स्त्री–पुरुष समानता की कसौटी: सीमित लाभ और व्यापक प्रभाव
किसी भी समाज की प्रगति इस बात से तय होती है कि वहाँ स्त्री और पुरुष दोनों को समान अवसर, सम्मान और भागीदारी मिल रही है या नहीं। यदि कुछ गिने-चुने लोगों की उन्नति को पूरी समाज की सफलता बता दिया जाए, जबकि बड़ी संख्या में स्त्रियाँ और पुरुष पीछे छूट जाएँ, तो उस विकास पर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
अक्सर यह देखा जाता है कि कुछ व्यक्तियों की उपलब्धियों को सामने रखकर यह दावा किया जाता है कि समाज आगे बढ़ रहा है, जबकि वास्तविकता यह होती है कि बहुसंख्यक स्त्री और पुरुष आज भी शिक्षा, रोजगार और निर्णय प्रक्रिया से दूर हैं।
समान अवसर बनाम प्रतीकात्मक प्रगति
यदि किसी व्यवस्था में कुछ स्त्रियाँ आगे बढ़ जाएँ, लेकिन अधिकांश स्त्रियाँ और पुरुष बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहें, तो इसे समानता नहीं कहा जा सकता। वास्तविक समानता तब होती है जब प्रगति का लाभ सभी तक पहुँचे, न कि केवल चुनिंदा चेहरों तक।
किसी एक वर्ग की सफलता पूरे समाज की असफलता की कीमत पर हो, तो वह सफलता खोखली हो जाती है।
विभाजन का सामाजिक असर
जब स्त्री और पुरुष को आपस में तुलना या प्रतिस्पर्धा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो समाज की सामूहिक शक्ति कमजोर होती है। समान लक्ष्य की जगह अलग-अलग हित खड़े कर दिए जाते हैं, जिससे असंतुलन बढ़ता है।
एक स्वस्थ समाज वह होता है जहाँ स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी हों। विकास तभी संभव है जब दोनों मिलकर आगे बढ़ें।
नेतृत्व और भागीदारी
सशक्त समाज में नेतृत्व केवल कुछ लोगों तक सीमित नहीं रहता। स्त्रियों और पुरुषों दोनों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में बराबर स्थान मिलता है। इससे नीतियाँ अधिक व्यावहारिक, संवेदनशील और प्रभावी बनती हैं।
यदि नेतृत्व केवल एक वर्ग या एक लिंग के हाथ में सिमट जाए और दूसरा वर्ग केवल अनुयायी बना रहे, तो समानता का विचार कमजोर पड़ जाता है। नेतृत्व का अर्थ है साथ लेकर चलना, न कि ऊपर से निर्देश देना।
तात्कालिक समाधान और दीर्घकालिक परिणाम
कल्पना कीजिए कि कोई व्यवस्था कुछ लोगों को तुरंत लाभ पहुँचा दे, लेकिन भविष्य में स्त्री–पुरुष के बीच असमानता और बढ़ा दे। क्या ऐसे समाधान को सही कहा जा सकता है?
जो निर्णय आज आसान लगते हैं, वही आने वाले समय में समाज के लिए कठिनाइयाँ पैदा कर सकते हैं। इसलिए हर कदम का मूल्यांकन दीर्घकालिक प्रभावों के आधार पर होना चाहिए।
शोर नहीं, समझ की आवश्यकता
बड़े दावे और आकर्षक बातें ध्यान खींच सकती हैं, लेकिन स्थायी सुधार सोच-समझकर किए गए प्रयासों से ही आता है। स्त्री–पुरुष समानता भावनाओं से नहीं, बल्कि ठोस नीतियों और व्यवहारिक बदलावों से स्थापित होती है।
सच्चा सामाजिक विकास वही है जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से आगे बढ़ें।
जहाँ प्रश्न पूछने और सुधार की गुंजाइश होती है, वहीं प्रगति संभव होती है।
और जहाँ समानता को केवल दिखावे तक सीमित न रखकर व्यवहार में उतारा जाता है, वहीं मजबूत समाज का निर्माण होता है।
अब समाज को यह तय करना है
प्रतीकात्मक सफलता चाहिए या वास्तविक समानता,
कुछ लोगों की उन्नति या सभी का विकास,
और सबसे महत्वपूर्ण
आसान रास्ता या सही दिशा।
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