Sunday, January 11, 2026

कुछ स्त्रियाँ आज भी हैं...

कुछ स्त्रियाँ आज भी हैं

जो समय के संग चलती हैं,

पर समय में घुलकर

अपनी जड़ों को नहीं भूलतीं।


वे जानती हैं

मोबाइल की चमक,

शहरों की तेज़ रफ्तार,

और आधुनिकता की भाषा,

फिर भी उनके मन में

रीति-रिवाज

अबूझ बोझ नहीं,

सांसों की तरह स्वाभाविक हैं।


आज भी वे

मांग में पूरा सिंदूर भरती हैं,

आधा नहीं, संकोच में नहीं,

पूरी आस्था के साथ,

जैसे ललाट पर

परंपरा स्वयं उतर आई हो।


बड़ी सी बिंदी

उनकी भौंहों के मध्य

केवल श्रृंगार नहीं,

संस्कृति का विराम-चिह्न है,

जो कहता है,

“मैं हूँ,

और अपनी पहचान के साथ हूँ।”


कलाई भर चूड़ियाँ

जब चलती हैं तो

घर के आंगन में

मधुर नाद भर देती हैं,

उनकी खनक में

माँ की सीख,

दादी की कथाएँ

और नानी का आशीष

एक साथ बज उठता है।


वे पूरा श्रृंगार करती हैं,

किसी को दिखाने के लिए नहीं,

बल्कि अपने भीतर

स्त्री होने के उत्सव को

प्रतिदिन मनाने के लिए।


साड़ी उनके लिए

वस्त्र नहीं,

विरासत है—

जिसकी एक-एक सिलवट में

पूर्वजों का अनुशासन,

मर्यादा और

संयम बुना हुआ है।


वे आज भी

उन नियमों में रहती हैं

जो कभी घरों ने गढ़े थे—

जहाँ रिश्ते पहले आते थे,

और स्वार्थ बाद में।

कहने को लोग उन्हें

पुरानी सोच का कह दें,

पर सच यह है—

यही स्त्रियाँ

समय की आँधी में

संस्कृति की दीया-बाती बनकर

जली रहती हैं।

वे पीछे नहीं,


वे जड़ हैं


और जड़ें ही तय करती हैं

कि वृक्ष

कितनी ऊँचाई तक जाएगा।

सभी मर्द एक जैसे होते हैं

सभी मर्द एक जैसे होते हैं...

कौन मर्द ?

जो बाप बनकर ताउम्र तुम्हारी हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी ख्वाहिशों को पूरी करता है,जिसे अपने फटे हुए जूते सिलवाने याद रहे ना रहे लेकिन अपनी बिटिया के लिए स्कूल ड्रेस खरीदना कभी नहीं भूलता है जो महज तुम्हारी छोटी सी इलेक्ट्रॉनिक गुड़िया और एक तुम्हारी पहली स्कूटी और साइकिल के लिए रोज 4 घंटे ओवरटाइम के नाम पर घर लेट आया करता है तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना?


सभी मर्द एक जैसे होते हैं।

कौन मर्द ?

वही मर्द ना ,जो भाई बनकर ताउम्र अपनी ख्वाहिशों को मार कर अपने सारे खिलौने तुम्हे दे दिया करता है, तुम्हें डांट ना पड़े इसलिए अपने बाप से मार भी खा लिया करता है, लाख लापरवाह रहे हो वो, लेकिन तुम्हारे एक तरफ उठने वाली हर एक नजर को वह फोड़ दिया करता है वही मर्द ना जो जिंदगी भर पागलों की तरह हंसता रहता है लेकिन तुम्हारी विदाई में फूट फूट कर रोया करता है वही मर्द ना जो जिंदगी के भाग दौड़ में सबसे दूर भाग कर तुम्हारे एक फोन कॉल का इंतजार करता है तुम उसे मर्द की बात कर रही हो ना?


सभी मर्द एक जैसे होते हैं।

कौन मर्द ?

वही मर्द ना जो पति बनकर अपने लड़कपन को एक ही झटके में खत्म कर देता है 80 की रफ्तार से चलाने वाला बाइक अचानक से 40 की रफ्तार में अपने जिम्मेदारियों को थाम लेता है मंगलसूत्र का पहचान वह मर मर्द ता उमर तुम्हारी छोटी छोटी ख्वाहिशों के लिए अपने हर बड़े बड़े अरमानों को मार दिया करता है तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना जो पति बनकर हर उम्र में एक दोस्त की तरह तुम्हारा साथ दिया करता है बोलो ना तुम उसी की बात कर रही हो ना?


सभी मर्द एक जैसे होते हैं

कौन मर्द ?

वही मर्द ना जो प्रेमी बनकर पूरी दुनिया को भूलाकर बस तुमसे मोहब्बत करता है तुम्हारे हर झूठे तुम्हारे हर कहानी की बातों को सच मानकर तुमसे बेइंतेहा इश्क करता है वह तुम्हारी झूठ में भी खुद के लिए सच खोज लिया करता है तुम्हारी एक मुस्कान के लिए अपना सब कुछ निछावर कर दिया करता है तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना जो प्रेमी बनकर अपनी प्रेमिका के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाया करता है अरे बोलो ना, अरे चुप क्यों हो, बताओ ना की बात कर रही हो ना?


सभी मर्द एक जैसे होते हैं । 

कौन मर्द ??

वही मर्द ना जो दोस्ती के रिश्ते में एक दोस्त बनकर तुम्हें परिवार का हिस्सा मान लेता है जो तुम्हें पिज़्ज़ा खिलाने के लिए खुद के लिए बल्ला खरीदने का पैसा निकाल कर तुम्हें पिज्जा खिला देता है, वही मर्द ना जो मात्र दोस्ती का रिश्ता होने के बावजूद भी पूरी दुनिया से तुम्हारे लिए लड़ जाया करता है तुम्हें सब से बचाता है तुमसे हमेशा गाली खाता है लेकिन तुम्हारी आंखों में कभी आंसू नहीं आने देता वही मर्द ना जो तुमसे लड़ता है झगड़ते है तुम्हें रुलाता है और फिर तुम्हें हंसाने के लिए खुद जोकर बन जाया करता है बताओ ना तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना?


सभी मर्द एक जैसे ही होते है 

कौन मर्द ??

वही मर्द जो एक बेटा बन कर हमेशा अपनी मां का ढाल बन कर खड़ा रहता है वही मर्द जिसकी हर तम्माना को पूरी करने के लिए मां रात भर जागती है और मां के बुढ़ापे में वही लड़का एक ढाल बन कर मां की सेवा करता है मां के लिए उसका बेटा ही सबसे बेहतर होता है मां के लिए उसका बेटा ही हीरो है , हां ये बात सही है कि शादी होने के बाद वही कुछ बेटे अपनी मां को घर से निकाल कर वृद्ध आश्रम में भेज देते है लेकिन उनके इस कुकर्म के लिए क्या सिर्फ मर्द ही जिमेद्दार होते है लेकिन इन सब से दूर हिंदुस्तान के आज भी हर घर में श्रवण कुमार जैसे बेटे रहते है जिनके लिए उनकी मां ही उनकी दुनिया है ,

बताओ ना क्या तुम उसी मर्द की बात कर रहीं हो जो अपनी मां के लिए जान भी देते हैं...

Friday, January 9, 2026

Raj sir Words




दोस्तों...प्रशंसा को हमेशा विनम्रता से स्वीकार करें और आलोचना पर गंभीरता से विचार करें...अगर ऊंचाई हासिल करनी है, तो बाज बनो धोखेबाज नहीं...स्वीकारना, सीखना, सुधारना और उभरना यही जीवन है। उजालों में असलियत नज़र नही आती,अंधेरा ही बता सकता है सितारा कौन है...जीवन मे हैसियत का परिचय तब देना चाहिए जब बात आत्म सम्मान की हो अन्यथा सादगी ही सबसे बड़ा परिचय होता है...कहानियों में प्रेम कुछ और है किताबों में कुछ और ये मोह को प्रेम समझने वाला चल रहा है दौर...चेहरों की नुमाइश में रूह को कौन देखता है यहाँ तो बस ज़रूरतों का खेल चल रहा है दोस्तों किताबें भरी पड़ी हैं वफ़ा के किस्सों से और बाहर बस दिल बहलाने का दौर चल रहा है। परिवर्तनो को स्वीकार करना जीवन को सहज बना देता है...जीवन में सबसे शक्तिशाली चीज़ हमारी सोच है,जो किसी भी परिस्थिति को बदलने की क्षमता रखती है। जो मनुष्य जीवन में धेर्य और संतोष को अपना साथी बना लेता है वह कभी दुखी नहीं रहता...धर्म कि दिवारें ऊंची होती जा रही है और इंसानियत उनके नीचे दबती जा रही है...कामयाबी की पहली सीढ़ी है कोशिश,कोशिश से ग़लती,ग़लती से सबक,सबक से तजुर्बा और तजुर्बे से कामयाबी मिलती है...ज़िंदगी कभी भी परफेक्ट नहीं होती...हर किसी के अपने कमियाँ होती हैं, अपनी चुनौतियाँ होती हैं, अपनी परेशानियाँ होती हैं—और अपना जीने का तरीका होता है। इसलिए खुद को दूसरों से तुलना न करें; जैसे हैं वैसे ही अच्छी तरह जीना काफ़ी है...राज Sir


दोस्त जिस हुस्न का सौदागर राज था, ओ जिस्म किसी और के हाथो बिक गया,हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी,कुछ हमारी ख़बर नहीं आती दोस्त...ये होंठ चूमने वाली प्रेमिकाएं कब समझेंगी परेशानी पुरुषों का, दोस्त प्रेम मे माथा चूमा जाता है होंठ नही...कई फोन बदले जाएंगे कई इमेल को भी बदला जाएगा,मगर पुरुषों के फोन मे प्रेमिकाओं की तस्वीरें हमेशा बरकार रहती है...जिस पर ज़हर तक असर नही करता, उन लोगो अक्सर तन्हाई मार देती है दोस्त..आत्मसम्मान पे लगे ज़ख्म,माफी की इजाजत कभी नहीं देते दोस्त....उसूलों के पक्के मर्द के लिए हुस्न माटी है,और किरदार की पक्की औरत के लिए पैसा राख दोस्त...असली परख हुस्न या दौलत से नहीं बल्कि किरदार से होती है,मजबूत उसूलों वाली शख्सियत हर चमक पर भारी होती है दोस्त...उसके भूतकाल पर विवाद क्या करना दोस्त,जिसके यादो साथ अनंत काल तक रहना हो...मुकम्मल कहां रही किसी की जिंदगी दोस्त,हर शख्स कुछ खोता ही रह गया कुछ पाने के लिए...लोगों की पहचान उनके वचन से नहीं उनके व्यवहार से होती है,अच्छे बोल सबके पास होते हैं,पर अच्छा दिल बहुत कम लोगों के पास होता है दोस्त...मैं भी नहीं अकेला हूँ दोस्त,शाम है‚ दर्द है‚ उदासी है और तेरी खूबसूरत यादें है...शिद्दत की प्यास है इस मुद्दत के प्यासे को,तरे हाथों से जो मिले तो दो बूंद ही काफी है दोस्त...चायपत्ती और पति मे क्या समानता है जानते हो दोस्त,दोनों के ही भाग्य मे जलना और उबलना लिखा है...फ़िर तेरे बाद कुछ खोया नही हमने दोस्त,तू मेरी ज़िंदगी का आखिरी नुकसान है ...हक़ीक़त की धुप में जलना मंजूर है दोस्त हमें पर,झुठ की छांव में बिकना मेरी फितरत नहीं...बदलते लोग, बदलते रिश्ते और बदलता मौसम,चाहे दिखाई ना दे मगर महसूस जरूर होते है दोस्त...जीवन में सबसे कठिन है लोगो को पहचानना, क्योंकि इंसान जैसा दिखता है वैसा होता नहीं दोस्त...अब तजुर्बा कहता है रिश्तो में फांसला रखिए ज़्यादा नजदीकियां अक़्सर दर्द से जाती हैं दोस्त...मैंने शराब और प्यार दोनों का स्वाद चखा है ,मुझ पर विश्वास कर दोस्त तेरे लिए हमेसा बेहतर थे और है...कोई क्या लगाएगा मेरे बर्दाश्त करने का अंदाजा दोस्त,मैंने मर जाने जैसा वक्त भी जी के गुजारा है...सूरत तो वह देखते हैं जिन्हें रात गुजारनी होती है दोस्त,जिंदगी गुजारने वाले सीरत देखा करते हैं...एक समझने वाला,हज़ारों चाहने वालों से बेहतर है दोस्त...कहां से लाए पक्के सबूत की तुम्हें कितना चाहते हैं.. दिल, दिमाग, नजर, सब तो तेरी कैद में है दोस्त... Raj


Have a wonderful night friends...

Thursday, January 8, 2026

दो शरीरों का मिलन

जब किसी पुरुष की ऊर्जा किसी स्त्री की ऊर्जा से गहरे सामंजस्य में मिलती है

तो कुछ ऐसा घटता है जो पारलौकिक है।

यह केवल दो शरीरों का मिलन नहीं होता —

यह दो ब्रह्मांडों का एक लय में विलय होना है।

जब यह पूर्णता से होता है, तब दोनों खो जाते हैं।

तब न पुरुष रहता है, न स्त्री;

केवल एक ऊर्जा रह जाती है — पूर्णता की ऊर्जा।


सामान्य प्रेम में तुम केवल सतह पर मिलते हो —

शरीर को छूते हो, बातें करते हो, भावनाएँ साझा करते हो —

लेकिन भीतर से अलग ही रहते हो।

जब प्रेम ध्यानमय हो जाता है, जब उसमें जागरूकता उपस्थित होती है,

तब यह मिलन दो व्यक्तियों का नहीं, दो ध्रुवों का हो जाता है।


पुरुष सूर्य की ऊर्जा लिए होता है — सक्रिय, पैठनेवाली, बाहर की ओर जानेवाली।

स्त्री चंद्रमा की ऊर्जा लिए होती है — ग्रहणशील, ठंडी, स्वागतपूर्ण।

जब ये दोनों ऊर्जा जागरूकता में मिलती हैं,

तब एक नई दिशा खुलती है — वही ईश्वर का द्वार है।


किसी पुरुष के लिए “पूर्ण स्त्री” वह नहीं जो उसकी इच्छाओं को पूरा करे,

बल्कि वह है जो उसके अस्तित्व का दर्पण बन जाए।

और किसी स्त्री के लिए “पूर्ण पुरुष” वह नहीं जो उस पर अधिकार करे,

बल्कि वह है जिसकी उपस्थिति में वह खिल सके।


पुरुष को कभी-कभी समर्पण करना सीखना होता है —

यही उसका स्त्री के माध्यम से दीक्षा है।

और स्त्री को मौन और साक्षी होना सीखना होता है —

यही उसकी पुरुष के माध्यम से दीक्षा है।


जब यह द्वंद्व नाच बन जाता है —

जब न शक्ति की लड़ाई होती है, न कोई माँग, न कोई भय —

तब उनके बीच जो ऊर्जा बहती है, वह आनंदमय, सृजनशील और प्रार्थनापूर्ण बन जाती है।

तब सेक्स अब सेक्स नहीं रहता — वह समाधि बन जाता है।

प्रेमी किसी विशालता में खो जाते हैं;

वे अस्तित्व के सार को छू लेते हैं।


“पूर्ण ऊर्जा” का मिलना किसी “पूर्ण व्यक्ति” को पाना नहीं है —

यह एक “पूर्ण अनुनाद” को पाना है।

यह किसी के साथ भी घट सकता है,

जब दोनों खुले हों, निडर हों, और उपस्थित हों।

जिस क्षण दोनों की ऊर्जाएँ एक स्वर में गूँजती हैं,

उसी क्षण तुमने दिव्य प्रिय को पा लिया।”



वासना सभी को भिखमंगा बना देती है। न कभी द्वार खुलते, न कभी भिक्षापात्र भरता। वासना सभी की आंखों को आंसुओं से भर देती है। वासना सभी के हृदय में कांटे बो देती है। वासना महादुख है।


मगर इसका यह अर्थ नहीं कि वासना का कोई उपयोग नहीं है। यही उपयोग है कि वासना तुम्हें जगाए, झंझोड़े; दुख, पीड़ा, अंधड़ उठें; और तुम चौकन्ने हो जाओ; तुम सावधान हो जाओ। वासना को देख-देख कर एक बात अगर तुम समझ लो, तो दुख का सारा सार निचोड़ लिया--कि मांगना व्यर्थ है। मांगे कुछ भी नहीं मिलता। दौड़ व्यर्थ है, दौड़कर कोई कहीं नहीं पहुंचता।


इतनी समझ आ जाए दुख में कि दौड़कर कोई कहीं नहीं पहुंचता और तुम रुक जाओ; इतनी समझ आ जाए कि मांगकर कुछ भी नहीं मिलता और तुम्हारी सब मांगें चली जाएं, तुम्हारी सब प्रार्थनाएं चली जाएं, तुम भिक्षापात्र तोड़ दो--उसी क्षण संन्यास का फूल खिल जाता है।


संन्यास का अर्थ क्या होता है? इतना ही अर्थ होता है: इस संसार में न कुछ मिलता है, न मिल सकता है। दौड़ है, आपाधापी है, खूब संघर्ष है, लेकिन संतुष्टि नहीं। जिसने यह देख लिया, जिसके भरम टूटे, जिसके सपन टूटे, जिसके ये सारे भीतर चलते हुए झूठे खयाल दुख से टकरा-टकरा कर खंडित हो गए, बिखर गए, उसको बड़ा लाभ होता है। लाभ होता है कि वह अपने में थिर हो जाता  है...

मेहनत से आगे की समझ...

खुद को प्रसिद्ध करने की कला: मेहनत से आगे की समझ


दुनिया में लाखों लोग दिन-रात मेहनत करते हैं।

कोई लिखता है, कोई गाता है, कोई पढ़ाता है, कोई व्यापार करता है।

फिर भी एक अजीब सच्चाई सामने आती है


कुछ लोग कम मेहनत में प्रसिद्ध हो जाते हैं,

और कुछ लोग जीवन भर मेहनत करके भी गुमनाम रह जाते हैं।


यह अन्याय नहीं है, यह कला और समझ का अंतर है।


केवल मेहनत क्यों पर्याप्त नहीं होती?


मेहनत तब तक अधूरी है जब तक उसमें यह सवाल न जुड़ा हो

“मैं किसके लिए कर रहा हूँ, और उन्हें अभी क्या चाहिए?”


उदाहरण 1: मेहनती लेखक बनाम समझदार लेखक


एक लेखक रोज़ 5 घंटे गहरी साहित्यिक रचनाएँ लिखता है

कठिन शब्द, जटिल विचार, भारी भाषा


दूसरा लेखक रोज़ 30 मिनट लिखता है

सरल भाषा, आज की समस्या, लोगों की भावना


परिणाम

पहला लेखक विद्वानों में सराहा जाता है,

दूसरा लेखक आम लोगों में प्रसिद्ध हो जाता है।


 कारण?

दूसरा लेखक लोगों की ज़रूरत लिखता है,

पहला लेखक अपनी विद्वता दिखाता है।


प्रसिद्धि = समस्या का समाधान + सही समय


लोग आपको तब सुनते हैं जब


वे उलझन में हों


दर्द में हों


डर में हों


या आशा ढूँढ रहे हों


उदाहरण 2: साधारण वीडियो, असाधारण प्रसिद्धि


एक व्यक्ति कैमरे के सामने बैठकर कहता है:


“अगर आज तुम्हें कोई समझ नहीं पा रहा,

तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम गलत हो।”


तकनीकी रूप से कुछ भी खास नहीं।

पर वीडियो लाखों लोग देख लेते हैं।


क्यों?


क्योंकि उसने वही कहा जो उस समय लोगों के दिल में चल रहा था।


शौंदर्य साधना का रहस्य


यहाँ शौंदर्य का मतलब केवल बाहरी सुंदरता नहीं है, बल्कि


भाषा की सुंदरता


विचार की स्पष्टता


प्रस्तुति की सादगी


और भावनाओं की सच्चाई


उदाहरण 3: दो शिक्षक


शिक्षक A:


बहुत ज्ञानी


लेकिन कठिन भाषा


छात्रों से दूरी


शिक्षक B:


सामान्य ज्ञान


लेकिन उदाहरण जीवन से


छात्रों की भाषा में बात


प्रसिद्ध शिक्षक कौन?

शिक्षक B


 क्योंकि उसने ज्ञान के साथ अनुभव बाँटा।


संवेदना को समझना: प्रसिद्धि की असली चाबी


लोग यह नहीं पूछते कि आप कितने महान हैं।

वे यह देखते हैं


“क्या यह व्यक्ति मुझे समझता है?”


उदाहरण 4: दो समाजसेवी


एक भाषण देता है

“गरीबी खत्म होनी चाहिए!”


दूसरा कहता है

“मुझे पता है, महीने के आख़िरी 5 दिन कैसे लगते हैं।”


दूसरा अधिक प्रभावी क्यों?

क्योंकि उसने अनुभव की भाषा बोली।


फालतू मुद्दों से दूरी, अपने लक्ष्य पर ध्यान


जो व्यक्ति हर बहस में कूदता है,

हर ट्रेंड पर राय देता है,

वह खुद को बिखेर देता है।


प्रसिद्ध व्यक्ति जानता है


मुझे क्या बोलना है


और क्या छोड़ देना है


उदाहरण 5: शांत व्यक्ति की पहचान


जो हर बात पर प्रतिक्रिया नहीं देता,

लोग उसकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करते हैं।


 कम बोलना + सही बोलना = प्रभाव


खुद की जागरूकता: मैं क्या कर रहा हूँ?


प्रसिद्ध होने वाला व्यक्ति


अंधाधुंध मेहनत नहीं करता


वह देखता है:


मैं क्यों कर रहा हूँ?


इसका परिणाम क्या होगा?


क्या यह मेरे लक्ष्य से जुड़ा है?


उदाहरण 6: दौड़ने वाला और दिशा जानने वाला


एक व्यक्ति तेज़ दौड़ रहा है


दूसरा धीरे चल रहा है लेकिन दिशा सही है


अंत में कौन पहुँचेगा?

 दूसरा


प्रसिद्धि का सूत्र


प्रसिद्धि का अर्थ शोर नहीं,

प्रसिद्धि का अर्थ सही जगह पर सही स्वर है।


 मेहनत ज़रूरी है

धैर्य ज़रूरी है

लेकिन साथ में चाहिए...


लोगों की जरूरत की समझ


समय की पहचान


संवेदना की गहराई


और स्वयं की स्पष्टता


जो व्यक्ति लोगों की भाषा में

उनके दर्द का समाधान बन जाता है,

वही बिना चिल्लाए प्रसिद्ध हो जाता है।

कौनसा ड्राई फ्रूट्स खाए

बहुत जरूरी है ये जानना किस बीमारी में कौनसा ड्राई फ्रूट्स खाए जरूरत के अनुसार कैसे और कब खाए ड्राई फ्रूट्स प्राकृतिक जीवन देखे उपयोग करने का तरीका सम्पूर्ण विवरण:-


1.बादाम:-


दिमाग़ की कमजोरी

याददाश्त कम होना

शारीरिक दुर्बलता

बच्चों में मानसिक विकास

कैसे सेवन करें

रात में 5–6 बादाम पानी में भिगो दें

सुबह छिलका उतारकर अच्छी तरह चबाएँ

चाहें तो 1 चम्मच शहद के साथ लें


क्यों लाभकारी

बादाम में विटामिन E, ओमेगा-3 और प्रोटीन होते हैं, जो मस्तिष्क व नसों को मज़बूत करते हैं।


2️⃣ काजू:-

किस बीमारी में लाभकारी

अत्यधिक कमजोरी

कम वजन

थकान

कैसे सेवन करें

3–4 काजू सुबह नाश्ते के साथ

या हल्का भूनकर

❌ कब न लें

मोटापा, शुगर और उच्च कोलेस्ट्रॉल में अधिक सेवन न करें।


3️⃣ अखरोट:-

किस बीमारी में लाभकारी

हृदय रोग

तनाव, चिंता

ब्रेन हेल्थ

कैसे सेवन करें

1–2 अखरोट सुबह खाली पेट

क्यों

अखरोट में ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है, जो दिल और दिमाग दोनों के लिए श्रेष्ठ है।


4️⃣ पिस्ता:-

किस बीमारी में लाभकारी

कमजोरी

आँखों की थकान

रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना

कैसे सेवन करें

6–8 पिस्ता दिन में कभी भी

बेहतर है भिगोकर या हल्का भूनकर


5️⃣ किशमिश:-

किस बीमारी में लाभकारी

कब्ज

खून की कमी

पेट की कमजोरी

कैसे सेवन करें

10–15 किशमिश रात को भिगोकर

सुबह पानी सहित सेवन करें


6️⃣ काली किशमिश:-

किस बीमारी में लाभकारी


एनीमिया


चक्कर आना


महिलाओं में कमजोरी


कैसे सेवन करें


8–10 काली किशमिश भिगोकर सुबह


7️⃣ खजूर:-

किस बीमारी में लाभकारी


अत्यधिक कमजोरी


कम रक्तचाप


प्रसव के बाद कमजोरी


कैसे सेवन करें


1–2 खजूर गुनगुने दूध के साथ


❌ मधुमेह में न लें


8️⃣ अंजीर:-

किस बीमारी में लाभकारी


पुरानी कब्ज


बवासीर


पेट की सूजन


कैसे सेवन करें


2 अंजीर रात को भिगोकर


सुबह खाली पेट


9️⃣ सूखी खुबानी:-

किस बीमारी में लाभकारी


खून की कमी


त्वचा रोग


कमजोरी


कैसे सेवन करें


2–3 खुबानी भिगोकर सुबह


🔟 मूंगफली:-

किस बीमारी में लाभकारी


कमजोरी


सर्दी में ऊर्जा


कैसे सेवन करें


भुनी हुई 1 मुट्ठी


❌ एसिडिटी व एलर्जी में न लें


1️⃣1️⃣ सूखा नारियल:-

किस बीमारी में लाभकारी


शरीर में रूखापन


कमजोरी


कैसे सेवन करें


1–2 छोटे टुकड़े दिन में


1️⃣2️⃣ मखाना:-

किस बीमारी में लाभकारी


मधुमेह


हृदय रोग


गर्भावस्था में कमजोरी


कैसे सेवन करें


घी में हल्का भूनकर 1 कटोरी


1️⃣3️⃣ हेज़लनट:-

किस बीमारी में लाभकारी


हृदय व नसों की कमजोरी


कैसे सेवन करें


3–4 दाने सुबह


1️⃣4️⃣ ब्राज़ील नट:-

किस बीमारी में लाभकारी


थायरॉयड


कैसे सेवन करें


सप्ताह में 2–3 बार केवल 1 दाना


1️⃣5️⃣ मैकाडेमिया नट:-

किस बीमारी में लाभकारी


हृदय स्वास्थ्य


कैसे सेवन करें


2–3 दाने

❌ अधिक मात्रा से वजन बढ़ता है


1️⃣6️⃣ पाइन नट:-

किस बीमारी में लाभकारी


कमजोरी


यौन दुर्बलता


कैसे सेवन करें


1 चम्मच सुबह


1️⃣7️⃣ सूखी क्रैनबेरी:-

किस बीमारी में लाभकारी


मूत्र संक्रमण (UTI)


कैसे सेवन करें


1 छोटा चम्मच


1️⃣8️⃣ सूखी ब्लूबेरी:-

किस बीमारी में लाभकारी


आँखों की कमजोरी


एंटीऑक्सीडेंट की कमी


कैसे सेवन करें


1 चम्मच दिन में


1️⃣9️⃣ प्रून्स (सूखा आलूबुखारा):-

किस बीमारी में लाभकारी


गंभीर कब्ज


कैसे सेवन करें


2–3 भिगोकर सुबह


2️⃣0️⃣ अंजीर स्लाइस:-

किस बीमारी में लाभकारी


कब्ज


हड्डियों की कमजोरी


कैसे सेवन करें


2–3 स्लाइस भिगोकर

Wednesday, January 7, 2026

कौनसा तेल है लाभकारी

किस शारीरिक व्याधि में कौनसा तेल है लाभकारी,कैसे और किस तेल का सेवन है स्वास्थ्यवर्धक,देखे डिटेल...


❤️ हृदय रोग (Heart Disease)

लाभकारी तेल:जैतून तेल,सरसों तेल,अलसी का तेल 

सेवन विधि:

भोजन बनाने में 1–2 चम्मच प्रतिदिन

सलाद या सब्ज़ी में कच्चा उपयोग अधिक लाभकारी


🍬 मधुमेह (डायबिटीज)

लाभकारी तेल:नारियल तेल, मूंगफली तेल,सरसों का तेल

सेवन विधि:

तले भोजन से बचें

हल्की आँच पर बना भोजन, दिन में 1–2 चम्मच


🦴 जोड़ों का दर्द / गठिया

लाभकारी तेल:तिल का तेल,सरसों का तेल,अरंडी का तेल

सेवन/उपयोग:

बाहरी मालिश प्रतिदिन

अरंडी तेल ½ चम्मच गुनगुने दूध के साथ (सप्ताह में 2–3 बार)


🧠 तनाव व अनिद्रा

लाभकारी तेल:नारियल तेल,बादाम तेल 

उपयोग:

सिर की मालिश रात में

बादाम तेल 1 चम्मच गुनगुने दूध के साथ


🔥 पाचन समस्या व कब्ज

लाभकारी तेल:अरंडी तेल,जैतून का तेल

सेवन विधि:

अरंडी तेल ½–1 चम्मच रात को (डॉक्टर की सलाह से)

जैतून तेल सलाद या भोजन में


🧴 त्वचा रोग

लाभकारी तेल:नीम का तेल,नारियल तेल 

उपयोग:

प्रभावित स्थान पर दिन में 1–2 बार

नीम तेल को नारियल तेल में मिलाकर लगाएँ


🩸 उच्च रक्तचाप

लाभकारी तेल:जैतून तेल,अलसी तेल 

सेवन विधि:

1–2 चम्मच प्रतिदिन

नमक कम रखें, तेल सीमित मात्रा में लें


🧠 स्मरण शक्ति व मस्तिष्क कमजोरी

लाभकारी तेल:अखरोट का तेल,ब्राह्मी तेल

उपयोग विधि:

अखरोट तेल 1 चम्मच सुबह खाली पेट

ब्राह्मी तेल से रात में सिर की मालिश


👁️ आँखों की कमजोरी

लाभकारी तेल:बादाम तेल,अरंडी का तेल

सेवन/उपयोग:

बादाम तेल 1 चम्मच दूध के साथ

अरंडी तेल की 1 बूँद आँखों के चारों ओर (आँख के अंदर नहीं)


🩺 यकृत (लिवर) रोग

लाभकारी तेल:जैतून का तेल,अलसी तेल 

सेवन विधि:

भोजन में 1–2 चम्मच

तले भोजन से परहेज़


🤧 सर्दी-खाँसी व जुकाम

लाभकारी तेल:सरसों का तेल,नीलगिरी का तेल

उपयोग:

सरसों तेल में लहसुन डालकर छाती पर मालिश

नीलगिरी तेल की भाप


🦷 दाँत व मसूड़ों की समस्या

लाभकारी तेल:लांग का तेल,तिल का तेल 

उपयोग:

लौंग तेल की 1 बूँद दर्द वाले दाँत पर

तिल तेल से ऑयल पुलिंग (कुल्ला)


👩‍🦰 बाल झड़ना व रूसी

लाभकारी तेल:

नारियल का तेल

अरंडी का तेल

आँवला तेल

उपयोग:सप्ताह में 2–3 बार सिर की मालिश

नारियल + अरंडी तेल मिलाकर अधिक लाभ


🩸 एनीमिया (खून की कमी)

लाभकारी तेल:

तिल का तेल

मूंगफली का तेल

सेवन विधि:

भोजन में सीमित मात्रा

आयरन युक्त आहार के साथ लें


अधिक मात्रा में सेवन हानिकारक हो सकता है

Sunday, January 4, 2026

प्रेम की भावना और समझ...

 प्रेम: भावनाओं का जाल या समझ का रिश्ता?


आज के समय में प्रेम को बहुत गलत तरीके से समझ लिया गया है।

शुरुआत में कहा जाता है

“तुम जैसे कोई नहीं”,

“तुम ही सबसे अच्छे हो।”


लेकिन कुछ समय बाद वही शब्द बन जाते हैं

“तुम जैसे किसी को चाहना भी गलती थी”,

“तुम बहुत बुरे हो।”


यहीं से सवाल पैदा होता है

क्या यह सच में प्रेम था, या सिर्फ भावनाओं का नशा?


भावनाओं पर टिका प्रेम क्यों टूट जाता है?


आज ज़्यादातर रिश्ते भावनाओं की तेजी में शुरू होते हैं,

न कि समझ और धैर्य से।


जब तक सब ठीक चलता है


बातें मीठी लगती हैं


कमियाँ नज़र नहीं आतीं


भविष्य बहुत सुंदर दिखता है


लेकिन जैसे ही ज़िंदगी की सच्चाई सामने आती है


ज़िम्मेदारियाँ


पैसों की चिंता


परिवार का दबाव


सोच का अंतर


तब वही रिश्ता कमजोर पड़ने लगता है।


ब्रेकअप के बाद दर्द इतना क्यों होता है?


क्योंकि लोग इंसान से कम,

अपनी उम्मीदों से ज़्यादा जुड़ जाते हैं।


“हमेशा साथ रहेंगे”


“तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूँ”


जब रिश्ता टूटता है,

तो सिर्फ इंसान नहीं जाता,

पूरा सपना टूट जाता है।


इसीलिए दर्द इतना गहरा होता है।


क्या ज़्यादातर प्रेम ट्रॉमा बन जाते हैं?


सच कड़वा है, लेकिन सच है

बिना समझ के किया गया प्रेम अक्सर दर्द छोड़ जाता है।


जहाँ...


बात कम और शक ज़्यादा हो


समझ कम और अधिकार ज़्यादा हो


सच से ज़्यादा दिखावा हो


वहाँ प्रेम धीरे-धीरे बोझ बन जाता है।


ऐसे रिश्तों में

भावनाओं से झूठ का महल बनाया जाता है,

जो सच्चाई की एक हवा में गिर जाता है।


सच्चा प्रेम कैसा होता है?


सच्चा प्रेम


धीरे-धीरे बढ़ता है


सवाल पूछने की आज़ादी देता है


मतभेद में भी सम्मान बनाए रखता है


और सबसे ज़रूरी

अलग होने पर भी इंसान को तोड़ता नहीं


जहाँ प्रेम होता है,

वहाँ इंसान खुद को खोता नहीं,

बल्कि और समझदार बनता है।


प्रेम गलत नहीं है,

गलत है उसे सिर्फ भावनाओं का खेल समझ लेना।


जब प्रेम में

समझ, धैर्य और सच्चाई नहीं होती,

तो वह

खुशी से ज़्यादा घाव देता है।


इसलिए प्रेम करें

दिल से ज़रूर करें,

लेकिन आँख बंद करके नहीं।


Wednesday, December 31, 2025

Happy new year 2026





Friends change your desire & direction into decision because action is more important than efforts...


The first step to success is action since action leads to mistakes,mistakes lead to lessons,lessons lead to experience,and experience leads to success.


Life is never perfect. Everyone has their own shortcomings, their own challenges, their own problems—and their own way of life. So don't compare yourself to others, living well as you are is enough.


लोगों से प्रेम करना, उनकी सेवा करना, उन्हें सशक्त बनाना और उन्हें प्रोत्साहित करने का नाम ही जीवन है। जीवन में आनन्द को कर्तव्य बनाने की अपेक्षा कर्तव्य को आनन्द बनाना अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। यह बिल्कुल सत्य है कि साझा की गई प्रसन्नता दुगनी हो जाती है एवं साझा किया गया दुख आधा हो जाता है...


स्त्री और पुरुष दोनों ही मनुष्य हैं,दोनों की भावनाएँ हैं दोनों की सीमाएँ हैं। जो रिश्ता समझ, संवाद और सम्मान पर टिकता है, वही रिश्ता जीवन को सहज, सुरक्षित और सार्थक बनाता है...पर इन दोनों बिच एक सक का दायरा होता है जो इनको एक दूसरे हद से ज़्यदा प्यार और बाते करने से रोकता...स्त्री के प्रति किया गया उम्मीद पुरुष का दिलसा होता है...और जब ये रुट टूट जाता है तब पुरुष पागपन का शिकार हो जाता है और स्त्री अनकही जिंदिगी जीने की शुरुआत कर देती है...


In the last, I want revise my own written quotation... Friends...Our mind made computer...Computer did not make our mind becouse a computer has limit of storage but our mind has no limitation of data so accelerat your mind as per your acceleration...mind on this point... Update mind is superior to prepared mind... Program your planing and work on your planing...Your wishes & desires will be in your foots...


शुक्रिया मेरे यारों तहे दिल से इस गुजरते हुए साल के तरफ से...


शुक्रिया उन लोगों का जिन्होंने मुझे नफरत दी,

क्योंकि उनकी वजह से मैंने खुद को और मजबूत किया...


शुक्रिया उन लोगों का जिन्होंने मुझसे प्यार किया,

क्योंकि उनके प्यार ने मेरे दिल को विशाल बना दिया...


शुक्रिया उन लोगों का जो मेरे लिए परेशान हुए और मुझे,एहसास दिलाया कि मेरी कदर की जाती है...


शुक्रिया उन लोगों का जिन्होंने मुझे छोड़ दिया, क्योंकि

उन्होंने मुझे यह सिखाया कि हर चीज़ अधूरी नहीं होती.


शुक्रिया उन लोगों का जो मेरी जिंदगी का हिस्सा बने,

और मुझे वो ताकत दी, जो कभी मैंने सोचा भी नहीं था...


शुक्रिया सबसे ज्यादा उस वक्त का,जब मैंने मुश्किलों का सामना किया और कुछ नया सीखा...


Wish you all My FB friens & Family members very very Happy new Year...

स्त्री और पुरुष का रिश्ता...

मानव संबंधों में सबसे बड़ी गलतफहमी यह होती है कि हम सामने वाले को बदलने की कोशिश करने लगते हैं, बजाय उसे समझने के। खासकर स्त्री–पुरुष संबंधों में यह टकराव अक्सर देखने को मिलता है।


कोई भी महिला अपने घमंड, अकड़, दबाव या ज़बरदस्ती से किसी पुरुष को लंबे समय तक बाँध नहीं सकती। ऐसा इसलिए नहीं कि वह कमजोर है, बल्कि इसलिए कि मानव मन स्वभाव से नियंत्रण का विरोध करता है।

जहाँ दबाव होता है, वहाँ अपनापन नहीं टिकता।


दबाव से व्यवहार नहीं, केवल प्रतिक्रिया पैदा होती है


व्यवहार परिवर्तन सहमति से होता है, मजबूरी से नहीं।


जब किसी व्यक्ति पर लगातार आदेश, ताना, तुलना या भावनात्मक दबाव डाला जाता है, तो वह या तो:


भीतर से टूट जाता है


या बाहर से चुप होकर भीतर विद्रोही बन जाता है


दोनों ही स्थितियाँ रिश्ते को खोखला कर देती हैं।


प्रकृति का उदाहरण : पेड़ और रस्सी


प्रकृति हमें बहुत सरल भाषा में गहरे सत्य सिखाती है।


यदि किसी पेड़ को सीधा करना हो और आप उसे रस्सी से ज़ोर से बाँध दें

तो या तो:

पेड़ टूट जाएगा


या रस्सी हटते ही पहले से अधिक टेढ़ा हो जाएगा


लेकिन यदि आप उसे समय, सहारा और सही दिशा दें तो वही पेड़ बिना टूटे, स्वाभाविक रूप से सीधा बढ़ता है।


मानव मन भी ठीक ऐसा ही है।


पुरुष मन की सामाजिक संरचना


पुरुषों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी कठोर, भावनाओं को दबाने वाला, और मज़बूत दिखने वाला बनना सिखाया गया है।

उन्हें सिखाया गया:


रोना कमजोरी है


डर दिखाना गलत है


झुकना हार है


इसलिए कई पुरुष अपनी भावनाएँ ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते।

यह कमी नहीं, बल्कि सिखाया गया व्यवहार है।


समझ और सम्मान मिलने पर बदलाव संभव है


जब किसी पुरुष को:


समझदारी से प्यार मिले


बिना अपमान के संवाद मिले


और बिना डर के अपनी बात कहने की जगह मिले


तो उसका व्यवहार बदल सकता है।

वह अधिक संवेदनशील, ज़िम्मेदार और सहयोगी बन सकता है।


क्योंकि तब वह रिश्ते में सुरक्षित महसूस करता है, न कि नियंत्रित।


दबाव क्यों असंभव है?


जो महिला पुरुष को दबाकर अपने अनुसार ढालना चाहती है, वहाँ समस्या केवल रिश्ते की नहीं होती, बल्कि सामाजिक यथार्थ की भी होती है।


भले ही पुरुष में कुछ कमियाँ हों,

लेकिन समाज उसे ताकत, स्वतंत्रता और विकल्प देता है।


इसलिए:-

दबाया गया पुरुष अक्सर दूरी बना लेता है


या बाहर से झुककर भीतर से कट जाता है

दोनों ही स्थितियों में रिश्ता जीवित नहीं रहता।


जीवन जीना है तो…


जीवन चलाने के लिए:


शक्ति नहीं, संतुलन चाहिए


अधिकार नहीं, सम्मान चाहिए


नियंत्रण नहीं, सहयोग चाहिए


रिश्ते प्रतियोगिता नहीं होते, जहाँ किसी एक को जीतना हो।

वे साझेदारी होते हैं, जहाँ दोनों का बढ़ना ज़रूरी होता है।


कोई भी इंसान दबाव में बदलता नहीं, केवल टूटता है


प्रेम का अर्थ नियंत्रण नहीं, स्वीकार है


समझ से मिला सम्मान व्यक्ति को बेहतर बनाता है डर से पैदा हुआ साथ कभी स्थायी नहीं होता


स्त्री और पुरुष

दोनों ही मनुष्य हैं,

दोनों की भावनाएँ हैं,

दोनों की सीमाएँ हैं।


जो रिश्ता समझ, संवाद और सम्मान पर टिकता है, वही रिश्ता जीवन को सहज, सुरक्षित और सार्थक बनाता है।


स्त्री और पुरुष के प्रेम का सबसे सुंदर स्वरूप है,

स्त्री के सपनों के लिए संघर्ष करता हुआ पुरुष और,

पुरुष के बुरे वक्त में साथ खड़ी रहती स्त्री.. 


Tuesday, December 30, 2025

प्रेम के लक्षण

 प्रेम के लक्षण...


*तुम महसूस कर सकते हो कि तुम प्रेम में हो 

लेकिन लक्षण बताते हैं कि तुम प्रेम में नहीं हो..

प्रेम में होने के लक्षण क्या....? 

तीन लक्षण हैं-*


पहला लक्षण है 

#परिपूर्ण_संतोष_____

 जिसमें कुछ और की जरूरत नहीं रहती 

परमात्मा तक की जरूरत नहीं रहती,

क्योंकी तुम जीसे प्रेम करते हो 

तुम्हारे लिये वो ईश्वर हो जाता है,,

तुम उसके ही खयालों में मदमस्त रहते हो...!!!


दूसरा लक्षण है कि

#इसमें_भविष्य_नहीं_है____

प्रेम का यह एक क्षण शास्वत के समान है,,

 इसमें दूसरा क्षण नहीं, 

भविष्य नहीं ,कोई कल नहीं है....

प्रेम वर्तमान में घटित हो रहा है....!!!!!


और तीसरा लक्षण है-कि

#प्रेम_में_तुम_समाप्त_हो_जाते_हो____

तुम अब तुम नहीं रहते हो और 

अगर तुम अब भी तुम हो, 

तुम्हें जीने के लिये दुसरों का साथ चाहिए,,

तुम दुसरों के लिये प्रेम को इंतजार कराने लगाते हो,,

तुम्हें प्रेम से ज्यादा महत्व दुसरों को देना लगता है,,

 तो सच मानिये तुमने प्रेम के मंदिर में 

प्रवेश नहीं किया है,,,

तुम प्रेम होने का दिखावा कर रहे हो--

तुम प्रेम का खेल खेल रहे हो--

तुम यह सब करते हो तो यह सच है

तुम ईश्वर को धोखा दे रहे हो-----!!!!!


प्रेम तब परखा जाता है जब कठिनाइयाँ आती हैं, जब अंतर उभरते हैं, जब दूरियाँ बढ़ती हैं, जब थकावट सवार होती है, और जब कमियाँ स्पष्ट होती हैं। प्रेम तब सिद्ध होता है जब इन सभी के बावजूद, आप फिर भी उसी व्यक्ति को चुनते हैं—बार-बार।


प्रेम सिर्फ उन सुंदर क्षणों में नहीं होता, जब सब कुछ सुहावना होता है, जब हम मुस्करा रहे होते हैं, और जब जीवन सहज और सही चल रहा होता है। क्योंकि जब आप सफल होते हैं, आकर्षक होते हैं, और समृद्ध होते हैं, तो कोई भी आपका साथ दे सकता है।


लेकिन हर कोई आपके कमजोर होने पर, आपके दुखी होने पर, और आपके चिड़चिड़े पलों में आपका साथ नहीं देता।


हर कोई, जब आप झगड़े के बाद सुलह करने के लिए दौड़ते हैं, सिर्फ इसलिए नहीं कि वे आपको खोने से डरते हैं, ऐसा नहीं करते।


हर कोई, भले ही आप दोषी हों, सिर्फ रिश्ते की कोमलता को बनाए रखने के लिए, आपको सांत्वना देने के लिए सामने नहीं आता।


हर कोई, जब आपकी सारी कमियाँ सामने आ जाती हैं, तब भी आपको चुनने की ज़िद नहीं करता—जब तक कि वे आपको पूरी तरह से दिल से नहीं चाहते।


सच्चा प्रेम वह है जो हर रोज़ की वास्तविकताओं के बीच, बिना किसी दिखावे के, आपको वैसे ही अपनाता है जैसे आप हैं।


प्रेम की असली परीक्षा तब होती है जब सब कुछ बिखरने लगता है, फिर भी आप एक-दूसरे को पकड़कर रखते हैं।


जब, हर कठिनाई के बावजूद, आप एक साथ खड़े रहते हैं—तब आपको सच्चे प्रेम का अर्थ वास्तव में समझ में आता है।


वेदों में वर्णित स्त्री के तीन स्वरूप

वेदों में वर्णित स्त्री के तीन स्वरूप


वेदों तथा शास्त्रों में स्त्री के तीन स्वरूप दर्शाएँ गए है ये है:- कन्या, वधू या पत्नी तथा देवी या माता ।


कन्या के रूप में स्त्री


कन्या का धात्वर्थ है प्रकाशमान, प्रख्यात तथा जाज्वल्यमान । स्त्री को बाल्यावस्था में इस नाम से पुकारने का अभिप्राय यही है कि उसे उन सब गुणों को प्राप्त करना चाहिए जो उसे प्रत्येक कार्यक्षेत्र में या समाज में आभायुक्त बनाएं । शारीरिक दृष्टि से उसे अपने शरीरी को बलिष्ठ और स्वस्थ बनाना चाहिए जिससे उसका शारीरिक बल और सौन्दर्भ प्रस्फुटित हो । साथ ही उसके अंग-प्रत्यंग न केवल सुडौल एवं स्वस्थ हों अपितु वह सुशिक्षित भी होनी चाहिए जिससे कि उसका ज्ञान और बुद्धिचातुर्य उसे मानसिक रुप से प्रकाशमान और आकर्षक बनाएं ।


विविध शिल्प और कलाकौशल में भी वह पारंगत होनी चाहिए जिससे कि उसकी सृजनात्मक शक्ति विकसित हो जाये । शारीरिक सौष्ठव और अध्यात्मिक गुणों से सम्पन्न होने पर उसका सांसारिक जीवन पूर्ण होता है । इन सबके अतिरिक्त उसे आत्म संयम, सादगी, पवित्रता, त्याग और तपस्या का जीवन यापन करना होता है । इस प्रकार उच्च, पवित्र नैतिक गुणों के आत्मसात करने पर ही वह अपने श्रेष्ठ आचरण और चरित्र का प्रकाश फैला सकती है । वेद उसी लड़की को कन्या की संज्ञा देता है जो शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक दृष्टि से पूर्ण विकसित होती है और तभी अपने लिए पति को चुनने के लिए उसे वेद अधिकृत करते है । 


यह एक विडम्बना है कि स्त्री के पूर्ण विकास और शिक्षा के लिए वेद के इस सुस्पष्ट आदेश के होते हुए वह शिक्षा तथा ज्ञान प्राप्ति से वंचित रखी गई और स्वभावतः उसे सामाजिक प्रतिष्ठा से भी वंचित किया गया । कारण राजनीति व सामाजिक हो सकते हैं। इसलिए स्त्री शुद्रो नाधीयाताम जी वाक्य घड़े गए है । शायद यह कदम बाह्य आक्रमणों के बाद देश में व्याप्त विदेशी संस्कृति से सीधे संपर्क और उसके दुष्प्रभाव से स्त्रियों को दूर रखने की आवश्यकता का धोतक हो । 


उनका तर्क था कि इस भांति अपनी स्त्रियों को विदेशी प्रभाव से मुक्त रखकर वे अपनी संतति को विदेश संस्कृति के दुष्प्रभाव से बचा सकेंगे । यह तर्क सारहीन न था । जबसे यूरोपियन ढंग पर शिक्षा दी गई है , तब से वर्तमान पीढ़ी, जिसमें लड़कियां भी सम्मिलित हैं, पाश्चात्याभिमुखा एवं अभारतीय हो गयी है ।


वधू के रूप में नारी


जैसा कि ऊपर कहा गया है, कन्या को अपने जीवन साथी को चुनने का जन्मसिद्ध अधिकार है और यह अधिकार वेद प्रतिपादित है, यही कारण था कि प्राचीन काल में स्वयंवर, स्त्री के नाम से संबोधित होते थे पुरुष के नाम से नहीं, यथा सीता स्वयंवर, द्रौपदी स्वयंवर आदि । यह बात ध्यान देने योग्य है की स्त्री का यह जन्मसिद्ध अधिकार पश्चिम के उन वर्गों में भी जो आर्य वंश के कहे जाते हैं, आज भी मूल रूप में पाया जाता है।


वहां विवाह का प्रस्ताव पुरुष की ओर से आना अनिवार्य है जबकि लड़की का यह अधिकार होता है कि वह उसे स्वीकार करें या ना करे । यद्यपि स्त्री अपने जीवन साथी को चुनने के अधिकार का उपयोग करती थी तथापि माता-पिता के परिपक्व और बुद्धिसंगत अनुभव द्वारा उसका सैदव मार्गदर्शन होता था । पुत्री को मनोनीत पति के हवाले कर देने की प्रथा आज भी पाश्चात्य देशों में प्रचलित है । यह प्रथा या रिवाज वेद से ग्रहण किया गया है । (ऋग्वेद (1-124-3) का कथन है :-


                          " एषा दिव: दुहितायै"


जिस प्रकार सूर्य प्रात:काल अपनी पुत्री उषा को विविध चमकदार रंगों से विभूषित करके संसार को अर्पण करता है उसी प्रकार पुत्री विवाह के समय माता-पिता द्वारा वस्त्राभूषण से अलकृत करके, वर को अर्पित की जाती है ।


स्त्री पत्नी के रूप में


प्राचीनकाल में भारत में विवाह दो व्यक्तियों के मध्य कतिपय आर्थिक सिद्धांतों पर अवलम्बित सौदा न था । यह पवित्र बंधन है जो स्त्री पुरुष को स्थाई बंधन में बांधता है । यह भिन्न रूप के दो जलों के सम्मिश्रण के समान है । यह दो ह्रदयों का मिलन है । विवाह के समय दोनों निम्न लिखित मंत्रो का उच्चारण करते है :-


              यत् एतद् ह्रदयं तव, तदस्तु ह्रदयं मम ।

              यदिदं ह्रदयं मम, तदस्तु ह्रदयं तव ।।


वर अपनी को पति कहता है और वधू अपने को पत्नी कहती है। इससे गृहस्थ में दोनों के कार्य विभाजन का बोध होता है।

विवाह शब्द का अर्थ है, श्रेष्ठम क्षमताओं के साथ निर्वाह करना । यह शब्द एक बड़े सामाजिक सिद्धांत का भी धोतक है । इसका अभिप्राय: यह है कि उद्देश्य विशेष की पूर्ति के लिए कोई अपने को विवाह-बंधन में बांधता है। यह उद्देश्य न केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक लाभ से सम्बद्ध हैं, अपितु यह समाज देश और मानव जाती के प्रति कर्तव्यों के बोध से सन्निहित होता है ।


वेदों की शिक्षा के अनुसार विवाह-प्रथा की स्थापना मात्र रीति-रिवाज व आत्म-समृद्धि के लिए नहीं वरन सामाजिक दायित्वों की पूर्ति के लिए हुई है, जिसमें स्त्री को समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका से गुरुतर होती है । घर वह इकाई है जिससे सामाजिक व्यवस्था प्रसारित होती है । गृहस्थ की सुव्यवस्था स्त्री के हाथ में थी । वह घर के शासन करती थी इसलिए वह गृह स्वामिनी कहलाती थी । महाभारत के निम्नलिखित शलोकों में इस नियम तथा घर में स्त्री के पद का बड़ी सुन्दरता से वर्णन किया है ।


                        न गृहं गृहमित्याहु:।

                                       गृहिणी गृहमुच्यते ।।


स्त्री के बिना पुरुष आधा होता है । उसका दूसरा आधा भाग स्त्री होती है। इसलिए वह अर्द्धांगिनी कहलाती है ।


स्त्री माता के रूप में


विविध धर्म शास्त्रों में असंख्य आख्यान और उपदेश पाए जाते है जो इस धारणा की पुष्टि करते है कि स्त्री पूरक, प्रेरक शक्ति, एवं समृधि की निर्माता है, अत: न तो परिवार में और न समाज में उसकी अवहेलना होनी चाहिए ।


प्राचीन भारत में वेदों की आज्ञानुसार, माता-पिता की कामवासना की तृप्ति के फलस्वरूप संतान पैदा नहीं की जाती थी । बच्चा सदा मनचाहा होता था । पौधा भूमि और बीज की उपज होता है । अच्छी फसल के लिए अच्छी भूमि और अच्छा बीज आवश्यक होता है । वेद में माता की तुलना भूमि से और पिता की तुलना बीज से की गई है । स्वस्थ बुद्धिमान और धर्मात्मा संतान की प्राप्ति के लिए माता और पिता दोनों का योग्य होना आवश्यक है । दोनों को ही, विशेषत: माता को सुसन्तति प्राप्ति की आशा-पूर्ति के लिए पवित्र जीवन यापन की सलाह दी गई है । मनुस्मृति में मनु महाराज कहते है कि :-


             स्वां प्रसूतिम् चरित्रं च कुलं आत्मानमेव च ।

             स्वयं च धर्म प्रयत्नेन जाया रक्षन् हि रक्षति ।।

             पतिर्भार्यां: संप्रविश्य, गर्भों भूत्वेह जायते ।

             जायायास्तद्वि जायात्वं यदस्यां जायते पुन: ।


मनु महाराज कहते है कि पुरुष पत्नी के माध्यम से अपना ही पुनर्निर्माण करता है कि बालक अपने माता पिता के लिए दर्पण का कार्य करते है। उसी के माध्यम से वे जान सकते हैं कि वे किस तरह कार्य करता है । उसी के माध्यम से वे जान सकते है की वे किस प्रकार के व्यक्ति हैं । इस प्रकार स्त्री अपने पति को एवं स्वयं को पहचानने में सहायता प्रदान करती है । 


इसलिए हमारे प्राचीन प्रजनन शास्त्रियों ने स्त्री के आचार-विचार, व्यवहार, पवित्रता एवं शील पर अधिक बल दिया है । इसी सिद्धांत में आस्था रखने के कारण अर्जुन ने महाभारत में उल्ल्लिखित महायुद्ध के दुष्परिणामों के विषय में अपनी चिंता से श्रीकृष्ण को अवगत किया था । उस महान युद्ध में पुरुषों के बहु संख्या में मारे जाने से नियंत्रक तत्वों का लोप हो जायेगा और प्राय: सभी सामाजिक व्यवस्था तत्वों का लोप हो जायेगा और प्राय: सभी सामाजिक व्यवस्था, पारिवारिक मान्यताएं एवं परम्पराएँ छिन्न-भिन्न हो जाएँगी ।


इससे स्त्रियों के भ्रष्ट, और दुराचारिणी होने की आशंका रहेगी, वंश परम्परागत दूषित हो जाएगी । बाद में ऐसे उच्च सामाजिक ढांचे, राष्ट्रीय चरित्र और संस्कृति को नष्ट कर देंगे । अर्जुन की दृष्टि में इस प्रकार के महान युद्धों से सामाजिक अराजकता उत्पन्न होती है और ये अक्षम्य पाप होते है । दुसरे शब्दों में अर्जुन नारी को वंशानुगत विशेषताओं और एकता का आधार तथा राष्ट्र के सामाजिक ढांचे को बनाये रखने वाली समझते थे । इन्ही कारणों से हमारे शास्त्रों में नारी की देवी के रूप में आराधना की गई है ।

मैं खुश हूं

  मैं खुश हूं...


एक महिला की आदत थी कि वह हर रोज सोने से पहले, अपनी दिन भर की खुशियों को एक काग़ज़ पर, लिख लिया करती थी... एक रात उन्होंने लिखा :


मैं खुश हूं, कि मेरा पति पूरी रात, ज़ोरदार खर्राटे लेता है, क्योंकि वह ज़िंदा है और मेरे पास है. ये ईश्वर का, शुक्र है...


मैं खुश हूं, कि मेरा बेटा सुबह सबेरे इस बात पर झगड़ा करता है, कि रात भर मच्छर- खटमल सोने नहीं देते. यानी वह रात घर पर गुजारता है, आवारागर्दी नहीं करता. ईश्वर का शुक्र है..


मैं खुश हूं, कि हर महीना बिजली, गैस, पेट्रोल, पानी वगैरह का, अच्छा खासा टैक्स देना पड़ता है. यानी ये सब चीजें मेरे पास, मेरे इस्तेमाल में हैं. अगर यह ना होती तो ज़िन्दगी कितनी मुश्किल होती ? ईश्वर का शुक्र है...


मैं खुश हूं, कि दिन ख़त्म होने तक, मेरा थकान से बुरा हाल हो जाता है. यानी मेरे अंदर दिन भर सख़्त काम करने की ताक़त और हिम्मत, सिर्फ ईश्वर की मेहर से है...


मैं खुश हूं, कि हर रोज अपने घर का झाड़ू पोछा करना पड़ता है, और दरवाज़े-खिड़कियों को साफ करना पड़ता है. शुक्र है, मेरे पास घर तो है. जिनके पास छत नहीं, उनका क्या हाल होता होगा ? ईश्वर का, शुक्र है...


मैं खुश हूं, कि कभी कभार, थोड़ी बीमार हो जाती हूँ. यानी मैं ज़्यादातर सेहतमंद ही रहती हूं. ईश्वर का शुक्र है..


मैं खुश हूं, कि हर साल त्यौहारों पर तोहफ़े देने में पर्स ख़ाली हो जाता है. यानी मेरे पास चाहने वाले, मेरे अज़ीज़, रिश्तेदार, दोस्त, अपने हैं, जिन्हें तोहफ़ा दे सकूं. अगर ये ना हों, तो ज़िन्दगी कितनी बेरौनक हो..? ईश्वर का शुक्र है...


मैं खुश हूं, कि हर रोज अलार्म की आवाज़ पर, उठ जाती हूँ. यानी मुझे हर रोज़, एक नई सुबह देखना नसीब होती है. ये भी, ईश्वर का ही करम है..


जीने के इस फॉर्मूले पर अमल करते हुए, अपनी और अपने लोगों की ज़िंदगी, सुकून की बनानी चाहिए. छोटी या बड़ी परेशानियों में भी, खुशियों की तलाश करिए, हर हाल में, उस ईश्वर का शुक्रिया कर, जिंदगी खुशगवार बनाएं..!!!