"विचारों का बाज़ार और ऊर्जा का घर"
कभी बैठकर अपने मन को देखिए।
न उसे रोकिए, न समझाइए, न बदलने की कोशिश कीजिए।
बस देखिए।
आप पाएँगे कि आपके भीतर एक पूरा बाज़ार लगा हुआ है।
कोई पुरानी घटना अपनी दुकान खोले बैठी है।
कोई अधूरी इच्छा आवाज़ लगा रही है।
कोई भविष्य का डर ग्राहकों को बुला रहा है।
कोई पुराना अपमान बार-बार अपना हिसाब माँग रहा है।
मनुष्य का मन अक्सर ऐसा ही होता है।
अजीब बात यह है कि इनमें से अधिकांश चीज़ों का इस क्षण से कोई संबंध नहीं होता, फिर भी वे हमारी ऊर्जा खाती रहती हैं।
हम समझते हैं कि हम थक गए हैं क्योंकि हमने बहुत काम किया है।
लेकिन कई बार सच्चाई यह होती है कि हमने बहुत सोचा है।
सोचना बुरा नहीं है।
पर हर विचार की अपनी एक कीमत होती है।
जैसे कोई वाहन ईंधन लेकर चलता है, वैसे ही विचार ऊर्जा लेकर चलते हैं।
एक विचार आता है तो केवल शब्द नहीं आता।
उसके साथ शरीर की दशा आती है।
भावना आती है।
स्मृति आती है।
वातावरण आता है।
सुनाई देने वाली ध्वनियाँ आती हैं।
दिखाई देने वाले दृश्य आते हैं।
अनुभवों का पूरा इतिहास आता है।
इन सबके मिलने से विचार जन्म लेता है।
इसलिए विचार एक घटना नहीं है।
वह अनेक ऊर्जाओं की बैठक है।
"मनुष्य की सबसे बड़ी गरीबी"
दुनिया में धन की गरीबी से भी बड़ी एक गरीबी है।
ऊर्जा की गरीबी।
और उससे भी बड़ी गरीबी है
ऊर्जा का बिखराव।
एक आदमी दिन भर मेहनत करता है।
दूसरा आदमी भी उतनी ही मेहनत करता है।
फिर भी एक व्यक्ति के काम में चमक दिखाई देती है और दूसरे के काम में नहीं।
क्यों?
क्योंकि पहला व्यक्ति अपनी ऊर्जा को साथ लेकर काम करता है।
दूसरा व्यक्ति केवल शरीर लेकर काम करता है।
उसका मन कहीं और होता है।
वह काम कर रहा होता है लेकिन भीतर किसी से बहस कर रहा होता है।
वह भोजन कर रहा होता है लेकिन भविष्य की चिंता कर रहा होता है।
वह परिवार के बीच बैठा होता है लेकिन अतीत के घाव कुरेद रहा होता है।
ऊर्जा शरीर के साथ नहीं है।
ऊर्जा कहीं और घूम रही है।
प्रकृति का एक अलग उदाहरण
एक पहाड़ के भीतर वर्षों तक पानी इकट्ठा होता रहता है।
बूँद-बूँद।
कोई शोर नहीं।
कोई घोषणा नहीं।
कोई प्रदर्शन नहीं।
सतह पर देखने वाले को लगता है कि कुछ हो ही नहीं रहा।
लेकिन एक दिन वही संचित जल पहाड़ के भीतर से रास्ता बना लेता है।
और एक झरने के रूप में फूट पड़ता है।
लोग उस झरने को देखकर चमत्कार कहते हैं।
पर चमत्कार उस दिन नहीं हुआ था।
चमत्कार तो उन वर्षों में हुआ था जब पानी चुपचाप एकत्रित हो रहा था।
मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही है।
लोग किसी महान व्यक्ति की उपलब्धि देखते हैं।
उन्हें लगता है कि अचानक कुछ हो गया।
लेकिन उन्हें दिखाई नहीं देता कि वर्षों तक उसने अपनी ऊर्जा को व्यर्थ की दिशाओं में बहने से रोका था।
उसने अपनी चेतना को बचाया था।
उसने अपने भीतर का पानी इकट्ठा किया था।
"ऊर्जा का सबसे बड़ा चोर"
हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे शत्रु बाहर हैं।
लेकिन ऊर्जा का सबसे बड़ा चोर बाहर नहीं बैठा।
वह भीतर बैठा है।
वह हर बात पर प्रतिक्रिया करना चाहता है।
हर आवाज़ पर मुड़कर देखना चाहता है।
हर विवाद में उतरना चाहता है।
हर आलोचना का उत्तर देना चाहता है।
हर तुलना में जीतना चाहता है।
उसे लगता है कि वह जीवन जी रहा है।
वास्तव में वह अपनी ऊर्जा के छोटे-छोटे टुकड़े बाँट रहा होता है।
और शाम तक उसके पास कुछ भी शेष नहीं बचता।
वर्तमान क्या है?
बहुत लोग वर्तमान को केवल समय का एक टुकड़ा समझते हैं।
लेकिन वर्तमान समय नहीं है।
वर्तमान वह स्थान है जहाँ आपकी पूरी ऊर्जा एक साथ उपस्थित हो सकती है।
जब आप किसी काम में पूरी तरह उपस्थित होते हैं, तब समय का बोध कम होने लगता है।
क्यों?
क्योंकि ऊर्जा बिखरी नहीं है।
वह एक जगह खड़ी है।
और जहाँ ऊर्जा एकत्रित होती है, वहाँ साधारण काम भी असाधारण होने लगते हैं।
बड़े लोग अलग क्या करते हैं?
वे अधिक ऊर्जा वाले लोग नहीं होते।
वे ऊर्जा को बचाने वाले लोग होते हैं।
वे हर लड़ाई नहीं लड़ते।
हर बहस में नहीं उतरते।
हर आकर्षण के पीछे नहीं भागते।
हर शोर को महत्व नहीं देते।
वे जानते हैं कि जीवन सीमित है।
ऊर्जा सीमित है।
और जो सीमित है उसे वहाँ लगाना चाहिए जहाँ उससे कुछ निर्मित हो सके।
कुछ ऐसा जो स्वयं से बड़ा हो।
कुछ ऐसा जो समय से आगे जा सके।
कुछ ऐसा जिससे केवल उनका नहीं, अनेक लोगों का भला हो।
यदि कभी जीवन को समझना हो तो अपने विचारों की संख्या मत गिनिए।
यह देखिए कि आपकी ऊर्जा कहाँ जा रही है।
जिस दिन यह दिखाई देने लगेगा, उसी दिन जीवन का एक नया अध्याय खुल जाएगा।
तब आप समझेंगे कि समस्या ऊर्जा की कमी नहीं थी।
समस्या यह थी कि घर का सारा अनाज खुले आँगन में पड़ा था और चिड़ियाँ उसे थोड़ा-थोड़ा करके ले जा रही थीं।
जीवन की साधना शायद इससे अधिक कुछ नहीं
अपने भीतर बिखरे हुए अनाज को समेटकर फिर से घर में रख देना।
जब ऊर्जा घर लौटती है, तब मन शांत होता है।
जब मन शांत होता है, तब दृष्टि साफ़ होती है।
और जब दृष्टि साफ़ होती है, तब मनुष्य केवल अपना जीवन नहीं जीता,
वह जीवन को समझना शुरू करता है।