Saturday, January 24, 2026

सत्य एक निरंतर यात्रा

 सत्य एक निरंतर यात्रा 


मनुष्य का जीवन केवल जन्म और मृत्यु के बीच का समय नहीं है, बल्कि यह सत्य की ओर बढ़ती हुई एक चेतन यात्रा है। हर सोच, हर निर्णय, हर अनुभव हमें किसी न किसी सत्य के करीब ले जाता है। मनुष्य जिस क्षण सत्य को समझ लेता है, उसी क्षण उसके भीतर एक शांति उतरती है। यह शांति बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि भीतर की स्पष्टता से जन्म लेती है।


दार्शनिक दृष्टि : सत्य स्थिर नहीं, प्रवाह में है


दर्शन कहता है कि सत्य कोई जमी हुई वस्तु नहीं है। जैसे नदी बहती है, वैसे ही सत्य भी समय, चेतना और अनुभव के साथ बहता रहता है। प्लेटो से लेकर बुद्ध और आधुनिक दार्शनिकों तक सभी ने किसी न किसी रूप में यही कहा कि सत्य को अंतिम मान लेना स्वयं असत्य की शुरुआत है।


जिसे हम आज सत्य मानते हैं, वह हमारी वर्तमान समझ की सीमा तक ही सत्य है। जैसे-जैसे समझ बढ़ती है, वही सत्य नया रूप ले लेता है। इसलिए “आख़िरी सत्य” की खोज नहीं, बल्कि सत्य के प्रति जागरूक रहना ही दार्शनिक परिपक्वता है।


आध्यात्मिक दृष्टि : परम् सत्य कोई विचार नहीं, अनुभव है


अध्यात्म में सत्य को जानने का अर्थ है स्वयं को जानना। यहाँ सत्य बाहरी प्रमाणों से नहीं, बल्कि भीतर की चेतना से प्रकट होता है। उपनिषद कहते हैं...

“नेति-नेति” यह भी नहीं, वह भी नहीं।

अर्थात जो हम सोच लेते हैं कि यही अंतिम सत्य है, वह भी पूर्ण नहीं होता।


परम् सत्य कोई स्थिर निष्कर्ष नहीं, बल्कि चेतना की वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति अपने समय और अनुभव के सबसे निकट सत्य को जी रहा होता है। जो व्यक्ति अहंकार, भय और भ्रम से मुक्त होकर सत्य को स्वीकार करता है, वही परम् सत्य के करीब होता है।


आधुनिक जीवन में सत्य : विज्ञान, रिश्ते और समाज


विज्ञान इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है।

एक समय पृथ्वी को ब्रह्मांड का केंद्र माना गया वह उस युग का सत्य था। फिर कोपरनिकस आया, न्यूटन आया, आइंस्टीन आया हर बार सत्य अपडेट हुआ। पुराने सत्य गलत नहीं थे, वे अपने समय की समझ तक सही थे।


रिश्तों में भी यही हुआ।

पहले रिश्तों में त्याग, सहनशीलता और चुप रहना आदर्श माना जाता था। उस समय वही सत्य था। आज के समय में संवाद, भावनात्मक स्पष्टता और मानसिक स्वास्थ्य को महत्व दिया जाता है। संघर्ष करने के तरीके बदले हैं, इसलिए रिश्तों का सत्य भी बदला है।


कारोबार और समाज में भी सत्य बदलता रहा है।

पहले केवल लाभ कमाना सफलता माना जाता था। आज पारदर्शिता, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी भी सत्य का हिस्सा बन चुकी हैं। जो कंपनियाँ इस नए सत्य को समझ पाईं, वही आगे बढ़ीं।


सत्य से दूरी ही अशांति का कारण है


जब व्यक्ति पुराने सत्य से चिपका रहता है और नए सत्य को स्वीकार नहीं करता, तब संघर्ष पैदा होता है। भीतर भी और बाहर भी। पीढ़ियों के बीच टकराव, रिश्तों में दूरी, समाज में तनाव इन सबका मूल कारण अक्सर यही होता है कि हम सत्य के अपडेट को स्वीकार नहीं करते।


जो व्यक्ति जितना सत्य के करीब होता है, वह उतना ही सहज होता है। उसे स्वयं से लड़ना नहीं पड़ता, वह जीवन के साथ बहने लगता है।


सत्य के साथ चलना ही जीवन है


सत्य को पकड़ने की नहीं, बल्कि सत्य के साथ चलते रहने की आवश्यकता है। जीवन में शांति, प्रगति और संतुलन उसी को मिलता है जो यह समझ लेता है कि उसका आज का सत्य कल बदल सकता है।


परम् सत्य कोई मंज़िल नहीं वह एक दिशा है।

और जो उस दिशा में ईमानदारी से चलता है, वही वास्तव में जीवन को समझता है।


राहुल कुमार झा ✒️✒️

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