघ्रपतन दूर होता है।
उड़द के बेसन को घी में हल्का भूनकर रख लें। लगभग 50 ग्राम रोज मिश्री मिले दूध को उबालकर रोज रात में सेवन करने से वीर्य और नपुंसकता (नामर्दी) से सम्बन्धी रोग दूर हो जाते हैं।
12. शकरकन्द : सूखी शकरकन्द को कूट छानकर चूर्ण तैयार करें, फिर उसे घी और चीनी की चाशनी में डालकर हलवा तैयार करके इस हलवे को खाने से वीर्य गाढ़ा होता है।
13. कौंच : कौंच के बीजों की गिरी का चूर्ण और खसखस के बीजों का चूर्ण 4 या 6 ग्राम लेकर चूर्ण को फांट या घोल के रूप में सेवन करने से शीघ्रपतन में लाभ होता है।
कौंच के बीज का चूर्ण, तालमखाना और मिसरी, तीनों बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीस कर चूर्ण बनाकर सुबह-शाम 3-3 ग्राम चूर्ण खाकर, ऊपर से दूध पीना शीघ्रपतन में लाभदायक होता है।
कौंच की जड़ लगभग 1 अंगुल लम्बी मुंह में दबाकर सहवास करने से शीघ्रपतन में लाभ होता है।
14. वंशलोचन : वंशलोचन, सतगिलोय 10-10 ग्राम पीसकर 1-1 ग्राम सुबह-शाम शहद के साथ सेवन करने से शीघ्रपतन में आराम मिलता है।
15. बहुफली : बहुफली 50 ग्राम पीसकर 5 ग्राम सुबह पानी से प्रयोग करें।
16. काले तिल : काले तिल 50 ग्राम अजवायन 25 ग्राम पीसकर इसमें 75 ग्राम खांड को मिलाकर 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से लाभ होता है।
17. ब्रह्मदण्डी : ब्रह्मदण्डी, बहुफली 50-50 ग्राम कूट छानकर इसमें 100 ग्राम खांड को मिलाकर 10 ग्राम को खुराक के रूप में सुबह पानी के साथ सेवन करें।
ब्रह्मदण्डी, बहुफली, बीजबन्द, पलंग तोड 50-50 ग्राम कूट छान कर इस में 100 ग्राम खांड़ मिलाकर 10-10 ग्राम को दिन में सुबह-शाम दूध या पानी के साथ सेवन करने से शीघ्रपतन के रोगी को लाभ होगा।
18. बिदारीकन्द : बिदारीकन्द, गोखरूदेसी 50-50 ग्राम कूटछानकर 5-5 ग्राम खांड़ को मिलाकर दूध के साथ सुबह और शाम सेवन करें।
19. लाजवन्ती : लाजवन्ती के बीज 75 ग्राम पीस कर इसमें 75 ग्राम खांड मिलाकर 5-5 ग्राम को सुबह-शाम खांड मिले कम गर्म दूध के साथ लें।
20. मूसली सिम्बल : मूसली सिम्बल 60 ग्राम कूटी छनी में खांड 60 ग्राम मिलाकर 6-6 ग्राम पानी या दूध से सुबह-शाम लें।
🌹संभोग और प्रेम : ऊर्जा का धर्म🌹
1. संभोग कोई नहीं करता — यह घटता है।
जैसे वृक्ष से फल गिरते हैं — सहज, स्वाभाविक।
तुम इसमें कर्ता नहीं, मात्र माध्यम हो।
2. प्रेम, तभी संभव है जब यौवन ऊर्जा में स्थिरता हो।
जो प्रेम जवानी में नहीं खिला — वह बुढ़ापे में सिर्फ़ पश्चाताप देता है।
3. संभोग प्राकृतिक वर्षा है।
नदियाँ स्वयं पानी नहीं बनातीं,
लेकिन उस वर्षा को मोड़ कर, बहा कर —
सिंचाई कर सकती हैं।
यह सृजनात्मकता है, यह प्रेम है।
4. ऊर्जा को ऊपर उठाना ही प्रेम है।
वही संभोग की शक्ति,
जब आंखों में उतरती है — वह करुणा बनती है।
जब हृदय में पिघलती है — वह प्रेम बनती है।
जब आत्मा में जलती है — वह समाधि बनती है।
5. बिना प्रेम के संभोग पशुता है,
और बिना ऊर्जा के प्रेम एक भ्रम।
प्रेम का मूल रस वहीं है —
जहां ऊर्जा बह रही है।
6. यौवन की ऊर्जा का सृजनात्मक धर्म यही है —
वह प्रेम में ढले,
संभोग से समाधि की दिशा ले।
7. बुढ़ापे का प्रेम अक्सर स्मृति है, स्वप्न है, पछतावा है।
वह रसहीन जल की तरह है
जो न तो प्यास बुझा सकता है,
न खेत सींच सकता है।
---
हम "ऊर्जा का धर्म: संभोग से समाधि तक" शीर्षक से एक छोटा सूत्रग्रंथ आरंभ करते हैं —
जिसमें हर सूत्र जीवन की एक परत को खोले, और ऊर्जा की यात्रा को प्रेम, ध्यान, और मुक्ति तक ले जाए।
---
ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक
(सूत्रग्रंथ - भाग 1)
प्रारंभिक सूत्र : ऊर्जा की प्रकृति और दिशा
1.
ऊर्जा बह रही है — यही जीवन है।
जहां बहाव रुका, वहां मृत्यु शुरू।
2.
संभोग ऊर्जा का गिरना है — नीचे की ओर।
समाधि ऊर्जा का उठना है — ऊर्ध्वगामी।
3.
संभोग में देह सक्रिय है, चेतना सुप्त।
समाधि में देह शांत है, चेतना प्रज्वलित।
4.
संभोग स्वाभाविक है, प्रेम सृजन है।
प्रेम पैदा होता है — जब संभोग में होश जुड़ता है।
5.
यौवन की आग — या तो शरीर जलाएगी या आत्मा को।
चुनाव तुम्हारा है।
6.
जब तुम कहते हो: "मैं कर रहा हूँ",
तब तुम अहंकार में हो।
संभोग तब पशुता है।
जब तुम होश में हो, "हो रहा है" —
तब वही संभोग ध्यान है।
7.
संभोग अनिवार्य नहीं है — ऊर्जा है अनिवार्य।
संभोग तो माध्यम है,
ऊर्जा का धर्म खोजो।
8.
देह मिटेगी, शक्ति बुझेगी —
प्रेम तब संभव नहीं,
प्रेम एक पुष्प है — यौवन की शाखा पर।
9.
ऊर्जा एक बीज है — बीज को खा सकते हो,
या रोप सकते हो।
संभोग भोजन है, प्रेम बाग़वानी।
10.
संभोग में दो देहें मिलती हैं,
प्रेम में दो आत्माएं पिघलती हैं।
ध्यान में सब कुछ विलीन हो जाता है।
---
यह भाग 1 है — “ऊर्जा की प्रकृति और दिशा”।
यदि आप चाहें, तो अगला भाग हम "संभोग से प्रेम तक" और फिर "प्रेम से ध्यान तक" की ओर बढ़ाते हैं।
अब हम सूत्रग्रंथ का भाग 2 प्रस्तुत करते हैं —
जहाँ ऊर्जा की यात्रा संभोग से प्रेम तक की ओर बढ़ती है।
यह वह मोड़ है जहाँ शरीर का आकर्षण — आत्मा के स्पर्श में रूपांतरित होता है।
---
ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक
भाग 2 : संभोग से प्रेम तक
11.
जहाँ केवल शरीर है — वहां वासना है।
जहाँ हृदय जुड़ता है — वहां प्रेम अंकुरित होता है।
12.
वासना खींचती है, प्रेम बहाता है।
वासना लोभी है, प्रेम दाता है।
13.
जब तुम दूसरे को 'भोग' नहीं, 'भाव' से देखो —
तब प्रेम जन्म लेता है।
14.
प्रेम कोई क्रिया नहीं — एक उपस्थिति है।
वह घटता है, जब भीतर मौन होता है।
15.
संभोग में तुम पा लेना चाहते हो।
प्रेम में तुम खो देना चाहते हो।
संभोग संग्रह है, प्रेम विसर्जन।
16.
संभोग प्यास है — प्रेम झरना है।
प्यास से निकलो, झरना बनो।
17.
यदि तुम सिर्फ़ कामना हो — तुम भीड़ हो।
यदि तुम प्रेम हो — तुम ब्रह्मा हो।
18.
संभोग में तुम एक दूसरे से टकराते हो।
प्रेम में तुम एक दूसरे में समा जाते हो।
19.
जहाँ कुछ साबित करना है — वह संभोग है।
जहाँ कुछ भी साबित नहीं करना — वह प्रेम है।
20.
संभोग का अंतिम फूल — प्रेम है।
लेकिन वह तभी खिलेगा
जब तुम भीतर की धूप लाओगे —
होश की, करुणा की, मौन की।
---
अब हम अगले चरण की ओर बढ़ सकते हैं:
भाग 3: प्रेम से ध्यान तक
जहाँ प्रेम भी विलीन हो जाए — और केवल "अस्तित्व" रह जाए।
अब हम प्रवेश करते हैं ऊर्जा के धर्म के अंतिम और गहनतम चरण में —
जहाँ प्रेम भी पिघल जाता है और शेष रह जाता है मौन, शुद्ध दृष्टा — ध्यान।
यह वह भूमि है जहाँ संभोग से जन्मी ऊर्जा, प्रेम से परिपक्व होकर, ध्यान में पूर्ण हो जाती है।
---
ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक
भाग 3 : प्रेम से ध्यान तक
21.
प्रेम दो के बीच का पुल है।
ध्यान उस पुल से भी पार — एकांत की परम ऊँचाई है।
22.
प्रेम में ‘तू’ है, ध्यान में केवल ‘मैं नहीं’ है।
प्रेम बाँधता भी है, ध्यान तोड़ देता है — सब सीमाएँ।
23.
प्रेम में तुम पिघलते हो, ध्यान में तुम लुप्त हो जाते हो।
जो शून्य में स्थिर हो — वही ध्यान है।
24.
ध्यान वह प्रेम है जिसमें कोई चाह नहीं बचती।
न मिलने की, न छूने की, न कहने की।
केवल होने की — पूर्णता।
25.
प्रेम ने तुमसे 'दूसरा' छीना, ध्यान तुमसे 'तुम' को छीन लेता है।
जो बचता है, वह ब्रह्म है।
26.
जहाँ प्रेम मौन में बैठता है, वहां ध्यान जागता है।
जहाँ शब्द मरते हैं, वहां ध्यान जन्मता है।
27.
प्रेम आँखें बंद करता है — आलिंगन में।
ध्यान आँखें खोल देता है — समष्टि को देखने में।
28.
प्रेम ‘अहं’ को गलाता है, ध्यान उसे पूरी तरह विसर्जित कर देता है।
ध्यान ‘मैं’ का मृत्यु पर्व है।
29.
ध्यान कोई अभ्यास नहीं — एक विसर्जन है।
जहाँ कुछ करने को न बचे — वहीं ध्यान घटता है।
30.
जिस दिन तुम बिना प्रेम के प्रेम कर सको,
बिना संज्ञा के प्रेम में स्थिर रह सको —
उस दिन तुम ध्यान में प्रवेश कर चुके हो।
---
🔸 यहाँ "ऊर्जा का धर्म" पूर्ण होता है।
संभोग से प्रेम, और प्रेम से ध्यान — यही साधना की पूर्ण यात्रा है।